यश चोपड़ा का वो आखिरी फोन कॉल

विख्यात फिल्मकार यश चोपड़ा के निधन से उनके करीबी दोस्त और सहयोगी स्तब्ध हैं. यश चोपड़ा बतौर निर्देशक अपनी आखिरी फिल्म जब तक है जान के प्रमोशन में व्यस्त थे. यश चोपड़ा से जुड़ी हुई हस्तियों ने इस प्रख्यात फिल्मकार को कुछ ऐसे याद किया.
जावेद अख्तर:नज़ाकत और नफासत का बादशाह
एक महीने पहले की बात है. यश जी का मेरे पास फोन आया.
उन्होंने कहा,"मुझे कुछ काम नहीं है, लेकिन पता नहीं क्यों आज बड़ा दिल कर रहा था आपसे बात करने का. मैं आपसे ये कहना चाहता हूं कि हमारी भले ही इन दिनों ज़्यादा बात ना होती हो लेकिन मैं अब भी आपका अच्छा दोस्त हूं."
यश चोपड़ा जी उस स्कूल के थे, जहां स्क्रिप्ट और गानों पर बड़ा ज़ोर दिया जाता था. उनकी किसी भी फिल्म में ओछापन नहीं होता था.
मेरी और उनकी जान पहचान 40 सालों से भी ज़्यादा समय से हैं. उन्होंने ही मुझे ज़बरदस्ती गीतकार बनाया, वरना मैं तो गाने लिखना भी नहीं चाहता था.
फिल्म सिलसिला के लिए उन्होंने कहा कि तुम्हें गाने लिखने होंगे, चाहे कुछ हो जाए. मैं उनके घर सुबह 10 बजे पहुंचा.
संगीत निर्देशक शिव हरि ने मुझे धुन सुनाई और फिर मैंने कुछ घंटों की मेहनत के बाद गाना लिखा, "देखा एक ख्वाब तो ये सिलसिले हुए." इस तरह से मुझसे गाने लिखवाने का श्रेय यश जी को जाता है.
निजी जीवन में भी वो बड़े दिलदार किस्म के इंसान थे. वो और उनकी पत्नी पामेला चोपड़ा बेहतरीन मेज़बान थे.
लोग उन्हें किंग ऑफ रोमांस कहते हैं. लेकिन उन्होंने हर किस्म की फिल्म बनाई. दीवार और कभी-कभी जैसी फिल्मों की शूटिंग एक ही वक्त की और देखिए कितनी जुदा फिल्में थी दोनों.
मैं उन्हें किंग ऑफ डीसेंसी यानी नज़ाकत और नफासत का बादशाह कहूंगा.
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यश जी हिंदी सिनेमा के लीडर थे. इंडस्ट्री की कोई समस्या हो, सरकार से बात करनी हो उन सबमें वो हमारे लिए अग्रणी भूमिका निभाते थे.
उनके अंदर सबके लिए मोहब्बत कूट-कूट के भरी थी शायद इसलिए उनकी फिल्मों में प्यार को इस खूबसूरती से पेश किया जाता था.
उन्होंने अपनी फिल्मों में हर तरह का रिस्क लिया. 60 और 70 के दशक में धूल का फूल, धरम पुत्र और दाग जैसी फिल्में बनाईं जो समाज के परंपरागत नियमों को चुनौती देती थीं.
हिंदी सिनेमा के दो बहुत बड़े सितारों, अमिताभ और शाहरुख के करियर में यश जी का बेहद अहम योगदान है.
हाल ही में अमिताभ बच्चन के 70वें जन्मदिन समारोह में वो मुझसे मिले.
मैंने कहा, यश जी आपकी फिल्म जब तक है जान के प्रोमो शानदार लग रहे हैं और मुझे आपसे प्रेरणा मिलती है कि जब आप 80 साल की उम्र में इतना बेहतरीन काम कर रहे हैं, तो मैं भी 15-20 साल और काम कर सकता हूं.
उन्होंने हंसते हुए मेरे कंधे पर हाथ रखा और कहा, "नेवर गिव अप."
हिंदी सिनेमा के परदे पर अब रोमांस अब वैसा कभी नहीं रहेगा, जैसा यश जी की फिल्मों में होता था.
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मेरी और यश चोपड़ा की पहचान 50 के दशक से है. मुझे याद है हम दोनों सुबह 6 बजे जुहू बीच पर सैर करने जाते थे. हम लोग हंसते, मज़ाक करते और सिनेमा के बारे में बातें करते रहते.
फिर जब उन्हें मेरी ज़रूरत थी, तो मैं अपने काम में इतना मशरूफ हो गया कि ऐसा हो नहीं पाया.
उन्होंने बतौर फिल्मकार अपनी फिल्मों में सतत प्रगति की. हर दौर के हिसाब से उन्होंने अपने को ढाला और कामयाबी पाई.
हम दोनों के बीच में हमेशा एक मज़ाक चलता. मैं उनको फोन करता और कहता, "यश जी मेरा नंबर नोट कर लीजिए. मुझे आपके साथ काम करना है." तो वो हंसते हुए कहते, "आपका नंबर मुझे अच्छी तरह से याद है मनोज जी."
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मैंने उनके साथ दाग, त्रिशूल और काला पत्थर जैसी फिल्में कीं. उनकी फिल्मों के सेट पर पिकनिक का सा माहौल रहता.
वो अपने कलाकारों का बहुत ध्यान रखते थे. 70 के दौर में वो ऐसे फिल्मकार थे, जो जब सेट पर आते तो उनके पास पूरी स्क्रिप्ट डायलॉग सहित तैयार होती. वरना कई ऐसे फिल्मकार भी थे जो सेट पर आकर जायलॉग लिखते.
मैं मानता हूं कि अमिताभ और शाहरुख के करियर में उनका बहुत ज़्यादा योगदान है. उन्होंने सिनेमा को एक उद्योग की शक्ल दी.
अपना स्टूडियो तैयार किया. ना जाने कितने फिल्मकार तैयार किए. लाखों लोगों को प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से रोज़गार दिया. उन्होंने अपने ही किस्म का एक ब्रांड बनाया.












