सतीश कौशिक के मिस्टर इंडिया वाले कैलेंडर का पाकिस्तान और जनरल ज़िया उल हक़ से कनेक्शन

सतीश कौशिक

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    • Author, वंदना
    • पदनाम, टीवी एडिटर, बीबीसी इंडिया

मुंबई की एक टेक्सटाइल मिल और मिल में नौकरी का पहला दिन. पहले दिन का काम था धूल से भरे पड़े कमरे को झाड़ू से साफ़ करना.

जिस शख़्स को ये काम करना था वो देश के नामी नेशनल स्कूल ऑफ़ ड्रामा का पासआउट था और एफ़टीआईआई पुणे में भी ट्रेनिंग ले चुका था और कई नाटकों में काम कर चुका था.

पर चूँकि फ़िल्मों में किस्मत आज़मानी थी तो दिल्ली से सतीश कौशिक को मुंबई आना पड़ा और गुज़ारे के लिए टेक्सटाइल मिल में काम करना पड़ा.

सतीश कौशिक के मुंबई पहुँचने की तारीख़ थी नौ अगस्त, 1979. इसके बाद अगले एक साल तक सतीश कौशिक दिन में मिल में काम करते और शाम को नाटकों में.

13 अप्रैल 1956 को जन्मे इसी सतीश कौशिक को लोगों ने मिस्टर इंडिया में कैलेंडर के रोल में न सिर्फ़ पहचाना, सराहा बल्कि सर आँखों पर बिठाया और सतीश कौशिक ने भी पीछे मुड़कर नहीं देखा.

पाकिस्तान और कैलेंडर

मिस्टर इंडिया और सतीश कौशिक के करियर के सबसे यादगार किरदारों में था कुक कैलेंडर. हंसने हंसाने का कैलेंडर का अंदाज़, चाल-ढाल का अपना स्टाइल.

'कैलेंडर खाना दो'- फ़िल्म का मशहूर डायलॉग बन गया था. इस किरदार का नाम सतीश कौशिक ने ही कैलेंडर रखा था और इसका नाता पाकिस्तान से है और ज़िया उल हक़ के निज़ाम से भी.

सतीश कौशिक

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दरअसल 1984 में पाकिस्तानी टीवी ड्रामा 'आंगन टेढ़ा' काफ़ी मशहूर हुआ था और भारत में भी इसे देखा जाता था. सतीश कौशिक को ये पाकिस्तानी ड्रामा और इसके किरदार काफ़ी पसंद आए- ख़ासकर क्लासिक्ल सिंगर से बावर्ची बनने को मजबूर हुआ एक किरदार और लहरी नाम के मशहूर कॉमेडियन का किरदार.

इनके चलने, बात करने का अंदाज़, बॉडी लैंग्वेज फ़ेमिनाइन थी. कोमल नाहटा के शो पर सतीश कौशिक ने बताया था कि उन्हें वो काफ़ी अच्छा लगा और उन्होंने वहाँ से कैलेंडर के किरदार की प्रेरणा ली.

ज़िया उल हक़ और आँगन टेढ़ा

इसे एक कलाकार, या कहें कि एक अच्छे कलाकार का गुण ही माना जा सकता है वो कहीं की भी कला, कहीं के भी कलाकार से मुतासिर हो सकता है.

सतीश कौशिक का इंटरव्यू सुनने के बाद ही मैंने इंटरनेट पर आंगन टेढ़ा देखना शुरू किया. पाकिस्तानी ड्रामा आंगन टेढ़ा एक व्यंग्य शो ज़रूर था लेकिन इसके पीछे की कहानी काफ़ी दिलचस्प है.

बीबीसी उर्दू सेवा के वरिष्ठ पत्रकार आरिफ़ शमीम उन दिनों पाकिस्तान में ही थे और बताते हैं, "मैं बॉलीवुड फ़िल्मों और पाकिस्तानी टीवी ड्रामों दोनों का शौकीन हूँ. ज़िया अल हक़ के तानाशाही वाले दौर के दौरान के पाकिस्तानी ड्रामे सबसे उम्दा थे. उस वक़्त लोगों में जो ग़ुस्सा था, उसे ज़ाहिर करने का निर्देशकों और प्रोड्यूसरों ने नायाब तरीका निकाला था- तंज़ के ज़रिए बात रखना. आंगन टेढ़ा ऐसा ही एक मास्टरपीस था. ये एक व्यंग्यात्मक टीवी सीरिज़ थी जिसमें मार्शल लॉ के दौर पर मज़ेदार तरीके से कटाक्ष किया गया था."

दरअसल ज़िया उल हक़ के समय में पाकिस्तान के कई डांस स्कूल बंद कर दिए गए थे. तब लेखक अनवर मक़सूद ने बड़ी चतुराई से आंगन टेढ़ा में अकबर नाम के एक नर्तक का किरदार रखा जो अब ख़ानसामे या कुक का काम करता था. अनवर मक़सूद ने बताया था कि वो वाक़ई में ऐसे एक नर्तक को जानते थे जो डांस अकादमियां बंद होने के बाद बेरोज़गार हो गए और चूँकि उन्हें सिर्फ़ खाना बनाना आता था तो किसी के घर बावर्ची बनकर काम करने लगे.

आरिफ़ शमीम बताते हैं, "आंगन टेढ़ा में बड़ी होशियारी से ज़िया उल हक़ की तानाशाही के वक़्त कला और कलाकारों की दुर्दशा को दिखाया गया था. दरअसल उस दौरान ऐसे कई पाकिस्तानी टीवी नाटक बने थे जैसे 50-50 जो हर एपिसोड में अप्रत्यक्ष रूप से ज़िया अल हक़ की सरकार का मज़ाक उड़ाते थे. कहा जाता है कि ख़ुद जिया उल हक़ इस सीरियल के फ़ैन थे और प्रोड्यूसर को बताते थे कि उन्हें ख़ुद पर किया कटाक्ष समझ आ रहा है."

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ख़ैर कैलेंडर पर लौटें तो इसका किरदार तो पाकिस्तानी ड्रामे से प्रभावित था लेकिन इसका नाम सतीश कौशिक ने एक असल व्यक्ति के नाम पर रखा. उनके पिता काम के सिलसिले में राजस्थान जाते थे तो उनका एक जानने वाला ख़ुद के नाम के पीछे कैलेंडर लगता था- तकिया कलाम की तरह.

तो इस तरह एक भारतीय व्यक्ति और एक पाकिस्तानी टीवी सीरियल ने हमें कैलेंडर के रूप में एक शानदार किरदार दिया.

'मेरा एक्स रे मुझसे ज़्यादा सुंदर'

ज़्यादातर लोगों ने सतीश कौशिक को ज़बरदस्त कॉमिक टाइमिंग के लिए और डायलॉग के लिए जाना और ये हुनर उनमें शुरू से ही था.

संघर्ष के दिनों में वो एक बार किडनी स्टोन के सिलसिले में मुंबई में अस्पताल गए और एक्सरे करवाया. वहीं पास में ही श्याम बेनेगल की फ़िल्म मंडी की शूटिंग चल रही थी.

तो काम माँगने के लिए सतीश कौशिक वहाँ चले गए और श्याम बेनेगल से बोला कि मैं एनएसडी से हूँ और मुझे भी काम दे दीजिए.

जब बेनेगल ने कहा कि अपनी फोटो छोड़ जाओ तो सतीश कौशिक को एहसास हुआ कि फ़ोटो उन्होंने कभी खिंचवाई नहीं. और वो तुरंत बोले, "श्याम जी, मेरा एक्सरे रख लीजिए. ये मेरी शक्ल से ज़्यादा ख़ूबसूरत है."

ये सुनते ही श्याम बेनेगल ठहाके लगाकर हँस पड़े और वहीं के वहीं सतीश कौशिक को फ़िल्म मंडी में ले लिया जिसमें शबाना आज़मी, नीना गुप्ता, स्मिता पाटिल, नसीर, ओम पुरी और पंकज कपूर जैसे कलाकार थे.

मासूस में कैसे मिला मौका

ये अजब इत्तेफ़ाक़ है कि 1983 में सतीश कौशिक की तीन-चार फ़िल्में आईं और तीनों ने ख़ूब नाम कमाया- मंडी, जाने भी दो यारो और वो सात दिन. वहीं मासूम में सतीश कौशिक ने शेखर कपूर के साथ असिस्टेंट डायरेक्टर के तौर पर काम किया था.

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सतीश कौशिक मुंबई एक्टर बनने आए थे. 9 अगस्त को आए और 16 अगस्त को उन्हें मुंबई में एक प्ले में काम करने का मौका भी मिल गया क्योंकि एक एक्टर को अचानक कहीं जाना पड़ा.

नाटक से टेक्सटाइल मिल, वहाँ से फ़िल्में, असिस्टेंट डायरेक्शन, डायरेक्शन और लेखन- तकरीबन हर काम उन्होंने किया.

सबसे पहले सतीश कौशिक को बतौर सहायक निर्देशक काम करने का मौका शेखर कपूर की फ़िल्म मासूम में मिला जिसका दिलचस्प क़िस्सा है.

एयरपोर्ट जाकर मांगा था रोल

समाचार चैनल एबीपी को दिए इंटरव्यू में सतीश कौशिक ने बताया था, "एक दिन मैंने शेखर कपूर के घर फ़ोन किया. बताया गया कि वो किसी को छोड़ने एयरपोर्ट गए हैं. मैं झटपट एयरपोर्ट पहुँच गया और मुझे इत्तेफ़ाक़ से शेखर मिल भी गए. वो बड़े हैरान हुए कि मेरी कोई फ़्लाइट नहीं है और मैं सिर्फ़ उनसे काम माँगने आया हूँ. बाद में फिर फ़ोन पर उनसे बात हुई तो उन्होंने कहा कि किसी राजकुमार संतोषी को उन्होंने रख लिया है."

"मैं अंग्रेज़ी में कुछ और ही कहना चाह रहा था लेकिन ग़लत अंग्रेज़ी में मैंने बोल दिया कि यू विल मिस मी क्योंकि मैं बहुत मेहनती हूँ. बात आई गई हो गई. लेकिन थोड़े दिन बाद उनकी शायद नसीर से बात हुई और मुझे उन्होंने सहायक निर्देशक रख लिया. फिर उनके साथ जोशीले और मिस्टर इंडिया में काम किया."

फ़्लॉप फ़िल्म से शुरू हुआ निर्देशन का सफ़र

निर्देशन में सतीश कौशिक की दिलचस्पी नाटक के दिनों से ही हो गई थी. सतीश कौशिक ने जो पहली फ़िल्म निर्देशित की वो उस समय की सबसे महंगी हिंदी फ़िल्म थी - अनिल कपूर और श्रीदेवी के साथ 1993 में रूप की रानी, चोरों का राजा.

फ़िल्म महाफ्लॉप हुई. इस हद तक कि सतीश कौशिक बताते हैं कि हैदराबाद में उन्होंने ख़ुदकुशी करने के बारे में सोच लिया था.

फिर 1995 में आई बतौर निर्देशक दूसरी फ़िल्म प्रेम भी फ़्लॉप. इसके बाद 1996 में सतीश कौशिक के दो साल के बेटे की मौत हो गई थी. ये उनके जीवन का सबसे मुश्किल दौर था.

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पप्पू पेजर से लेकर मुत्तुस्वामी के अतरंगी किरदार

लेकिन सतीश कौशिक ने बतौर एक्टर और निर्देशक वापसी की. 1999 में उन्होंने हम आपके दिल में रहते हैं बनाई, 2001 में मुझे कुछ कहना है और 2003 में तेरे नाम.

दूसरी पारी में सलमान के करियर को नया आयाम देने वाली फ़िल्मों में तेरे नाम का नाम हमेशा लिया जाता है.

अगर सतीश कौशिक के डायलॉग कोरे कागज़ पर पढ़े जाएँ तो बेहद मामूली या बेसिर पैर के लग सकते हैं- मसलन दीवाना मस्ताना का डायलॉग 'ए टमाटर के आख़िरी दाने' और दूध के फटेले हिस्से या साजन चले ससुराल का डायलॉग- 'हमारा फ़ादर नॉर्थ इंडियन, हमारा मदर साउथ इंडियन इसलिए हम कम्पलीट इंडियन.'

लेकिन आप यूट्यूब पर जाकर इन संवादों को सर्च कीजिए और सतीश कौशिक के स्टाइल में सुनिए तो चेहरे पर मुस्कान आ ही जाएगी - चाहे दीवाना मस्ताना का पप्पू पेजर हो, साजन चले ससुराल का मुत्तुस्वामी हो, मिस्टर एंड मिसेज़ खिलाड़ी का चंदा मामा, राम लखन का काशीराम या हसीना मान जाएगी का कुंजबिहारी हो.

जाने भी दो यारो

1983 में सतीश कौशिक ने जाने भी दो यारो में काम किया जिसमें ज़्यादातर नए लेखक, निर्देशक, एक्टर काम कर रहे थे. सतीश कौशिक का रोल एक भ्रष्ट बिल्डर (पंकज कपूर) के भ्रष्ट असिस्टेंट का था- नाम था अशोक नंबूदरीपाद.

सतीश कौशिक का एक सीन आइकॉनिक माना जाता है. फ़िल्म का ये सीन तर्क और लॉजिक से कोसों दूर हैं. सीन ये है कि नसीरुद्दीन शाह एक डिटेक्टिव बनकर भ्रष्ट बिल्डरों के कमरे में जाते हैं जहाँ बिल्डर पंकज कपूर का राइट हैंड मैन सतीश कौशिक भी हैं.

जाने भी दो यारो

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नसीर उन्हें बताते हैं कि आपके लिए सीक्रेट कॉल है, अब सतीश कौशिक और नसीरुद्दीन शाह एक ही कमरे में दो लैंडलाइन फ़ोन से एक दूसरे से बात कर रहे हैं.

एक वक़्त फ़ोन गिर जाते हैं और तारें उलझ जाती हैं तो दोनों एक दूसरे से पीठ लगाकर एक ही कमरे से बात करते हैं. सतीश कौशिक शीशे में नसीर को अपने ही कमरे में देख भी लेते हैं पर बातचीत जारी रहती है. इस बेहद बेतुके से लगने वाले सीन में से भी ज़बरदस्त कॉमेडी निकल कर आती है जिसका श्रेय बहुत तक नसीर और सतीश कौशिक को जाता है.

कॉमेडी से बढ़कर थे सतीश कौशिक

हालांकि सतीश कौशिक के हुनर का दायरा कॉमेडी से कहीं ज़्यादा था. वरिष्ठ फ़िल्म पत्रकार अजय ब्रह्मत्मज कहते हैं, "सतीश कौशिक बहुत ही दिलचस्प और ख़ुशदिल कलाकार रहे. दिक़्क़त ये है कि हम उन्हें हास्य कलाकार तक सीमित कर देते हैं. अगर आपको उनकी अदाकारी देखनी है जो उनकी वो फ़िल्में और नाटक देखिए जहाँ वो अलग ही रूप में हैं."

इसकी मिसाल अंग्रेज़ी फ़िल्म ब्रिक लेन में मिलती है जिसमें सतीश कौशिक ने एक प्रवासी बांग्लादेशी का रोल किया था जो अपने परिवार के साथ लंदन में रहता है. इस विदेशी फ़िल्म में सतीश कौशिक को अपनी एक्टिंग के गंभीर पहलू को दर्शाने का मौका मिला.

उनकी एक्टिंग का दूसरा पहलू देखना हो तो उनसे पूछिए जो उन्हें नाटकों में देख चुके हैं जिसका ज़िक्र अजय ब्रह्मात्मज ने किया. सेल्समैन रामलाल नाटक इसकी मिसाल है. जिसमें बुज़ुर्गियत, नौकरी में नई तकनीक और ज़िम्मेदारियों के बोझ तले दबा रामलाल ढलती उम्र में अपने ज़िंदगी को बिखरते देखता है.

और वो सीन जब अचानक थिएटर में अंधेरा छा जाता है और आपको सिर्फ़ रामलाल के स्कूटर के क्रैश की आवाज़ सुनाई देती है. उस वक़्त हँसाने वाला कैलेंडर दूर दूर तक ज़हन में नहीं आता. ये नाटक पुलित्ज़र जीत चुके नाटक डेथ ऑफ़ ए सेल्समैन पर आधारित था.

मशहूर थे दोस्ती के क़िस्से

सतीश कौशिक जितना अपनी फ़िल्मों के लिए जाने जाते थे उतना ही अपनी दोस्ती के लिए भी.

जब 80 के दशक में नीना गुप्ता ने बिना शादी किए बच्ची को जन्म देने का फ़ैसला किया और समाज में कई तरह की दिक्कतें आईं तो उनके पक्के दोस्त सतीश कौशिक ने कहा था कि वो उनसे शादी कर लें. ये बात नीना ने अपनी ऑटोबायोग्राफ़ी में लिखी है.

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अनिल कपूर, डेविड धवन और अनुपम खेर के साथ उनकी दोस्ती के क़िस्से मशहूर हैं.

रूप की रानी के फ़्लॉप होने के बाद सतीश कौशिक डेविड धवन के साथ फ़िल्म राजा बाबू में काम कर रहे थे. फ़िल्म में जो रोल बाद में शक्ति कपूर ने किया वो किरदार दरअसल सतीश निभा रहे थे.

लेकिन सतीश को लगा कि करियर के इस मोड़ पर ये किरदार उनकी छवि के लिए ठीक नहीं है क्योंकि लोग सोचेंगे कि फ़्लॉप फ़िल्म के बाद अब वो इस तरह का किरदार कर रहे हैं.

लेकिन सतीश कौशिक के मुताबिक डेविड धवन उनकी उलझन को समझ गए और उन्होंने साजन चले ससुराल में जो रोल शक्ति कपूर कर रहे थे वो सतीश को दे दिया और जो रोल राजा बाबू में सतीश कर रहे थे शक्ति कपूर को दे दिया.

इत्तेफ़ाक़न शक्ति कपूर और सतीश कौशिक दोनों को ही फ़िल्मफ़ेयर पुरस्कार मिला. सतीश की फ़िल्में हिट-फ़लॉप होती रहीं लेकिन दोस्ती के मामले में सतीश कौशिक बहुत अमीर थे.

पप्पू पेजर के दिमाग़ को समझने को तेरे को टाइम लगेगा

उनकी फ़िल्में हिट रहीं लेकिन बधाई हो बधाई, मिलेंगे मिलेंगे जैसी फ़्लॉप फ़िल्में भी उन्होंने बनाई और सबसे ज़्यादा हैरान करने वाली कर्ज़ की रीमेक जैसी फ़िल्में भी.

कर्ज़ के रीमेक को लेकर मुझे हमेशा हैरत होती रही और हर बार सोचा कि किसी इंटरव्यू में उनसे पूछूँगी. अब लगता है कि पूछने पर शायद वो पप्पू पेजर की माफ़िक जवाब देते- पप्पू पेजर के दिमाग़ को समझने को तेरे को टाइम लगेगा. समझा क्या?

यहाँ सतीश कौशिक की फ़िल्म बड़े मियां छोटे मियां का डायलॉग भी याद आता है जहाँ उन्होंने चोर बाज़ार में काम करने वाले शराफ़त अली का रोल किया था और अमिताभ बच्चन और गोविंदा को बराबर की टक्कर दी थी.

फ़िल्म में शराफ़त अली कहते हैं, "पिछले 9 साल में शराफ़त अली ने चोर बाज़ार में पैसा नहीं कमाया पर शराफ़त से इज़्ज़त बहुत कमाई है."

सतीश कौशिक

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असल ज़िंदगी में भी सतीश कौशिक ने पिछले 40 सालों में फ़िल्मी बाज़ार में पैसा कमाया, ख़ूब सारा नाम कमाया और बेशुमार इज़्ज़त भी कमाई.

अजय ब्रह्मात्मज कहते हैं, "सतीश कौशिक ने रूप की रानी और प्रेम जैसी फ़िल्में बनाई. लेकिन ये देखिए वो आख़िरकार पहुँचे कहाँ. सच तो ये है कि उनका दिल कागज़ जैसी फ़िल्म में लगता था और वो कागज़-2 की तैयारी कर रहे थे. मुझे लगता है कि सतीश कौशिक का मूल्यांकन सही तरीक़े से होना चाहिए. ये देखा जाना चाहिए कि उन्होंने ख़ुद के लिए कैसी फ़िल्में चुनी और अपने प्रोडक्शन हाउस के लिए किस तरह की फ़िल्में बनाईं."

यू विल मिस मी वाली बात सतीश कौशिक ने कमज़ोर अंग्रेज़ी के चक्कर में भले ही ग़लती से शेखर कपूर से यूँ ही बोल दी हो लेकिन उनकी एक्टिंग के प्रशंसकों के लिए ये बात सच ही है.

वैसे सतीश कौशिक का एक किरदार और याद आ रहा है जो उन्होंने फ़िल्म जमाई राजा में निभाया था- उनके दूसरे किरदारों की तरह इस किरदार का नाम भी अतरंगी था- बीबीसी (बांके बिहारी चतुर्वेदी).

सतीश कौशिक के प्रशंसक उन्हें आने वाली कुछ फ़िल्मों और वेब शो में देख सकते हैं जिसमें शामिल है- किसी का भाई किसी की जान, पटना शुक्ला, इमरजेंसी, कागज़ 2, गन्स एंड ग़ुलाब्ज़.

( मुंबई से मधु पाल के इनपुट के साथ )

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