अल्फ्रेड हिचकॉक: ख़ौफ़ की हदों को पार करते अद्भुत सिनेमा का महारथी

अल्फ्रेड हिचकॉक

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    • Author, तुषार कुलकर्णी
    • पदनाम, बीबीसी मराठी

हर क्षेत्र में कुछ लोग होते हैं जो अपनी पहचान बनाते हैं और वो पहचान समय के साथ भी कायम रहती है. ब्रिटिश-अमेरिकी निर्देशक अल्फ्रेड हिचकॉक ऐसे ही सिनेमाई जादूगर थे. उनका निधन 29 अप्रैल, 1980 को हो गया था, लेकिन 43 साल बाद भी लोग उनके सिनेमा को याद करते हैं.

कुछ विश्लेषक कहते हैं कि उनका लोहा माने बिना फ़िल्मों में आगे नहीं बढ़ सकते. हिचकॉक ऐसे निर्देशक थे, जिन्होंने दुनिया भर के फ़िल्म निर्माताओं को प्रभावित किया. उन्होंने सस्पेंस या थ्रिलर की परिभाषा ही बदल दी थी.

हिचकॉक की बात हो तो सबसे पहले उनकी फ़िल्म 'साइको' का ख्याल आता है. इस फ़िल्म को आप कितनी भी बार देख लें, डर एक जैसा ही रहता है.

कई बार मिले ऑस्कर नॉमिनेशन

हिचकॉक की पहली फ़िल्म 1925 में और आख़िरी 1976 में आई थी. लगभग 50 साल लंबे करियर में, उन्होंने 50 से अधिक फ़िल्में बनाईं. इसके अलावा नाज़ी शिविर जैसे गंभीर विषयों पर वृत्तचित्र बनाए, टीवी शो बनाए, लेखन और निर्देशन किया.

उनकी फिल्मों को कुल 46 ऑस्कर नॉमिनेशन मिले और उनकी फ़िल्मों को छह बार ऑस्कर पुरस्कार मिला. उन्हें खुद पांच बार बेस्ट डायरेक्टर के लिए नॉमिनेट किया गया पर उन्हें कभी पुरस्कार नहीं मिला. लेकिन उनका काम चौंका देने वाला था और उन्हें जीनियस माना जाता रहा.

हिचकॉक का जन्म इंग्लैंड में एक सामान्य परिवार में हुआ था, जो फल और सब्जियां बेचकर गुजारा करता था.

इस कहानी में हम आपको उनके हॉलीवुड पहुंचने, नाम कमाने, उनके फ़िल्म निर्माण की तकनीक और उनके स्टाइल, सबके बारे में बताएंगे, क्योंकि हिचकॉक की यही उपलब्धियां उन्हें असाधारण बनाती हैं.

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इमेज कैप्शन, हिचकॉक की फ़िल्म का एक दृश्य

फ़िल्में कितनी लंबी होनी चाहिए

फ़िल्मों की लंबाई के बारे में हिचकॉक का एक कथन बहुत मशहूर रहा है. वे अमूमन कहा करते थे कि फ़िल्म की लंबाई उतनी ही होनी चाहिए जितनी देर तक आदमी अपनी पेशाब रोक सकता है.

एक संभावना यह है कि उन्होंने ऐसा इसलिए कहा क्योंकि हिचकॉक की फ़िल्मों में बहुत हास्य और वह व्यंग्य था. दूसरी बात यह भी है कि उन्होंने इतनी योजना बनाकर काम किया कि वह मानव शरीर की क्षमताओं को समझे बिना निर्णय नहीं ले रहे होंगे.

हालांकि उनके इस बयान का एक और कारण हो सकता है. उन्हें अपनी फ़िल्म पर इतना भरोसा था कि जब तक फ़िल्म ख़त्म नहीं हो जाती, तब तक दर्शक अपनी सीट से भी नहीं उठते. हालांकि मेरे विचार से वे इस बारे में थोड़े ग़लत थे.

क्योंकि आप घर में कुर्सी पर बैठकर उनकी फ़िल्में देखते हैं तो अचानक खड़े हो जाते हैं, कई बार तो क्लाइमेक्स इतना इंटेंस होता है कि आप उसे छोड़ना भी नहीं चाहते. कभी-कभी आप फ़िल्म देखते हुए सोफ़े पर लेटे होते हैं और सब कुछ इतना डरावना होता है कि आपको अचानक ऐसा लगता है कि आप बैठे हैं और खुद को अपने ही दोनों हाथों से पकड़ रहे हैं.

वर्टिगो, साइको, बर्ड्स जैसी उनकी फ़िल्मों का जादू आज भी लोगों को मंत्रमुग्ध कर देता है.

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जो देखते हैं और जो अनुभव करते हैं

फ़िल्म समीक्षक प्रो. डेविड थोरबर्न कहते हैं कि हिचकॉक की 'फ़िल्मों में दो कहानियां चलती हैं. एक वह जो आप पर्दे पर देखते हैं और दूसरा जो आप अनुभव करते हैं.'

मुझे इस बात का यक़ीन तब हुआ जब मैंने पहली बार 'डायल एम फॉर मर्डर' देखी. जैसे ही फ़िल्म शुरू होती है, कुछ ही मिनटों में सारा ध्यान फ़िल्म पर केंद्रित हो जाता है. हर सीन के बाद आगे क्या होगा, ये सवाल मन में उमड़ने लगता है.

फ़िल्म लाइफ़बोट में, जब नाज़ी सैनिकों द्वारा एक बड़े जहाज को डुबो दिया जाता है, तो जहाज के बचे हुए लोग एक लाइफ़बोट की मदद से सुरक्षित बचने की कोशिश कर रहे होते हैं. फ़िल्म यहीं से शुरू होती है और फिर नाव पर सवार हो जाते हैं अजनबी लोग, और हम यह समझने की कोशिश करते हैं कि क्या गहरे समुद्र को पार करके ये लोग सुरक्षित स्थान पर पहुंच पाएंगे.

उसी तरह 'रेबेका' की कहानी बहुत सीधी-सादी है. एक साधारण परिवार की लड़की एक अमीर आदमी से शादी करती है और सोचती है कि उस घर में उसे कैसे स्वीकार किया जाएगा. लेकिन धीरे-धीरे हम फ़िल्म और उसकी कहानी से जुड़ जाते हैं और सोचने लगते हैं कि अगले ही पल उसके साथ क्या होगा, वह क्या करेगी.

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वहीं 'नटोरियस' जासूसों की एक प्रेम कहानी है. एक अमेरिकी एजेंसी एक मिशन के लिए एक जर्मन लड़की को चुनती है. उसे लाने वाले एजेंट को लड़की से प्यार हो जाता है. स्थिति ऐसी है कि अगर उसे और जानकारी चाहिए तो उसे शादी करनी पड़ेगी, ये सारी बातें चंद मिनटों में स्पष्ट हो जाती हैं लेकिन हम डरे सहमे रह जाते हैं कि उनका क्या होगा.

'रियर विंडो' में हीरो सिर्फ़ एक खिड़की पर बैठकर मर्डर करता है. वहीं 'द स्ट्रेंजर्स ऑन ट्रेन' एक बहुत ही खूबसूरत फ़िल्म है. थ्रिलर है लेकिन उसमें ह्यूमर भी है.

नॉर्थ बाय नॉर्थवेस्ट पूरी तरह से मसाला एंटरटेनर है. इसे पहली बॉन्ड फ़िल्म भी कहा जाता है. इसका कारण यह है कि इस फ़िल्म में सबसे पहले भव्यता और रहस्य एवं रोमांच का फ्यूजन देखने को मिला है. यह फ़िल्म 1959 में आई थी और पहली बॉन्ड फ़िल्म 1962 में आई थी.

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फ़िल्म निर्माण की तकनीक कैसे सीखी?

हिचकॉक ने मूक फिल्मों का युग देखा, फिर टॉकीज का दौर भी. इसके बाद रंगीन सिनेमा को ना केवल देखा बल्कि उसमें दशकों तक काम भी किया. उन्होंने 52-53 वर्षों तक एक पेशेवर फ़िल्म निर्देशक के रूप में काम किया है, इससे उनकी तकनीक का अंदाज़ा लगाया जा सकता है.

अगर उन्होंने नई तकनीकों को नहीं अपनाया होता तो वे इतने लंबे समय तक कैसे सक्रिय रह पाते? लेकिन फ़िल्म एक कला है और कहा जाता है कि आप इसे तकनीक, योजना और ढांचे में फ़िट नहीं कर सकते.

यह भी दावा किया जाता है कि फ़िल्म के सेट पर पहुंचने से पहले ही सब कुछ उनके दिमाग़ में रहता था. उनकी फ़िल्मों की स्टोरी बोर्ड और शेड्यूल सब कुछ योजनाबद्ध ढंग से आगे बढ़ता था.

डेविड थोरबर्न कहते हैं कि "जिन लोगों ने उन्हें सेट पर देखा, उन्होंने कहा कि ऐसा लगता है कि पूरी फ़िल्म उनके दिमाग़ में चल रही थी."

हिचकॉक ने रॉयल नेवी इंजीनियरिंग में एक तकनीशियन के रूप में अध्ययन किया था. इसका लाभ ये हुआ कि वे फ़िल्म निर्माण से जुड़ी लाइटिंग, साउंड, माहौल और सेट की तकनीक में उन्हें महारत हासिल हो गई थी.

उनके साक्षात्कारों को देखने से पता चलता है कि तकनीक के साथ कहानी को कैसे आगे बढ़ाया जाए, इस बारे में वे बहुत सोचा करते थे.

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इमेज कैप्शन, डायल एम फॉर मर्डर फ़िल्म का पोस्टर

'ड्रामा फ़िल्मों में होना चाहिए, सेट पर नहीं'

उन्होंने मूल रूप से एक तकनीशियन के रूप में फ़िल्म उद्योग में शुरुआत की. पहली एक घंटे की फ़िल्म 1906 में बनी थी.

उन दिनों के निर्देशकों के लिए काम बहुत जटिल था. इसलिए उन्हें हर तरह की तकनीक सीखनी पड़ी. हिचकॉक ने पहली बार 1919 में टाइटल ट्रैक के निर्माता के रूप में फ़िल्म उद्योग में प्रवेश किया.

हॉलीवुड की पैरामाउंट कंपनी ने लंदन में एक फ़िल्म स्टूडियो खोला. अमेरिकी कर्मचारियों को अपना काम करने के लिए कहा गया था, लेकिन अंग्रेजों को नई चीज़ें सीखने के लिए कहा गया था ताकि वे अपनी फ़िल्म इंडस्ट्री को मज़बूत करने के लिए तैयार हो सकें.

इसके चार-पांच साल बाद उन्हें एक फ़िल्म निर्देशित करने का मौका मिला और 1925 में उनकी पहली फ़िल्म आई. इसके बाद उन्होंने क़रीब 15 साल तक लंदन में फ़िल्में बनायीं.

1938-39 में उन्हें निर्माता डेविड सेल्ज़निक ने हॉलीवुड बुलाया और बतौर निर्देशक उनकी पहली अमेरिकी फ़िल्म, रेबेका, न केवल हिट रही बल्कि सर्वश्रेष्ठ पिक्चर के लिए ऑस्कर भी जीता.

एनबीसी के साथ एक साक्षात्कार में, वह मज़ाक़िया तौर पर अपनी तकनीक के बारे में कहते हैं, "अमेरिका आने के बाद मैं केवल एक बार दूसरे निर्देशक के सेट पर गया हूं. वहां जो चल रहा था उसे देखकर मुझे अहसास हुआ कि सेट पर सारा ड्रामा तो दिख रहा है, लेकिन स्क्रीन पर कुछ भी नजर नहीं आएगा."

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डर प्रेरणा कैसे बना?

हिचकॉक के अलावा कई दूसरे फ़िल्मकारों ने थ्रिल, स्पीड, चौंकाने वाली तकनीक का इस्तेमाल कर अच्छी फ़िल्में बनाई हैं.

लेकिन हिचकॉक ने हॉरर को एक अलग ही आयाम दिया. उन्होंने दिखाया कि सिर्फ भूत ही नहीं, साधारण चीज़ें भी आपको डरा सकती हैं.

हर कोई अपने जीवन के लिए डरता है. अपनों के साथ कुछ अनहोनी का भी डर है. इसका इस्तेमाल उन्होंने साजिश रचने में किया. हालांकि उन्होंने यह भी दिखाया कि हॉरर फिल्मों में भी ह्यूमर हो सकता है.

हिचकॉक की फ़िल्मों के किरदार लगातार डर के साये में चलते नजर आते हैं. ऐसा नहीं है कि वे लोग कायर हैं बल्कि वे उस स्थिति में हैं जिसकी उन्होंने कभी कल्पना नहीं की होगी.

कुछ पात्र इनोवेटर्स हैं, जैसे-जैसे वे अपना काम करते हैं, कहानी ऐसा मोड़ लेती है कि पूरा माहौल डर से भर जाता है.

कभी कोई अचानक से लटका हुआ दिखता है, किसी को बंद कर दिया जाता है, कभी कोई समुद्र में तैरता हुआ दिख जाता है, कभी किसी पर ग़लत तरीके से हत्या का आरोप लगाया जाता है और वह व्यक्ति अपनी बेगुनाही साबित करने के लिए अपनी जान जोख़िम में डालता है.

कई बार वो क्लाइमेक्स और फिर एंटीक्लामेक्स का इस्तेमाल कर तनाव का माहौल बना देते हैं.

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हिचकॉक को पुलिस से डरलगता था

हिचकॉक को पुलिस से डर क्यों लगता था, इसका जवाब उन्होंने एनबीसी को दिए एक इंटरव्यू में दिया था. उन्होंने कहा था, "क्योंकि मैं कायर हूं. मुझे पुलिस से बहुत डर लगता है. इसलिए मैं बहुत सावधान रहता हूँ. जब कोई अधिकारी मेरे सामने होता है तो मुझे डर लगता है. मैं नहीं चाहता कि वे हमें चोट पहुंचाएं और हमें परेशान करें."

लेकिन आप पुलिस से इतना डरते क्यों हैं? इसका जवाब उन्होंने फ्रेंच डायरेक्टर फ्रांस्वा ट्रिफोइट के साथ एक लंबे इंटरव्यू में कहा, "जब मैं चार या पांच साल का था, तो मेरे पिता ने मुझे एक नोट थमा कर पुलिस स्टेशन भेज दिया. पुलिसकर्मी ने मुझे पांच से दस मिनट तक हिरासत में रखा और कहा, 'पता चला हम शरारती बच्चों के साथ क्या करते हैं?'

आख़िर पिता ने उनके साथ ऐसा क्यों किया होगा, पूछे जाने पर उन्होंने कहा था मुझे कुछ पता नहीं.

एनबीसी के साथ एक साक्षात्कार में उन्होंने कहा, "वास्तव में, बहुत से लोगों को यह ग़लतफहमी है कि मेरी फिल्मों के विषय मेरे स्वभाव से मेल खाते हैं, लेकिन वास्तव में मैं बहुत शांत, क़ानून का पालन करने वाला व्यक्ति हूं जिसके पास ह्यूमर का सेंस भी है."

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इमेज कैप्शन, फ़िल्म रियर व्यू

दुनिया भर के निर्देशकों पर हिचकॉक का प्रभाव

दुनिया भर के निर्देशकों और सिनेमा पर हिचकॉक का क्या प्रभाव था? इस सवाल का जवाब काफ़ी हद तक न्यूटन का विज्ञान पर असर या डॉन ब्रैडमैन का क्रिकेट पर असर में तलाशा जा सकता है.

चाहे वह स्टीवन स्पीलबर्ग की 'जॉज़' हो या बाद में रिडले स्कॉट की 'एलियन'. ऐसा लगता है कि रहस्य और भय ने हमें घेर लिया है. ऐसा क्यों हो रहा है, असल वजह क्या है, अगर आप किसी फ़िल्म को देखते हुए सवाल पूछ रहे हैं तो समझ लीजिए यह हिचकॉक का ही असर है.

ब्रेकिंग बैड, बेटर कॉल सोल जैसी हालिया हॉलीवुड सिरीज़ में निर्देशक विभिन्न कैमरा एंगल के साथ खिलवाड़ करते हुए दिखाई देते हैं. यह भी हिचकॉक की शैली का असर है. वे कैमरे के साथ काफ़ी प्रयोग करते थे. उन्होंने फ़िल्म वर्टिगो में एक शॉट का इस्तेमाल किया, जिसे बाद में वर्टिगो शॉट के रूप में जाना जाने लगा.

वीडियो कैप्शन, प्रियंका चोपड़ा के बुरे दिनों की कहानी

भारत में कई निर्देशकों पर हिचकॉक का प्रभाव देखा जा सकता है. राम गोपाल वर्मा और अनुराग कश्यप जैसे निर्देशकों ने इसे स्वीकार भी किया है.

अनुराग कश्यप ने कहा था, "पहले मैंने हिचकॉक की मशहूर फ़िल्में ही देखी थीं. असली ख़जाना तब मिला जब मैंने उनकी मूक फ़िल्में देखीं."

राम गोपाल वर्मा की कई फ़िल्मों में हिचकॉक की फ़िल्म से सीधे तौर पर जुड़े दृश्यों को देखा जा सकता है.

कई बार राम गोपाल वर्मा ने ट्वीट कर उनके बारे में लिखा है. जब साइको फ़िल्म ने पचास साल पूरे किए तो राम गोपाल वर्मा ने फिफ्टी ईयर्स ऑफ साइकोइंग नाम से एक ब्लॉग लिखा.

इसमें उन्होंने कहा, 'हर बार जब आप थिएटर या घर में किसी हॉरर फ़िल्म पर चिल्लाते हैं, तो हिचकॉक को धन्यवाद दें.' (बेशक अगर बाकी दुनिया याद रखे तो.)

अंधाधुंध, जॉनी गद्दार, एक थी हसीना जैसी थ्रिलर फ़िल्में बनाने वाले श्रीराम राघवन का भी कहना है कि फिल्मों के लिए जुनून और प्रेरणा उन्हें हिचकॉक से मिली.

उन्होंने कहा है, "मैंने अपने दर्शकों को अधिक से अधिक जानकारी देने के लिए हिचकॉक से यह तरीक़ा अपनाया."

कुछ निर्देशक अपनी ही फ़िल्मों में अतिथि कलाकार के रूप में दिखाई देते हैं. भारतीय निर्देशकों में अगर आप सुभाष घई की फिल्में देखेंगे तो वे कुछ सेकंड के लिए अपनी फ़िल्मों में आते हैं. यह भी हिचकॉक का असर माना जा सकता है.

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हिचकॉक की एक शैली थी जो उनकी प्रत्येक फ़िल्म में दिखाई देती है. बस कुछ सेकेंड के लिए वे अपनी फ़िल्मों में दिखाई ज़रूर देते थे. तनाव से भरी फ़िल्म में कुछ सेकंड के लिए उनकी मौजूदगी एक हास्य का कारण बन जाती थी.

अल्फ्रेड हिचकॉक उन कुछ फ़िल्म निर्देशकों में से एक हैं जिन्होंने एक ही समय में दर्शकों के प्यार, आलोचनात्मक प्रशंसा और व्यावसायिक सफलता का आनंद लिया है. लेकिन उनकी मृत्यु के बाद ही उनकी गिनती महान निर्देशकों में हुई.

दरअसल उनकी मृत्यु के बाद ही वीडियो कैसेट और वीसीआर आए. इसके बाद टीवी, प्राइवेट चैनल, सीडी, डीवीडी, ब्लू-रे और इंटरनेट ने हिचकॉक की फ़िल्मों को दुनिया के कोने-कोने में पहुंचा दिया.

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वहीं वर्टिगो को अब तक की सबसे महान फ़िल्मों में से एक माना जाता है. हिचकॉक की मृत्यु के वर्षों बाद, उनकी फ़िल्म वर्टिगो ने ब्रिटिश फ़िल्म संस्थान की सर्वकालिक महान फ़िल्म की सूची में शीर्ष स्थान हासिल किया है.

दरअसल, जब ये फ़िल्म आई तो यह अच्छा प्रदर्शन नहीं कर रही थी. फ़िल्म निर्माण की लागत भर निकाल पाई थी. 1958 तक, उनकी फ़िल्म बहुत बड़ी हिट नहीं थी, लेकिन अब इसे दुनिया की सर्वश्रेष्ठ फ़िल्मों में से एक माना जाता है.

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