भोंदू एंड कंपनी की दरियादिली से उस्ताद बने थे नौशाद

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- Author, रोहित घोष
- पदनाम, लखनऊ से, बीबीसी हिंदी डॉट कॉम के लिए
बात क़रीब 90 साल पहले की है.
लखनऊ के लाटूश रोड में साज़ों की एक दुकान हुआ करती थी - भोंदू एंड कंपनी.
एक छोटा बच्चा बार-बार दुकान के चक्कर लगाता, दुकान के मालिक ग़ुरबत अली ने उससे पूछा, "तुम इन साज़ों को क्यों घूरते रहते हो?"
बच्चे ने जवाब दिया, "क्योंकि मैं उन्हें ख़रीद नहीं सकता हूँ," साथ ही पूछ लिया कि क्या वो दुकान में झाड़ू-पोछा लगाने का काम कर सकता है?

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एक दिन जब ग़ुरबत अली दूकान पहुंचे तो देखा कि वो लड़का हारमोनियम पर अपनी उंगुलिया नचा रहा है, और उसकी धुन हर तरफ़ फैल रही है.
हारमोनियम बजाने में तल्लीन बच्चे का हाथ जब रूका और नज़र ग़ुरबत अली पर पड़ी तो वो कांपने लगा.
ग़ुरबत अली ने ऊंची आवाज़ में कहा, "तू दुकान की साफ़ सफाई करने आता है या मेरे नए साज़ों पे अपने हाथ साफ़ करने आता है?"
बच्चे माफ़ी मांगता रहा, कहता रहा "आगे से ऐसा नहीं होगा."
पर ग़ुरबत अली हारमोनियम पर बच्चे की उंगलियों का जादू देख प्रभावित थे और उन्होंने वो हारमोनियम उसे मुफ्त ही दे दिया.
कभी साज़ों की दुकान में सफाई करनेवाला वो बच्चा सालों बाद हिंदी फ़िल्म संगीत की दुनिया का न मिटने वाला नामी संगीतकार नौशाद के नाम से मशहूर हुआ.
भोंदू एंड कंपनी को बंद हुए ज़माना गुज़र चुका है.

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जंहा भोंदू एंड कंपनी हुआ करती थी, क़रीब-क़रीब उसी के सामने साज़ों की एक और दुकान है जहाँ पर आपको आज भी नौशाद के तमाम क़िस्से सुनने मिल जाएंगे.
नौशाद की पुरानी तस्वीरें और उनके लिखे ख़त भी मौजूद हैं - अल्लन साहब एंड संस नाम की दुकान में.
अल्लन एंड संस नौशाद के मामू की थी. अल्लन साहब के पोते अज़मत उल्लाह बताते हैं, "नौशाद ने संगीत का ककहरा अल्लन साहब से ही सीखा था."
अज़मत उल्लाह 58 साल के हैं.
अज़मत उल्लाह बताते हैं, "नौशाद का ज़्यादातर वक़्त अल्लन साहब के इर्द-गिर्द ही बीतता था. उनका बचपन तो पूरी तरह अल्लन साहब के घर पर ही बीता."

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दादा के बारे में बात करते हुए अज़मत उल्लाह कहते हैं, "वो साइलेंट मूवीज़ का दौर था. सिनेमा हॉल में कुछ कलाकार साज़ लेके परदे के पास बैठा करते थे और फ़िल्म के बीच में सीन या मूड के हिसाब से धुन बजाया करते थे. अल्लन साहब जब रॉयल थिएटर में हारमोनियम बजाते थे तो नौशाद उनके साथ होते थे."
रॉयल सिनेमा का नया नाम मेहरा थिएटर है.
नौशाद जब 18-19 साल के हुए तो बम्बई चले गए.
लखनऊ में दो ही शख़्स रहे - अज़मत उल्लाह के दादा, अल्लन साहब और उनके पिता नसीब उल्लाह जिनसे नौशाद का ख़तों के ज़रिये नाता बना रहा.
अज़मत उल्लाह हंसते हुए कहते हैं, "वालिद साहब उनका खत पढ़कर फ़ाड़ देते थे, पर अब नौशाद इस दुनिया में नहीं है तो हमें उनके खतों की अहमियत पता चल रही है."
वो अलमारी से कागज़ों एक पुलिंदा निकलते हैं और नौशाद का एक ख़त दिखाते हैं.

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ख़त नौशाद ने अपने लेटरहेड पे लिखा था और वो उर्दू में है. उसपे तारीख़ पड़ी है 17 फरवरी, 1993.
अज़मत उल्लाह अपनी भारी आवाज में खत पढ़ के सुनाते हैं - आप का प्यार भरा खत मिला. पढ़ कर सबकी याद आई. फिर एक बार बचपन आँखों के सामने घूम गया. खुदा आप सब को सलामत रखे. हमारी नानी का घर सलामत रहे. कई बार ऐसा ख्याल आता है कि एक बार सब बच्चों और आपके यहाँ ही ठहरूँ और मस्जिद की छत पर से फिर पतंग उड़ाएं. और नानी की आवाज़ सुनें. ऐ कमबख्तों मस्जिद की छत से उतरो, गुनाह बढ़ेगा. फिर तकिया वाले पीर साहब की मज़ार पर जाऊं और हमारे बुज़ुर्ग इमली के पेड़ से लिपट कर जी भरकर खूब रोऊँ. मुझे बड़ी यादें सताती हैं......
अज़मत उल्लाह कहते हैं कि नौशाद आख़िरी बार साल 2002 में लखनऊ आए थे. अल्लन साहब एंड संस में भी गए. काफी देर देर लाटूश रोड पर टहले. फिर थक कर दुकान में वापस आ गए. और उस वक़्त उन्हें देखने के लिए लोगों की भीड़ जमा हो गई.
वो आख़िरी मौका था जब जब नौशाद लखनऊ आए.
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