शोले के 40 साल बाद 'रामगढ़' कैसा है?

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- Author, जनार्दन पांडेय
- पदनाम, रामनगरम से लौटकर
कर्नाटक में बंगलुरु और मैसूर के बीच पहाड़ियों से घिरा रामनगरम मशहूर है फ़िल्म शोले की शूटिंग की वजह से.
साल 1973 से 1975 के बीच शोले की अधिकांश शूटिंग यहीं हुई थी.
लेकिन शोले की शूटिंग के 40 साल बाद भी यहां के लोगों में ग़ुस्सा है. उनकी शिकायत है कि इस फ़िल्म की शूटिंग से उन्हें कुछ मिला तो नहीं, बल्कि यहां की ख़ासियत भी छिन गई.
रामनगरम जाना जाता था अपनी पहाड़ियों और उन पर मिलने वाले दुर्लभ प्रजाति के गिद्धों की वजह से.
लेकिन शोले की शूटिंग के दौरान लगातार शोर-शराबे और बम फोड़े जाने की वजह से ज़्यादातर गिद्ध यहां से चले गए.
रही सही कसर 1983-84 में अंग्रेजी फिल्म 'द पैसेज टू इंडिया' की शूटिंग ने पूरी कर दी.
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इलाके के वन अधिकारी रवि कुमार शंकर बताते हैं कि 70-80 के दशक में यहां सैकड़ों गिद्ध थे. लेकिन अब 20 से 25 दुर्लभ गिद्ध ही बचे हैं.
पर्यावरणविद् शिवरंजन दावा करते हैं कि शूटिंग के दौरन बारूद के इस्तेमाल से कुछ दुर्लभ गिद्धों की मौत भी गई थी.
शोले की शूटिंग के दौरान एक बार रामनगरम में तनाव की स्थिति भी पैदा हो गई थी.
रामनगरम के जिला कमिश्नर वी सूर्यनाथ कामत बताते हैं कि उन दिनों कर्नाटक और महाराष्ट्र में सीमा विवाद बढ़ गया था.
इसी दौरान भाषा के आधार पर कन्नड़ लोगों से हिंसा होने की ख़बर आई. इससे कन्नड़ एसोसिएशन के लोग नाराज़ हो गए और रामनगरम से शोले की टीम को भगाने जा पहुंचे.
निर्देशक रमेश सिप्पी ने इसकी शिकायत कमिश्नर से की तो चार लोगों को हिरासत में लिया गया. पुलिस के दखल देने के बाद मामला सुलझा.
रामनगरम की पहाड़ियों में शोले की शूटिंग के लिए रामगढ़ नाम का एक गांव बसाया गया था.
रामगढ़ वाले प्रभाकर

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यह रामनगरम से अधिक लोकप्रिय हुआ. स्थानीय कारोबारी वी प्रभाकर बताते हैं कि आज भी दूर-दराज के इलाकों में लोग उन्हें रामगढ़ वाले प्रभाकर के रूप में ही जानते हैं.
लेकिन ये रामगढ़ गांव अब मौजूद नहीं है. क्योंकि शूटिंग ख़त्म होने के बाद ये गांव उजाड़ दिया था. जाते वक्त जीपी सिप्पी ने रामगढ़ गांव का क़ीमती सामान स्थानीय दुकानदार पीवी नागराजन को एक लाख़ रुपये में बेचने की भी पेशकश की थी, लेकिन बात बनी नहीं.
फ़िल्म में मज़दूर के तौर काम कर चुके ईरैय्या बताते हैं, ''गांव के क़ीमती सामान को नीलाम कर दिया गया. कुछ सामान मज़दूरों में बांट दिया गया और कुछ में आग लगा दी गई.''
तो शोले के नाम पर अब रामनगरम में बाकी क्या बचा?
पहाड़ियां

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बस वो पहाड़ियां जहां गब्बर की आवाज़ गूंजती थी और कुछ गुमनाम लोग जिन्होंने शोले के सेट को अपना गांव समझ लिया था.
ऐसे ही एक व्यक्ति हैं शिवलिंगैया. शिवलिंगैया को रमेश सिप्पी ने अचानक एक दिन गब्बर सिंह की 'गैंग' में शामिल कर दिया था.
लेकिन बाद में शिवलिंगैया को सेट पर सबको चाय-नाश्ता पहुंचाने की ज़िम्मेदारी दे दी गई.
बोरम्मा भी उन लोगों में से हैं जिनकी यादें शोले से जुड़ी हैं. बोरम्मा तब सिर्फ़ आठ साल की थीं और गब्बर सिंह के डाकुओं के घोड़ों से कुचलते-कुचलते बची थीं.
असल में फ़िल्म में होली के गाने के बाद उन्हें घोड़ों के सामने से भागना था, लेकिन वो अचानक गिर गई थीं.
रामनगरम के ईरैया के पूरे परिवार ने मिलकर शोले के रामगढ़ के कई घर और वह पानी की टंकी भी बनाई थी जिससे फ़िल्म में वीरू बार-बार कूदने की धमकी देता है.
रामनगरम का शोले

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ईरैया अब भी शोले से दूर नहीं होना चाहते. शायद यही वजह है कि उन्होंने रामदेवरबेट्टा (अब शोले हिल्स) की देखभाल की नौकरी कर ली है.
रामनगरम की शांता और उनकी मां ने डेढ़ साल तक शोले की शूटिंग के लिए मुंबई से आए लोगों को खाना बनाकर खिलाया था.
जाते वक्त सिप्पी ने इन्हें कुछ रुपये और एक गुलदस्ता भेंट किया था.
बस यही बाकी बचा है रामनगरम में शोले का.
(हमारी पार्टनर वेबसाइट अमर उजाला के सौजन्य से)
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