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हादसों ने अहसास दिलाया ज़िम्मेदारी का | |||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
'गमन' और 'उमराव जान' जैसी हिट फिल्मों से शोहरत पानेवाले मुज़फ़्फ़र अली एक बहुआयामी कलाकार हैं. पैंटिंग,फोटोग्राफी और फैशन-डिज़ाइनिंग में गहरी दिलचस्पी के बावजूद उनका पहला शौक़ फिल्म ही है. फिल्म 'ज़ूनी' की नाकामी से मुज़फ़्फ़र अली ने हिम्मत नहीं हारी है और अब वह मशहूर सूफ़ी संत 'रूमी' के जीवन और फ़लसफ़े पर एक बड़े बजट की फिल्म बनाने की तैयारी में लगे हैं. पेश है सूफ़िया शानी के साथ उनकी बातचीत के अंश: 'घर में शुरू से तो फ़िल्म का माहौल नहीं था . हमारा शरफ़ी ख़ानदान गुजरात के फ़ुगवाड़ा इलाक़े से अवध आया था. ज़ाहिर है वह नवाबी दौर था. लेकिन हमने अवध का पतन भी देखा. 1857 की पहली जंग-ए-आज़ादी, उसके बाद 1947 में आज़ादी के साथ मिला बंटवारा और ख़ून-ख़राबा...फ़िर बाबरी मस्जिद हादसा, इन चीज़ों का कभी न मिटने वाला असर किसी भी क्रिएटिव दिमाग़ पर पड़ता ही है. सो हमारे दिमाग़ पर भी पड़ा. इन हादसों से दिल को तकलीफ़ तो पहुंचती ही है लेकिन साथ ही समझदारी और होशमंदी भी पैदा होती है. आप समाज के ताने-बाने को समझने लगते हैं. समाज में अपनी हैसियत और अपनी ज़िम्मेदारी का अहसास भी होने लगता है. दिमाग़ में जो कुछ चल रहा होता है...वो व्यक्त होना चाहता है. ज़ाहिर है वह अभिव्यक्ति कलात्मक अंदाज़ मे ही हो सकती है. फ़िल्म की ओर रुझान मेरा मिज़ाज शुरू से ही आर्टिस्टिक रहा है......पेंटिंग,फोटोग्राफ़ी और म्युज़िक का शौक़ रहा है. लिखने से ज़्यादा मुझे फिल्म का माध्यम आकर्षित करता रहा है और फिल्म एक ऐसा माध्यम है जिसमें फोटोग्राफ़ी, पेंटिंग और म्युज़िक हर चीज़ की समझ काम आती है. फिर अवध से मुझे कलात्मक्ता और रुमानियत मिली. दस्तकारी, ख़ुशनुमा लिबास और उन्हें पहनने के नफ़ीस अंदाज़. और इन सभी चीज़ों का मैंने अपनी फिल्मों में इस्तेमाल किया . मेरी पहली फिल्म थी 'गमन'. यह फिल्म गन्ना किसानों की ज़िदगी पर बनाई गई थी. इस फिल्म की कामयाबी से हौसला बढ़ा और उसी के बाद फिल्म 'अजुंमन' बनायी. यह फिल्म अवध की दस्तकारी और दस्तकारों के जीवन पर बनाई गई थी. उमराव जान के बारे में सभी जानते हैं. उस फिल्म में भी अवध के पूरे कल्चर को ज़िन्दा करने की कोशिश की गई थी और कामयाबी भी मिली. हर नए काम में नए प्रयोग की कोशिश भी मैंने की है. मिसाल के तौर पर 'उमराव जान' में शहरयार साहेब की ग़ज़लें और आशाजी की आवाज़ के प्रयोग को काफ़ी सराहा गया.उससे पहले न तो शहरयार साहेब ने कभी फिल्मों के लिए ग़ज़लें लिखी थीं और न ही आशाजी ने फिल्मों में ग़ज़लें गाई थीं.
सच कहूँ तो मुझे 'उमराव जान' में जो भी हुआ अच्छा लगता है. गाने की बात करें तो 'जुस्तजू जिसकी थी, उसको तो न पाया मैंने...' मुझे आज भी बहुत अच्छा लगता है. और सीन की बात करें तो मुझे फिल्म का आख़िरी दृश्य बेहद अच्छा लगता है जहँ उमराव जान की माँ उसे स्वीकार करने से मना कर देती है. उसी सीन के बैकड्रॉप में यह गाना चलता है, 'ये क्या जगह है दोस्तों....' ज़ूनी की विफलता 'ज़ूनी' भी कश्मीर की मशहूर शायरा हब्बा ख़ातून की ज़िंदगी पर बनाई जा रही थी. दरअसल कश्मीर के दिल की धड़कन को अब भी कोई पहचान नहीं रहा है. वहाँ के हालात को महज़ ऊपर से ही देखा जा रहा है. एक तो वहाँ का हुस्न है जो चीख़-चीख़ कर बोलता है...और दरअसल कशमीर पर जो बीत रही है उसे अल्फाज़ में या किताब के ज़रिए बयान नहीं किया जा सकता. फिल्म ही उसकी सही तस्वीर पेश कर सकती है. वहाँ के हालात के विभिन्न डायमेशंस को फिल्म के ज़रिए ही पेश किया जा सकता है. वही कोशिश मैंने की थी, जो अधूरी रह गई. मेरे बेटे शाद अली ने बॉलीवुड में अपनी पहचान बनाली है लेकिन मेरे और उनके नज़रिए में ज़मीन-आसमान का फ़र्क़ है. उन्होंने बॉलीवुड की नब्ज़ को समझ लिया है. वह जानते हैं कि किसी भी फिल्म का पॉपुलर होना ज़रूरी है. लेकिन मेरा यह तरीक़ा नहीं है. मेरे लिए फिल्म का मक़सद ज्यादा ज़रूरी है जिसे मैं कलात्मक अंदाज़ में पेश करने की कोशिश करता हूं. शायद इसीलिए बॉलीवुड हमारी दुनिया नहीं मीरा.. मेरी हमसफ़र हैं और उनका साथ होना मेरे लिए बेहद ज़रूरी है. दूसरे शब्दों में कहूँ तो जब दो क्रिएटिव ज़ेहन मिल जाते हैं तो काम आसान हो जाता है. हम दोनों खूब डूब कर एक दूसरे के कामों में दिलचस्पी लेते हैं. बचपन से ही मुझ पर महिलाओं का काफ़ी प्रभाव रहा है. 'उमराव जान' या 'हब्बा ख़ातून' से बहुत पहले अपनी मां से मुझे ज़िंदगी का नज़रिया मिला. मैंने उनकी ज़िंदगी को बेहद क़रीब से देखा. जिन हालात से वह जूझती रहती थीं..जिस तरह वह सबको साथ ले कर चलने की कोशिश करती थीं. सबसे ज़्यादा मैं अपनी माँ से ही प्रभावित रहा. मुझे लगता है कि हमारे यहॉ औरत ख़ुद अपने जाल में ऐसी फँस जाती है कि उसे उससे निकलने की ज़रूरत ही महसूस नहीं होती. औरत बेहद हस्सास होती है, औरत में गहराई होती है, औरत में समर्पण का माद्दा होता है, उसमें कलात्मकता होती है, नफ़ासत होती है. अपने समाज की सही तस्वीर औरत के ज़रिए ही पेश की जा सकती है. इसी लिए मैं मानता हूँ कि बेटी की परवरिश एक चैलेंज है. जब वह चैलेंज मां -बाप नही उठा पाते तो बेटी बोझ बन जाती है. मेरी बेटी सबा है. दूसरी बेटियों की तरह वह भी ज्यादा अटेंशन चाहती है. मुझे लगता है कि अगर गहरी ज़िम्मेदारी से बेटी की परवरिश नहीं होगी तो उसकी तालीम अधूरी रह जाएगी. अभी ठहरा नहीं हूं. फोटोग्राफी, पैंटिंग और फैशन शो जारी हैं. सूफ़ी-संतों पर फिल्में बनाने की तैयारी भी चल रही है. 'जहॉन-ए-ख़ुसरो' और 'पैग़ाम-ए-मुहब्बत' के लिए रिसर्च का काम हो चुका है. पहली फिल्म ज़ाहिर है अमीर ख़ुसरो पर होगी और दूसरी विश्वविख्यात सूफ़ी सलाहउदीन 'रूमी' की ज़िंदगी पर. रूमी की ज़िंदगी और फ़लसफ़े पर फिल्म बनाना एक बड़ा चैलेंज है क्योंकि इसका कैनवास बड़ा होगा और इसमें दुनिया के एक बहुत बड़े हिस्से की दिलचस्पी होगी'. |
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