दिलीप कुमार की 100वीं जयंती पर सायरा बानो ने इतना कुछ बताया

सायरा बानो

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    • Author, प्रदीप सरदाना
    • पदनाम, वरिष्ठ पत्रकार एवं फिल्म समीक्षक, बीबीसी हिंदी के लिए

"हमने सोचा था दिलीप साहब जब 100 साल के होंगे तो उनका जन्मदिन उसी धूमधाम से मनाएंगे जैसे उनका 90वां जन्मदिन मनाया था. लेकिन हमारी यह इच्छा पूरी नहीं हो सकी. फिर भी उनका 100वां जन्मदिन कुछ अलग ढंग से मना रहे हैं."

यह कहना है दिलीप कुमार की बेगम और अपने ज़माने की बेहतरीन अभिनेत्री सायरा बानो का. अगर दिलीप कुमार आज होते तो 11 दिसंबर को 100 साल के हो जाते.

दिलीप कुमार का पिछले वर्ष सात जुलाई को 99 साल की उम्र में निधन हो गया था.

सायरा बानो बताती हैं, "मुझे ख़ुशी है कि दिलीप साहब के 100वें जन्मदिन को देश भर में उनकी पुरानी फ़िल्मों का दो दिन का समारोह आयोजित किया जा रहा है. इससे नई पीढ़ी के लोग भी उनकी पुरानी फ़िल्मों को देख सकेंगे."

मुंबई में इस फ़िल्म समारोह के लिए फ़िल्म इंडस्ट्री के बहुत से लोग आकर उन्हें याद करेंगे. इस फ़िल्म समारोह में सायरा बानो के साथ वहीदा रहमान, आशा पारेख, रमेश सिप्पी के साथ जावेद अख़्तर, प्रेम चोपड़ा, विश्वजीत भी शामिल हो रहे हैं.

इसके अलावा बिमल राय, महबूब ख़ान, प्रेम नाथ और प्राण साहब के परिवार के लोग भी शिरकत करेंगे. अमिताभ बच्चन और कमल हासन एक वीडियो के माध्यम से अपनी उपस्थिती दर्ज करा रहे हैं.

दिलीप कुमार की फ़िल्मों का यह समारोह उस 'फ़िल्म हेरिटेज फाउंडेशन' द्वारा आयोजित किया जा रहा है, जिसके संरक्षक अमिताभ बच्चन हैं. वह स्वयं दिलीप कुमार के पुराने मुरीद हैं. 'हीरो ऑफ हीरोज' (नायकों के नायक) नाम के इस फ़िल्म समारोह के पोस्टर को भी स्वयं अमिताभ बच्चन ने जारी किया है.

दिलीप कुमार के इस बेहद ख़ास जन्मदिन को मनाने के लिए उनकी फिल्मों का यह समारोह 10 और 11 दिसंबर को रखा है. इसके लिए उनकी चार फ़िल्में 'आन', 'देवदास', 'राम और श्याम' और 'शक्ति' को चुना गया है. इन फ़िल्मों का प्रदर्शन देश भर के कई शहरों में किया जा रहा है.

अमिताभ बच्चन

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समारोह में मुगल-ए-आज़म नहीं

इस समारोह के लिए दिलीप कुमार की इन चार फ़िल्मों को ही क्यों चुना गया. साथ ही उनके फ़िल्म समारोह में 'मुगल-ए-आज़म' और 'गंगा जमुना' जैसी दो बड़ी फिल्मों के नहीं होने पर 'फ़िल्म हेरिटेज फाउंडेशन' के संस्थापक शिवेंद्र सिंह डूँगरपुर कहते हैं-

"ये फ़िल्में होनी चाहिए थीं. लेकिन 'गंगा जमुना' का प्रिंट इस स्थिति में नहीं है कि उसे दिखाया जा सके. 'मुगल-ए-आजम' का भी ब्लैक एंड व्हाइट प्रिंट हमको अच्छी स्थिति का नहीं मिल पाया. इसका कलर वर्जन अच्छी स्थिति में है. लेकिन सायरा जी का मानना है कि दिलीप साहब इस फ़िल्म के रंगीन बनने से इत्तेफाक़ नहीं रखते थे. इसलिए हमने उसके रंगीन संस्करण को इस फ़िल्म समारोह में नहीं रखा."

वैसे इस आयोजन पर सायरा बानो बताती हैं, "साहब की 'आन' जैसी फ़िल्म देखने का यह सुनहरा मौका है. ऐसी फ़िल्में आज भला कहाँ देखने को मिलती हैं. मैंने भी दिलीप साहब की 'आन' फ़िल्म सबसे पहले देखी थी. उसी के बाद मैंने दिलीप साहब से शादी करने का फ़ैसला मन ही मन ले लिया था."

सायरा दिलीप साहब के साथ हमेशा साया बनकर रहीं. अब उनकी कमी के बारे पर सायरा बताती हैं, "मेरे लिए आज भी दिलीप साहब मेरे साथ हैं. उनकी यादें, उनकी बातें, उनकी शख्सियत इस कद्र मेरे दिल में, मेरे जहन में बसी हैं कि मैं उन्हें हमेशा अपने साथ महसूस करती हूँ. वो चाहे बहुतों के लिए नहीं हैं. लेकिन मेरे लिए आज भी मेरे साथ हैं.''

''हालांकि अल्लाह ने उन्हें लंबी उम्र बख्शी, पर यदि वह एक दो साल और जीते तो और भी अच्छा होता. आपको याद होगा हमने उनके 89वें वर्ष पूरे होने पर 90वें जन्मदिन पर कैसी पार्टी दी थी. हमारे घर के बड़े बगीचे में सिनेमा के एक से एक सितारे मौजूद थे. हालांकि उनके जन्मदिन पर हम कोई पार्टी नहीं करते थे. ख़ुद ही उस दिन कुछ लोग हमारे घर बधाई देने आ जाते थे. कभी अमित जी, धरम जी, कभी लता जी, कभी शाहरुख़ को कभी आमिर."

सायरा बानो और दिलीप कुमार

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सोचा तो बहुत कुछ था

वो कहती हैं, "उस दिन इतने लोग बधाई भेजते थे कि हमारा पूरा घर फूलों से भर जाता था. लेकिन उनके 90वें जन्मदिन पर मेरी भतीजी ने कहा हम बड़ी पार्टी करेंगे. इसलिए तब बड़ी पार्टी रखी, जिसमें कितने ही लोग शामिल हुए."

''अब मैंने सोचा था कि 100वें जन्मदिन का जश्न मनाएंगे. पहले की तरह सभी को आमंत्रित करेंगे. सोचा तो बहुत कुछ था, लेकिन क्या करें. जो अल्लाह को मंज़ूर.''

'गोपी', 'सगीना', 'बैराग' जैसी फ़िल्मों में उनके साथ अभिनय कर चुकीं सायरा बानो अभिनेता दिलीप कुमार के बारे में बताती हैं, "दिलीप साहब आज भी बेमिसाल हैं. उनकी बराबरी आज भी कोई और नहीं कर सका. उन्होंने सिनेमा में अभिनय की नई शैली को ईजाद किया. उनसे पहले कैमरे के सामने भी थिएटरिकल एक्टिंग, थिएटर जैसे अंदाज़ का अभिनय होता था. लेकिन दिलीप साहब ने सहज अभिनय किया."

दिलीप कुमार के मेथड अभिनय पर सायरा बानो बताती हैं, "विश्व सिनेमा में मार्लन ब्रेंडो को मेथड एक्टर कहा जाता है. लेकिन दिलीप साहब ने मार्लन ब्रेंडो से भी पहले मेथड एक्टिंग की शुरुआत कर दी थी. उनका मानना था दर्शकों को फ़िल्म देखते हुए यह महसूस न हो कि वह कोई नाटक देख रहे हैं. उन्हें लगना चाहिए जो कुछ हम देख रहे हैं, वह हमारे सामने सच में हो रहा है. इसीलिए वह बेमिसाल रहे."

"उनकी कोई भी फ़िल्म देख लीजिए किसी में भी वह दिलीप कुमार नहीं, फ़िल्म के क़िरदार नज़र आते हैं. उनकी पुरानी से पुरानी फ़िल्में आज के समय की लगती हैं. उनका क़िरदार दर्शकों को असली और सच्चा लगता है."

वीडियो कैप्शन, अभिनेता दिलीप कुमार का फ़िल्मी दुनिया का सफ़र

ख़ुद को कभी दोहराया नहीं

दिलीप साहब ने कुल लगभग 60 फ़िल्में कीं. लेकिन इतनी कम फ़िल्में करने के बाद भी उन्हें वह शोहरत मिली जो सैकड़ों फ़िल्में करने वाले कलाकार को भी नहीं मिल पाती.

उनकी कामयाबी पर सायरा बानो कहती हैं, "असल में दिलीप साहब ने जहाँ सहज अभिनय किया वहाँ अपनी भूमिकाओं को दोहराया नहीं. वह कहते थे एक सब्ज़ी कितनी भी स्वादिष्ट क्यों ना हो. यदि नाश्ते में भी उसे खाएँगे फिर लंच में भी और डिनर में भी तो उसका वह मज़ा नहीं रहेगा. इसलिए 'देवदास' के समय उन्हें कुछ ऐसी ही फ़िल्में मिलने लगीं, तो उन्होंने उन्हें करने से इनकार कर दिया."

सायरा बानो दिलीप कुमार के जीवन और उनके फ़िल्मी सफ़र को लेकर एक म्यूज़ियम बनवाने की कोशिशों में भी जुटी हैं.

वह कहती हैं, "पूरी कोशिश है कि ऐसा हो, उधर तबीयत भी ठीक नहीं रहती है लेकिन दुआ कीजिए कि इंशाअल्लाह यह तमन्ना पूरी हो."

दिलीप साहब के 100वें जन्मदिन के मौक़े पर क्या ख़ास करेंगी, इसके जवाब में उन्होंने कहा, "हम परिवार के सभी लोग साथ बैठकर उनके लिए दुआ करेंगे. ख़ुशियाँ मनाएंगे कि दिलीप साहब जैसी हस्ती इस दिन दुनिया में आई. हमको उनका साथ मिला,प्यार मिला."

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