यश चोपड़ाः सामाजिक फ़िल्मों के डायरेक्टर से लेकर 'किंग ऑफ़ रोमांस' बनने तक की कहानी

यश चोपड़ा

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    • Author, वंदना
    • पदनाम, बीबीसी टीवी एडिटर (भारतीय भाषाएं)

जालंधर में रहने वाले यश चोपड़ा यूँ तो 1951 में घर से बॉम्बे भेजे गए थे इंजीनियरिंग की पढ़ाई के लिए. बड़े भाई बीआर चोपड़ा पहले से बंबई में बड़े फ़िल्मकार थे, यश चोपड़ा को भी बस वही करना था.

बड़े भाई ने यश चोपड़ा को आईएस जौहर के यहाँ काम सीखने भेज दिया. लेकिन यश चोपड़ा को काम कुछ जमा नहीं. पर बीआर चोपड़ा को मनाना आसान नहीं था.

बीआर चोपड़ा के दोस्त रहे मनमोहन कृष्ण से सिफ़ारिश लगवाकर वो बड़े भाई के पास लौट गए और बीआर फ़िल्म्स के साथ सेकेंड असिस्टेंट डायरेक्टर का काम करना शुरू कर किया.

कुछ सालों की मेहनत के बाद बीआर चोपड़ा ने यश चोपड़ा को अपने बैनर तले पहली फ़िल्म बनाने का मौक़ा दिया लेकिन शर्त थी कि यश चोपड़ा को बड़े भाई के चीफ़ असिस्टेंट ओमी बेदी के साथ मिलकर फ़िल्म 'को-डायरेक्ट' करनी होगी. यश चोपड़ा थोड़ी उलझन में थे.

उसी दौरान हुआ ये कि ओमी बेदी को कहीं और से अकेले फ़िल्म बनाने का ऑफ़र आया और वे चले गए. इस तरह यश चोपड़ा की पहली फ़िल्म 'धूल का फूल' 1959 में रिलीज़ हुई.

धूल का फूल

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धूल का फूल

बीआर चोपड़ा के बैनर तले यश चोपड़ा ने पाँच फ़िल्में डायरेक्ट की जिसमें धर्मपुत्र (1961), वक़्त, इत्तेफ़ाक़ और आदमी और इंसान (1969) शामिल है.

ये अपने समय की बहुत महत्वपूर्ण फ़िल्में थीं जिसमें उस समय की सामाजिक उथल-पुथल को देखा जा सकता है.

1959 में आई धूल का फूल एक ऐसे मुसलमान शख़्स की कहानी है जो एक नाजायज़ हिंदू बच्चे को पालता है.

चोपड़ा परिवार ने बंटवारे के बाद का धार्मिक उन्माद और ख़ून ख़राबा देखा था. फ़िल्म का गाना तू हिंदू बनेगा न मुसलमान बनेगा...वहीं से उपजा गीत है.

अपने हीरो राजेंद्र कुमार को ग्रे शेड में दिखाने का जोख़िम भी यश चोपड़ा ने लिया.

यश चोपड़ा

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नेशनल अवॉर्ड

वैसे बीआर चोपड़ा इसमें राजकुमार को लेना चाहते थे.

लेकिन जब राजकुमार ने पहली बार निर्देशन करने जा रहे यश चोपड़ा की काबिलियत पर थोड़ा शक किया तो बीआर चोपड़ा ने राजकुमार को बाहर का रास्ता दिखा दिया.

इस फ़िल्म के दो साल बाद ही यश चोपड़ा 1961 में लेकर आए धर्मपुत्र.

इस बार कहानी में एक हिंदू परिवार एक नाजायज़ मुसलमान बच्चे का पालता है.

बंटवारे से पहले के धार्मिक उन्माद में एक कट्टरपंथी हिंदू के रोल में शशि कपूर से यश चोपड़ा ने बेहतरीन काम करवाया था. धर्मपुत्र को नेशनल अवॉर्ड मिला था.

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एक्सपेरिमेंटल फ़िल्म

लेकिन 1965 में यश चोपड़ा ने ट्रैक थोड़ा बदला जब वे 'वक़्त' लेकर आए.

बड़े पर्दें पर कई बड़े सितारों को एक साथ लाना, वो बचपन में भाइयों का ग़ुम हो जाना और लॉस्ट-एंड फाउंड वाले फ़ॉर्मूले को यश चोपड़ा ने नया ट्रेंड बनाया.

लेकिन इन सबसे अलग यश चोपड़ा की सबसे एक्सपेरिमेंटल फ़िल्म अगर कोई मानी जाती है तो वो है 'इत्तेफ़ाक़'.

महज़ 28 दिनों में बनी ये फ़िल्म एक मर्डर मिस्ट्री थी जिसमें न गाने थे, न इंटरवल.

अराधना अभी रिलीज़ नहीं हुई थी और राजेश खन्ना बड़े स्टार नहीं थे. सिनेमाघर बिना इंटरवल के फ़िल्म नहीं चला सकते थे.

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रिस्क लेने का माद्दा

यश चोपड़ा ने स्टोरी ऑफ़ अ डॉक्टर नाम की 20 मिनट की एक डॉक्यूमेंट्री के राइट्स ख़रीदे, उसे शुरू में सिनेमा में चलवाया और फिर बिना ब्रेक के इत्तेफ़ाक़ सिनेमाघरों में चली.

और देखते ही देखते फ़िल्म ने अच्छी कमाई की. रिस्क लेने का माद्दा यश चोपड़ा में हमेशा से था.

लेकिन 1970 में यशराज ने इससे भी बड़ा फ़ैसला लिया- उन्होंने बीआर चोपड़ा से अलग होकर यश राज फ़िल्म्स का अपना बैनर बनाया.

बड़े भाई से अलग होना एक बड़ा और जोख़िम भरा कदम था. यशराज बैनर की पहली फ़िल्म भी कम जोख़िम भरी नहीं थी.

27 अप्रैल 1973 में यश राज फ़िल्म्स के निर्माण में पहली फ़िल्म दाग़ रिलीज़ हुई.

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अमिताभ बच्चन के साथ

दाग़ एक ऐसे व्यक्ति की कहानी थी जिसकी दो पत्नियाँ थी -एक ऐसी प्रेम कहानी जिसे समाज नैतिकता की नज़रों से तौलता है तो इसमें उलझे किरदार अपनी कसौटी पर.

दीवार, त्रिशूल, कभी कभी , जोशिले, मशाल, नूरी - 70 और 80 के दशक में एक से बढ़कर एक फ़िल्में दीं.

इसे यश चोपड़ा का कमाल ही कहा जा सकता है कि दो अलग-अलग मिजाज़ वाली फ़िल्में दीवार और कभी-कभी वो अमिताभ बच्चन के साथ एक साथ शूट कर रहे थे.

दीवार एक एक्शन से भरपूर फ़िल्म थी जिसमें सामाजिक असमानता पर सवाल उठाए गए हैं और साथ ही माँ-बेटे के रिश्ते को भी करीब से छूती है जबकि कभी-कभी रोमांस में एक एक्सपेरिमेंट कहा जा सकता है.

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कहानी सिलसिला की

इस फ़िल्म के लिए उन्होंने अमिताभ बच्चन के साथ स्मिता पाटिल और परवीन बॉबी को साइन किया था.

2012 में अपने आख़िरी जन्मदिन के मौके पर यश चोपड़ा ने अपने स्टूडियो में एक ओपन इंटरव्यू दिया था जिसमें उन्होंने सिलसिला के बारे में खुल कर बात की थी.

उस इंटरव्यू में उन्होंने बताया था, "कश्मीर में कालिया की शूटिंग चल रही थी और मैं रात को अमिताभ बच्चन से मिलने गया और सिलसिला की बात शुरु हुई. अमित ने पूछा कि यश जी आप स्टारकास्ट से ख़ुश हैं. मैंने कहा खुश तो नही हूँ लेकिन मैं क्या चाहता हूँ इस पर बात करने का कोई फ़ायदा भी नहीं है. तब अमित ने कहा कि आप बताइए तो सही. मैंने कहा कि दरअसल मैं तो जया और रेखा को लेना चाहता हूँ. उसके बाद अमित की ओर से लंबा पॉज़ था. फिर थोड़ी देर बाद वो बोले तो आप बात करके देखिए दोनों से."

यश चोपड़ा जया और रेखा दोनों से मिले और उनकी बात सुनने के बाद दोनों ही बिना किसी ख़ास मशक्क़त के सिलसिला करने के लिए राज़ी हो गईं.

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इतिहास के पन्नों में

और उसके बाद जो हुआ वो सिनेमा के इतिहास के पन्नों में दर्ज है.

1981 में अमिताभ-रेखा-जया की फ़िल्म सिलसिला रिलीज़ हुई जो बॉक्स ऑफ़िस पर बहुत अच्छा नहीं कर पाई पर आज एक कल्ट फ़िल्म मानी जाती है.

लेकिन बात यहीं ख़त्म नहीं हुई थी. यश चोपड़ा रेखा के रोल के लिए परवीन बॉबी और जया बच्चन के रोल के लिए स्मिता पाटिल को साइन कर चुके थे.

और अभी इन दोनों को ये बताना बाकी था कि अब वो फ़िल्म का हिस्सा नहीं हैं. साइन किए हुए कलाकारों को फ़िल्म के लिए न कहना यश चोपड़ा के लिए मुश्किल काम था.

यश चोपड़ा ने एक कॉमन मित्र का सहारा लिया और परवीन बॉबी तक अपनी बात पहुँचा दी. परवीन बॉबी भी श्रीनगर में शूटिंग कर रही थीं तो यश चोपड़ा भी शूटिंग करने श्रीनगर आ रहे थे.

उस ओपन इंटरव्यू में यश चोपड़ा बताते हैं, "मैं श्रीनगर हवाई अड्डे पर उतरा, तो देखा परवीन बॉबी भी वहीं थीं. अपनी फ़्लाइट के इंतज़ार में. वो छोटा सा हवाईअड्डा था. परवीन ने मुझे देखा तो मेरे पास आईं और बोली यश जी आपको मुझसे डरने की ज़रूरत नहीं है. आप वही कर रहे हैं जो आपकी फ़िल्म के लिए अच्छा है. पर हाँ मुझपर आपकी एक फ़िल्म उधार रही."

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यश चोपड़ा के गहरे दोस्त

ये कहकर परवीन बॉबी चली गईं. इस तरह परवीन बॉबी का किस्सा तो सुलझ गया लेकिन स्मिता पाटिल का किस्सा बाकी थी.

शशि कपूर फ़िल्म सिलसिला में काम कर रहे थे और यश चोपड़ा के गहरे दोस्त थे.

यश चोपड़ा ने शशि कपूर से गुज़ारिश की कि स्मिता को न कहने का काम वही करें. ना-नुकर के बाद शशि कपूर मान गए और स्मिता तक संदेश पहुँचा दिया गया और बात आई-गई हो गई.

कुछ समय बाद हुआ कुछ यूँ कि एक शूटिंग के दौरान स्मिता पाटिल और यश चोपड़ा एक दूसरे से टकरा गए.

2012 में दी अपनी इंटरव्यू में यश चोपड़ा बताते हैं, "स्मिता मेरे पास आईं और बोली यशजी अगर आप ख़ुद मुझसे आकर बोलते कि आप मुझे फ़िल्म में नहीं ले सकते तो मुझे बिल्कुल बुरा नहीं लगता. लेकिन आपने शशि के ज़रिए कहलवाया तो मुझे बुरा लगा. मैं क्या कहता. अजीब लग रहा था. दरअसल किसी को न कहना मुझे बहुत मुश्किल लगता है."

ख़ैर इस तरह स्मिता पाटिल और परवीन बॉबी की जगह जया और रेखा को लेकर सिलसिला पूरी हुई.

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स्विट्ज़रलैंड और शिफ़ॉन साड़ियाँ

80 के दशक में फ़ासले और विजय जैसी मारधाड़ वाली फ़िल्मों में यश चोपड़ा को असफलता भी झेलनी पड़ी.

साल 1989 में चांदनी के ज़रिए यश चोपड़ा रोमांस पर ऐसे लौटे कि उसके बाद उन्हें 'किंग ऑफ़ रोमांस' कहा जाने लगा.

हालांकि डर जैसी साइको-थ्रिलर बनाकर वो लोगों को चौंकाते रहे. दिल तो पागल है, वीर ज़ारा, जब तक है जान में रोमांस ही मुख्य बिंदु था.

धूल का फूल और धर्मपुत्र जैसी फ़िल्मों में सामाजिक मुद्दों को उठाने वाले यश चोपड़ा की बाद की फ़िल्मों में स्विट्ज़रलैंड, शिफ़ॉन साड़ियाँ, सरसों के खेत- यशराज बैनर की पहचान बन गए.

उनकी बाद की फ़िल्में सामाजिक गहराइयों से थोड़ी दूर ज़रूर जाती दिखीं लेकिन यश चोपड़ा की फ़िल्में हमेशा संपूर्ण मनोरंजन के अपने वादे से दूर नहीं गई.

समय के साथ यश चोपड़ा बदले, शायद यही वजह थी कि 80 साल की उम्र तक 22 फ़िल्में निर्देशित करने वाले यश चोपड़ा का फ़िल्मी सिलसिला 60 साल लंबा था.

नवंबर 2012 में अपनी फ़िल्म जब तक है जान की रिलीज़ के कुछ दिन पहले ही यश चोपड़ा की 21 अक्तूबर को मौत हो गई थी.

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