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क्यों नहीं होती निर्देशकों की तुलना? | |||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
डॉन की रिलीज़ के साथ ही शाहरुख़ ख़ान और अमिताभ बच्चन की तुलना की जाने लगी थी. लोगों में ये बहस शुरू हो गई कि क्या शाहरुख, अमिताभ की बराबरी कर पाएँगे? फ़िल्म देखने के बाद कुछ समीक्षकों ने भी दोनों सुपरस्टार्स की तुलना में कितने पन्ने भर डाले. लेकिन किसी ने भी नई फ़िल्म डॉन के निर्देशक फ़रहान अख़्तर और पुरानी डॉन के निर्देशक चंद्रा बारोट के काम की तुलना की तरफ़ ध्यान भी नहीं दिया. आजकल फ़िल्म इंडस्ट्री में रीमेक फ़िल्मों की धूम है. डॉन के साथ साथ मुज़फ़्फ़र अली की क्लासिकल फ़िल्म उमराव जान की भी रीमेक बन चुकी है. इसके साथ ही राम गोपाल वर्मा अब मशहूर फ़िल्म शोले का रीमेक बना रहे हैं. उमराव जान की अगर बात करें तो ऐश्वर्या राय के अभिनय की तुलना रेखा से की जा रही है. रेखा ने अस्सी के दशक में मुज़फ़्फ़र अली की उमराव जान में शानदार अभिनय किया था. तुलना दरअसल रीमेक फ़िल्मों के बारे में कोई भी तुलना तब तक सही निष्कर्ष तक नहीं पहुँच सकती जब तक दोनों फ़िल्मों के सभी पक्षों का तुलनात्मक अध्ययन न किया जाय. फ़िल्मों में निर्देशक की अहम भूमिका होती है. कोई भी फ़िल्म एक निर्देशक की सोच होती है. कलाकार तो सिर्फ़ उसमें अभिनय करते हैं. किसी भी फ़िल्म का निर्देशक जहाज़ के उस कैप्टन की तरह होता है जिसके इशारे पर ही सब कुछ निर्भर है. फ़िल्म के सफल या असफल होने में उसकी सबसे ज़्यादा भूमिका होती है. लेकिन लोग सीधे तौर पर केवल हीरो/हीरोईन की ही तुलना करते दिखाई देते हैं. मुश्किल ये है कि ज्यादातर तुलनाएँ धारणाओं के आधार पर की जाती हैं. चूँकि फ़िल्म में मुख्य कलाकार और स्टार ही दिखते हैं, इसलिए उनके हावभाव हमें याद रह जाते हैं. जबकि फ़िल्मों के निर्देशक के बारे में बहुत कम बहस हो पाती है. उमराव जान की अगर बात करें तो हमें मुज़फ़्फ़र अली, ख़य्याम और शहरयार की तुलना जेपी दत्ता, अनु मलिक और जावेद अख़्तर से करनी चाहिए. मुज़फ़्फ़र अली ने अपनी फ़िल्म उमराव जान में उस समय की सांस्कृतिक और सामाजिक पृष्ठभूमि को उकेरा. फ़िल्म के किरदारों के चित्रण में कोमल और संवेदनशील भावनाओं को अधिक महत्व दिया. यही वजह है कि उनकी उमराव जान देखते समय लखनऊ की तहज़ीब, नज़ाकत की याद दिमाग़ में ताज़ा हो जाती है. निर्देशक इसके अलावा उमराव जान के सूनेपन को उन्होंने शहरयार की ग़ज़लों के ज़रिये बड़ी ही संज़ीदगी के साथ पेश किया. हमें देखना होगा कि जेपी दत्ता ने अपनी उमराव जान को किस रंग में ढाला है?
वरिष्ठ फ़िल्म पत्रकार अजय ब्रह्मात्मज कहते हैं, "दरअसल तुलना तो फ़िल्मों के निर्देशकों की ही होनी चाहिए, क्योंकि किसी भी फ़िल्म की संरचना वे ही सुनिश्चित करते हैं. अगर हम डॉन या उमराव जान की बात करें तो निर्देशकों का संदर्भ और दृष्टिकोण लिए बिना सितारों की तुलना करना बेनामी है." इसके साथ ही संगीत, सेट और कॉस्ट्यूम, भाषा, तकनीक, फोटोग्राफ़ी और अन्य पहलुओं पर भी विचार होना चाहिए. दर्शकों को भी स्टार्स की ही तुलना में ज़्यादा रुचि रहती है क्योंकि किसी भी एक पक्ष को लेकर वे जीत हार की भावना से बहस में शामिल हो जाते हैं. लेकिन किसी भी फ़िल्म की सही समीक्षा उसके निर्देशकों के काम की तुलना किए बिना शायद अधूरी ही मानी जाएगी. |
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