प्यार नहीं 'दिल्ली के छोरोें' का पंचनामा

इमेज स्रोत, ABHISHEK KAPOOR
- Author, मयंक शेखर
- पदनाम, फ़िल्म समीक्षक
फ़िल्म: प्यार का पंचनामा 2
निर्देशक: लव रंजन
अभिनेता: ओंकार कपूर, सन्नी सिंह निज्जर, कार्तिक आर्यन
रेटिंग: ***
आप इसे 'छोरों वाली' फ़िल्म कह सकते हैं. मैंने सोच समझकर यह नाम रखा है क्योंकि दूसरा कोई नाम दिल्ली के लड़कों के बारे में इससे बेहतर नहीं बता सकता.
इसके बारे में और यह कह सकता हूं कि ये लोग अपने बारे में 'भाई' कह कर बात करते हैं. वे अपनी शेखी बघारते समय अमूमन कहते हैं, "देख, आज तेरे भाई ने क्या कमाल दिखाया है."
दूसरे लोग 'ब्रो' हैं और 'भाई' भी. वे कहते हैं, "देख भाई. भाई नहीं है क्या?"
वे अमूमन देखने में सुंदर, हट्टे-कट्टे, अच्छे कपड़े पहने उत्तर भारतीय हैं. वे ज़्यादातर समय रात में महंगी गाड़ियां ख़ुद चला रहे होते हैं.
वे पुरुषों के साथ अधिक सहज महसूस करते हैं. महिलाएं अमूमन उलझती रहती हैं. धीरे-धीरे वे यह राय बना लेती हैं कि यह दुनिया मूर्ख, चुगलखोर लड़कियों और उन कमज़ोर लड़कों से भरी हुई है, जो उनका पीछा करते रहते हैं.
भड़ास निकालने का तरीका?

यदि आपने इस तरह के अच्छे लोगों को अब तक नहीं देखा है तो यह फ़िल्म की अच्छी चीज है.
मैंने नोटिस किया कि फ़िल्म के लेखक-निर्देशक का नाम 'लव' है. निश्चय ही ये 'लव' प्यार मोहब्बत वाले लव नहीं बल्कि राम के बेटे हैं.
इस फ़िल्म में ये लोग जो कुछ भी करते हैं, उस पर आपने तनिक भी विश्वास किया तो प्रेम और रिश्ते से जुड़ी आपकी तमाम भावनाएं साफ़ हो जाएंगी.
आप सिर्फ़ यह समझ सकते हैं कि इस फ़िल्म के लोग जीवनभर अपने मन में कुछ भावनाएं पालते रहे और उस दिन का इंतज़ार करते रहे जब वे अपनी भड़ास निकाल सकें. यह वाकई बड़ी बात है.
तीन लड़के लगभग एक साथ ही वाकई कमनीय तीन लड़कियों से प्रेम करने लगते हैं. वे उनका मन जीत लेते हैं, ठीक उसके बाद ही मामला गंभीर हो जाता है. हम गुलाब में कई कांटे पाते हैं. सवाल उठता है कि आप रेस्तरां में अपना अपना बिल अदा करें और व्हॉट्सएप या एसएमएस शेयर करें या नहीं.
क्या यह बहुत ही मौलिक फ़िल्म है? बीस से तीस की उम्र के कुछ लड़के दिल्ली में एक साथ रहते हैं, क्या यह नई बात है? प्यार का पंचनामा (2011) ने एक नई शुरुआत की, इससे दूसरे पार्ट के बारे में भी पता चलता है.
दिव्येंदु शर्मा वाकई काफ़ी अच्छे अभिनेता हैं. मुझे लगा कि दूसरोें के साथ उनका सही इस्तेमाल नहीं किया गया है.
महिला विरोधी फ़िल्म?

दूसरे कलाकार कार्तिक आर्यन इसके पहले की फ़िल्म में भी थे. वे कुंठित युवाओं को महिलाओं और उनके साथ के रिश्तों पर काफ़ी लंबी बात करते हैं. यह लोगों को काफ़ी अच्छा भी लगता है. यह यूट्यूब पर वायरल हो गया. उसके सह कलाकार अोंकार कपूर, सन्नी सिंह निज्जर हैं जो काफ़ी जंचते हैं.
मुझे लगता है कि प्यार का पंचनामा टीवी शो के लिए बिल्कुल मुफ़ीद है. यह 'फ़्रेंड्स! हाउ आई मेट योर मदर' की तरह है. भारत के टेलीविज़न पर ऐसा कुछ नहीं है, जिसके साथ इसकी तुलना की जाए.
बेमतलब के गाने, बिल्कुल नकली लगने वाली लोकेशन्स, औरतें जो ऐसी लगे मानो वे कैमरा के सामने पोज देने के लिए ही हों, यदि आप बॉलीवुड से यह समझते हैं तो यह फ़िल्म वाकई ज़बरदस्त है. और भगवान साक्षी है, मैं यह बात तारीफ़ में ही कह रहा हूं.
मैं क्या कह रहा हूं, यह समझने के लिए आपको इंटरनेट पर हो रहे कुछ काम को देखना होगा, मसलन, टीवीएफ़ पिक्चर्स, वाईआरएफ़ का मैन्स वर्ल्ड वगैरह. इस फ़िल्म की तरह ही वे शो भी अच्छे ढंग से लिखी गई है.
क्या यह महिला विरोधी भी है? बिल्कुल.
लेकिन यह हास्य से भरा हुआ है. यदि आप स्त्री होने की वजह से या पुरुष होकर भी इस फ़िल्म से नाराज़ होते हैं तो मुझे अफ़सोस है. पर फ़िल्म में मज़ाक तो हैं ही.
मैं यहां बैठे हुए यह कह सका हूं कि दिल्ली में अपने साथियों के साथ बैठा एक सुदंर सजीला छोरा पर्दे पर देख कर कहता है, "भाई! बात दिल से निकली है. छू गई!"
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