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मंगलवार, 18 अप्रैल, 2006 को 20:30 GMT तक के समाचार
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पुराने सिनेमाघरों पर मल्टीप्लेक्स की मार

अल्फ्रेड सिनेमा
मल्टीप्लेक्स के आ जाने से पुराने सिनमा हॉलों की स्थिति गंभीर है
मल्टीप्लेक्स सिनेमाघरों ने जिस तरह से शहरों में अपने पैर पसारे हैं, उसके कारण पुराने सिनेमाघरों को दर्शकों को जुटाने के लिए कड़ी मशक्कत करनी पड़ रही है.

मल्टीप्लेक्स सिनेमाघरों में जिस तरह से फ़िल्म से लेकर खानेपीने और शॉपिंग तक का पूरा ख्याल रखा जाता है, उसका असर पुराने सिनेमाघरों की भीड़ पर पड़ रहा है.

इनमें से कई सिनेमाघरों के पास अपनी रोजी- रोटी और देखरेख के लिए ‘बी’ और ‘सी’ ग्रेड की फ़िल्में दिखाने के अलावा और कोई चारा नहीं बचा है.

आइए नज़र डालते हैं मुंबई के ऐसे ही कुछ सिनेमाघरों की, जो मल्टीप्लेक्स के ज़माने मे किस तरह से अपना अस्तित्व बनाए रखने की जद्दोजहद कर रहे हैं.

अलंकार सिनेमा, ग्रांट रोड

1962 में बना यह थियेटर इस शहर की पहचान के रूप में जाना जाता है. क़रीब एक हजार लोगों के बैठने की जगह यहां पर उपलब्ध है.

मज़ेदार बात यह है कि पुराने दौर में कई कलाकारों की यह सबसे पसंदीदा जगह मानी जाती थी.

कई बार अकेले तो कई बार अपने निर्माता-निर्देशकों के साथ आकर फ़िल्में देखना तो कलाकारों की ज़िंदगी का एक अहम हिस्सा थी.

अलंकार सिनेमा के मैनेजर सैयद एच. नक़वी बताते हैं, “आज बॉलीवुड के शहंशाह कहे जाने वाले अमिताभ बच्चन को उनके कैरियर का सबसे महत्वपूर्ण मौक़ा इसी थियेटर से मिला था. दिवंगत महमूद ने प्रकाश मेहरा को ‘बांम्बे टू गोवा’ फ़िल्म यही दिखाई तो उन्होंने अमिताभ बच्चन को ‘जंजीर’ में रोल दिया. ''

हालांकि नक़वी इस बात से भी इनकार करते हैं कि मॉडर्न सिनेमा हॉल और मल्टीप्लेक्स आ जाने की वजह से अलंकार सिनेमा उनसे मुक़ाबला नहीं कर सकता.

मोती सिनेमा, गिरगांव

खेतवाडी जैसे व्यस्त इलाक़े में होने की वजह से मोती सिनेमा में फ़िल्म दीवानों की लंबी कतार देखी जा सकती है.

745 सीट के इस थियेटर की नींव सन् 1930 में रखी गई थी. मल्टीप्लेक्स की मार खाने वाले सिनेमाघरों में से यह एक कहा जा सकता है.

मैनेजर विनोद पांचाल के मुताबिक, “आज मल्टीप्लेक्सेस के जमाने में हम उनसे प्रतिस्पर्धा नहीं कर सकते हैं. इसलिए हमें वे फ़िल्में भी दिखानी पडती है जो मल्टीप्लेक्स में नहीं दिखाई जाती हैं.”

हिंदी में डब की हुई अंग्रेज़ी या दक्षिण भारतीय एक्शन फिल्में, सेक्स फिल्में, पौराणिक और पुरानी फ़िल्में भी दिखाई जाती हैं.

न्यू रोशन टॉकिज़, ग्रांट रोड

मुंबई के रेड लाइट इलाके में होने की वजह से इसकी अपनी एक ख़ास पहचान है.

न्यू रोशन सिनेमा
न्यू रोशन सिनेमा अब भी अपना अस्तित्व बचाए हुए है

सन् 1935 में बना 668 सीट का यह थियेटर एक्शन, सेक्स, ‘बी’ और ‘सी’ ग्रेड की फ़िल्में दिखाकर अपना काम चला रहा है.

मैनेजर जावेद कुरैशी मानते हैं, “थियेटर को ज़िंदा रखने के लिए इस तरह की फ़िल्में दिखाने के अलावा हमारे पास और कोई चारा नहीं है. नई फिल्मों के दाम इतने ज्यादा होते हैं कि ख़रीदना हमारे बस की बात नहीं है.”

टिकट के दाम 12 से 15 रूपए होने से दर्शकों को जुटाने के लिए ज्यादा मेहनत नहीं करनी पड़ती है. रीजिनल फ़िल्मों से ही करीब 80 फ़ीसदी का कलेक्शन हो जाता है.

भारतमाता टॉकिज़, लालबाग

भारतमाता टॉकिज़ मुंबई के मराठियों की पहली पसंद है. इसकी वजह यह है कि मुंबई में यह एकमात्र थियेटर है जहां वाजिब दाम में सिर्फ़ मराठी फ़िल्में ही दिखाई जाती हैं.

नेशनल टेक्सटाइल मिल्स की जमीन पर 1937 में लगभग 756 सीट वाले इस थियेटर की शुरूआत हुई.

मैनेजर कपिल भोपचकर बताते हैं, “फिछले दो साल से यहां पर सिर्फ़ मराठी फि़ल्में ही दिखाई जा रही हैं. सामान्य दिनों में 45-50 फीसदी कलेक्शन हो जाता है और छुट्टी के दिन तो 80-90 या कभी कभी 100 फ़ीसदी कलेक्शन भी हुआ है.”

वो याद करते हैं, “हमारे थियेटर में मराठी फिल्म ‘सांगते आइका’ लगातार 130 सप्ताह तक दिखाई गई थी. फि़ल्म ‘नवरा माझा’ ने 25 सप्ताह बख़ूबी पूरे किए थे. ”

पिछले साल इस थियेटर ने अपना हुलिया बदला और लकड़ी की कुर्सियों की जगह आरामदायक कुर्सियां लगाई गईं.

एक पुराने वॉचमैन ने कहा, “पहले तो सॉफ्टड्रिंक की जगह यहां पर रोज़ वॉटर दिया जाता था लेकिन आज समय बहुत बदल गया है ”.

अल्फ्रेड टॉकिज़, फॉकलैंड रोड

शहर के रेड लाइट एरिया फॉकलैंड रोड में होने की वजह से यहां पर सेक्स वर्करों की भारी भीड़ देखी जा सकती है.

1932 में बने इस पुराने थियेटर में 800 दर्शकों के बैठने की व्यवस्था है.

कई दूसरे थियेटरों की ही तरह इस थियेटर को भी अपने आपको बचाने के लिए सेक्स या फिर एक्शन फि़ल्मों से ही काम चलाना पड़ता है. टिकट का कम दाम होना दर्शकों की भारी भीड़ का मुख्य कारण है.

हेल्थ ऑरगनाइजेशन के एक कर्मचारी गणेश के अनुसार, “सेक्स वर्करों के लिए फ़िल्में सबसे सस्ता मनोरंजन होती हैं. चूंकि यहां पर कई बार सेक्स से जुड़ी फ़िल्में प्रदर्शित होती है तो ऐसे दर्शकों का हुजूम उमडना लाज़मी है.”

सुपर सिनेमा, ग्रांट रोड

सन् 1926 में 822 सीट के बने इस थियेटर में देश की पहली बोलती फिल्म ‘आलमआरा’ दिखाई गई थी.

देखा जाए तो मूक फ़िल्मों से लेकर बोलने वाली फिल्मों के सफ़र का गवाह है यह थियेटर.

मैनेजर सुरेश गगलानी स्वीकार करते हैं, “दिन ब दिन बढती प्रतिस्पर्धा, महंगाई और यहां पर आने वाले कमज़ोर तबके के दर्शकों की वजह से हम नई फ़िल्में नहीं दिखा पाते हैं. रीजिनल (भोजपुरी) फिल्मों से ही तकरीबन 80 प्रतिशत का कलेक्शन हो जाता है.”

गगलानी कहते हैं, “दर्शकों का एक बडा वर्ग बी ग्रेड की फिल्मों (जो सेक्स और एक्शन विषयों पर बनती है) की तरफ ज्यादा आकर्षित होता है.”

लेकिन इतना तो साफ़ है कि मल्टीप्लेक्स के दौर में भी कुछ थियेटर ऐसे हैं जो सिर्फ़ अपनी उपस्थिति ही नहीं दर्ज करा रहे है बल्कि लोगों का मनोरंजन भी कर रहे हैं.

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