गुलज़ार: 'चाहता था कि सवाल पूछे ना जाएं...'

इमेज स्रोत, Sumer Singh Rathore/BBC
- Author, विकास त्रिवेदी
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
एक बार जावेद अख़्तर से बात शुरू होने से ठीक पहले दिल्ली में आंधी आ गई थी. तब जावेद अख़्तर से मैंने कहा था- एक आंधी फ़िल्म गुलज़ार लाए थे, एक आंधी आप ले आए हैं.
मुंबई के पाली हिल के सफ़ेद बंगले बोसकीयाना में गुलज़ार साब से जब ये बात बताई, तो वो मुस्कुराकर बोले, ''दिल्ली में आ जाया करती हैं आंधी अक्सर, दिल्ली में कई तरह से आंधी आती है. हमारी तो बैन हो गई थी. जावेद साब वाली आंधी बैन नहीं हुई.''
बोसकीयाना बंगले का वो पूरा कमरा हँसी से भर जाता है.
इंटरव्यू के लिए तय वक़्त से पहले सीढ़ियों से सफ़ेद कुर्ता पायजामा और जूते पहने गुलज़ार उतरते हैं. वक़्त की परवाह ना करने वाले सितारों से भरी मुंबई में 88 साल के गुलज़ार आज भी वक़्त के पक्के हैं.
'उम्र कब की बरस के सुफ़ैद हो गई' लिखने वाले गुलज़ार की चाल उम्र को मात देती कमरे में दाख़िल होती है.
इस कमरे के बाहर नन्ही सी बिटिया की बड़ी सी ब्लैक एंड वाइट तस्वीर लगी है. अंदर जाएँ, तो बूढ़े से मिर्ज़ा ग़ालिब की मूर्ति रखी है. ये गुलज़ार के साथ ही हो सकता है, जिनके क़रीब बच्चे भी हैं और उम्रदराज़ भी.
पाली हिल के जिस घर से कितने ही लोगों के ज़ख़्मों को भरने वाले गीत लिखे गए, उसके बाहर इन दिनों घरों की दीवारों के 'ज़ख़्मों' को भरने की मरम्मत चल रही है.

इमेज स्रोत, SUMER SINGH RATHORE
लम्हों को संभालकर दर्ज करने वाले गुलज़ार
वक़्त की बड़ी गुल्लक में हम सब लम्हे डालते हैं. ये लम्हे क़िल्लत वाले दिनों में याद बनकर साथ रहते हैं और हिम्मत देते हैं. लेकिन कई बार गुल्लकें टूट जाती हैं और लम्हे बिखर जाते हैं.
तब कई पीढ़ियों के लिए लम्हे संभालने और दर्ज करने वाले गुलज़ार साब आते हैं और मासूम मन कहता है- तुझसे नाराज़ नहीं ज़िंदगी.
आज आपके हमारे साथ कुछ वक़्त, क़िस्से साझा करने के लिए हैं गीतकार, निर्देशक और लेखक गुलज़ार.
सवाल: आपने अनगिनत इंटरव्यू दिए होंगे. कितने ही सवालों के जवाब आपने कई-कई बार दिए होंगे. क्या कोई ऐसा सवाल है जो आप चाहते थे कि आपसे पूछा जाए, मगर आज तक पूछा ना गया हो?
गुलज़ार: ''मैं तो ये चाहता था कि सवाल ही ना पूछा जाए मुझसे. सवाल मुश्किल चीज़ है. उससे ज़्यादा मुश्किल चीज़ है जवाब. सवाल आपको मुश्किल में डाल सकता है. इसलिए मेरी ख़्वाहिश तो यही रहती है कि मुझसे कोई सवाल ना करे. कोई कुछ ना पूछे. उम्मीद करता हूँ कि हर बार वही जवाब दिया, हर बार मेरा जवाब बदल तो नहीं जाता.
वक़्त के साथ तजुर्बे बदलते हैं, तो उनके जवाब बदलते हैं क्योंकि उनका विस्तार बढ़ जाता है. तजुर्बा ये है कि रेख़्ता या जेएलएफ़ कई बार गए हैं.
जावेद साब के साथ भी गए हैं और उनकी सोहबत में अच्छा वक़्त कटा. आप जितना चाहे शायरी, साहित्य सुना लीजिए एक-एक घंटा, दो- दो घंटा. उसके बाद जब लोगों ने सवाल पूछे तो फ़िल्मों के दो चार गानों की बात पूछी. किसी ने साहित्य की बात नहीं पूछी.
बहुत बार यहाँ तक आ जाता है कि लगता है कि अब ये पूछेंगे कि रेखाजी ने शादी क्यों नहीं की? तब बड़ी मायूसी होती है. घंटों शायरी सुनाओ और फिर लोग पूछते हैं कि वो गाना आपने कैसे लिखा था. बताइए क्या करे आदमी. तब नख़्शब साब का शेर आता है- घबरा के जो हम सर को टकराएँ, तो अच्छा हो.
मैंने आपके सवाल का लंबा जवाब तो नहीं दे दिया न?''

इमेज स्रोत, Getty Images
जब लता मंगेशकर बोलीं- मैं अंधा महसूस कर रही हूँ
'दिल से' फ़िल्म के गाने 'जिया जले' की रिकॉर्डिंग चेन्नई में हुई थी. तब लता मंगेशकर ने गाने की रिकॉर्डिंग के बीच में कहा था- ऐसा लग रहा है कि मैं अंधी हो गई हूँ.
'जिया जले' किताब में नसरीन मुन्नी कबीर लिखती हैं- तब गुलज़ार और एक स्टूल की एंट्री होती है और गाने की रिकॉर्डिंग पूरी हो पाई थी.
सवाल: ये पूरा क़िस्सा क्या था गुलज़ार साब?
गुलज़ार: ''वो वाकया यूँ है कि जितने भी स्टूडियो होते हैं उसमें ग्लास लगा होता है जिससे वहाँ सिंगर, संगीतकार, गीतकार सब एक दूसरे को देख सकते हैं.
उंगलियों के इशारे से वन-टू-थ्री बोल सकते हैं. मगर ये रहमान साब का स्टूडियो था, जो बहुत ख़ूबसूरत और पर्सनल सा था.
लता जी पहली बार गाना गा रही थीं रहमान के साथ. स्टूडियो की सेटिंग ऐसी थी कि सिंगर संगीतकार को देख नहीं सकता. बाहर से कोई संपर्क नहीं दिखता. ऐसे में सिंगर को लगता है कि अपने कान में ही गाए जा रहे हैं.
लता जी ने मुझे बुलाया और कहा कि मैं देख नहीं पा रही हूँ. मैं समझ गया कि ये साइकोलॉजिकल है. लिहाज़ा मैं वहीं बीच में स्टूल रखकर बैठ गया.
मुझे मणि सर (मणि रत्नम) ने भी कहा कि आप मत बैठिए लेकिन मैं बैठ गया और बीच में इधर से उधर कोई बात कहनी हुई हो तो कह भी दी. ये समझिए कि कोई बेतकल्लुफ़ी में एक तकल्लुफ़ जैसी बात थी. इस गाने के टाइटल वाली "जिया जले" किताब अब हिंदी में भी आई है. इसके लिए मैं राजकमल प्रकाशन के अशोक महेश्वरी जी का एहतराम करता हूँ."

इमेज स्रोत, Getty Images
गीतों की समझ कमज़ोर हो रही है?
अमिताभ भट्टाचार्य ने एक गाने में लिखा था- ''गुलज़ार के गीतों में जब यो-यो हनी सिंह घुस गया तो रायता फैल गया.''
फ़िल्म इंडस्ट्री में वरुण ग्रोवर जैसे कई गीतकारों को ये भी सुनना पड़ा कि गुलज़ार जैसा मत लिखो.
गुलज़ार के लिखे को कुछ मुश्किल माना जाता है. हालाँकि ये गुलज़ार ही हैं, जिन्होंने बच्चों से लेकर बड़ों तक को समझा देने वाली लाइन ''जंगल-जंगल बात चली है, पता चला है... चड्डी पहनकर फूल खिला है'' भी लिखी.
सवाल: 'मेरा कुछ सामान तुम्हारे पास पड़ा है...'' जैसी आसान मगर रुला देने वाली लाइन. फिर ''116 चांद की रातें एक तुम्हारे कांधे का तिल'' बहुत सारे लोगों की पसंदीदा मगर मुश्किल लाइन. इंडस्ट्री में कहा जाता है कि गुलज़ार साब जैसा मत लिखना. क्या आपको लगता है कि आज के समय में लोगों की गीतों की समझ कमज़ोर होती जा रही है?
गुलज़ार: ''जिस ज़ुबान में फ़िल्म चल रही है, उसी ज़ुबान में गाने लिखे जा रहे हैं. गानों की ज़ुबान अलग नहीं है. अगर डायलॉग समझ आ रहे हैं तो गाने भी समझ आने चाहिए. हाँ ये ज़रूर है कि ये वो ज़ुबान नहीं है जो 1947 से पहले की ज़ुबान थी. ज़ुबान तो वक़्त के साथ बदलती है. सच पूछिए तो इस वक़्त आपने जींस पहनी हुई है. ये पहनावा भी तो पहले नहीं था. आपका पहनावा बदल गया, खाना बदल गया. बातचीत, किताबें, सिनेमा, संगीत बदल गया. तो क्या गाने की ज़ुबान नहीं बदलेगी?
फाइन आर्ट्स जितने भी हैं, फिर चाहे म्यूज़िक हो, पेंटिंग हो या शायरी. फाइन आर्ट्स ज़िंदगी के साथ जुड़े हुए हैं. अगर दौर बदल रहा है तो मसले और हल भी बदल रहे हैं. खाना-पीना भी बदल रहा है. जल्दी में हैं तो दो बर्गर ले लिए गाड़ी में. रुककर कढ़ी-चावल तो नहीं बना रहे हैं. बर्गर पकड़ लेते हैं और चल देते हैं. आपकी ज़िंदगी की रफ़्तार बदल रही है तो म्यूज़िक की रफ़्तार भी बदल रही है.
मैं अगर आपको स्वीकार कर रहा हूँ, तो आपकी ज़ुबान साथ में स्वीकार रहा हूँ. मैं अपने दौर, आस-पास के माहौल को स्वीकार कर रहा हूँ, तो बाक़ी की चीज़ें भी स्वीकार कर रहा हूँ. ये तो नहीं हो सकता न कि मैं आज के दौर में रह रहा हूँ, तो बात कर रहा हूँ ग़ालिब के दौर की.
तब तो मैं पालकी में आऊँ या घोड़ों पर सवार होकर आऊँ. हाँ अगर कोई खर दिमाग़ी हो और इस दौर में नहीं जीना चाहता तो वो उस दौर के कपड़े पहने और घोड़ों पर सवार होकर आए, हमें कोई एतराज़ नहीं.''
- ये भी पढ़ें - गाइड ने बना दिया था गोल्डी आनंद को चोटी का निर्देशक

इमेज स्रोत, Getty Images
''दिल तो बच्चा है जी...''
सवाल: आप 'दिल तो बच्चा है जी' गाने की रिकॉर्डिंग के लिए लाहौर गए थे. आपका जन्म भी अब के पाकिस्तान, तब के हिंदुस्तान में हुआ था. आपने लिखा भी है- लकीरें हैं तो रहने दो किसी ने ग़ुस्से में आकर खींच दी होंगी. अब जब कई बार दोनों देशों के लोग, सरकारें एक दूसरे के दिल को बच्चा नहीं रहने दे रहे हैं तो क्या ये देखकर कोफ़्त होती है?
गुलज़ार: ''दोनों देशों के लोगों के दिल में अगर बच्चे हैं तो बच्चे हैं, उतने ही मासूम हैं उसी तरह से. हाँ सरकारों के दिल के बच्चे बड़े हो गए होंगे.
सरकारों के बदलने से क़ानून बदल जाते हैं, हरक़तें बदल जाती हैं. भई मोदी साब जाते-जाते जन्मदिन के लिए क्यों रुक गए. लाहौर उतर गए न. आपकी सियासत बदल गई. आदमी तो नहीं बदला न. इंसान तो वैसे ही हैं. इंसान वैसे रह जाएँगे, तो रह जाएँगे.''
सवाल: क्या आपको लगता है कि जो सरहदें बाहर थीं, वो अब भीतर आ गई हैं?
गुलज़ार: ''सियासत की बात ना करें तो अच्छा है. फिर कई और चीज़ें लपेट में आ जा जाती हैं. वो सारे विश्लेषण यहाँ बैठकर नहीं किए जा सकते हैं. वो लंबी चौड़ी बातचीत हो जाएगी. चीज़ें बदल रही हैं. माहौल बदल रहा है. कुछ के साथ आप सहज होते हैं, कुछ के साथ आप असहज होते हैं. इतिहास तो ऐसे ही चलते हैं.''
अगला सवाल शुरू करते ही गुलज़ार सामने मेज़ पर रखे नींबू पानी की ओर इशारा कर कहते हैं- दोपहर की गर्मी में बैठे हैं, बीच-बीच में ज़रा घूंट ले लीजिए.
इस बीच गुलज़ार अपनी हथेली में लिपटे सफ़ेद रुमाल को संभाले रहते हैं.
सवाल: आपने ग़ालिब सीरियल में दिखाया था कि मिर्ज़ा साब जब शेर कहते तो रुमाल में गिरह (गांठ) लगाते जाते थे. फिर उन गिरहों को खोलते जाते और शेर दर्ज कर लेते थे. क्या गुलज़ार साब के पास भी कुछ ऐसा है जो वो लिखने और सोचने के बीच की कड़ी बनता है?
गुलज़ार: ''रुमाल तो लिहाज़न लिखा गया है. वरना जिस तरह से उर्दू की बड़ी स्कॉलर रक्षंदा जलील बताती हैं कि ग़ालिब इज़ारबंद में गिरह लगाते रहते थे और खोल लेते थे. अब इज़ारबंद आपको मालूम नहीं होगा. फ़ारसी का शब्द है. इज़ारबंद कहते हैं - नाड़े को, पायजामे के नाड़े को.
अब ग़ालिब पायजामा के नाड़े में गिरह लगाते थे और खोल लेते थे. अब हमारे पास नाड़ा ही नहीं रहा तो क्या करें. आपने भी जींस पहनी हुई है तो नाड़ा कहाँ से लाएँगे और गिरह कहाँ लगाएँगे. अब यही है कि गले में पहन लीजिए और उसी में गिरह लगाते रहें.''

इमेज स्रोत, Getty Images
अनुवाद कितनी बड़ी चुनौती है?
गुलज़ार ने लगभग 34 भाषाओं के सैकड़ों शायरों का अनुवाद किया है. कुछ ऐसी भी भाषाएँ हैं, जिनके पास अपनी लिपि नहीं है और वो दूसरी लिपि में लिखी जाती हैं.
सवाल: आप उर्दू, इंग्लिश में लिखते हैं. हिंदी में पढ़े, सुने जाते हैं. लॉस्ट इन ट्रांसलेशन यानी अनुवाद में चीज़ों का खो जाना कितनी बड़ी चुनौती बना है?
गुलज़ार: ''हर ज़बान का अपना एक भाव होता है. हमारे यहाँ इतनी ज़बानें हैं. इनका आपस में कॉन्टेक्ट होना ज़रूरी है. हम जब इंग्लिश में भी अनुवाद करते हैं तो बस पश्चिमी देशों के लिए नहीं कर रहे हैं. अपने देश के लिए कर रहे हैं. हमारे यहाँ इतनी समृद्ध और क्लासिक ज़बानें हैं कि हमें एक मीडियम, एक लिंक भाषा की ज़रूरत है.
फ़र्ज़ कीजिए कि तमिल की शायरी मुझे हिंदी में पढ़ने को मिल जाए. या हिंदी की शायरी गुजराती में मिल जाए. एक लिंक भाषा हमारे यहाँ इंग्लिश बनी हुई है. ये कल्चरल बाउंडेज जो है हमारी आपस में, उसका पूरा अनुवाद नहीं हो सकता. हम पनघट, मांग का सिंदूर नहीं समझा सकते. इंग्लिश में ये बताने के लिए आपको बड़ा लंबा बताना पड़ता है.
जैसे मंगलसूत्र को इंग्लिश में समझाने की बजाय आप अपनी किसी भारतीय भाषा में समझाने की कोशिश करें तो कोई न कोई लफ़्ज़ मिल जाएगा. क्योंकि सांस्कृतिक तौर पर हम एक हैं. इसलिए आपस की ज़बानों में तर्जुमा होना बहुत ज़रूरी हैं. इसमें लफ़्ज़ के भाव बदलेंगे.
कई बार हम गागर, मटकी की बात ही कर रहे होते हैं लेकिन किसी ज़बान में वो स्त्रीलिंग हो जाता है और किसी में पुल्लिंग. अनुवाद में मानी से ज़्यादा अहसास की ज़रूरत होती है. तर्जुमा करने के लिए दोनों ज़ुबानों से वाकिफ़ होना बहुत ज़रूरी है.''
आज भी हमारे पूर्वाग्रह ना हों तो जो हिंदी में हमने चार पाँच नुक्ते वाले अल्फाज़ शामिल किए हैं, उससे हिंदी सुंदर ही हुई है. हम जहाज को जहाज़ कह सकते हैं. अंग्रेज़ी में अगर ओज़ोन कहना है तो ज़ आपको सीखना पड़ेगा. तो इस्तेमाल कर लीजिए न. ज़्यादा से ज़्यादा पाँच-छह साउंड हैं.''

इमेज स्रोत, Getty Images
मैड जीनियस...
गुलज़ार ने किशोर कुमार के साथ भी काम किया. गुलज़ार ने अपनी किताब 'एक्चुली आई मेट देम' में बताया था कि आनंद फ़िल्म में किशोर कुमार को लिया जाना था.
मगर सब कुछ फ़ाइनल होने के ठीक पहले किशोर कुमार सिर मुंडवाकर चले आए थे और डायरेक्टर ऋषिकेश मुखर्जी से नाचते, गाते हुए बोले थे- अब तुम क्या करोगे ऋषि?
बाद में आनंद के किरदार के लिए राजेश खन्ना को लिया गया.
सवाल: आपने किशोर कुमार को 'ए मैड जीनियस' कहा है. आज के दौर में आपको कोई 'मैड जीनियस' नज़र आता है?
गुलज़ार: ''देखिए मैड जीनियस कहना एक ढंग है किसी की तारीफ़ करने का. इस वक़्त तो मुझे आप ही नज़र आते हैं, दूसरा कोई नज़र नहीं आता है जो इस तरह के इतने कमाल के सवाल कर रहा है. अब अगर आपको मैड जीनियस कहना बुरा लगे तो मैं माफ़ी चाहता हूँ.''

इमेज स्रोत, Getty Images
गुलज़ार दीनवी: दीना, दिल्ली और यार
ड्योढ़ी किताब में गुलज़ार लिखते हैं- ''किताबों से कभी गुज़रो तो यूँ किरदार मिलते हैं, गए वक़्त की ड्योढ़ी में खड़े कुछ यार मिलते हैं.''
सवाल: गुलज़ार साब अपनी जन्मभूमि दीना (अब पाकिस्तान) से मुंबई तक कोई यार है जो छूट गया हो और अब याद आता हो?
गुलज़ार: दीना भी याद है और दिल्ली की सब्ज़ी मंडी भी याद है, जहाँ पला बड़ा हुआ. वहाँ से अब बंबई आया हूँ. अब बंबई भी बदल गई है. मुंबई हो गई है. यहाँ की ट्रामें याद हैं जिसमें ख़ूब सफ़र किया है. प्रोग्रेसिव राइटर्स एसोसिएशन से उठा करते थे.''
उस दौर में कई बड़े लेखकों को देखते थे. साहिर लुधियानिवी, कृश्न चंदर, राजेंद्र सिंह बेदी, जां निसार अख़्तर को सुनते थे, हैरान होते थे और ज़ाहिर है कि सीखते थे.
जावेद सिद्दीक़ी का चेहरा याद आता है. जावेद अख़्तर से मुलाक़ात नहीं हुई थी तब. युवा लेखकों को मौक़ा नहीं मिलता था. ज़ाहिर है इन उस्तादों के सामने हम कहें कि हमारी सुनो, तो यो नहीं होता था. पर कंधे पर हाथ रख देते थे. लेखकों की बैठक ट्राम में हुआ करती थीं.''

इमेज स्रोत, Getty Images
फ़िल्मों के लिए मुश्किल वक़्त है?
बीते कुछ सालों में कई फ़िल्मों को बायकॉट का सामना करना पड़ा है. कई फ़िल्मों की रिलीज़ में भी दिक़्क़तें आई हैं.
सवाल: गुलज़ार साब, आप 1963 से 2023 तक लिख रहे हैं. कई सरकारें आईं और गईं. लेकिन अब देखने को मिल रहा है कि फ़िल्मों को मुश्किलों का सामना करना पड़ता है. क्या आपको भी लगता है कि ये वक़्त मुश्किल है या पहले भी ऐसा वक़्त रहा था?
गुलज़ार: ''अरे साब. इस पीढ़ी की फ़िल्में बड़ी बुलंद आवाज़ें बोलती हैं. हमारे दौर में किसी किरदार को मिनिस्टर भी नहीं कह सकते थे. मैंने आंधी में एक किरदार को मिनिस्टर कहा था तो वो सेंसर हो गया था कि आप मिनिस्टर नहीं कह सकते. उस दौर में ज़्यादा मुश्किलें थीं.
आज की पीढ़ी जिस तरह से फ़िल्मों में बात करती है, उसमें सब्जेक्ट या मसले मुश्किल हैं. जैसे मैं अपनी बेटी मेघना का नाम लूँ. या मैं राकेश मेहरा या विशाल का ज़िक्र करूँ. ये पीढ़ी खुलकर फ़िल्म बनाती है.
ये पूरे हौसले के साथ बात करती है. ये पीढ़ी बोलना जानती है. इस पर बड़ा फ़ख़्र है. ये कमाल की पीढ़ी है. सच बोलती है. मुंहफट नहीं कह सकते पर मुंह पर बोलते हैं. मुझे लगता है कि आज की फ़िल्म हमारे ज़माने से ज़्यादा आज़ाद हैं.
अगर ट्रैश की बात करिए तो ये हर दौर, हर फ़ील्ड में होता रहा है सदियों से. कोई नई बात नहीं है.
मेरा मुल्क इस पीढ़ी के हाथों में है. बड़ी तसल्ली है कि अब जा सकता हूँ मैं. इतनी तसल्ली है.''
- ये भी पढ़ें - अमिताभ बच्चन का वो रूप जो आपने पहले कभी नहीं देखा होगा

इमेज स्रोत, Getty Images
गुलज़ार का गुस्सा और क्या ना पसंद?
गुलज़ार के इस्तेमाल किए ज़्यादातर शब्द मुलायम महसूस होते हैं. हालाँकि कई बार वो ज्वलनशील होकर गीतों में 'जिगर जलाने' की बात भी करते हैं.
गुलज़ार की प्रकट सार्वजनिक शख़्सियत में ग़ुस्सा कम ही नज़र आता है.
सवाल: गुलज़ार साब आपने पिछले सवाल के जवाब में मेघना की बात की. मेघना चौथी क्लास में थीं. पियानो नहीं बजा पा रही थीं. तब एक पिता गुलज़ार पहली बार ग़ुस्सा हुए और बोले- बैठी रहो, जब तक पियानो ढंग से सीख ना जाओ, तब तक बजाती रहो. क्या आपसे भी कभी किसी ने इस तरह का ग़ुस्सा किया है कि जब तक ढंग का लिख ना लो, तब तक लिखते रहो.
गुलज़ार: हमारे ज़माने में लिखने की बात करते तो कहा जाता- हटो कलम छोड़ दो. बड़े कवि बनने चले हैं. चलो दुकान में बैठो. क्योंकि उस दौर में राइटर होना कोई बहुत बड़ी ख़ूबी नहीं गिनी जाती थी.
राइटर आज भी अपनी किताब पर ज़िंदा नहीं रह सकता. लेकिन आज राइटर के लिए और भी कई सारे प्रोफ़ेशन हैं. हमारे दौर में लिखना रोज़गार का ज़रिया नहीं था. कृश्न जी की कही बात बहुत मशहूर है. रोज़ बैठे हुए देखकर उनकी पत्नी ने पूछा था- आप काम क्या करते हैं?
जब उनसे कहा गया कि लिखते हैं तो वो बोलीं- वो तो ठीक है लेकिन काम क्या करते हैं?''
गुलज़ार के नाम से कई फ़र्ज़ी कविताएँ भी सोशल मीडिया पर शेयर होती रही हैं.
किताब 'जिया जले' में गुलज़ार ने कहा था, ''मैंने एक बार लिखा था कि आदतें भी अजीब होती हैं, किसी ने उसको कर दिया कि औरतें भी अजीब होती हैं. मेरे नाम पर ख़राब कविताएँ लिखने की बजाय वो लोग लिखने वाले का नाम लिखा करें. अब लोगों में शर्म नहीं रह गई है. अगर कोई कवि बनना चाह रहा है तो चाहे कितनी ही ख़राब कविता हो, पर अपनी लिखिए. किसी की नकल मत कीजिए या किसी का क्रेडिट मत खाइए.''

इमेज स्रोत, Getty Images
''जावेद अख़्तर से ही रश्क...''
जावेद अख़्तर एक इंटरव्यू के दौरान मेरे पूछे सवाल पर बोले थे, "बीड़ी जलइले गाने को लेकर मुझे गुलज़ार से ईर्ष्या होती है. ऐसा लगता नहीं कि ये गाना किसी ने टेबल कुर्सी पर बैठकर लिखा होगा. लगता है कि 100-150 साल का कोई लोकगीत होगा और गाँव की मीलों में गाया जाता होगा, लोग नौटंकी में गाते होंगे...इतना सही लगता है."
सवाल: गुलज़ार साब क्या आपको भी जावेद साब के किसी गाने से रश्क होता है?
गुलज़ार: ''मैं जो जावेद साब पर ही रश्क करता हूँ, जो भी लिखते हैं वो. उनकी याददाश्त, ज़ुबान पर भी रश्क करता हूँ. वो मुझसे अच्छा लिखते हैं. मैंने नज़्म भी सुनाई थी कि वो कमबख़्त मुझसे अच्छा लिखता है.
बीड़ी जलइले जावेद साब को पसंद आया तो हौसला बढ़ जाता है. जिस गाने के लिए लोग आलोचना कर रहे हों, उसको कोई दाद दे दे तो मैं कह देता हूँ कि जावेद साब से पूछिए उन्हें भी पसंद है. उस गाने में बुरा कुछ था भी नहीं.''
सवाल: हिंदी साहित्य जगत में आपकी लगातार आवाजाही रही है. केदारनाथ सिंह के साथ आपने कई बार मंच भी साझा किया है. आपने उनको उस्ताद भी कहा. बंबई की सिनेमाई दुनिया से अलग साहित्य की एक अलग दुनिया है. उससे आपका रिश्ता कैसा रहा है?
गुलज़ार: ''बड़ा अच्छा रिश्ता रहा है. आप देख ही सकते हैं कि मैं उस माहौल में रहा हूँ. केदारनाथ सिंह जी के साथ बड़ा प्यारा रिश्ता था. मेरा ख़्याल है कि मैंने उनकी किताबें मंगवाई हैं. कुछ थीं और कुछ और मंगवाई हैं. मैं उनकी किताबों से एक संकलन निकालना चाहता हूँ.''
सवाल: रहमान, मणि रत्नम साब और गुलज़ार साब. फ़िल्मी दुनिया की इस तिकड़ी के काम को खूब सराहा गया. आज के दौर में कोई ऐसी दूसरी तिकड़ी बनती दिख रही है आपको?
गुलज़ार: ''विशाल भारद्वाज बहुत अच्छा काम कर रहे हैं. राइटर भी हैं, कम्पोजर भी हैं और डायरेक्टर भी हैं. ये तीन ख़ूबियाँ जो आपने हम तीन लोगों में गिनी, वो एक शख्स में शामिल है और वो विशाल भारद्वाज हैं. मतलब विशाल राइटर भी हैं, शायर भी हैं और संगीतकार, डायरेक्टर भी हैं.''

इमेज स्रोत, Getty Images
गुलज़ार के मन में कोई घाव रह गया?
गुलज़ार और अभिनेत्री राखी की शादी 1973 में हुई थी. बाद में दोनों की राहें अलग हो गईं.
गुलज़ार ने 'रावी पार' किताब को राखी को समर्पित करते हुए लिखा था- द लॉन्गेस्ट शॉर्ट स्टोरी ऑफ माई लाइफ़.
इजाज़त फ़िल्म में गुलज़ार का लिखा गीत भी है- छोटी सी कहानी से, बारिशों के पानी से...सारी वादी भर गई. न जाने क्यों दिल भर गया?

इमेज स्रोत, Getty Images
सवाल: गुलज़ार ने कई पीढ़ियों के दिल के घाव भरे हैं. क्या गुलज़ार साब के दिल में भी कोई घाव है जो रह गया है?
गुलज़ार: ''आदमी ज़िंदा है तो जीता है अरमानों के साथ. अरमान कोई ख़त्म तो नहीं होते. अरमान ख़त्म होते हैं जिस दिन आप जीना बंद कर देंगे.''
गुलज़ार साब की एक कहानी है - ओवर. इस कहानी में किरदार बुझारत सिंह को वायरलेस में बात करने की इतनी आदत थी कि वो बात के आख़िर में कहता- ओवर. जैसे- चारपाई खींचकर बैठ जाओ, ओवर. परमाणु बम से बीड़ी नहीं सुलगा सकते, ओवर.
ठीक इसी किरदार की तरह गुलज़ार साब से इस बातचीत को हम 'ओवर' कहकर बोसकियाना से बाहर निकल आते हैं.
गुलज़ार साब अपनी लिखने वाली मेज़ की ओर बढ़ जाते हैं.
ये भी पढ़ें -
(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक, ट्विटर, इंस्टाग्राम और यूट्यूब पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)

















