'शोले' की चिंगारी तलाशता बॉलीवुड

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- Author, संजय मिश्रा
- पदनाम, मुंबई से, बीबीसी हिंदी डॉटकॉम के लिए
15 अगस्त को हिंदी सिनेमा की मास्टरपीस फ़िल्म 'शोले' को 41 साल पूरे हो गए.
इन चार दशकों में बॉलीवुड ने बॉक्स ऑफ़िस पर काफ़ी 'शोले' भड़काने की कोशिशें की, लेकिन सारी कोशिशें नाकाम ही साबित होती रही हैं.
यहां तक कि ख़ुद रमेश सिप्पी 'शोले' को दोहरा नहीं पाए और 'शान','शक्ति' और 'अकेला' जैसी फ़िल्मों से अपनी नाकामी का ग्राफ़ बढ़ाते रहे.

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फ़िल्मकारों में शोले बॉलीवुड के लिए क्या मायने रखता है, इसे शेखर कपूर की इस टिपण्णी से समझा जा सकता है.
शेखर कपूर कहते हैं, "हिंदी फ़िल्म इंडस्ट्री को दो भागो में बांटा जा सकता है. पहला हिस्सा 'शोले' की रिलीज़ के पहले का और दूसरा हिस्सा रिलीज़ से अब तक का."
शोले का ख़ुमार बॉलीवुड पर इस क़दर छाया रहा कि फ़िल्मकार शोले की कहानी कई बार अलग-अलग अंदाज़ से दोहराते रहे.
यहां तक कि फ़िल्म किरदार, डायलॉग और फ़िल्म के गाने के मुखड़ों पर भी फ़िल्में बनाकर शोले को भुनाने की कोशिश करते रहे और यह सिलसिला आज भी बदस्तूर जारी है.
आइए डालते हैं नज़र उन फ़िल्मों पर जिसमें शोले को चिंगारी से भड़काने की कोशिश की गई....

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'आंधी-तूफ़ान' (1985)
निर्माता पहलाज निहलानी और निर्देशक बी.सुभाष ने शशिकपूर, हेमा मालिनी, शत्रुघ्न सिन्हा, मिथुन चक्रवर्ती और मीनाक्षी शेषाद्रि को लेकर एक और शोले बनाने की कोशिश में 'आंधी-तूफ़ान' बनाई, लेकिन यह फ़िल्म दर्शकों को रिझाने में फिसड्डी साबित हुई.

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'कर्मा' (1986)
सुभाष घई की दिलीप कुमार, अनिल कपूर, श्रीदेवी और नूतन स्टारर फ़िल्म 'कर्मा', 'शोले' के ग्यारह साल बाद रिलीज़ हुई. इसकी कहानी का मूल रूप शोले से प्रभावित थी. जिसे पूरी तरह नए अंदाज़ से बनाया गया था. सुभाष घई की यह कोशिश कामयाब तो रही. लेकिन इसे शोले के समकक्ष जगह नहीं मिल पाई.

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सूरमा भोपाली (1988)
अभिनेता जगदीप पर शोले का बुख़ार कुछ ऐसा चढ़ा कि वो कभी सूरमा भोपाली के अपने किरदार से बाहर ही नहीं निकल पाए. शोले की रिलीज़ के लगभग 13 साल बाद 1988 में उन्होंने अमिताभ बच्चन, रेखा और धर्मेंद्र जैसे बड़े सितारों के सहारे ख़ुद को सूरमा भोपाली के रूप में मनवाने की कोशिश की. लेकिन बॉक्स ऑफ़िस पर दर्शकों ने ऐसा सूरमा चुराया कि इस भोपाली ने फिर कभी फ़िल्म बनाने की हिम्मत ही नहीं की.

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रामगढ़ के शोले (1991)
शोले की रिलीज़ के 15 साल बाद निर्देशक अजित दीवानी ने शोले के असली गब्बर अमजद ख़ान और राजेंद्र सहित कुछ और सितारों के हमशक्लों को लेकर शोले पर आधारित 2 घंटे की एक फ़िल्म बना दी. रामगढ़ की इस शोले ने लोगों को हंसाया ज़रूर, लेकिन निर्देशक के मंसूबों पर पानी फिर गया. क्योंकि कोई गब्बर को इस रूप में झेलने को तैयार नहीं हुआ.

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चाइना गेट (1998)
निर्देशक राजकुमार संतोषी ने 23 साल बाद शोले की मूल कहानी को ओम पूरी, अमरीश पूरी, नसीरुद्दीन शाह और कुलभूषण खरबंदा जैसे मंझे हुए कलाकारों के साथ फ़िल्म 'चाइना गेट' बनाई. इस फ़िल्म से मुकेश तिवारी जैसे अभिनेता को जगीरा के किरदार में लोगों ने ख़ूब पहचाना. फ़िल्म सफल तो नहीं हुई उलटे सेवन समुराई की भद्दी नक़ल के रूप में संतोषी के करियर पर एक दाग़ लगा गई.

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'मेला' (2000)
आमिर ख़ान, फ़ैसल ख़ान और ट्विंकल खन्ना स्टारर फ़िल्म 'मेला' की कहानी 'शोले' से ही प्रेरित थी. 13.5 करोड़ बनी 'मेला' ने दोगुनी कमाई की थी. फ़िल्म का निर्देशन धर्मेश दर्शन ने किया था.

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राम गोपाल वर्मा की 'आग' (2007)
भूत और अंडरवर्ल्ड दुनिया की फ़िल्में बनाने वाले राम गोपाल वर्मा ने 2007 में शोले की कहानी को अपने एक ड्रीम प्रोजेक्ट के रूप में पेश किया. जिसमें अमिताभ बच्चन, अजय देवगन, मोहन लाल और सुष्मिता सेन जैसे बड़े-बड़े कलाकारों के सहारे शोले के नॉस्टेल्जिया को रीक्रिएट करने का नाम दिया गया. लेकिन राम गोपाल वर्मा अपनी लगाई इस 'आग' की चपेट में आ गए और बॉलीवुड में उनका सारा पुराना करिश्मा स्वाहा हो गया.

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दो शोले-दो शेर (पंजाबी/हिंदी)
शोले की रिलीज़ के ठीक दो साल बाद ही निर्देशक सुखदेव अहलूवालिया ने पंजाबी में धर्मेंद्र और राजेंद्र कुमार को लेकर फ़िल्म दो शोले बनाई. जिसे हिंदी में दो शेर के नाम से भी रिलीज़ किया गया था. लेकिन शोले देख चुके लोगों के लिए अभी तक शोले की कहानी और किरदारों को इतनी जल्दी दूसरे कलाकारों के साथ अपना पाना मुश्किल था और लोगों ने इस फ़िल्म को सिरे से नकार दिया.
'शोले' को रीक्रिएट करने में असफल रहे फ़िल्मकारों ने फ़िल्म किरदारों के नाम पर टाइटल रखने शुरू कर दिए जिनका शोले की कहानी से कोई रिश्ता नहीं था.

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इस लिस्ट में लगभग आधे दर्जन से ज़्यादा हिंदी फ़िल्में शामिल हैं. जिनमें अमिताभ बच्चन स्टारर फ़िल्म 'कालिया'(1981), फ़रदीन ख़ान और कुणाल खेमू स्टारर फ़िल्म 'जय-वीरू' (2009), शक्ति कपूर और क़ादिर ख़ान स्टारर 'बसंती तांगेवाली' (1992), 'बसंती की शादी-गब्बर का हनीमून' (2002), अक्षय कुमार की 'गब्बर इज़ बैक' (2015) जैसी फ़िल्में शामिल हैं.
शोले भड़काने की इन असफल कोशिशों को देखकर तो यही कहा जा सकता है कि कुछ इतिहास बनाए नहीं जाते, बल्कि बन जाते हैं और बन जानेवाले इतिहास को दोहराया नहीं जा सकता.
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