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बुधवार, 01 मार्च, 2006 को 12:58 GMT तक के समाचार
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खलनायक
खलनायक की छवि में बदलाव आया है
हिंदी सिनेमा ने बदलाव का हर दौर देखा है फिर चाहे वह फ़िल्में हो, अभिनेता हों या फिर खलनायक की बदलती छवि.

आज का खलनायक न ही 'मिस्टर इंडिया' का 'मोगेम्बो' होता है और न ही फ़िल्म 'शोले' का खौफ़नाक 'गब्बर' होता है.

चेहरे पर मासूमियत का नक़ाब, होठों पर मीठी मुस्कान लिए आज के खलनायक ने दर्शकों को रोमांचित ज़रूर किया है.

आपराध की दुनिया की कहानी बयान करती फ़िल्में नई नहीं हैं. लेकिन हां, समय के साथ अपराध करने का तरीका और खलनायक का चेहरा ज़रूर बदलता रहा है.

'शोले', 'मिस्टर इंडिया', 'रेशमा और शेरा', 'मेरा गांव मेरा देश', 'गंगा की सौगंध', 'डॉन' जैसी खलनायक प्रधान फ़िल्मों को अगर भुलाना आसान नहीं तो आज की 'कांटे', 'सरकार', 'सत्या', 'कंपनी', 'चॉकलेट' जैसी फ़िल्मों को भी भुलाना भी कठिन है.

प्राण, अमरीश पुरी, कन्हैयालाल, अमजद ख़ान, अजीत, प्रेम चोपड़ा और गुलशन ग्रोवर जैसे खलनायकों ने परदे पर अपने व्यक्तित्व के ज़रिए खलनायक का एक खौफ़नाक चेहरा पेश किया.

नायक भी, खलनायक भी

शाहरूख़ ने 'डर', संजय दत्त ने 'खलनायक' और आमिर ख़ान ने '1947 अर्थ' में खलनायक की भूमिका करके दिखा दिया कि हीरो और विलेन के बीच की रेखा धुँधली हो रही है.

अभिनेताओं की इस पहल को दर्शकों ने हाथों-हाथ लिया और खलनायक की भूमिका के लिए कई बड़े सितारों की शिरकत देख हर अभिनेता ऐसे किरदार के लिए दिलचस्पी दिखाने लगा.

समय के साथ-साथ खलनायकों की प्रस्तुतीकरण में भी बदलाव आया और ख़तरनाक, खौफ़नाक, बेडौल दिखने वाले खलनायकों की जगह ख़ूबसूरत, आकर्षक, छरहरे बदन वाले खलनायकों ने ली है.

 मैं बॉलीवुड का बेस्ट बैडमैन हूँ और पटकथा में खलनायक की ख़ास जगह के बिना मैं फ़िल्में नहीं करता हूँ
गुलशन ग्रोवर, चरित्र अभिनेता

शायद यही वजह है कि अमिताभ बच्चन, अभिषेक बच्चन, शाहरूख ख़ान, सैफ़ अली ख़ान, अक्षय कुमार, अजय देवगन जैसे अभिनेताओं को भी खलनायक का किरदार निभाने से गुरेज नहीं है.

इन अभिनेताओं ने अपनी आकर्षक देहयष्टि, चाल-ढाल और रूतबे से खलनायक की परिभाषा ही बदल दी है.

गुलशन ग्रोवर फ़िल्म इंडस्ट्री के प्रमाणित खलनायकों में गिने जाते हैं. ये ख़ुद खुले तौर पर कहते हैं, "मैं बॉलीवुड का बेस्ट बैडमैन हूँ और पटकथा में खलनायक की ख़ास जगह के बिना मैं फ़िल्में नहीं करता हूँ."

नए खलनायक

इसी क्रम में रंगमंच से फ़िल्मों तक का सफ़र तय करने वाले ज़ाकिर हुसैन भी हैं.

ज़ाकिर फ़िल्म 'सरकार' में अपने मज़बूत अभिनय के बलबूते दर्शकों के मन से खलनायक की छवि निकालने में ज़रूर कामयाब हुए हैं.

हाल ही में इन्हें इसी फ़िल्म के लिए 'स्टारडस्ट-द मेन्स' अवार्ड से सम्मानित भी किया गया.

ज़ाकिर कहते हैं, "मुझे बताया गया कि परदे पर सबसे ज़्यादा नफ़रत झेलने वालों में मैं भी हूँ लेकिन मुझे जानकर खुशी हुई कि परदे पर नफ़रत करने के लिए नामांकित लोगों में मैं सबसे योग्य पाया गया."

खलनायक
मुरली के काम की प्रशंसा हो रही है

ज़ाकिर अपनी आने वाली फ़िल्म 'डेडलाइन-सिर्फ़ 24 घंटे' के लिए काफी उत्साहित हैं.

वह कहते हैं, "इस फ़िल्म में मैं एक भावनात्मक खलनायक की भूमिका में हूँ. फ़िल्म में अपहरण की हुई बच्ची प्रिन्सी ज़्यादा समय तक मेरे साथ ही रहती है लेकिन फिर भी वह मुझसे नफ़रत नहीं करती है. इस फ़िल्म में मैं बुरा हूँ लेकिन ख़तरनाक नहीं."

वहीं कई टीवी धारावाहिकों और फ़िल्मों में अपने अभिनय कर चुके मुरली शर्मा फ़िल्म 'तीसरी आंख' में खलनायकी का नया रंग बिखेरते नज़र आएंगे.

इनका कहना है, "इस फ़िल्म में मेरा किरदार ऐसा है 'कि यू लव टू हेट मी'. खलनायक के किरदार में जान डालने के लिए कड़ी मेहनत की ज़रूरत पड़ती है और ये काम आसान नहीं होता है. मुझे यकीन है कि आने वाले समय में मैं एक हार्ड कोर विलेन के रूप में देखा जा सकूँगा."

लगता है कई वर्षों से उसी दहाड़ने वाले विलेन को देखकर दर्शक भी ऊब गए थे और कुछ नएपन के इंतज़ार में थे.

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