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अब 'ब्लू अम्ब्रेला' लेकर आए हैं विशाल | |||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
'मकड़ी', 'मक़बूल' और 'ओंकारा' जैसी फ़िल्में बनाने वाले विशाल भारद्वाज ऐसे निर्देशक हैं जो सिर्फ़ बड़ों के लिए फ़िल्में बनाने में यक़ीन नहीं करते. बच्चों को समाज का आईना बताते हुए वे कहते हैं कि भारत में बच्चों के मनोरंजन वाली फ़िल्में बहुत कम है और हर फ़िल्ममेकर को बच्चों की कम से कम दो-तीन फ़िल्में ज़रूर बनानी चाहिए. फ़िल्म ओंकारा के बाद विशाल भारद्वाज ने कोई कमर्शियल फ़िल्म नहीं बनाई बल्कि बच्चों के लिए फ़िल्म 'द ब्लू अम्ब्रेला' के साथ वापस आए हैं. इस फ़िल्म में मुख्य भूमिका में अभिनेता पंकज कपूर और नई बाल कलाकार श्रेया शर्मा हैं. विशाल भारद्वाज से उनकी इस फ़िल्म और निजी जीवन से जुड़े विभिन्न पहलुओं पर हुई बातचीत के मुख्य अंश: फ़िल्म 'द ब्लू अम्ब्रेला' के बारे में कुछ बताइए ? 'द ब्लू अम्ब्रेला' रस्किन बांड की कहानी पर आधारित है. यह पहाड़ों के बहुत ही छोटे से गाँव के एक छोटी बच्ची और साठ साल के बूढ़े नंदकिशोर खत्री की कहानी है. इनकी एक दूकान है और इनके रिश्तों के आसपास ही कहानी घूमती है और अम्ब्रेला उसका माध्यम है. फ़िल्म का नाम 'ब्लू अम्ब्रेला' ही क्यों? क्योंकि इस फ़िल्म में बच्ची के छाते का रंग नीला है और छाता मिलने के बाद ही उसके जीवन में बदलाव आते हैं. रस्किन साहब ने ये कहानी सत्तर के दशक में लिखी थी और उसमें भी छाते का रंग नीला ही था. क्या इस फ़िल्म में बच्चों के लिए कोई संदेश है? किसी भी कहानी में अगर बच्चों को कोई संदेश दिया जाए तो वे ऊब जाते हैं क्योंकि उन्हें वैसे ही दिन भर किसी न किसी तरीके से हर कोई संदेश ही देता रहता है. मुझे लगता है ये ज़िम्मेदारी माँ-बाप की है कि वे अपने बच्चों को ये फ़िल्म दिखाए क्योंकि ये एक ऐसी फ़िल्म है जिसमें बच्चों को संदेश दिखेगा नहीं लेकिन उनके अंतर्मन पर संदेश का प्रभाव ज़रूर पड़ेगा. मुख्य किरदार में पंकज कपूर और श्रेया शर्मा हैं, इनके चुनाव आपने कैसे किया ? श्रेया एक बहुत ही अच्छी कलाकार है. इस किरदार के लिए कई शहरों में बच्चे तलाश करने के बाद इस बच्ची को शॉर्टलिस्ट किया. जहाँ तक पंकज कपूर की बात है तो वे एक बहुत ही बेहतरीन कलाकार हैं और ऐसे फनकार के साथ काम करना मेरे लिए सौभाग्य की बात है. वे कोई किरदार की भूमिका नहीं करते बल्कि वो किरदार बन जाते हैं. मैं मानता हूं कि उनकी अभिनय क्षमता के हिसाब से उन्हें इंडस्ट्री में रोल नहीं मिले हैं. आप हमेशा से कुछ हटकर फ़िल्में बनाने के लिए जाने जाते हैं फिर चाहे वह बच्चों की फ़िल्म 'मकड़ी' हो या फिर 'ओमकारा' ? मैं इसके लिए अपनी ओर से कोई ख़ास कोशिश करता. शायद मेरा वयक्तित्व ही लीक से हटकर है और इसीलिए मैं जो भी सोचता हूँ वो हमेशा टेढ़ा ही होता है. जैसी कहानी मिलती है और वह जैसा काम करने के लिए उत्साहित करती है मैं काम करना शुरू कर देता हूँ. अगर कल को मुझे 'अमर, अकबर अंथनी' जैसी फ़िल्म मिल जाए तो मैं उसे भी मसालेदार बनाने की कोशिश करूंगा.
आपका बच्चों की फ़िल्में बनाने में भी बराबर का योगदान रहा है. इसकी कोई ख़ास वजह? मुझे लगता है मैं ख़ुद भी अभी बच्चा हूँ और इसी एहसास के लिए ऐसी फ़िल्मों को बनाता हूँ. दूसरी वजह ये कि हमारे यहाँ बच्चों के मनोरंजन के लिए बहुत कम साधन और चीज़ें हैं. मुझे इस बात का बहुत दर्द है कि हमारे यहाँ के बच्चे दिन भर बाहर का सॉफ़्टवेयर देखते रहते हैं या फिर वीडियो गेम्स खेलते हैं. इसके चलते हमारे बच्चे अपनी संस्कृति से परिपूर्ण कहानियों और उन तमाम चीज़ों से परे हो जाते हैं, जो उन्हें जानना चाहिए. आपकी फ़िल्म मकड़ी को अवार्ड मिल चुका है, क्या इस फ़िल्म से भी आपको ऐसी उम्मीद है ? इस फ़िल्म से भी मुझे काफ़ी उम्मीदें हैं. काफ़ी इंटरनेशनल फ़िल्म फ़ेस्टिवल में ये फ़िल्म जा चुकी है और अभी भी जा रही है. देखते हैं अवार्ड के समय क्या होता है. फ़िल्म इंडस्ट्री में बच्चों के लिए फ़िल्में कम ही बनती हैं. इसकी क्या वजह मानते हैं ? मनोरंजन इंडस्ट्री का एक हिस्सा होने के बावजूद हम बच्चों को कोई अहम दर्जा नहीं देते हैं. मेरे ख़्याल से हर फ़िल्ममेकर को बच्चों की कम से कम दो-तीन फ़िल्में ज़रूर बनानी चाहिए. मेरी यह मुहिम तो मकड़ी से ही शुरू हो गई है. आपने इंडस्ट्री में आने के लिए हारमोनियम से शुरुआत की है, अपना सफ़र किस तरह देखते हैं ? बहुत ही अच्छा और मज़ेदार सफर रहा है. काफ़ी मेहनत भी की और आज जो भी कुछ भी हासिल हुआ है वह मेरी मेहनत और सब्र का बहुत ही मीठा फ़ल है. संगीतकार, गायक या फिर पूरे तौर पर एक निर्देशक, कौन से काम से आपको ज़्यादा खुशी होती है? मैं एक निर्देशक के तौर पर बहुत ज़्यादा ख़ुश हूँ क्योंकि निर्देशक रहते मैं अपने संगीतकार की इच्छा भी पूरी कर सकता हूँ. निर्देशक पूरी फ़िल्म को निर्देशित करता है और संगीतकार, गायक उसका एक हिस्सा होते हैं. आपकी दो फ़िल्में मक़बूल और ओंकारा शेक्सपियर के प्ले पर आधारित है. इसकी कोई ख़ास वजह ? शेक्सपियर से कौन नहीं प्रभावित है. उनके ऊपर तो कितनी पीएचडी हो चुकी है और अभी भी हो रही है. मैं इस मामले में बहुत ही ख़ुशनसीब हूँ कि हमारे यहाँ किसी ने उनके प्ले पर कोई फ़िल्म नहीं बनाई थी और ये मौक़ा मुझे मिल गया.
फ़िल्म को हिट बनाने के लिए बड़े-बड़े कलाकारों की ज़रूरत होती है या फिर वह अच्छी कहानी के ऊपर चलती है ? फ़िल्म क्यों नहीं चलती ये तो आजतक कोई नहीं बता पाया, लेकिन मेरे हिसाब से अगर कहानी अच्छी है और उसे सही तरीक़े से पेश किया जाए तो उसके चलने के आसार ज़्यादा होते हैं. आपने अपनी फ़िल्म मकड़ी खुद लिखी थी, आगे भी क्या हम आपकी कहानी पर फ़िल्में देख पाएँगे ? ज़रूर देख पाएँगे. मैं भी पूरी कोशिश कर रहा हूँ कि अगली फ़िल्म मेरी अपनी कहानी हो. जिसके लिए मैंने कुछ तैयारियाँ भी शुरू कर दी हैं. | इससे जुड़ी ख़बरें 'ख़्वाहिश शाहरुख़ के साथ काम करने की'01 जनवरी, 2007 | पत्रिका 'बाबुल भी और काबुल एक्सप्रेस भी'03 दिसंबर, 2006 | पत्रिका 'औरत होना मेरी सबसे बड़ी पहचान है'02 नवंबर, 2006 | पत्रिका 'शाहरुख़ वाले किरदार चाहता हूँ, कौन देगा?'29 सितंबर, 2006 | पत्रिका 'मैं एक पढ़ा-लिखा कलाकार हूँ'15 सितंबर, 2006 | पत्रिका पुराने सिनेमाघरों पर मल्टीप्लेक्स की मार18 अप्रैल, 2006 | पत्रिका अब 'राजश्री' की दूसरी पारी27 अप्रैल, 2006 | पत्रिका | |||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
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