अमिताभ, डॉन और 'खइके पान बनारस वाला' की कहानी जो पहले फ़िल्म में था ही नहीं

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- Author, वंदना .
- पदनाम, टीवी एडिटर, बीबीसी इंडिया
ये वो दौर था जब 1978 में अमिताभ बच्चन की पांच बड़ी फ़िल्में रिलीज़ को तैयार थीं. पांच साल पहले 1973 में फ़िल्म 'ज़ंजीर' के ज़रिए एंग्री यंग मैन के रूप में अमिताभ बच्चन दस्तक दे चुके थे.
10 फ़रवरी 1978 को अमिताभ और रेखा की फ़िल्म 'गंगा की सौगंध' आई. इसके बाद राखी, रणधीर कपूर और नीतू सिंह के साथ 'कस्मे वादे' 21 अप्रैल 1978 को रिलीज़ हुई.
दो हफ़्ते बाद ही यानी 5 मई 1978 को आई संजीव कपूर, शशि कपूर और अमिताभ की फ़िल्म 'त्रिशूल' की धूम चारों तरफ़ थी.
'त्रिशूल' के सिर्फ़ सात दिन बाद यानी 12 मई 1978 को अमिताभ बच्चन की एक और फ़िल्म रिलीज़ को तैयार थी.
फ़िल्म के डायरेक्टर का नाम था चंद्रा बारोट जिनकी ये पहली फ़िल्म थी. फ़िल्म के प्रोड्यूसर ऐसे थे जो बुरी तरह क़र्ज़ में डूबे हुए थे और इस फ़िल्म पर दांव खेलकर सब उम्मीद कर रहे थे कि ये पैसा कमाएगी और क़र्ज़ चुकता होगा.
फ़िल्म का नाम कुछ ऐसा था जिसे लेकर आपत्ति जताई जा चुकी थी. फ़िल्म का नाम था 'डॉन'. ये शाहरुख़ ख़ान और फ़रहान अख़्तर वाली 'डॉन' नहीं बल्कि 1978 में आई डॉन है.
'डॉन' के नाम को लेकर था एतराज़
दरअसल उन दिनों 'डॉन' (dawn) नाम का एक बहुत ही मशहूर अंडरगारमेंट ब्रैंड था. इसलिए फ़िल्मी बाज़ार में 'डॉन' (dawn) नाम को लेकर कोई फ़िल्म ख़रीदना नहीं चाह रहा था क्योंकि दोनों का उच्चारण एक जैसा था.
अमिताभ बच्चन ने ये किस्सा बताते हुए अपने ब्लॉग पर लिखा है, ''सच तो ये है कि बहुत से लोगों के लिए डॉन (dawn) का टाइटल कौतुहूल का विषय था. ये एक बनियान ब्रैंड का नाम था. ये तो बाद में गॉडफ़ादर आने के बाद डॉन शब्द प्रचलित हो गया और इसे सामान्य माना जाने लगा. लेकिन उस दौर में इसे मज़ाकिया लहजे में इस्तेमाल किया जाता था.''
बात यहां तक पहुंच गई थी कि डिस्ट्रीब्यूटर 'डॉन' नाम की फ़िल्म ख़रीदना नहीं चाह रहे थे. जब फ़िल्म रिलीज़ हुई तो इसे फ्ल़ॉप क़रार दे दिया गया.
लेकिन चंद ही दिनों में ऐसा चमत्कार हुआ कि फ़िल्म का टिकट लेने के लिए लंबी-लंबी क़तारें लगने लगीं. लोग एक गाना देखने के लिए बार-बार थिएटर जाते. गाना था- खइके पान बनारस वाला..
देखते ही देखते फ़िल्म डॉन सुपरहिट हो गई. जिस शब्द डॉन को लेकर आपत्ति थी उसी का डायलॉग 'डॉन को पकड़ना मुश्किल ही नहीं, नामुमकिन है' सबकी ज़ुबां पर था.
45 साल पूरे होने के बाद आज उसे कल्ट फ़िल्म माना जाता है.

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'खइके पान बनारस वाला' फ़िल्म में था ही नहीं
बात यहां गानों की चली है तो सबसे पहले 'खइके पान बनारस वाला' की ही बात करते हैं.
दरअसल ये गाना फ़िल्म में था नहीं था जिसका ज़िक्र अमिताभ बच्चन ने अपने ट्ववीट में किया है. वो लिखते हैं, "ये बाद में आया हुआ ख़्याल था - खइके पान बनारस वाला दरअसल फ़िल्म 'डॉन' पूरी हो जाने के बाद शामिल किया गया था."
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कहानी यूं है कि फ़िल्म के निर्देशक चंद्रा बारोट मनोज कुमार के शागिर्द थे. 'पूरब और पश्चिम', 'रोटी कपड़ा और मकान' जैसी फ़िल्मों में उन्होंने मनोज कुमार को असिस्ट किया था.
जब डॉन तैयार हो गई तो चंद्रा बारोट ने फ़िल्म मनोज कुमार को दिखाई. मनोज कुमार ने कहा कि सलीम जावेद की लिखी हुई ये कहानी इतनी कसी हुई है और इतना थ्रिल है कि यहां थोड़ी ढील देने की ज़रूरत है.
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दर्शकों को ढील देने की इसी सलाह को मानते हुए चंद्रा बारोट ने 'खइके पान बनारस वाला' गाना शामिल किया.
ठेठ बनारसी अंदाज़ वाला ये गाना लिखा था गीतकार अंजान ने जो बनारस के रहने वाले थे.. फ़िल्म के संगीत का ज़िम्मा था कल्याण जी आनंद जी के नाम और गाना गाया था किशोर कुमार ने.

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जब किशोर ने 'खइके पान' गाने से मना कर दिया
अंजान के बेटे समीर ने 2019 में 'आजतक साहित्य' नाम के एक कार्यक्रम में बताया था, "मैं 17-18 साल का था जब मुंबई में 'खइके पान बनारस वाला' की रिकॉर्डिंग हो रही थी.
''किशोर कुमार, अमिताभ बच्चन और मेरे पिता अंजान रिकॉर्डिंग रूम में थे.. जब किशोर जी को पहली बार देखा तो दंग रह गया. वो सिल्क लुंगी पहने हुए थे. पैरों में दो अलग-अलग तरह की चप्पल थी. आंखों में सुरमा लगाया हुआ था."
"जैसे ही पिताजी ने गीत के बोल सुनाए किशोर जी बोले कि ये क्या बोल है कि 'भंग का रंग' जमा हो चकाचक.
उन्होंने कहा, 'मैंने ये शब्द पहले नहीं सुने, मैं नहीं गाऊँगा.' फिर जब उन्हें 'खइके' पान शब्द बताया तो किशोर जी अड़ गए कि वो 'खा के' बोलेंगे.''
''पिता जी बोले कि खइके और चकाचक का मतलब समझने के लिए आपको बनारस की गलियों में जाना होगा. उसके बाद किशोरजी ने कुछ नहीं कहा. उनके लिए पान मंगवाया गया. किशोर जी ने कहा कि वो सिर्फ़ एक ही बार गाएँगे और कोई साजिंदा रिकॉर्डिंग में ग़लती न करे. किशोर जी ने एक टेक में पूरा गाना गा दिया."
खइके पान बनारस वाला गाना दरअसल 'डॉन' के लिए लिखा ही नहीं गया था. कल्याण जी आनंद जी ने इसे देव आनंद की फ़िल्म 'बनारसी बाबू' (1973) के लिए लिखा था.
लेकिन देव आनंद को गाना ज़्यादा पसंद नहीं आया था.

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तंज़ानिया से आए थे चंद्रा बारोट
गाने की शूटिंग के क़िस्से भी दिलचस्प हैं. दरअसल आनंद जी पान के शौक़ीन थे और रात तक पान खाते-खाते उनके होंठ लाल हो जाते थे.
उन्हें देखकर चंद्रा बारोट ने भी गाने की शूटिंग से पहले अमिताभ बच्चन के लिए ख़ूब सारे पान मंगाए और खिलाए. नतीजा ये हुआ कि होंठ तो लाल हुए, लेकिन पान में डले चूने से उनके होंठ बुरी तरह कट गए थे.
चंद्रा बारोट दरअसल तंज़ानिया के रहने वाले थे और वहीं नौकरी करते थे. लेकिन 1960 के दशक में वहां के हालात काफ़ी ख़राब हो गए. कई जगह नस्ली हमले हुए. 1966 में छात्रों का बड़ा आंदोलन भी हुआ.
ख़राब हालात को देखते हुए परिवार ने तंज़ानिया छोड़ दिया.
चंद्रा बारोट कुछ दिन के लिए मुंबई आ गए अपनी बहन कमल बारोट से मिलने. कमल हिंदी फ़िल्मों में गायिका थीं.
'हंसता हुआ नूरानी चेहरा और 'दादी अम्मा दादी अम्मा मान जाओ' उन्होंने दूसरी गायिकाओं के साथ गाए हैं.
चंद्रा बारोट जो एक बार मुंबई आए तो यहीं के होकर रह गए और मनोज कुमार के साथ ने उनकी क़िस्मत बदल दी.

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क़र्ज़ चुकाने के लिए बनाई थी 'डॉन'
'रोटी कपड़ा और मकान' फ़िल्म में वो मनोज कुमार को असिस्ट कर रहे थे. इस फ़िल्म के सिनेमेटोग्राफ़र थे नरीमन ईरानी जो बहुत बड़ा नाम थे.
वरिष्ठ फ़िल्म समीक्षक रामाचंद्रन श्रीनिवासन बताते हैं, "नरीमन ईरानी ने 'ज़िंदगी-ज़िंदगी' नाम की फ़िल्म बनाई थी जो बुरी तरह फ़्लॉप हो गई थी.
ईरानी 12 लाख रुपए के क़र्ज़ में डूब गए. तब 'रोटी कपड़ा और मकान' में काम करने वाले कुछ कलाकारों ने ईरानी जी से कहा कि आप एक फ़िल्म बनाइए और ज़रूरत पड़ी तो हम फ़्री में काम करेंगे.
सलीम जावेद से स्क्रिप्ट ली गई.
यूँ तो डॉन एक अपराधी की कहानी है, लेकिन दरअसल डॉन उस जज़्बात की कहानी है जहाँ चंद्रा बारोट, ज़ीनत अमान, अमिताभ बच्चन और प्राण जैसे लोग मुश्किल वक़्त में अपनी ही बिरादरी के एक साथी के साथ खड़े नज़र आए.
लेकिन फ़िल्म के दौरान एक बड़ा हादसा हुआ. रामाचंद्रन श्रीनिवासन बताते हैं, "शूटिंग के दौरान बादल फटने से लाइट ईरानी जी पर गिरी और वो घायल हो गए और उनका इंतकाल हो गया. सभी लोगों ने बिना पैसे लिए फ़िल्म ख़त्म की. जब फ़िल्म ने पैसा कमाया, तब जाकर सब कलाकारों में पैसे बांटे गए."
इस फ़िल्म के लिए अमिताभ बच्चन को फ़िल्मफेयर पुरस्कार भी मिला.
अवॉर्ड की पुरानी तस्वीर शेयर करते हुए अमिताभ ने ट्वीट किया था, "उस साल नूतन जी और मुझे फ़िल्मफ़ेयर अवॉर्ड मिला था. फ़िल्म 'डॉन' रिलीज़ होने से पहले ही नरीमन ईरानी को हमने खो दिया था. मैंने ये अवॉर्ड उनकी पत्नी को समर्पित किया था."
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डॉन की कामयाबी की तख़्ती भारी हो गई
इतनी बड़ी हिट देने के बावजूद चंद्रा बारोट कोई और बड़ी फ़िल्म नहीं दे पाए.
2015 में बीबीसी की सहयोगी श्वेता पांडेय से बातचीत में उन्होंने कहा था, "डॉन की कामयाबी की तख़्ती काफ़ी भारी हो गई. लोगों की उम्मीदें बढ़ गईं. कोशिश हमेशा रही है कि पिछली फ़िल्म से बेहतर करूं, लेकिन स्टारकास्ट और बजट के अभाव में ऐसा नहीं हो सका."
अमिताभ और चंद्रा बारोट की दोस्ती आज भी बरक़रार है. वो अमिताभ को 'टाइगर' बुलाते हैं. वे कहते हैं, "रिश्ता एक बार ही बनता है और ताउम्र बना रहता है. एक बार मैं अल पचीनो की एक फ़िल्म देख रहा था कि मुझे 'शमिताभ' में अमिताभ का मोनोलॉग याद आया और रात में 4.30 बजे मैसेज किया, जिसका उसने तुरंत जवाब दिया."
डॉन पर लौटें तो अमिताभ शोले, दीवार, चुपके चुपके जैसी सुपरहिट फ़िल्में दे चुके थे, लेकिन डॉन इस मायने में अहम है कि ज़ंजीर के बाद शायद डॉन पहली ऐसी सुपरहिट फ़िल्म थी जिसमें अमिताभ के साथ दूसरे हीरो नहीं थे.
उस मायने में वन मैन इंडस्ट्री का जो तमगा अमिताभ बच्चन को मिला उसकी नींव मज़बूत डॉन से ही हुई.

डॉन अपने टाइम की स्टाइलिश फ़िल्मों में से थी. जहाँ डाकूओं और साहूकारों का ज़माना था, वहीं इस फ़िल्म का विलेन एक स्टाइलिश डॉन था. अमिताभ की बेल बॉटम, पोलका डॉट वाली शर्ट और वेस्टकोट ज़बर्दस्त हिट थे.
हालांकि मज़ेदार बात ये है कि जहां हिंदी फ़िल्मों में हर कुछ सीन में कपड़े बदल जाते हैं., फ़िल्म के लगभग आख़िरी एक घंटे (01.22.37) से लेकर आख़िर तक अमिताभ एक ही लिबास में दिखते हैं- बस पुलिस की भाग-दौड़ में शायद कहीं उनका कोट और बो टाई ग़ायब हो जाती है.
रामाचंद्रन श्रीनिवासन कहते हैं, "फ़िल्म का एक और मज़ेदार किस्सा ये है कि सरोज ख़ान ने इस फ़िल्म में साइड डांसर का रोल किया था. वो हर रोज़ टिकट लेकर एक ही सिनेमाघर में जाती थीं और डांस देखती थीं. कुछ दिनों के बाद मालिकों को जब पता चला कि क्यों ये रोज़ आती हैं तो उन्होंने सरोज ख़ान के लिए एक अलग सीट ही निकाल कर दी थी."
डॉन की कामयाबी की तख्ती काफ़ी भारी हो गई. लोगों की उम्मीदें बढ़ गईं. कोशिश हमेशा रही है कि पिछली फ़िल्म से बेहतर करूं, लेकिन स्टारकास्ट और बज़ट के अभाव में ऐसा नहीं हो सका
ज़ीनत अमान और हेलेन का रोल
डॉन में अमिताभ ही नहीं बाकी किरदार भी मकबूल थे. रोमा के रोल में ज़ीनत अमान को चुनौतीपूर्ण किरदार मिला जहाँ उनका काम सिर्फ़ रोमांस करना नहीं था.
जसजीत के रोल में प्राण बहुत ही अहम भूमिका में थे और उन दिनों हीरो से ज़्यादा फ़ीस कई बार उनकी होती थी.
किरदार चाहे कोई भी हो- डीएसपी डि सिल्वा बने इफ़्तेख़ार, वरदान बने ओम शिवपुरी, इंस्पेक्टर वर्मा बने सत्येन कप्पू, नारंग बने कमल कपूर, डॉन के गैंग मेंबर बने मैक (मैकमोहन) या डॉन की गर्लफ़्रेंड बनी अपर्णा चौधरी- सब यादगार थे.
हेलेन ने भी फ़िल्म में छोटा-सा रोल किया था और उनका गाना 'ये मेरा दिल' सुपरहिट था. उस वक्त हेलेन की उम्र 40 के क़रीब हो चुकी थी. और ये वो दौर था जब हीरोइन या वैंप की उम्र तीस पार नहीं होनी चाहिए थे.
डॉन के लिए आशा भोसले और किशोर कुमार दोनों को फ़िल्मफेयर पुरस्कार मिला था.

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सलीम जावेद की कहानी
अगर स्क्रीनप्ले की बात करें तो दीवार, शोले या त्रिशूल में सलीम जावेद ने कई परतों वाले किरदार लिखे थे जिनमें सही और ग़लत के बीच की लकीर धुँधली होती नज़र आती है. उनकी तुलना में डॉन की कहानी कमोबेश सीधी सपाट है -लेकिन स्क्रीनप्ले में ज़बर्दस्त कसावट थी जिसे चंद्रा बरोट ने उम्दा तरीके से बनाया.
डॉन की सफलता के बाद कई भाषाओं में इसे बनाया गया. ये वो समय था जब रजनीकांत भी तमिल फ़िल्मों में आ चुके थे. उन्हें सफलता भी मिली, लेकिन जब 1980 में तमिल में बिल्ला नाम से 'डॉन' की रीमेक बनी तो रजनीकांत सुपरस्टार बन गए.

तेलुगू में एनटीआर (एनटी रामाराव) ने इसमें काम किया. मलयालम में मोहनलाल ने इस पर बनी रीमेक पर काम किया. पाकिस्तान में 'कोबरा नाम से ये फ़िल्म बनी. 2006 में शाहरुख़ ने 'डॉन' में काम किया और 2009 में तेलुगू में फिर से प्रभास के साथ इसे बनाया गया.
अमिताभ के 80वें जन्मदिन पर 2022 में जब 'डॉन' दोबारा सिनेमाघरों में रिलीज़ हुई तो लोग हॉल में नाचते-झूमते नज़र आए थे.
फ़िल्म निर्देशक मधुर भंडारकर ने इसका ज़िक्र करते हुए लिखा था कि उन्होंने बचपन में ये फ़िल्म सिनेमाघर में देखी थी और 44 साल बाद वो दोबारा सिनेमाहॉल में इसे देखने गए.
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फ़िल्म पठान के हिट होते ही लोगों ने शाहरुख़ और डॉन-3 ट्रेंड करवाना शुरू कर दिया था. पिछले साल अमिताभ बच्चन ने डॉन के पोस्टर और शाहरुख़ के साथ एक फ़ोटो शेयर की थी जिस पर लिखा था- उसी क्रम को बरक़रार रखते हुए डॉन. इसके सबने अपने-अपने मतलब निकाले.
सोचा तो मैंने भी था कि अगर वाक़ई अमिताभ और शाहरुख़ एक साथ 'डॉन' सिरीज़ में नज़र आएं तो...
(मधुपाल के इनपुट के साथ)
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