डिस्को डांसर: रूस से लेकर अफ़्रीका तक गूंजता 'जिमी जिमी आजा आजा'

मिथुन

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    • Author, वंदना
    • पदनाम, टीवी एडिटर, बीबीसी इंडिया

"डिस्को डांसर फ़िल्म में हीरो ग़रीब होता है लेकिन वो अपनी प्रतिभा के दम पर अपनी कला, मेहनत के ज़रिए चमकता है और डिस्को सुपर-स्टार बनता है. मिथुन इस रोल के लिए परफ़ेक्ट थे. ग़रीबी और मुश्किलों से निकलकर वो स्टार बनता है लेकिन उसमें घमंड नहीं आता. इस बात और इस रोल ने उज़्बेकिस्तान, सेंट्रल एशिया में हमारा दिल जीत लिया था."

उज़्बेकिस्तान में एक मशहूर म्यूज़िक बैंड चलाने वाले रुस्तमजान इरामतोव हिंदी फ़िल्म 'डिस्को डांसर' और मिथुन चक्रवर्ती के ज़बरदस्त फ़ैन हैं.

HAVAS BAND

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वे कहते हैं, "मैं आर्टिस्ट होकर भी कुछ बजाना नहीं सीख पाया लेकिन मेरी बड़ी इच्छा थी कि जब मेरे बच्चे होंगे तब मैं उन्हें मौका और इतने पैसे दूँगा कि वो ये सब सीख सकें. अब उज़्बेकिस्तान में हमारा म्यूज़िकल बैंड है. डिस्को डांसर की तरह."

वे ऐसे अकेले फ़ैन नहीं हैं जिनका भारत से यूँ तो कोई नाता नहीं है लेकिन हिंदी फ़िल्म 'डिस्को डांसर' और मिथुन को लेकर उनमें ज़बरदस्त क्रेज़ है.

"मैं दस साल का था जब 'डिस्को डांसर' रिलीज़ हुई थी. उस दिन से लेकर आज तक मिथुन चक्रवर्ती हमारे देश में बहुत मशहूर हो गए. मेरी बहुत सी यादें हैं जॉर्जिया में दादा के साथ."

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कल्ट फ़िल्म

ये शब्द लिखने वाले डेविड आज 48 साल के हैं और भारत से कोई चार हज़ार किलोमीटर जॉर्जिया में रहते हैं लेकिन उनका मिथुन प्रेम जगज़ाहिर है.

आज से 40 साल पहले 17 दिसंबर 1982 को रिलीज़ हुई फ़िल्म 'डिस्को डांसर' एक कल्ट फ़िल्म मानी जाती है जिसका जलवा आज तक बरकरार है.

बी सुभाष के निर्देशन, राही मासूम रज़ा के लेखन और बप्पी लाहिड़ी के संगीत से सजी 'डिस्को डांसर' जब आई थी तब इसने भारत ही नहीं, चीन और तत्कालीन सोवियत संघ तक में धूम मचा दी थी. आज भी 'जिमी जिमी' वाला गाना वहाँ आपको सुनाई दे जाएगा.

अगर आपने 'डिस्को डांसर' न देखी हो तो ये जिमी नाम के एक ग़रीब बच्चे की कहानी है जिसे और उसकी माँ को बेइज्ज़त होकर मुंबई से जाना पड़ता है.

ये लड़का बड़ा होकर डिस्को डांसर जिमी बनता है. वो अपने डांस और संगीत के ज़रिए बचपन में हुई बेइज़्जती का बदला लेता है.

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आलीशान स्टेज, चमकदार बेल बॉटम, ज़बरदस्त संगीत, चमचमाते बल्ब और स्टेज पर गिटार लिए मिथुन जो अपने फ़ैन्स से कहते हैं, 'आई एम ए डिस्को डांसर' और उनके गाने पर थिरकते हज़ारों फ़ैन्स. ये सिर्फ़ फ़िल्मी सीन नहीं था पर असल में जहाँ ये गाना बजाया जाता था, ऐसा ही नज़ारा होता था.

यूँ तो इसमें ड्रामा, रोमांस, बदला, एक्शन सब कुछ है, लेकिन 'डिस्को डांसर' एक म्यूज़िकल और डांस फ़िल्म थी. यही खूबी इस फ़िल्म की सफलता की सबसे बड़ी वजह बनी.

और सफलता भी ऐसी कि मिथुन चक्रवर्ती रातों रात हिंदी फ़िल्मों के ही नहीं, बल्कि 'इंटरनेशनल स्टार' बन गए. मिथुन का ये रोल शायद हिंदी सिनेमा के सबसे लोकप्रिय डांसिंग क़िरदारों में से एक है.

रूसी फ़ैन्स के साथ मिथुन की पुरानी तस्वीरें रह-रहकर वायरल होती हैं जो उनकी लोकप्रियता के मयार को दर्शाती हैं.

उनका गाना 'जिमी जिमी' कितना मशहूर है इसकी बानगी लगातार देखने को मिलती रहती है.

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जब चीन में वायरल हुआ 'जिमी जिमी'

पिछले महीने चीन में कोविड लॉकडाउन की वजह से बहुत से लोगों के घर में चावल समेत खाने-पीने का सामान ख़त्म हो गया था.

तब लोगों ने सोशल मीडिया पर ऐसे वीडियो डालने शुरू कर दिए जिसमें वो 'जिमी जिमी' गाना गाते हुए अपने खाली बर्तन दिखा रहे थे.

दरअसल मैंडरिन में 'जी मी जी मी' का मतलब 'मुझे चावल दो' होता है इसलिए लोग खाली बर्तन लेकर इस गाने को पोस्ट कर रहे थे.

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इसके पहले सिंतबर 2022 में शंघाई कॉर्पोरेशन समिट (एससीओ) के दौरान अंतरराष्ट्रीय मीडिया के लिए जो प्रोग्राम रखा गया उसमें 'आई एम ए डिस्को डांसर' और 'जिमी जिमी' गाना ख़ास तौर पर बजाया गया.

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रूस में हिट

वरिष्ठ फ़िल्म समीक्षक गरीश वानखेडे इस फ़िल्म की विदेशों में लोकप्रियता पर कहते हैं, "डिस्को डांसर की सबसे बड़ी अंतरराष्ट्रीय अपील थी इसके गाने में. आठों गानों का अगल-अलग रिदम था. ख़ास कर पार्वती खान का 'जिमी जिमी'. रूस में डिस्को डांसर ने ज़बरदस्त कमाई की थी."

"डिस्को डांसर की कहानी भी लोगों को बहुत पसंद आई क्योंकि वो एक ग़रीब लड़के की कहानी थी कि कैसे वो सुपरहिट डांसर बना. इसमें इमोशनल कनेक्ट था जहाँ माँ और बेटे की कहानी भी है जो लोगों को छू गई."

"माँ बेटे का इमोशन और ज़बरदस्त संगीत का कॉम्बिनेशन विदेश में लोगों को बहुत पसंद आया. फ़िल्म भरपूर मनोरंजन करती है, कहीं भी बोरिंग नहीं लगती है, लेकिन संगीत सबसे बड़ा फ़ैक्टर था. 'याद आ रहा है तेरा प्यार', 'गोरों की न कालों की..' समेत सब गाने शानदार थे."

मिथुन

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उज़्बेकिस्तान से लेकर जॉर्जिया तक धूम

उज़्बेकिस्तान के रुस्तमजान बताते हैं, "मुझे गोरों की न कालों की वाला गाना बहुत पसंद है. इसका अर्थ गहरा है. फ़िल्म में ग़रीबी से निकलकर वो बच्चा स्टार बनता है. इसलिए ये गाना मेरे दिल के बहुत करीब है. पिछले साल उज़्बेकिस्तान में हुए फ़िल्म फेस्टिवल में हमने मिथुन चक्रवर्ती का स्वागत हिंदी गाने गाकर किया."

"वो इतने लोकप्रिय हैं लेकिन वो बहुत विनम्र थे. हमारी जवानी सोवियत युग में गुज़री है जब रेडियो पर भारतीय गाने बहुत बजते थे. जैसे ही हिंदी फ़िल्म आती थी हम काम धंधा छोड़कर फ़िल्म देखने जाते थे. भारतीय फ़िल्मों के प्रति प्यार हमें विरासत में मिला है."

"जब मेरी पत्नी पैदा होने वाली थीं, तो एक भारतीय फ़िल्म टीवी पर आने वाले थी. इस डर से कि कहीं फ़िल्म छूट न जाए मेरी पत्नी को घर पर ही जन्म देने का फ़ैसला किया गया."

सोशल मीडिया पर सर्च करने से डिस्को डांसर की लोकप्रियता के कई किस्से और वाकये मिल जाएँगे.

जैसे जॉर्जिया की राजधानी तिबलिसी में एक रेस्तरां था जिसका उद्घाटन राजीव कपूर ने किया था और नाम था 'जिमी जिमी'.

और जैसा कि अक्सर होता है, किसी भी मशहूर हस्ती या कल्ट फ़िल्म के साथ कई काल्पनिक और असल किस्से जुड़ते चले जाते हैं.

मिख़ाइल गोर्बाचोफ़

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इमेज कैप्शन, मिख़ाइल गोर्बाचोफ़

मिखाइल गोर्बाचोफ़ का क़िस्सा

मसलन, ये क़िस्सा काफ़ी मशहूर है कि मिखाइल गोर्बाचोफ़ जब 80 के दशक में भारत आए थे तो राजीव गांधी ने उन्हें अमिताभ बच्चन से ये कहते हुए मिलवाया कि ये भारत के सबसे बड़े सुपरस्टार हैं लेकिन गर्बोचोफ़ ने जवाब दिया कि 'मेरी बेटी तो मिथुन चक्रवर्ती को ही जानती है.'

उसी तरह ये क़िस्सा भी मशहूर है कि जब बप्पी लहड़ी और मिथुन चक्रवर्ती कज़ाख़स्तान गए थे तो वहाँ के राष्ट्रपति के बजाए दोनों भारतीय सितारों को देखने के लिए ज़्यादा भीड़ जुटी थी. राष्ट्रपति उस दिन भाषण दे रहे थे.

ये क़िस्से आधी हक़ीक़त और आधे फ़साने हो सकते हैं लेकिन ये मिथुन और 'डिस्को डांसर' की लोकप्रियता को दर्शाते हैं.

बप्पी लाहिड़ी

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'डिस्को डांसर' में बप्पी लाहिड़ी ने हिंदी फ़िल्मों में लोगों को डिस्को की नई धुनों से रूबरू करवाया.

पार्वती ख़ान, विजय बेनेडिक्ट, उषा उथुप, नंदू भेंडे. ये सब आवाज़ें लोगों ने कम ही सुनी थी. नए तरह के संगीत और नई आवाज़ों के साथ बप्पी लाहिड़ी ने म्यूज़िक का नया कॉकटेल भारतीय लोगों के सामने पेश किया.

पॉप सिंगिंग में नाम कमाने वाली पार्वती ख़ान उन दिनों नई-नई थीं. पार्वती ख़ान के ससुर राही मासूम रज़ा डिस्को डांसर के लेखक थे और बी सुभाष ने उन्हें 'जिमी जिमी' गाना दिया.

बी सुभाष बताते हैं रिकॉर्डिंग के दौरान बप्पी लाहिड़ी को वो बात नहीं मिल रही थी जो उन्हें चाहिए थी जिसके बाद उन्होंने इस गाने में डबल आवाज़ को जोड़ा जबकि गायक विजय बेनेडिक्ट ने 'आई एम ए डिस्को डांसर' के ज़रिए डेब्यू किया.

समीक्षक गिरीश वानखेड़े कहते हैं, "बप्पी लाहिड़ी का म्यूज़िक अंतरराष्ट्रीय धुनों से प्रेरित था और इसमें भारतीय अंदाज़ भी था जो लोगों को बहुत पसंद आया."

उस दौर के फ़िल्मों की बात करें तो 'प्रेम रोग' 'शक्ति', 'सत्ता पे सत्ता' 'बाज़ार', 'निकाह' जैसी फ़िल्में आई थीं जिसमें अच्छा संगीत था लेकिन वो पारंपरिक किस्म का संगीत था लेकिन बप्पी जो लेकर आए वो एकदम अलग किस्म का संगीत था. उसमें नयापन था.

माइकल जैक्सन

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माइकल जैक्सन से मिली प्रेरणा

फ़िल्म 'डिस्को डांसर' में बहुत अलग-अलग तरह के कलाकारों की कला का मेल था. फ़िल्म के गीतों के लिए बोल लिखे थे अनजान ने. अगर आप अनजान के गीतों से वाकिफ़ हैं तो उनके गीतों की तासीर 'डिस्को डांसर' के गानों से तो बिल्कुल मेल नहीं खाती.

'छूकर मेरे मन को किया तूने क्या इशारा', 'ओ साथी रे तेरे बिना भी क्या जीना', 'पिपरा के पतवा सरीखे डोले मनवा' जैसे गाने अनजान ने लिखे थे. अनजान अपने फ़ोक टच के लिए जाने जाते थे.

निर्देशक बी सुभाष बताते हैं, "अनजान जी मेरी दूसरी फ़िल्म के गाने लिख चुके थे. मैंने उनसे 'डिस्को डांसर' के गाने लिखने के लिए कहा. लेकिन उन्होंने कहा कि वो नहीं कर पाएँगे और मैं किसी और से लिखवा लूँ. लेकिन मुझे उन्हीं से लिखवाने थे."

"मैं बाज़ार गया और दुकान से माइकल जैक्सन और दूसरे विदेशी गायकों के म्यूज़िक पैंफलेट लेकर आया जो उन दिनों बिका करते थे. वो मैंने अनजान साहब को दिए. उसमें माइकल जैक्सन का एक गाना था- 'माई मदर सेज़ आई यूज्ड टू सिंग वेन आई वाज़ नॉट एबल टू टॉक, आई यूज़्ड को डांस वेन आई वॉज़ नॉट एबल को वॉक'. बस मैंने अनजान साहब से कहा कि यही है आपका डिस्को डांसर."

मिथुन के किरदार को समेटते हुए आई एम ए डिस्को डांसर गाने में अनजान साहब ने लिखा था, "ये लोग कहते हैं, मैं तब भी गाता था जब बोल पाता नहीं था. ये पाँव मेरे तो तब भी थिरकते थे जब चलना आता नहीं था."

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चीन हो या तत्कालीन सोवियत संघ, आख़िर क्या वजह है कि डिस्को डांसर एक कल्चरल आइकन बनकर उभरी है. इसके लिए चीन के इतिहास को समझना होगा.

माओ की मौत से पहले तक चीन बाकी दुनिया से कटा हुआ था. कम्युनिस्ट शासन के तहत पश्चिमी संस्कृति से जुड़ी चीज़ों और संगीत से लोग अनजान थे क्योंकि उन पर रोक थी.

लेकिन 1976 के बाद वहीं थोड़ी बहुत छूट दी जाने लगी. दुनिया ने भले ही डिस्को पहले ही जान लिया था लेकिन जब 1983 में फ़िल्म डिस्को डांसर चीन पहुँची तो वहाँ के लोगों ने डिस्को को जाना और फ़िल्म रातों रात छा गई.

बी सुभाष ये किस्सा कई बार सुना चुके हैं कि जब वो चीन गए और लोगों को पता चला कि उन्होंने डिस्को डांसर बनाई है तो लोग उन्हें देखकर जिमी जिमी आजा आजा गाने लग जाते थे.

अमरीका में रहने वाले मणि ट्विटर पर लिखते हैं, "डिस्को डांसर से जुड़ी थ्योरी को टेस्ट करने के लिए मेरा दोस्त यूक्रेन में पर्यटक बस से निकला और 'जिमी जिमी' चिल्लाने लगा और देखते ही देखते होटल स्टाफ़ के लोग भागते हुए आए और बोलने लगे डिस्को डांसर. इन देशों में मिथुन अब भी बहुत मशहूर हैं."

व्हाट्सऐप के फाउंडर जान कॉम पूर्व सोवियत संघ में पले बढ़े हैं. 2014 में इक्नॉमिक्स टाइम्स को दिए विशेष इंटरव्यू में उन्होंने कहा था, "मैंने बचपन में 'डिस्को डांसर' कोई 20 बार देखी होगी. मैं रूस में बॉलीवुड फ़िल्में देखकर ही बड़ा हुआ हूँ और बॉलीवुड से वाकिफ़ हूँ."

मिथुन की बात करें तो 1982 में 'डिस्को डांसर' के आने से पहले 1976 में मिथुन 'मृगया' फ़िल्म में काम कर चुके थे और राष्ट्रीय फ़िल्म पुरस्कार भी जीता था. 'हम पाँच' और 'शौकीन' जैसी फ़िल्में भी आ चुकी थीं लेकिन मिथुन को वो नाम और मकाम नहीं मिल पाया था.

उन दिनों वो निर्देशक बी सुभाष की फ़िल्म 'तक़दीर का बादशाह' में काम कर रहे थे.

बी सुभाष बताते हैं, "उस दिन मिथुन थोड़ा परेशान थे, मैंने उनसे पूछा कि क्या हुआ तो मिथुन ने कहा कि वो मेहनत तो कर रहे हैं लेकिन सफलता नहीं मिल रही. उनका मूड अच्छा करने के लिए मैंने उनसे कह दिया कि मैं तुम्हारे साथ एक नई फ़िल्म बनाऊँगा और तुम स्टार बन जाओगे. बस वो जोशो ख़रोश से शूटिंग करने लगे. मेरे पब्लिसिस्ट आए और देखते ही देखते प्रेस में 'डिस्को डांसर' नाम की फ़िल्म की घोषणा हो गई और फिर जो हुआ वो सबको मालूम है."

मिथुन

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अफ़्रीका में दीवानगी

मिथुन के लिए ये दीवानगी अफ़्रीका तक दिखती है. बीबीसी के मेरे सहयोगी ज़ुबैर अहमद कोई 15 साल पुरानी बात बताते हैं.

उन्होंने बताया, "बीबीसी अफ़्रीका के हमारे एक सहोयगी कुछ समय के लिए भारत काम करने आए थे. वो सिएरा लियोन के रहने वाले थे. बचपन से ही वो मिथुन चक्रवर्ती की हीरो वर्शिप करते थे और किसी भी तरह मिथुन से मिलना या बात करना चाहते थे."

"मिथुन तब मुंबई में नहीं थे लेकिन मैं किसी तरह बीबीसी अफ़्रीका के अपने सहोयगी की मिथुन से फ़ोन पर बात करवा पाया. बाद में उन्होंने बीबीसी के लिए एक आर्टिकल लिखा. इसमें उन्होंने लिखा कि मिथुन से बात कर पाना उनके भारत दौरे का हाई प्वाइंट था."

भारत में सिने प्रेमियों से बात करें तो या तो आपको 'डिस्को डांसर' के ज़बरदस्त प्रशंसक मिलेंगे या फिर ऐसे लोग जो इसकी मेलोड्रैमिक कहानी और डायलॉग का मज़ाक भी उड़ाते हैं लेकिन इसकी 'लार्जर दैन लाइफ़ इमेज' को नकारते नहीं."

अनुपाल पाल ने इस फ़िल्म पर 'डिस्को डांसर- ए कॉमेडी इन फ़ाइव एक्ट्स' नाम की किताब लिखी है. ये किताब फ़िल्म के कल्ट को बरकरार रखती है लेकिन उन अजीबोग़रीब किस्सों और संवादों को भी खंगालती है जो इस फ़िल्म की कहानी का अविश्वसनीय से लगने वाले हिस्से हैं.

मसलन ये कि फ़िल्म का हीरो मिथुन एक डिस्को डांसर है जो गिटार भी बजाता है और गाता भी है. लेकिन गिटार में ज़बरदस्त करंट से उसकी माँ को मार दिया जाता है जिसके बाद उस सिंगर को गिटार फोबिया हो जाता है और वो गिटार से डरने लगता है.

लेकिन फिर जब उसका गुरु (राजेश खन्ना) मिथुन के बचपन से जुड़ा एक गीत गाता है और उसकी तरफ़ गिटार फेंकता है तो मिथुन का गिटार फ़ोबिया ख़त्म हो जाता है और डिस्को के ज़रिए ही वो विलेन को हराता है.

डिस्को डांसर

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हिंदी की पहली फ़िल्म जिसने कमाए 100 करोड़

ऐसे कई किस्से हैं जो कई लोगों को बेतुके से लगते हैं लेकिन फ़िल्म 'डिस्को डांसर' एक ऐसी लहर थी जिसमें सब कुछ समा गया.

'ओपन' मैगज़ीन में छपे एक लेख में दिलचस्प क़िस्सा बताया गया है. आर्टिकल में लेखक अनुभव पाल ने बताया, "किताब में मिथुन के बारे में लिखे शब्दों से कई लोग नाराज़ हो गए थे."

"मिथुन के बेटे मिमो के नाम से एक ईमेल भेजकर अपनी नाराज़गी जताई गई और फिर कुछ महीनों बाद सुलह के नाम पर एक रेस्तरां में डिनर के लिए बुलाया. मैं गया और लंबे समय तक इंतज़ार किया और फिर अपने पैसे खर्च करके खाना खाया."

"बाद में उसी मिमो का मेल मिला जिसमें लिखा था कि उम्मीद है कि आपने डिनर का मज़ा लिया होगा, मिथुन का एक फ़ैन."

डिस्को डांसर निर्देशक बी सुभाष की पहली प्रोडक्शन थी. करीब 42 लाख में बनी ये फ़िल्म मुंबई में शूट हुई. फ़िल्म में किम को बतौर हीरोइन लिया गया था.

डैनी उन दिनों उनके बॉयफ़्रेंड थे और उन्होंने बी सुभाष को किम के बारे में बताया था. फ़िल्म में ओम पुरी मिथुन के मैनेजर का रोल करते हैं जो उन दिनों नए-नए थे और बी सुभाष के पास काम माँगने गए थे.

'आई एम अ डिस्को डांसर' फ़िल्मीस्तान स्टूडियो में एक भव्य सेट लगाकर शूट किया गया था और बहुत सारे जूनियर आर्टिस्टों को बुलाया गया था. बी सुभाष बताते हैं, "मैं सबका पेमेंट देने के लिए खड़ा था."

"तब तक मिथुन आए और 30-40 हज़ार के नोट मुझे दे गए कि कल की शूट में काम आएँगे. ये वो वक़्त था जब मुझे उस शेड्यूल के लिए मुझे मिथुन को फ़ीस देनी थी. हालांकि बाद में मैंने उनके पैसे लौटा दिए लेकिन मैं ये मदद कभी नहीं भूला."

ये कहा जाता है कि 'डिस्को डांसर' दरअसल पहली भारतीय फ़िल्म थी जिसने 100 करोड़ कमाए थे और विदेशों में भी कमाई की.

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क्लाइमेक्स

फ़िल्म के म्यूज़िकल क्लाइमेक्स की अक्सर बात होती है जो दरअसल तीन अलग-अलग गानों से बना हुआ था.

फ़िल्म के क्लाइमेक्स में नाच-गाने का कॉम्पिटिशन होता है जहाँ हीरो मिथुन गा नहीं पा रहा, उसे गिटार फ़ोबिया है और हीरोइन किम 'जिमी जिमी आजा आजा' गाना गाकर उसे प्रेरित करने की कोशिश करती है.

उसके बाद आता है दूसरा गाना जब राजेश खन्ना वहाँ आते हैं जो बचपन में मिथुन के गुरु रहे हैं. वो उसके बचपन से जुड़ा गाना गाते हैं, 'गोरों की न कालों की ये दुनिया है दिलवालों की.'

इतने में विलेन गोली चला देता जो राजेश खन्ना को लगती है लेकिन मरने से पहले वो मिथुन को गिटार देकर जाते हैं और उन्हें गिटार फ़ोबिया से मुक्त करते हैं. और फिर मिथुन तीसरा गाना गाते हैं, 'याद आ रहा है तेरा प्यार.'

'डिस्को डांसर' में ये एक अलग तरह का प्रयोग था. 'डिस्को डांसर' ही वो फ़िल्म थी जिसने बी सुभाष-मिथुन-बप्पी लाहिड़ी की तिकड़ी को स्थापित किया और इन्होंने अलग-अलग और मिलकर आने सालों में कई सारी हिट फ़िल्में की. 'क़सम पैदा करने वाले की', 'डांस डांस', 'कमांडो', 'दलाल' आदि.

लेकिन 'डिस्को डांसर' ही ऐसी फ़िल्म है जिसका जादू आज भी बरकरार है भारत से लेकर चीन, रूस से लेकर उज़्बेकिस्तान तक.

(मुंबई से मधु पाल और दिल्ली से ज़रीन बुख़ारी के इनपुट के साथ)

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