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जाने-माने अभिनेता अमरीश पुरी नहीं रहे | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
जाने-माने अभिनेता अमरीश पुरी का निधन हो गया है. वे 72 वर्ष के थे. बुधवार सुबह मस्तिष्क की नस फट जाने के कारण मुंबई में उनकी मृत्यु हो गई. उनके परिवार के लोगों के अनुसार उनके मस्तिष्क में ख़ून जम गया था और वे कोमा में चले गए थे. पिछले सप्ताह उनका ऑपरेशन भी हुआ था. उनके परिवार में उनकी पत्नी, एक बेटी और एक बेटा हैं. 22 जून 1932 को जन्मे अमरीश पुरी ने 1971 में रेश्मा और शेरा से अपने फ़िल्मी जीवन की शुरुआत की थी. लेकिन अभिनेता के रूप में उन्हें पहचान मिली निशांत, मंथन और भूमिका जैसी फ़िल्मों से. समांतर सिनेमा में चरित्र अभिनेता से अपना सफ़र शुरू करने वाले अमरीश पुरी सबसे ज़्यादा चर्चित रहे खलनायक की भूमिका में. शेखर कपूर की मिस्टर इंडिया में लोगों को मोगैंबो का चरित्र इतना पसंद आया कि सालों तक उन्हें इसी नाम से पुकारा जाता था. उनका डॉयलॉग 'मोगैंबो ख़ुश हुआ'- भी उतना ही चर्चित हुआ. लेकिन एक दौर के बाद अमरीश पुरी ने अपने को चरित्र भूमिकाओं में ढाल लिया और एक के बाद एक बेहरतीन भूमिकाएँ निभाईं और लोगों का दिल जीता. दिलवाले दुल्हनिया ले जाएँगे का चौधरी बलदेव सिंह भी लोगों को भूला नहीं है. उनका यह चरित्र भी देश-विदेश में काफ़ी लोकप्रिय हुआ. पिछले साल के आख़िर में उनकी दो फ़िल्में रिलीज हुई थीं- ऐतराज़ और हलचल. ऐतराज़ में उन्होंने अक्षय कुमार, करीना कपूर और प्रियंका चोपड़ा के साथ काम किया. तो हलचल में जैकी श्रॉफ़, अक्षय खन्ना, सुनील शेट्टी और करीना कपूर जैसे कलाकारों के साथ. जल्द ही रिलीज होने वाली सुभाष घई की फ़िल्म किस्ना में भी उन्होंने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है. उन्होंने स्टीवेन स्पीलबर्ग की फ़िल्म इंडियाना जोन्स एंड द टेम्पल ऑफ़ डूम में मोलाराम की भूमिका निभाई जो काफ़ी चर्चित रही. 1984 में बनी इस फ़िल्म की भूमिका के लिए अमरीश पुरी ने अपना सिर मुँडा लिया था. इस भूमिका का ऐसा असर हुआ कि उन्होंने हमेशा अपना सिर मुँडा कर रहने का फ़ैसला किया. इस कारण खलनायक की भूमिका भी उन्हें काफ़ी मिली. सफ़र चरित्र अभिनेता मदन पुरी के छोटे भाई अमरीश पुरी का अभिनेता की भूमिका के लिए 1954 में स्क्रीन टेस्ट हुआ था लेकिन तब निर्माता ने उन्हें हीरो की भूमिका देने से इनकार कर दिया था. लेकिन अमरीश पुरी को जैसे अभिनय के दुनिया में क़दम रखने की धुन सवार थी. उन्होंने थियेटर की ओर रुख़ किया और जिंगल्स में अपनी आवाज़ देनी शुरू की. 1971 में निर्देशक सुखदेव ने जब उन्हें रेश्मा और शेरा के लिए साइन किया, तो अमरीश पुरी उस समय 40 वर्ष के हो चुके थे. बाद में निर्माता सुनील दत्त ने फ़िल्म के निर्देशन का ज़िम्मा संभाला और अमरीश पुरी फ़िल्म में कहीं खो से गए. एक बार फिर उन्हें इंतज़ार करना पड़ा. थियेटर की दुनिया में अपना स्थान बना चुके अमरीश पुरी ने अपनी दूसरी पारी शुरू की श्याम बेनेगल के निर्देशन में. श्याम बेनेगल के निर्देशन में उन्होंने निशांत, मंथन और भूमिका जैसी फ़िल्मों में काम किया. इन फ़िल्मों में भूमिका से अमरीश पुरी को एक ख़ास वर्ग की वाहवाही ही मिल पाई. सफलता लेकिन 1980 में आई हम पाँच ने उन्हें कमर्शियल फ़िल्मों में भी स्थापित कर दिया. इस फ़िल्म में उनका दुर्योधन का किरदार काफ़ी चर्चित रहा.
विधाता और हीरो जैसी फ़िल्में क्या सुपरहिट हुईं, अमरीश पुरी भी सुपरहिट खलनायक बन गए. 1987 में आई मिस्टर इंडिया ने तो उन्हें लोकप्रियता के आसमान पर स्थापित कर दिया. लेकिन अमरीश पुरी का सिर नहीं घूमा. राम लखन, सौदागर, करण अर्जुन और कोयला जैसी फ़िल्मों में भी उनकी भूमिकाएँ सराही गईं. समांतर या यों कहें कि अलग हट कर बनने वाली फ़िल्मों के प्रति उनका प्रेम बना रहा और वे इस तरह की फ़िल्मों से भी जुड़े रहे. फिर आया खलनायक की भूमिकाओं से हटकर चरित्र अभिनेता की भूमिकाओं वाले अमरीश पुरी का दौर. और इस दौर में भी उन्होंने अपनी अभिनय कला का जादू कम नहीं होने दिया. गर्दिश का पुरुषोत्तम साठे हो या घातक का शंभूनाथ या फिर विरासत का राजा ठाकुर- अमरीश पुरी का जादू लोगों के सिर चढ़कर बोला. बीच-बीच में अमरीश पुरी खलनायक की भूमिका भी करते रहे. उन्होंने मुस्कुराहट, चाची 420 और हालिया रिलीज हलचल में हास्य भूमिकाएँ भी कीं और प्रशंसा बटोरी. |
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