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गुरुवार, 11 अगस्त, 2005 को 07:32 GMT तक के समाचार
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अख़बार की दुनिया में...
ऑब्जेक्शन मी लॉर्ड
लेखिका निर्मला भुराड़िया नई दुनिया, इंदौर में सह-संपादक हैं
इस पखवाड़े की पुस्तक में निर्मला भुराड़िया की 'ऑब्जेक्शन मी लॉर्ड'.

इस पुस्तक में निर्मला भुराड़िया ने दो ऐसी दुनियाओं में झांकने की कोशिश की हैं जो दोनों ही अपने-अपने स्तर पर जटिल हैं.

एक है स्त्रियों की दुनिया और उसका दर्द. इस दुनिया में पात्र सहज दुनियावी पात्र हैं जो अपने दुख, सुख, अभाव, अधूरेपन के बीच छोटे-छोटे सुखों के लिए जीते दिखाई पड़ते हैं.

और दूसरी दुनिया है अख़बार की दुनिया. हिंदी में अब तक इस दुनिया के बारे में बहुत कुछ नहीं लिखा गया है और यदि लिखा भी गया है तो इतने विस्तार से नहीं लिखा गया है और न इस दुनिया को इतने भीतर से झांकने की कोशिश इससे पहले बहुत की गई है.

यह पुस्तक एकबारगी अख़बार की छुपी हुई दुनिया से पर्दा हटाती दिखाई देती है और उन लोगों को थोड़ा चकित भी करेगी जो अख़बार की दुनिया से अपरिचित हैं.

प्रस्तुत है पुस्तक का एक अंश -

अख़बार के दफ़्तर में एक नया सितारा उदित हुआ है. नहीं, किसी पुरस्कार विजेता लेखक ने अख़बार ज्वाइन नहीं किया है. न ही किसी संवाददाता ने कोई दमदार रिपोर्ट लिखकर कोई ख्याति प्राप्त की है. तेईस वर्षीय इस सितारे का उदय हुआ विवाह के ज़रिए. ये छोटे जालानजी के जमाई बाबू हैं, इसलिए सितारा हुए ही हुए. मीना से सगाई तय होते ही इनके नाम विज्ञप्तियों में तो चमकने ही लगे थे. अब शादी हो गई तो यह सीधे अख़बार के दफ़्तर को भी अपनी द्युति से चमकाने आए हैं.

वैसे जमाई बाबू मार्केटिंग देखेंगे. उनका कक्ष वहाँ हुआ करेगा. मगर अख़बार के दफ़्तर में आने वाला मार्केटिंग में बैठा रह जाए. यह नहीं होता. वह फीता काटने भी जाता है, और संपादकीय पृष्ठों की गुणवत्ता क्या सामग्री देकर बढ़ाई जाए, संपादकों को यह समझाने संपादकीय विभाग में भी जाता है. अतः दफ़्तर ज्वाइन करते ही ले रहे हैं जमाई बाबू अख़बार के संपादकीय विभाग की मीटिंग. इन नए बाबू साहब का नाम है निखिल बाबू! लेकिन निखिल बाबू खाली हाथ नहीं आए हैं. उनके दाएँ हाथ में एक फ़ाइल है और बाएँ हाथ की तरफ है मधुर कुमार. मधुर कुमार के हाथ में तीन-चार अमेरिकी पत्रिकाएं और अख़बार हैं.

“हमें नए तरीकों से चलना होगा” संपादकीय साथियों को बैठने का इशारा करते हुए ख़ुद भी बैठकर जमाई बाबू कहते हैं, “यूथ! यूथ इज़ द बज़ वर्ड टुडे”. नए जेनरेशन को जोड़ने के लिए हमें कुछ ग्लैमरस देना चाहिए. हॉलीवुड़ की फ़िल्मों का रिव्यू देना चाहिए. इतने दिनों में मैंने सिर्फ़ एक रैंप रिपोर्ट देखी है. लोगों में इन्हीं चीज़ों का क्रेज़ है. उधर यूके में डायना के एक लवर से टेब्लॉयड भरे हैं और हमारे यहाँ एक वर्ड भी नहीं है. दुनिया कहाँ जा रही है, हम कहाँ हैं. “वहाँ तो... ”

“वहाँ तो ” निखिल बाबू तकियाकलाम है और “वहाँ तो...” से उनका मलतब अमेरिका अथवा “पश्चिम” होता है...

“ऐई शेखर सर, मैंने तो सुना था क्षेत्रीय अख़बारों के लिए नर्मदा की बाढ़ बड़ी ख़बर है और नाइल का बाढ़ डैश न्यूज़.” पृथा मुस्कराकर शेखर के कान के पास फुसफुसा रही थी.

इधर निखिल कुमार का लेक्चर जारी था, “हमें नेशनल ही नहीं, ग्लोबल होना है. डिज़ाइनर क्लॉथ्स? कहाँ हैं डिजाइनर क्लॉथ्स. मैंने छोटे जालानजी से बात कर ली है, अब से “सुर-सरगम ” की जगह “ओ! दिस कलरफुल वर्ल्ड” कॉलम जाया करेगा. ”...तालियाँ.

इस प्रस्ताव पर उप-संपादकों ने तालियाँ बजा दी हैं. आखिर नए मालिक की नई उमंग, नई तरंग पर “लोली सब एडीटर” तरंगित कैसे न हों? लेकिन कुछ शंकालु भी मौजूद हैं महफ़िल में. “लेकिन सर “ओ! दिस कलरफुल वर्ल्ड...” यह नाम तो अंग्रेजी में है? ” एक उप-संपादक ने उठकर शंका जाहिर की. बेचारा छोटे जालानजी के शिष्यत्व में लंबे समय तक रहा है. छोटे जालानजी ने तो “मोबाइल” को “चलायमान ” लिखने के आदेश दिए हैं. बेचारे उप-संपादकगण अतिशुद्धतावाद और खिचड़ी के बीच फँस गए हैं. और क्यों न फंसें, उन्हें क्या पता अख़बार कैसा निकालना चाहिए. उनसे ज़्यादा पता तो निखिल बाबू को है क्योंकि वे जमाई बाबू हैं. उप-संपादक तो सिर्फ “बाबू” हैं. तो आगे इसी बात पर आ रहे हैं निखिल कुमार कि अख़बार कैसा निकाला जाए. किस पेज पर क्या मैटर जाए कि प्रसार और गुणवत्ता के हिसाब से उचित हो.

निखिल कुमार की आवाज़ कुछ दबी हुई-सी है. अतः विनम्रता का अभास देती है. वे अपनी धीमी मगर माइक के ज़रिए विस्तारित आवाज़ में कहते हैं, “अभी-अभी हम लोगों ने एक “रिसर्च” करवाया है. “रिसर्च ” के नतीजे यह बताते हैं कि हमारे अख़बार का सर्कुलेशन इसलिए गिर रहा है कि हम पाठकों की रुचि का अख़बार तैयार नहीं कर पा रहे हैं. हमारे गाँव के संवाददाताओं का कहना है कि बाकी अख़बारों में तो मसाला है. हमारे अख़बार में कुछ मसाला ही नहीं है पढ़ने को. देखिए, सर्वे का रिजल्ट आपको मधुर कुमार बताएंगे.” और निखिल कुमार मधुर के हाथ में माइक दे देते हैं.

बेचारे मधुर को अपने एक हाथ से पोनीटेल का रबर बैंड बार-बार खींचते-छोड़ने की आदत पड़ गई है, मगर इस वक्त फाइल दोनों हाथों से पकड़नी पड़ रही है. अतः हाथ से रबर बैंड खींचने की तलब की पूर्ति वे गले से कर रहे हैं. बहुत देर खंखारने और पानी का घूंट भरने के बाद उन्होंने हिस्सों-हिस्सों में रिपोर्ट पढ़नी शुरू कर दी है “पाठकों के बीच किए गए इस सर्वेक्षण के अनुसार, ज्यादा ऊँचे लेख पाठकों के गले नहीं उतरते हैं. लोगों की शिकायत है कि हमारे यहाँ चित्रों में मध्यमवर्गीय मॉडल खुद मध्यवर्ग की रुचि जगाने में असफल इसलिए रहते हैं, क्योंकि हर वर्ग अपने से ऊपर के वर्ग की तरह होने की चेष्टा करता है. ऐसे में ग्लैमर से जुड़ी चमकदार ख़बरें उसे प्रसन्नता प्रदान करती हैं.”

 “यार, ये जिंदगी-विंदगी का फ़ंडा इधर मत पेलो. ये देखो, उन लोगों ने क्या छापा है... बिकता यह है बाजार में!” मधुर कुमार ने प्रतिद्वंद्वी अख़बार का चिकने पन्ने का परिशिष्ट हवा में लहराया जिसके मुखपृष्ठ पर एक स्त्री मॉडल का अर्धनग्न फोटो था.

लेआउट आर्टिस्ट अब मीटिंग के बीच में ही उठकर खड़ा हो गया था और मधुर कुमार को बीच में रोककर बोलने लगा था, “मधुर भाई, आप जो यह ग्लैमर की बात कह रहे हैं न! वह चिकने पन्नों पर आता है. व्यवस्था करवाइए आर्ट पेपर की, फिर हम बताते हैं लेआउट क्या होता है. और कितना भी अच्छा लेआउट दो, लुगदी पर फ्लॉप हो जाता है.”

“आपको भरोसा नहीं है सर्वे की रिपोर्ट पर? हम क्या झूठ कह रहे हैं? मधुर कुमार बौखला रहे थे, “कल जो झुर्रियों वाले बूढ़े का चित्र आपने रविवार के आवरण पर लगाया था उसे देखकर कौन रीझेगा?” मधुर ने कहा.

“जनाब मधुरजी, कला में सौंदर्य-बोध के हिसाब से वह एक बेहतरीन फ़ोटोग्राफ था. उस बुजुर्ग के चेहरे की रेखाओं में जिंदगी लिखी थी.... ”

“यार, ये जिंदगी-विंदगी का फ़ंडा इधर मत पेलो. ये देखो, उन लोगों ने क्या छापा है... बिकता यह है बाजार में!” मधुर कुमार ने प्रतिद्वंद्वी अख़बार का चिकने पन्ने का परिशिष्ट हवा में लहराया जिसके मुखपृष्ठ पर एक स्त्री मॉडल का अर्धनग्न फोटो था.

लेआउट आर्टिस्ट भी आज जवाब देने के मूड में था. वैसे भी सामने “निखिल बच्चा” था, जालान सर नहीं, इसलिए वह थोड़ा बेखौफ़ हो चला था, “मधुर भाई, हम एक फोटो के सिर्फ सौ रुपए देते हैं. उसे बेकार न्यूज़ प्रिंट पर छापते हैं. वो जो फोटोग्राफ आप लहरा रहे हैं, वह पाँच हज़ार रुपए से कम का नहीं है. और जनाब, उन लोगों ने भी इसे ख़रीदा नही है, एक अन्य महंगी पत्रिका से ऐसा का ऐसा उठाकर लिया है पूरी बेशर्मी से. अब जनता यह सब तो समझती नहीं है.... हाँ, आप कहें तो हम भी यह धंधा शुरू कर देते हैं. मगर कॉपीराइट का कोई मुकदमा हो तो फिर भुगतिएगा आप ही... ”

 सच ये है कि विज्ञापनदाता विज्ञापन नहीं देता बौद्धिक या मध्यमवर्गीय सामग्री पर. अख़बार के धंधे में सब जानते हैं, पाठक की अब कोई औकात नहीं है. मगर बात सब पाठक की करते हैं. अख़बार के धंधे में सब जानते हैं, कंटेंट मजर फ़िलर हो गया है. मगर बात सब कंटेंट की करते हैं. अपना उद्योग डूब रहा हो तो किसी के मत्थे तो मढ़ना ही होगा न!

मधुर के पास सचमुच इस बात का जवाब नहीं था. आज का सौंदर्य-बोध अच्छे विषय के बजाय चिकने कागज़ और अर्धनग्न फ़ोटोग्राफ पर निर्भर करने लगा है तो क्या किया जाए?

मगर मधुर को मिले उत्तर का उत्तर मधुर ने नहीं दिया. निखिल कुमार ने दिया अपनी धीमी, खदबदी आवाज में, “वर्नाकुलर प्रेस के साथ यही तो डिफिकल्टी है.” “वर्नाकुलर” पर निखिल कुमार ऐसे जोर दे रहे थे जैसे वह खुद अंग्रेज हों. “हम चेंज नहीं चाहते. हम क्यों दिखाना चाहते हैं बुढ़ापा और ग़रीबी? हम क्यों देते हैं इतनी “चेस्ट हिंदी?” इसलिए तो एडवर्टाज़र हमें एटवर्टाइजमेंट देने से कतराते हैं.” यानी आ गए थे निखिल कुमार अपनी मूल बात पर. कोई पाठक सर्वे नहीं करवाया गया था. सच ये है कि विज्ञापनदाता विज्ञापन नहीं देता बौद्धिक या मध्यमवर्गीय सामग्री पर. अख़बार के धंधे में सब जानते हैं, पाठक की अब कोई औकात नहीं है. मगर बात सब पाठक की करते हैं. अख़बार के धंधे में सब जानते हैं, कंटेंट मजर फ़िलर हो गया है. मगर बात सब कंटेंट की करते हैं. अपना उद्योग डूब रहा हो तो किसी के मत्थे तो मढ़ना ही होगा न! “अंधेर नगरी चौपट राजा” की तर्ज़ पर फांसी का फंदा यदि किसी जीव के गले में फिट आता है तो वह अख़बार का उप-संपादक ही है. अकल बांटने का मूड हो तो सामने जो दिखती है वह उप-संपादक की झोली ही है. इस झोली को सब भरना चाहते हैं.

इसी सिलसिले में कल विनोद बाबू की “सहेली ” बरखा मैडम का भी फ़ोन आया था शेखर के पास. इन दिनों बरखा मैडम शहर की एक नामचीन हस्ती हो चली हैं. अध्यक्षता करने के लिए तमाम महिला-संगठनों, समाज-संगठनों और लेडीज क्लबों की पहली पसंद हैं बरखा मैडम. उनकी विशेषता क्या? यही कि उन्हें बुलाया जाए तो कम से कम एक अख़बार में तो संस्था का फोटोमय विज्ञप्ति छपना तय है. विनोद बाबू का अलिखित आदेश है यह नगर संपादकों को कि बरखा मैडम से संबंधित कोई चित्र न रोका जाए. ज़ाहिर है, बरखा मैडम को प्रतिभाशाली चर्चित स्त्री होने का गुमान हो चला है इन दिनों. जैसे आरती की थाल कोई भी पकड़े, थाल पकड़ने वाले का हाथ छूने वाले, फिर उसका भी हाथ छूने वाले का भी हाथ छूने वाला भी आरतीकर्ता होता है. उसे भी आरती का “पुन्न” मिलता है. ऐसा ही रवैया अख़बारनवीसी का भी है. चूंकि बरखा मैडम विनोद भाई की “वो ” हैं, अतः वे अख़बारनवीस भी ही गई हैं. आरती के थाल का “पुन्न ” उनके पास है. “वो” वह जरूर हैं लेकिन इतनी “वो” नहीं हैं कि यह पुन्न यूं ही खा जाएँ. हर तीसरे दिन अपने फ़ोटो छापने वाले अख़बार और उन पर प्रेम लुटाने मालिक के बीस प्रतिशत शेयर के प्रति उनका यह कर्तव्य तो बनता ही है कि वे अख़बार के गिरते प्रसार को सुधारने के लिए कुछ उपाए बताएँ. और ये उपाय वह किसको बताएंगी? जाहिर है उप-संपादक को. अख़बार का प्रसार गिरने का ज़िम्मेदार वही बेचारा तो है. और वही है सबसे छोटी अकल और सबसे बड़े कान वाला. इसीलिए बरखा मैम का फोन आया था कल शेखर के पास “शेखर, विनोद बाबू बहुत तारीफ़ करते हैं तुम्हारी.” अच्छे लड़के हो तुम, इसलिए तुमको बता रही हूँ. जैसा कि तुम जानते हो, “अपने अख़बार” का प्रसार इन दिनों गिर रहा है. तुम आओ एक बार मेरे घर, मैं तुम्हें टिप्स बताऊंगी अख़बार सुधारने की... क्या होता है शेखर, कि हम लोग अच्छा मनोरंजन नहीं दे पाते. इतने अच्छे-अच्छे गेम होते हैं किटी में. हमारे यहाँ महिला-पन्नों पर हम वो गेम दे सकते हैं. अच्छा! और मैं क्या कर रही थी... ऐसा करो, एक कॉलम चालू करो-“किटी क्लब से”. उसमें क्लब की हर हफ्ते की रिपोर्ट होनी चाहिए. लोग यह सब पढ़ते हैं. ”

ऑब्जेक्शन मी लॉर्ड

मगर आरती के थाल का पुन्न नहीं रुकता. चूंकि बरखा मैडम के इन दिनों बहुत फोटो आ रहे हैं अतः असली श्रीमती विनोद बड़ी खिन्न हैं. विनोद भाई बरखा मैडम का भला तो करना चाहते हैं मगर असली श्रीमती को खिन्न भी नहीं करना चाहते. विनोद भाई खुद अपने हाथों से एक पन्ना लाए हैं. अरे भाई, “उन्होंने” वे अपनी पत्नी को यही कहते हैं “अरे भाई, “उन्होंने” ये सूक्तियाँ संग्रहीत की हैं. जरा यह अख़बार में छाप देना, हाँ उचित समझो तो.” यह कहकर विनोद भाई ने अपनी यह दरियादिली भी दिखाई है कि मालिक होते हुए भी वे संपादक की आजादी के लिए कितने प्रतिबद्ध हैं. यह बात और है कि यह “यह उचित समझो तो” वह बरखा मैडम का फोटो देते समय संपादक को कभी नहीं कहते.

जब यह सूक्तियाँ “प्रस्तुतिः सुधा विनोद जालान” नाम के साथ प्रकाशित हुई तो शेखर तो धन्यवाद देने के लिए भाभीजी का फोन भी आया. और फोन के साथ ही यह सुझाव भी कि अख़बार अच्छा कैसे बनाया जाता है! “ भाई शेखर, वैसे तो मैं तुमको क्या बताऊँ”. तुम्हारे लेख पढ़कर लगता है कि तुम समझदार हो, पर एक बात बताना चाहती थी अख़बार के भले के लिए. थोड़ा ना साधु-संतों के प्रवचन भी दिया करो अख़बार में. एक नियमित कॉलम बना लो “आध्यात्मिक चिंतन” करके, चाहो तो मेरी डायरी ले लेना. बहुत “कलेक्शन” है उसमें. इतनी मदद तो मैं कर ही सकती हूँ तुम्हारी. आखिर हमारा भी तो कुछ कर्तव्य बनता है!”

(पृष्ठ 240 से 245)
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पुस्तक - ऑब्जेक्शन मी लॉर्ड
लेखिका - निर्मला भुराड़िया
प्रकाशक - सामयिक प्रकाशन, 3320-21, जटवाड़ा, नेताजी सुभाष मार्ग, दरियागंज, दिल्ली-12.
पृष्ठ - 304, मूल्य - 300 रुपए

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