'आगरा' फ़िल्म में ऐसा क्या जो आपको झकझोर कर रख देगा?

आगरा

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    • Author, कलीम आफ़ताब
    • पदनाम, बीबीसी कल्चर

बॉलीवुड की लोकप्रिय फ़िल्मों के कारण दुनिया भर में भारतीय सिनेमा की छवि ऐसी बन गई है कि वो रंगारंग नाच-गाने से भरपूर होते हैं.

भारत की फ़िल्मों की एक और पहचान ये भी है कि वो बेहद शालीन और सभ्य होती हैं. क्योंकि ऐतिहासिक रूप से देखें, तो एक ज़माने में भारत की फिल्मों में सेक्स के सीन की बात तो जाने ही दीजिए, किसिंग सीन तक नहीं होते थे.

निश्चित रूप से बॉलीवुड के फ़िल्म निर्देशकों को सेक्स सीन को, किरदारों की सेक्स अपील को दिखाने के लिए इशारों और दबे छुपे तरीक़ों से काम चलाना पड़ता था, ताकि उनकी फ़िल्में सेंसर बोर्ड में अटकें नहीं, पास हो जाएं.

मसलन, आपने अक्सर बेहद लोकप्रिय फिल्मी गानों में सफ़ेद साड़ी पहने हीरोइन को लजाते शर्माते किसी फ़व्वारे के इर्द गिर्द मंडराते देखा होगा.

लेकिन, जिसके के ज़हन में भी भारतीय सिनेमा की ये मासूमियत भरी छवि रही होगी, उसे इस साल के कान फिल्म फेस्टिवल के दौरान बहुत हैरानी हुई होगी.

25 मई को कान फिल्म फेस्टिवल में निर्देशक कनु बहल की फिल्म आगरा को डायरेक्टर्स फोर्टनाइट वाले सेक्शन में दिखाया गया था. इस फिल्म में भारत के मर्दों की सेक्स की दबी कुचली आकांक्षाओं को झकझोर देने वाली बेबाक़ी के साथ पेश किया गया है. फिल्म में न्यूड और सेक्स सीन भरे पड़े हैं.

आगरा, भारतीय सिनेमा की बंदिशें तोड़ने वाली वैकल्पिक फिल्मों के सिलसिले की ताज़ा कड़ी है, जिसकी शायद ही कोई ख़ास चर्चा हो रही हो.

जैसा कि कनु बहल ख़ुद कहते हैं, ''भारत में कितनी सारी फिल्में बनती हैं और वहां पर फिल्मों के वैसे ही दो पहलू नज़र आते हैं, जैसे कोई इंसान दो अलग अलग किरदारों में बंटा हुआ हो. एक तरफ़ भारतीय फिल्मों का बॉलीवुड वाला रंगारंग चेहरा है, जो बेहद लोकप्रिय है. जिसके बारे में बहुत से लोग जानते हैं.''

''वहीं दूसरी तरफ़ फिल्मों की एक समानांतर और बिल्कुल अलग ही दुनिया है, जहां काफ़ी दिलचस्प काम हो रहा है. और, ऐसा नहीं है कि ये कोई नया चलन है, जो अभी शुरू हुआ है. या, पिछले पांच या दस सालों से ऐसा हो रहा है. भारत में समानांतर सिनेमा का इतिहास तो दशकों पुराना है.''

दमित इच्छाओं और कुंठाओं का मारा कैरेक्टर

आगरा

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आगरा फिल्म में कॉल सेंटर के एक कर्मचारी गुरु की कहानी दिखाई गई है, जो दबी हुई इच्छाओं और कुंठाओं का मारा हुआ है. वो एक छोटे से घर में अपने मां-बाप और भाई-बहनों के साथ रहता है.

गुरु के उस तंग घर में इतनी भी जगह नहीं है कि वो अपना घर बसा सके और लोगों की नज़र और फ़ब्तियों से बचकर अपनी साथी के साथ सेक्स कर सके. इसलिए वो चाहता है कि घर में एक कमरा और बनवाया जाए.

यौन संबंधों से महरूम गुरु बुरी तरह खीझा हुआ इंसान है, जिसे डेटिंग ऐप्स की लत लगी हुई है. वो दिन का ज़्यादातर हिस्सा उन ऐप्स पर ही बिताता है, और एक के बाद एक अपनी हिंसक सेक्सुअल फैंटेसी को जीने का अभिनय करता है.

हालांकि, कनु बहल फिल्म में कभी ये बात नहीं साफ़ करते कि ये गुरु की कोरी कल्पनाएं ही हैं, या असली घटनाएं हैं.

गुरु की इस सनक और भरमजाल में हक़ीक़त और फ़साने का जो मेल है, उसमें हमें अमरीकी फिल्म, अमेरिकन साइको के पैट्रिक बेटमैन की झलक नज़र आती है.

ये एक साहसिक फिल्म है, जिसके पहले सेक्स सीन का ख़ात्मा एक महिला के विशाल चूहे में तब्दील होने के साथ होता है. औ,र हमें ये एहसास होने लगता है कि गुरु पेचीदा ख़्वाब गढ़ने वाला एक इंसान है.

वैसे ये सीन तो ऊट-पटांग का लगता है. लेकिन, कनु बहल गुरु की कुछ ज़्यादा हिंसक और गुस्सैल फंतासियां दिखाने में संकोच नहीं करते. इन्हें देखकर सदमा लगता है.

और जब निर्देशक, फिल्म देखने वाले को एक भयंकर रूप से बीमार इंसान के ख़तरनाक दिमाग़ के भीतर लेकर जाते हैं, जहां वो औरतों को अपने शिकंजे में कर लेने और अपनी मर्दानगी दिखाने की कल्पना कर रहा होता है, तो उसे बर्दाश्त कर पाना मुश्किल हो जाता है.

क्या कहते हैं आगरा के डायरेक्टर?

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42 बरस के फिल्म निर्देशक कनु बहल कहते हैं कि, 'ये फिल्म उन छुपे हुए पहलुओं पर रोशनी डालती है, जो हर इंसान की ज़िंदगी में होते हैं. मगर जिनके बारे में कोई बात नहीं करता. '

उत्तर भारत में पले बढ़े कनु कहते हैं, 'एक चढ़ती उम्र के लड़के के तौर पर मैं ख़ुद अपनी सेक्स की इच्छा दबाने के अनुभव से गुज़रा था. और मैं ही क्यों, मैंने बहुत से ऐसे लोगों को देखा है, जो यौन संबंध के मामले में देर से परिपक्व होने की चुनौती से जूझ रहे थे.'

कनु बहल की फिल्म आगरा, कुंठित यौन ख़्वाहिशों की समस्या की पड़ताल करती है, और इशारों में ये कहती है कि भारत में यौन अपराधों की ऊंची दर के पीछे यही वजह है. हालांकि, आगरा फिल्म में भारत में यौन हिंसा की समस्या को व्यापक तौर पर पेश करने की कोशिश नहीं की गई है.

2012 में दिल्ली में एक छात्रा के साथ बस में बलात्कार की बर्बर घटना हुई थी. जिसके बाद भारत में यौन हिंसा की ऊंची दर ने पूरी दुनिया का ध्यान अपनी ओर खींचा था.

इस घटना के बाद भारत की संसद ने सेक्स क्राइम के लिए सज़ा के प्रावधान और सख़्त कर दिए थे.

लेकिन, ऐसा लगता है कि इससे अपराध की दरों पर कोई ख़ास फ़र्क़ नहीं पड़ा. बलात्कार की घटनाएं बढ़ी ही हैं, और आज तो इसकी शिकार बनने वाली बहुत सी महिलाएं आगे आकर अपनी शिकायत करने से भी डरती हैं.

एक व्याकुल इंसान की कहानी के ज़रिए इस स्याह मसले पर नज़र डालते हुए कनु बहल ने एक ऐसी फ़िल्म बनाई है, जो बहुत से रिवाजों को तोड़ती है, भले ही ख़ुद निर्देशक का ऐसा इरादा न रहा हो.

कनु बहल कहते हैं कि,''मैंने फिल्म बनाने की शुरुआत किसी लक्ष्मण रेखा को पार करने की नीयत से नहीं की थी. लेकिन, ये विषय ही ऐसा था, जिसने मुझे ऐसा करने को मजबूर कर दिया.''

ऐसा विषय जिसका डायरेक्टर के लिए भी सामना मुश्किल

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ये फिल्म उन छुपे हुए पहलुओं पर रोशनी डालती है, जो हर इंसान की ज़िंदगी में होते हैं. मगर जिनके बारे में कोई बात नहीं करता.
कनु बहल
फिल्म 'आगरा' के निर्देशक

भारत में सेक्स संबंधी रीति रिवाज और यौन हिंसा का पूरा मसला, एक ऐसा विषय था जिसका सामना करना कनु बहल के लिए भी आसान नहीं था. उन्होंने कहानी का जो पहला ड्राफ्ट तैयार किया था, उसमें खुलकर सेक्स सीन का ज़िक्र नहीं था.

लेकिन, जब कनु बहल फिल्म निर्माताओं के लिए अमरीका के थ्री रिवर्स रेज़ीडेंसी में भाग ले रहे थे, तो बहल से कहा गया कि उन्हें अपने किरदार के दबे कुचले अरमानों, उसके बदसूरत किरदार और कहानी के स्याह पहलू को दर्शकों के सामने उजागर करने के लिए तस्वीरों में पेश करना होगा.

जिससे दर्शकों को ये समझ में आ सके कि फिल्म के मुख्य किरदार के कुंठित दिमाग़ ने ही शारीरिक संबंध बनाने की उसकी ख़्वाहिशों को वीभत्स बना दिया है.

कनु बहल ने बताया, ''जब उन्हें पढ़ाने वाले ने फिल्म का ड्राफ्ट पढ़ा, तो मुझसे पूछा कि मैं ये फ़िल्म क्यों बना रहा हूं? तो, मैंने जवाब दिया कि मैं भारत में जगह की कमी और यौन इच्छा के दमन की समस्या को दिखाना चाहता हूं. तब उन्होंने कहा कि फिर तुम इसे पर्दे पर क्यों नहीं दिखा रहे हो? ''

''अगर तुम वाक़ई लोगों को ये कहानी सुनाना चाहते हो, तो ये काम अधकचरे ढंग से नहीं कर सकते. उसी रात मैंने फ़ैसला किया कि मैं एक ऐसे कमज़ोर इंसान की ज़िंदगी पर फ़िल्म बनाऊंगा, जिसे नहीं पता कि वो अपने विपरीत लिंग वाले इंसान से कैसा व्यवहार करे. मुझे दिखाना पड़ा कि ऐसे लोग इतनी नीचता भरा बर्ताव करते हैं, जिसकी उम्मीद नहीं की जा सकती.''

भारतीय सिनेमा का डीएनए

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इमेज कैप्शन, कान फिल्म फेस्टिवल में कनु बहल

कनु बहल, भारतीय सिनेमा के इतिहास के बहुत उम्दा फ़िल्मकारों के नक़्श-ए-क़दम पर चल रहे हैं.

फिल्मों की जानकार मीनाक्षी शेड्डे कहती हैं,''भारत में सिनेमा का ये स्याह पहलू हमेशा से मौजूद था."

मीनाक्षी, बर्लिन फिल्म फेस्टिवल में भारत और दक्षिणी एशिया की प्रतिनिधि हैं. वो टोरंटो फिल्म फेस्टिवल के लिए भी सीनियर प्रोग्राम एडवाइज़र हैं. इस साल के कान फिल्म फेस्टिवल में मीनाक्षी क्रिटिक्स वीक जूरी की सदस्य हैं.

वो कहती हैं, ''हमारे सिनेमा में हमेशा से ही रूढ़ियों की बेड़ियां तोड़कर आगे बढ़ने वाले मौजूद रहे हैं. भले ही उनका दबदबा न रहा हो. लेकिन, भारतीय सिनेमा के डीएनए में शुरुआती दौर से ही ऐसे तत्व मौजूद रहे हैं. शायद ये बहुत सी संस्कृतियों में आम है, जहां सिनेमा बनाने की शुरुआत ही उन लोगों ने की थी, जो समाज की बेड़ियां तोड़ने को तैयार थे. ''

''भारत में भी फिल्म बनाने की शुरुआत निचली जाति के, हाशिए पर पड़े तबक़े के लोगों और अप्रवासियों ने ही की थी, क्योंकि फ़िल्मों में काम करना ख़राब माना जाता था.''

''1913 में आई मूक फिल्म राजा हरिश्चंद्र के बारे में अक्सर ये माना जाता है कि ये भारत की पहली फीचर फिल्म थी, जिसने भारत में सिनेमा को लोकप्रिय बनाया.''

लेकिन, उस वक़्त भारत में फिल्मों को इतना घटिया पेशा माना जाता था कि राजा हरिश्चंद्र फिल्म के निर्देशक दादासाहेब फाल्के को एक औरत के किरदार के लिए एक पुरुष कलाकार रखना पड़ा था. उसस वक़्त तो फिल्मों में होना ही समाज के उसूलों के ख़िलाफ़ माना जाता था.

सत्यजीत राय

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इमेज कैप्शन, सत्यजीत राय

मीनाक्षी कहती हैं, ''बेड़ियां तोड़ने का वो सिलसिला लंबे समय से आगे बढ़ता आ रहा है. हमने इसे 1950 के दशक से लेकर 1970 तक देखा था, जब समानांतर सिनेमा का आंदोलन शुरू हुआ था.''

''मिसाल के तौर पर अगर आप सत्यजित रे की फिल्में देखते हैं, तो पाथेर पंचाली 1955 में बनाई गई थी. और, मृणाल सेन और ऋत्विक घटक जैसे सत्यजित रे के समकालीन निर्देशकों और जाने माने कलाकारों ने बेहद सियासी और समाज की लक्ष्मण रेखा पार करने वाली फिल्में बनाईं. इन फिल्मों ने अपने दौर के रीति रिवाजों पर सवाल खड़े किए थे.''

फिर भी, भारतीय सिनेमा की इस आज़ाद परंपरा को तलाश पाना ख़ास तौर से भारत के बाहर बेहद मुश्किल होता था. दुनिया भर में भारतीय सिनेमा की पहचान बॉलीवुड की मुख्यधारा की पारंपरिक 'मसाला' फिल्में बन गईं, जो रोमांस, गानों और अंत भला तो सब भला के आज़माए हुए नुस्खों पर बनाई जाती थीं.

1990 का दशक आते आते, फिल्म निर्माण की बढ़ती लागत के कारण भारत में वैकल्पिक सिनेमा लगभग गुम ही हो गया था. विदेशों में बसे भारतीयों के बाज़ार का फ़ायदा उठाकर बॉलीवुड की फिल्में ही शोहरत और कमाई बटोरने लगी थीं.

कमाई न होने के कारण, सिनेमाघरों ने भी समानांतर फिल्में दिखाने में दिलचस्पी दिखानी बंद कर दी. वो भी सिर्फ़ मुख्यधारा की हिंदी फिल्में दिखाकर अपनी जेबें भरने में दिलचस्पी रखने लगे थे.

भारत में आज का सिनेमा

केनेडी

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इमेज कैप्शन, अनुराग कश्यप की फिल्म 'केनेडी' का दृश्य

लेकिन, इक्कीसवीं सदी में डिजिटल तकनीक के उभार के चलते फिल्में बनाना आसान और सस्ता हो गया. इससे हाल के वर्षों में स्वतंत्र भारतीय सिनेमा उद्योग में एक नई जान आ गई है. आज शोनाली बोस और अनुराग कश्यप जैसे फिल्मकारों की ख़ूब चर्चा हो रही है.

अब चूंकि सेंसर के नियमों में भी काफ़ी ढील दे दी गई है, तो जिन विषयों पर फिल्में बनाई जाती थीं, उनका दायरा भी बढ़ गया है.

आज भारत में विवादित सियासी इतिहास और LGBTQ जैसे सामाजिक मुद्दों पर भी फिल्में बनने लगी हैं. इन फिल्मों को बर्लिन और कान जैसे फिल्म फेस्टिवल में दर्शक भी मिल जाते हैं. अनुराग कश्यप की ताज़ा फिल्म केनेडी के बारे में कहा जा रहा है कि ये भारत के पुलिस महकमे में फैले भ्रष्टाचार की सच्ची कहानी पर आधारित है.

इस फिल्म को कान फिल्म फेस्टिवल के मिडनाइट सेक्शन में दिखाया जा रहा था. इस वर्ग में वो फिल्में दिखाई जाती हैं, जो बंधे बंधाए दायरों को तोड़कर बनाई जाती हैं.

और, आज जब इस तरह के भारतीय सिनेमा को दुनिया भर के फिल्म समीक्षक सराहने लगे हैं, तो इसका असर लोकप्रिय बॉलीवुड सिनेमा पर भी पड़ रहा है. आज बड़े बड़े स्टूडियोज़ को दर्शकों की बदलती पसंद के मुताबिक़ ख़ुद को भी ढालना पड़ रहा है.

अब मुख्यधारा की फिल्मों में भी शालीनता का पहलू कम हो रहा है और उन विषयों पर भी फिल्में बन रही हैं, जो अब तक अछूत माने जाते थे.

मीनाक्षी शेड्डे कहती हैं , ''इसके कारण बॉलीवुड की मसाला फिल्में बनाने वाले भी चर्चित विषयों पर फिल्में बना रहे हैं, जो हक़ीक़त के ज़्यादा क़रीब होती हैं.' मीनाक्षी ये भी कहती हैं कि इसका उल्टा असर भी हुआ है और समानांतर सिनेमा बनाने वाले भी अब 'नाच गाने को दर्शकों के बड़े वर्ग तक पहुंचा रहे हैं.'

भारतीय सिनेमा रोमांचक दौर में

अनुराग कश्यप

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इमेज कैप्शन, अनुराग कश्यप

भारतीय सिनेमा के लिए ये दौर निश्चित रूप से रोमांचक है. आज अधिक समृद्ध, विविधता भरी और दर्शकों को बांटने वाली फिल्में बन रही हैं. जो बॉलीवुड पर अपना दबदबा क़ायम करने वाली मसाला फ़िल्मों की तुलना में बंदिशें तोड़ने वाली भारतीय सिनेमा की जड़ों के ज़्यादा क़रीब हैं.

ये फ़िल्में समाज को आईना दिखाती हैं और, गैस्पर नो, जैक स्मिथ और केनेथ एंगर (जिनकी हाल ही में मौत हो गई थी) जैसे फिल्मकारों की फिल्मों से काफ़ी ज़्यादा मिलती हैं. इन तीनों की फ़िल्में बेहद विभाजनकारी होती हैं, और कई बार उन्हें देखना मुश्किल हो जाता है. आगरा भी इसी खांचे में फिट बैठती है.

दृश्यम

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कनु बहल हमें गुरु के ज़हन में दाख़िल कराने में इस क़दर कामयाब हो जाते हैं कि उनकी फिल्म घिनौनी लगने लगती है. इसके सीन हमारी समझ पर हमला करते हैं, जिससे हमारी आंतों में मरोड़ उठने लगती है, और भीतर से बहुत बुरी प्रतिक्रिया निकलती है.

जब इस फिल्म का दायरा बढ़ता है, और इसमें पैसे उधार लेने जैसे मुद्दे भी शामिल हो जाते हैं, तो सच्चाई और कल्पना के बीच फ़र्क़ करना मुश्किल हो जाता है.

हो सकता है कि बहुत से लोगों को ये फिल्म एक दिल दहला देने वाला तजुर्बा लगे. और, कुछ लोगों को ये फिल्म देखना भ्रामक भी लगे.

लेकिन, कनु बहल की फ़िल्म की सबसे ख़ास बात ये है कि इसमें भारत के सबसे बड़े मगर सबसे कम चर्चा वाले मुद्दे को इस तरह से पेश किया गया है, जिससे ये उपदेश जैसी बोझिल नहीं लगती. हम चाहेंगे कि भारत में ऐसी ही रचनात्मक रूप से साहसिक और सोचने को मजबूर करने वाली फिल्में ज़्यादा से ज़्यादा बनें.

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