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शनिवार, 07 जनवरी, 2006 को 12:25 GMT तक के समाचार
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'कलाकार अकेला रहे तो अच्छा है'
आशा भोसले और लता मंगेश्कर
हिंदी फ़िल्मों की प्रसिद्ध गायिका आशा भोसले को हाल ही मे संगीत की दुनिया के प्रतिष्ठित ग्रैमी पुरस्कार के वर्ड म्यूजिक के तहत नामांकित किया गया है.

ये दूसरा मौक़ा है जब उन्हें इस प्रतिष्ठित पुरस्कार के लिए नामांकित किया गया. पिछले दिनों वे जब लंदन में बीबीसी बुश हाउस आईं तो रूपा झा ने उनसे बात की.

सवाल- आशा जी, 1933 में आपका जन्म हुआ और बहुत जल्दी ही आपके सिर से पिता का साया उठ गया तो कितने मश्किल भरे दिन थे?

जवाब- जी हाँ, घर से अगर कोई चला जाता है तो मुश्किल ही दिन आ जाते हैं. हर तरह से मुश्किल आई, पिता जी के जाने का बाद. हम लोग पूना में रहते थे फिर कोल्हापुर गए. वहाँ पर मराठी फ़िल्में बनती थीं. 1943 मैंने वहाँ पहला गाना गाया था. फ़िल्म मे मेरा पहला गाना था मराठी भाषा में. उसके थोड़े सालों बाद मुंबई आए. 1947 से लगातार हिंदी फ़िल्मों में हूँ.

सवालः आपको संगीत की शिक्षा पिता से ही मिली?

जवाब- पिता जी गाने वाले थे, क्लासिकल गाते थे, ड्रामा आर्टिस्ट थे, तो ड्रामा उन्हीं से मिला है. गाने में ड्रामा तो करना ही पड़ता है और आवाज़ भी उन्हीं से मिली है. उन्होंने जो थोड़ा बहुत सिखाया वो भी साथ में है, आशीर्वाद भी है. उसके बाद कहीं-कहीं सीखा, इधर-उधर सिखा बहुत लोगों से. लेकिन असल शिक्षा जो थी उन्हीं की थी जो बचपन में मिली.

सवाल- किस तरह से सिखाते थे? बड़ा कड़ा रियाज़ होता था क्या?

जवाब- हम लोग बहुत छोटे थे. कड़ा रियाज़ तो दीदी का होता था, सबसे बड़ी हैं. लेकिन बचपन में क्या बोलते हैं जब माँ कुछ कड़वा पिलाती है तो कभी भूलता नहीं है इंसान. इसलिए पिता जी ने जो सिखाया वह बैठ गया.

सवाल- पर दीनानाथ जी तो बहुत महान संगीतकार थे तो वो चाहते होंगे कि आप शास्त्रीय संगीत की तरफ़ जाएँ तो फिर आप लोगो ने हिंदी फ़िल्मों में जाने का क्यों तय किया?

जवाब- क्या है कि क्लासिकल हम गाते तब भी जीवनचर्या नहीं चल सकती थी. मैंने अपने गुरू जी से पूछा था कि मैं क्लासिकल गाऊँ या लाइट गाऊँ, और यह भी पूछा कि पैसा किसमें है. उन्होंने कहा लाइट में, तो मैं लाइट गाऊंगी. क्योंकि पैसे की सख़्त ज़रूरत थी. हर एक को होती है और उस वक़्त हम छोटे थे. हम सबको काम करना जरूरी था. दीदी तो कर ही रही थी. मेरी शादी होने के बाद भी मेरा काम करना बहुत जरूरी था. तो स्वभाविक रूप से फ़िल्म लाइन या लाइट में गए हम लोग.

शादी और मुश्किलें

सवाल- शादी के बाद भी आपकी मुश्किले कम नही हुईं, बढ़ ही गईं तो आप कैसे निपटती थीं? क्या था आपके अंदर जो आपको ताक़त देता था?

जवाब- मेरा ख़याल है कि जब इंसान पर कुछ पड़ती है तो एक इंसान ऐसा होता है जो सामना करके बाहर आता है, एक होता है जो रोता हुआ मर जाता है, एक होता है जो इस परिस्थिति से भाग जाता है. मैं सामना करने वालों में से हूँ. मैं लड़ाई करती हूँ हर चीज़ से और उस लड़ाई में जीते या मरे वह तो भगवान के ऊपर है. लेकिन मैं काफ़ी हद तक जीती क्योंकि मुझे बच्चों को बड़ा करना था. और वो मेरे दिमाग़ में इतना भरा हुआ था कि मुझे बच्चों को अच्छी तरह से बड़ा करना है.

आशा भोसले
आशा ने अनेक संगीतकारों के साथ काम किया

सवाल- तो अपने काम और घर के बीच कैसे समन्वय बिठा पाती थीं आप?

जवाब- वैवाहिक जीवन तो साथ में ही होता था, मेरे साथ ही रहते थे, साथ में आते थे, साथ में जाते थे, और घर में एक ही लड़का था तब. उसके बाद बेटी जब हुई तो जगह बदल कर हम शहर आ गए थे. सुबह जल्दी उठना, काम करना फिर गाने के लिए जाना, बच्चे को स्कूल छोड़ देना ये काम होते थे. लेकिन 1960 से मैं अकेली थी और तीन बच्चों को मैंने बड़ा किया है.

सवाल- आशा जी आपने शादी करना क्यों तय किया? आप एक जीवन साथी में क्या ढूंढ रही थीं?

जवाब- मैंने कुछ भी नहीं ढूंढा था और न मुझे मालूम था और न मेरी उम्र थी. मैं बहुत छोटी थी. ये पागलपन था. समझ लीजिए कि दुनिया बड़ी ज़ालिम है फायदा उठाती है. जब आँखे खुलीं तो देर हो चुकी थी. नहीं समझ आई. फिर अपने पैरों पर खड़ा होना बहुत ज़रूरी था, भगवान ने वह भी कर दिया. बस एक ही बात दिमाग में थी कि बच्चों को बड़ा करना और कुछ सोचना नहीं है. जब बहुत हो गया तब मैंने बच्चों को लेकर अकेले बड़ा किया.

सवाल- आशा जी, उन दिनों आपके भाई-बहनों मे सबसे बड़ा संबल कौन बन कर खड़ा हुआ?

जवाब- सारा घर ही खड़ा रहा. मैं ज़्यादा से ज्यादा 12-13 महीने थी वहाँ. मैंने यह सोच लिया था जब मैं शादी करके घर से गई थी तो उनका क़सूर नहीं था, जब मेरा समय ख़राब हो तो सर पर आकर बैठूँ, वह भी बराबर नहीं, तो मुझे अपने आप खड़े होना बहुत ज़रूरी था.

सवाल- लता जी की छाया मे पनपना ज़रा मुश्किल था? क्या कभी ऐसा लगा कि आप उनकी बहन नहीं होतीं तो थोड़ी आसानी होती?

जवाब- किसी समय ऐसा लगता था, जब यंग थे तो लगता था. लेकिन आज ऐसा लगता है कि जो होने वाला होता है वह एक ही होता है जो ईश्वर ने लिख दिया है. आपकी मेहनत आपकी ताक़त और आप किस तरह निभा रहे हैं सब चीज़ को. मेरी तो पूरी जिंदगी में जो कष्ट हुआ उसने जिंदगी के अंत में सब कुछ दे दिया.

सवाल- कहते हैं कि ओपी नय्यर साहब के साथ जो आपके गीत थे उन्होंने असल आशा को जन्म दिया.

जवाब- जी नहीं, मैं ऐसा नहीं मानती. मैं उन लोगों को मान देती हूँ जिन्होंने मुझे पहला गाना दिया. पहला गाना हंसराज बहल जी ने दिया, अल्लारखा ख़ान साहब ने दिया, लक्षीराम, धनीराम बहुत सारे संगीत निर्देशक थे, उन्होंने गाने गवाए. बाद में नाम होने के बाद हर कोई गवाता है. तक़दीर है हमारी कि हमने जो गाने गाए, चल गए, उसके बाद सब कहते हैं कि ओपी ने आपको नाम दिया, कोई कहते हैं आरडी, कोई एसडी को कहते हैं. मुझे लगता है कि मैंने मेहनत की, काम किया, अगर हमें गाना नहीं आता तो क्या हमें गाना मिलता. आज मैं सिंगर नहीं होती तो क्या बैठती. जिसने काम किया है जो जानता है अगर मुझे कुछ नहीं आता तो कोई नहीं बुलाता. फ़िल्म लाइन में कोई रिश्तेदारी नहीं होती. बहुत कमर्शियल लाइफ़ है यहाँ की. यहाँ आपको ऐसे हाथों पर उठाएंगे दो मंज़िल तक और हाथ निकाल लेंगे, आप धड़ से गिर जाएंगे, कोई नीचे उतारेगा भी नहीं.

अकेलापन

सवाल- आपने एसडी बर्मन के साथ भी काम किया और पंचम दा के साथ भी. दोनों के काम करने मे क्या फ़र्क था.

मंगेश्वर परिवार
परिवार में सभी लोग संगीत से जुड़े रहे

जवाब- एसडी बर्मन के साथ काम करना थोड़ा अलग था. उनका संगीत जो था वह ज़्यादातर लोक संगीत में जाते थे और पंचम थोड़ा वेस्टर्न तर्ज़ पर था. लेकिन मुझे ऐसा लगता है कि हर एक का अपना-अपना स्टाइल मज़ा देता था. मैं यह नहीं कह सकती कि एक ही संगीत निर्देशक बेहतर है. ठीक है, उनके गाने बहुत अच्छे थे और आज उन्हीं का नाम है उन्हीं के गाने चलते हैं. मैं सब मंज़ूर करती हूँ लेकिन ''अबके बरस भेज भैया को बाबुल'' ये कितने मायने रखता है जीवन में. या 'काली घटा छाए, मोरा जिया तरसाय' कितना अच्छा लगता है.

सवाल- अच्छा आपको कैसे लगा कि आपके जीवन में पंचम आने चाहिए?

जवाब- आने चाहिए मुझे नहीं लगा. उनको चाहिए था कि वो आए, मैंने किसी को बुलाया नहीं कभी. अपनी तकलीफों में, कामों में भिड़ी हुई थी, ऐसा वक़्त आया कि ठीक है. लेकिन एक बात कहूँ? आर्टिस्ट अकेला हो बहुत अच्छा होता है. आर्टिस्ट जितना अकेला होता है उतना अच्छा काम कर सकता है. कोई भी आर्टिस्ट हो चाहे संगीत निर्देशक हो, लेखक हो, कोई भी हो, इन लोगों के लिए, इनका जो काम है वही उनकी बीवी है और काम ही मेरा पति है. मुझे अच्छा याद आया कि पंचम के गुज़रने के कुछ दिनों बाद गोपी कृष्ण घर पर आए थे. मुझे देखकर बोले, हे 'बहना क्या ऐसी बैठी रहेगी? तेरा ख़सम ये नहीं, तेरा ख़सम गाना है. अपने ख़सम को याद कर और जा इधर से, आर्टिस्ट का बीवी, हस्बेंड या भगवान काम होता है. तो जो लोग काम करते हैं, क्रिएट करते हैं तो अकेले होना अच्छा है. वह फ्रीडम उनकी अलग होती है, उस फ्रीडम में अच्छा काम करते हैं. उनको जहाँ बंधन आता है, बस वहीं उनकी कला समाप्त हो जाती है इसीलिए उनको अलग रहना चाहिए, फ्री रहना चाहिए. औरत की बात अलग है.

सवाल- अच्छा, आप जब कोई गीत गाती हैं, तो क्या सोचती है?

जवाब- कुछ नहीं होता है. सब लोग गलत समझते हैं कि हम अपने जीवन को याद करके गाते हैं. ऐसा नहीं होता है. इसके साथ हमारी निजी ज़िंदगी का कोई संबंध नहीं होता है. लोग जो कहते हैं कि ये दुखी हैं तो अच्छा गाता है, ये सब झूठ है, आदमी सुखी होना चाहिए, पैसा होना चाहिए, वह काम अच्छा करता है.

सवाल- आप जब बहुत ख़ुश होती हैं तो कोई तो गीत होगा जो आपको गाने या गुनगुनाने का मन करता होगा, शौक से क्या करती हैं?

जवाब- जो मुँह में आता है गाती रहती हूँ. किसी का भी हो सकता है सिर्फ़ मेरा ही नहीं.

सवाल- आपके कौन पसंदीदा गायक-गायिकाएँ हैं जिनके गीत आपको सुनना अच्छा लगता है?

जवाब- लता दीदी मेरी पहली पसंद हैं, नूरजहाँ हैं, ग़ुलाम अली हैं, मेंहदी हसन हैं, अच्छा लगता है जो सुर में गाते हैं.

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