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'मैं एक पढ़ा-लिखा कलाकार हूँ' | |||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
अभिनेता अनुपम खेर ने ढेर सारी फ़िल्मों में काम किया है जिनमें से ज़्यादातर व्यावसायिक फ़िल्में हैं. लेकिन वे बीच-बीच में सशक्त कहानी वाली कम बजट की फ़िल्मों में भी दिखते रहते हैं, मिसाल के तौर पर 'मैंने गाँधी को नहीं मारा.' मुंबई में बीबीसी के दुर्गेश उपाध्याय ने उनसे विशेष बातचीत की. 'खोसला का घोसला’ किस तरह की फ़िल्म है? ‘खोसला का घोसला’ उन करोड़ों हिंदुस्तानियों की कहानी है. जो अपनी छोटी सी जमा पूंजी से अपना एक घर बनाने का सपना देखते हैं. मैं इस फ़िल्म में खोसला, जो कि फ़िल्म का टाइटल भी है, उसका किरदार निभा रहा हूँ. इसके तीन बच्चे दो बेटे,एक बेटी है. खोसला का सपना अपनी ज़मीन लेकर मकान बनाने का है. इस तरह की बातें आप ज़्यादातर नार्थ इंडिया में ज़्यादा पाएंगे. ये कहानी अपने आपमें काफी शेड्स बटोरे हुए है. मूल रूप से ये कहानी दिल्ली की है. क्या आपको लगता है कि एक आम इंसान को आज अपना घर बनाने में जितनी जद्दोजहद करनी पड़ती है, ये फ़िल्म उन परिस्थितियों को अच्छे ढंग से दर्शकों के सामने लाएगी? एक आदमी कितनी जद्दोजहद करता है मकान बनाने के लिए. मेरा ये मानना है कि ये फ़िल्म उसे दिखा पाने में कामयाब साबित होगी. इस कहानी में ये दिखाने की कोशिश की गई है कि कैसे खोसला अलग तरह का घर चाहता है, उसकी बीवी और बच्चे कुछ अलग चाहते हैं. खोसला एकदम आम इंसान है. इसलिए उसकी चाहत भी बिल्कुल सीधी है. इससे पहले भी आपने कई फ़िल्मों में कॉमेडी की है. कैसा लगा इस फ़िल्म में कॉमेडी करके? इस फ़िल्म में एक अलग तरह की कॉमेडी की है. फ़िल्म के पात्र कॉमेडी को कॉमेडी समझकर नहीं कर रहे हैं, बल्कि स्थितियां जो है वो कॉमेडी क्रिएट करती हैं. जैसे खोसला को सुबह सपना आता है कि वो मर गया है, फिर वो खांसता है. फ़िल्म में स्थितियां ही हंसी का सबब बनती हैं. ऐसा नहीं है कि मैं ‘दिल’ के हजारीप्रसाद या ‘दिल है कि मानता नहीं’ जैसा किरदार कर रहा हूं. आपके साथ फ़िल्म में बोमन ईरानी भी हैं, उनके साथ काम करके कैसा लगा? बोमन ईरानी एक अच्छे कलाकार हैं, बहुत मिलनसार हैं. उनके साथ काम करके नहले पे दहला जैसी स्थिति होती है. दिबाकर बनर्जी एक नए निर्देशक हैं, उनके साथ काम का कैसा अनुभव रहा? देखिए मैंने इससे पहले भी कई नए निर्देशकों के साथ काम किया है दिबाकर में काफ़ी उत्साह है, उत्साह के साथ-साथ एक मासूमियत भी देखने को मिलती है. वो अपना काम बखूबी जानते हैं. उनकी फ़िल्म के बारे में जो रिसर्च थी वो वाक़ई कमाल की थी. अनुपम जी आपने ढेर सारी समानांतर फ़िल्मों में काम किया है. क्या आपको लगता है कि अब उस तरह के सार्थक सिनेमा में कमी आ रही है? देखिए सवाल समानांतर या कॉमर्शियल सिनेमा का नहीं है. ज़रूरी नहीं कि समानांतर सिनेमा में सारी अच्छी और कॉमर्शियल सिनेमा में सारी बुरी फ़िल्में बनती हैं, हाँ इतना ज़रूर है कि अब दर्शक ज़्यादा शिक्षित हो गए हैं. इसलिए अगर अच्छी फ़िल्म बनती है तो वो निश्चित रूप से अच्छा करेगी. ये एक अच्छा दौर है जब आप कोई अच्छी फ़िल्म बना सकते हैं. आपने समानांतर सिनेमा और कॉमर्शियल सिनेमा दोनों में ढेर सारा काम किया है. कितना अंतर महसूस करते हैं और आप किस तरह की फ़िल्म पसंद करते हैं? देखिए जो अच्छा एक्टर होता है वो कहीं भी जिस तरह की आप बात कर रहे हैं, दोनों जगह अच्छा काम करता है. मैं एक पढ़ा-लिखा कलाकार हूँ इसलिए अपने काम को बखूबी समझता हूँ. इसके बाद दर्शकों पर छोड़ देता हूँ कि वो फैसला करें. ढेर सारी बाहर की फ़िल्मों में भी अपने काम किया है. कितना अंतर महसूस करते हैं, बॉलीवुड और बाहर के सिनेमा की फ़िल्म मेकिंग में? टैलेंट में कोई अंतर नहीं है. अंतर केवल प्रोफेशन्लिज्म में है. अंतर दृष्टिकोण में है. लेकिन हमारे यहाँ काफ़ी बेहतर लोग हैं. थोड़ा सा और ज़्यादा प्रोफेशनल होने की ज़रूरत है. निर्देशन में भी आपने हाथ आजमाया है, क्या आगे भी कुछ करने जा रहे हैं? हाँ, एक स्क्रिप्ट पर काम चल रहा है, अगले साल की शुरूआत में फ़िल्म बननी शुरू होगी. ये एक रोमांटिक कॉमेडी होगी, नाम अभी पूरी तरह फाइनल तो नहीं लेकिन टेंटिवली ‘प्यार है तो कह दो यस’ | इससे जुड़ी ख़बरें वीडियो-टीवी भी सेंसर सर्टिफ़िकेट लें: खेर28 जुलाई, 2004 | पत्रिका अनुपम खेर से इस्तीफ़ा देने को कहा गया13 अक्तूबर, 2004 | पत्रिका शर्मिला टैगोर सेंसर बोर्ड की नई अध्यक्ष13 अक्तूबर, 2004 | पत्रिका अनुपम खेर का सुरजीत को क़ानूनी नोटिस14 अक्तूबर, 2004 | पत्रिका सारे लटके-झटके हैं 'ब्राइड एंड प्रेज्युडिस' में22 जुलाई, 2004 | पत्रिका | |||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
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