मर्दों में नहीं है औरतों जितना दम: बेनेगल

    • Author, वैभव दीवान
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता, मुंबई

भारतीय सिनेमा के सबसे सफल निर्देशकों में से एक श्याम बेनेगल ने अपने फ़िल्मी करियर में महिलाओं की सशक्त भूमिका वाली कई फ़िल्में बनाई हैं.

वह कहते हैं, "महिलाओं को केंद्र में रखकर फ़िल्में बनाने की वजह यही रही कि औरतें समाज की धुरी हैं. उनकी भूमिका बेहद अहम है. वे पूरे परिवार को जोड़कर रखती हैं क्योंकि उनके ज़िम्मे बहुत सारे रोल हैं- मां, बेटी,पत्नी और बहन. पुरुष को तो ये नहीं करना पड़ता. दरअसल पुरुष में इतनी ताक़त भी नहीं है. औरतें ज़्यादा सबल हैं इसी कारण वे ये सब कर पाती हैं.’’

हालांकि बेनेगल ये भी जोड़ते हैं कि भारतीय समाज में उन्हें बराबरी का दर्जा नहीं दिया गया और इसीलिए फ़िल्मों की कहानियां अक्सर महिलाओं की स्थिति के इर्द-गिर्द बुनी जाती हैं.

बेनेगल हिंदी सिनेमा में अकेले ऐसे निर्देशक हैं जिन्होंने भारत में मुसलमान महिलाओं को लेकर तीन फ़िल्मों की कड़ी बनाई है जिसमें मम्मो, सरदारी बेग़म औऱ ज़ुबैदा शामिल हैं.

<link type="page"><caption> बेनेगल का संविधान</caption><url href="http://www.bbc.co.uk/hindi/entertainment/2014/03/140301_shyam_benegal_samvidhan_dil.shtml" platform="highweb"/></link>

स्तरहीन काम से समझौता नहीं

बेनेगल ने तकरीबन 25 साल बाद टेलीविज़न पर वापसी की है ‘संविधान’ नामक एक सीरीज़ के साथ.

यही नहीं उन्होंने 1962 में पहला वृत्तचित्र बनाया था लेकिन पहली फ़ीचर फ़िल्म बनाने में उन्हें 14 साल लग गए क्योंकि पैसे नहीं मिल रहे थे.

इमेज स्रोत, NFAI

इस बीच हार ना मानने के सवाल पर बेनेगल बहुत सफ़ाई से कहते हैं, ‘‘पैसे के लिए अपना स्तर नीचे गिराने का तो सवाल ही पैदा नहीं होता. पैसा तो सब चाहते हैं लेकिन एक बार अगर आपने अपना स्तर नीचे कर लिया तो फिर उसका कुछ नहीं हो सकता."

उनके अनुसार, "आप दोबारा ऊपर नहीं जा सकते. समझौता बहुत ही ख़तरनाक होता है. शुरू से समझौता कर लिया तो फिर कुछ सही नहीं होता है.’’

1973 में आई अपनी पहली फ़िल्म अंकुर से ही बेनेगल ने अपनी एक अलग पहचान बनाई और एक नए सिनेमा का चेहरा बन गए. इस फ़िल्म के लिए उन्हें राष्ट्रीय पुरस्कार भी मिला था.

आज भी नहीं है पैसा

पिछले कुछ समय से बेनेगल एक नई फ़िल्म चमकी चमेली पर काम शुरू करना चाह रहे हैं लेकिन अब तक ये हो नहीं पाया.

इसकी वजह पूछने पर वह कहते हैं, फ़ाइनेंस को लेकर दिक़्क़त आ रही है.

दिक़्क़त और श्याम बेनेगल जैसे नाम को, ये सुनना थोड़ा अजीब लगता है पर सच है.

बेनेगल बताते हैं, ‘‘दिक़्क़त सबको आती ही है निर्माता ढूंढ़ने में. निर्देशक के सामने सीधी चुनौती होती है कि वो जो कहानी कहना चाहता है उसके लिए बाज़ार है या नहीं और यहीं से पैदा होती है पैसे की चुनौती. देखते हैं अगर पैसा मिल गया तो मैं करूंगा काम.’’

श्याम बेनेगल की नई टीवी सीरीज़ संविधान में भारत में सन 1946 से 1950 के बीच की घटनाओं का जि़क्र है. यही वो दौर था जब निर्माण हुआ था भारत के संविधान का और भारत गणतंत्र बना था.

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