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गंगा अमरीका कैसे आ सकती है? | |||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
आज बड़े-बड़े सुपरस्टार हर तरह के विज्ञापनों में दिखाई दे रहे हैं और उन चीज़ों का भी प्रचार कर रहे हैं जिन्हें वे अपने निजी जीवन में शायद इस्तेमाल भी न करते हों. ऐसे में ऐश्वर्या राय का एक बड़ी अमरीकी कंपनी का ऑफ़र सिर्फ़ इसलिए ठुकरा देना कि वह उससे आश्वस्त नहीं हैं, एक बड़ी बात है. ऐश्वर्या से एक कंपनी ने कहा था गंगा मिनरल वॉटर का अमरीका में प्रचार करने को. लेकिन ऐश्वर्या को यह बात कुछ जँची नहीं कि वह यह दिखाएँ कि गंगा अमरीका पहुँच गई है. उनका कहना था कि इससे भारतीयों की भावनाएँ आहत हो सकती हैं. पैसे और नाम की परवाह न करके एक विदेशी कंपनी के प्रचार अभियान में हिस्सा न लेने का यह फ़ैसला उनके प्रशंसकों के मन में उनका सम्मान ज़रूर बढ़ा देगा. * * * * * * * * * * * * * * * * * * * * * * * * * * * * * * * * * * * अच्छा अभिनय आज भी ज़िंदा है हिंदी सिनेमा के वे कलाकार जो स्टार भी हैं और अभिनेता भी, गिनेचुने ही हैं. संजय दत्त ऐसा ही एक नाम है जिसने अपने अभिनय का सिक्का तो मनवा ही लिया है, फ़िल्में उनके नाम पर बिकती भी हैं.
'वास्तव', 'काँटे' और 'मुसाफ़िर' जैसी फ़िल्में उनको ऐक्शन हीरो के रूप में सामने लाईं तो 'मुन्नाभाई एमबीबीएस' ने उन्हें यह दिखाने का मौक़ा दिया कि कॉमेडी में भी उनका जवाब नहीं है. 'ज़िंदा' भी एक ऐसी फ़िल्म है जिसमें संजू बाबा को अपने जौहर दिखाने का भरपूर अवसर मिला है. निर्देशक संजय गुप्ता की यह फ़िल्म बैंकॉक की अंडरवर्ल्ड की दुनिया का एक लेखाजोखा पेश करती है. पूरी फ़िल्म संजय दत्त के इर्दगिर्द घूमती है जिन्होंने एक ऐसे व्यक्ति की भूमिका निभाई है जो चौदह साल जेल की सलाख़ों के पीछे गुज़ारता है और आख़ीर तक यही पूछता है कि 'मेरा क़ुसूर क्या है'? फ़िल्म के अन्य कलाकार हैं जॉन अब्राहम, लारा दत्ता और सेलीना जेटली. * * * * * * * * * * * * * * * * * * * * * * * * * * * * * * * * * * * हम भी हैं मैदान में और अच्छे अभिनेताओं की ही बात हो रही है तो यह बात भी तय है कि इरफ़ान ख़ान भी इस मैदान में तेज़ी से अपने पाँव जमा रहे हैं.
मक़बूल के बाद अब उन्हें अपनी आने वाली फ़िल्म 'डेडलाइन' से बहुत उम्मीदें हैं. इरफ़ान का कहना है कि इस फ़िल्म को निर्देशक तनवीर अहमद ने जिस कुशलता से फ़िल्माया है वह अपने आप में एक मिसाल है. उनका कहना है कि फ़िल्म की एक ख़ूबी यह थी कि वह एक शेड्यूल में ही पूरी कर ली गई. हीरोइन कोंकणा सेन भी इस फ़िल्म से ख़ासी प्रभावित हैं. लेकिन इरफ़ान एक बात से ख़ुश नहीं हैं. वे कहते हैं कि उन्हें यह समझ में नहीं आता कि उन पर एक गंभीर रोल करने वाले ऐक्टर का ठप्पा क्यों लग गया है. अब उन्हें तलाश है कि एक हलके-फुलके रोल की जिसमें उन्हें कुछ हँसने-हँसाने का मौक़ा मिले. |
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