मेरे पिया गए रंगून......

शमशाद बेगम
इमेज कैप्शन, शमशाद बेगम के नाम कई लोकप्रिय गाने हैं.

चाहे रुपहले पर्दे का वो पुराना गाना 'कजरा मोहब्बत वाला हो' या फिर 'लेके पहला-पहला प्यार' जैसा गीत हो,शमशाद बेगम की गायन शैली ही कुछ इस तरह की थी कि उनके गाए सारे गीत न सिर्फ अपने ज़माने में हिट थे, बल्कि सदाबहार भी बन गए.

प्रसिद्ध संगीतकार ख़य्याम उन्हें याद करते हुए कहते हैं कि शमशाद बेगम एक ऐसी कलाकार थीं जिन्होंने अपने जमाने के लगभग सभी संगीतकारों के साथ काम किया.

<link type="page"><caption> पढिए: शमशाद बेगम का निधन</caption><url href="http://www.bbc.co.uk/hindi/entertainment/2013/04/130424_shamshadbegum_ks.shtml" platform="highweb"/></link>

"उनकी खनकती आवाज़ हर गीत में चार चाँद लगा देती थी. उनके गीत ऐसे लोकप्रिय हुआ करते थे, जो बड़ी आसानी से न सिर्फ बड़ों बल्कि बच्चे-बच्चे की ज़बान पर आसानी से चढ़ जाया करते थे.उनके गीत ऐसे हैं जिसमें न सिर्फ अल्हड़पन है, बल्कि प्रेम और जीवन की सच्चाई भी है.

<link type="page"><caption> देखिए शमशाद बेगम के सदाबहार गाने</caption><url href="http://www.dnaindia.com/entertainment/1826397/report-most-iconic-songs-by-bollywood-playback-singer-shamshad-begum" platform="highweb"/></link>

शब्दों का जादू

ख़य्याम कहते हैं कि ये शमशाद बेगम की गायिकी का कमाल था, उनका उच्चारण, सुरों पर पकड़ और उनकी लोचदार आवाज़ थी जिसने उन्हें इस मुकाम पर खड़ा कर दिया था.

करीब चार दशकों तक हिन्दी फिल्मों में एक से बढ़कर एक लोकप्रिय गीतों को स्वर देने वाली शमशाद बेगम बहुमुखी प्रतिभा की गायिका थीं. ऐसा नही है कि उन्होंने सिर्फ फिल्मी गीत ही गाए, उन्होंने भक्ति गीत, क्षेत्रीय गीतों के साथ साथ गज़लों को भी अपनी आवाज़ दी.

एक ओर वो लोकप्रिय धुनों पर गीत गाती रहीं, वहीं दूसरी ओर उन्होंने संगीतकार सी रामचन्द्र के लिए ‘‘आना मेरी जान.. संडे के संडे ’’ जैसी पश्चिमी धुन पर बड़ी सहजता से गा कर कमाल कर दिया.

अमृतसर में 14 अप्रैल 1919 में जन्मी शमशाद बेगम उस ज़माने के प्रसिद्ध गायक के एल सहगल की ज़बरदस्त प्रसंशक थी. उन्होंने सारंगी के उस्ताद हुसैन बख्शवाले साहेब से संगीत की दीक्षा ली थी.

शमशाद बेगम ने पेशावर, लाहौर और आकाशवाणी दिल्ली के लिए गाने गाए.

1944 में मुंबई आने के बाद शमशाद बेगम ने संगीतकार नौशाद, एसडी बर्मन, सी रामचन्द्रन, खेमचंद प्रकाश और ओपी नय्यर जैसे तमाम संगीतकारों के लिए गाने गाए.

उनकी आवाज़ समकालीन गायिकाएं गीता दत्त और लता मंगेश्कर से ख़ासी जुदा थी.

ओ पी नैय्यर ने ताउम्र लता मंगेश्कर की आवाज़ नहीं ली. उन्होंने आशा भोंसले के अलावा शमशाद बेगम को ही अपने गीतों के लिए चुना.

सदाबहार गीत

ख़य्याम कहते हैं कि उन्हें इस बात का बेहद अफसोस है कि उनकी शमशाद के साथ काम करने की इच्छा कभी पूरी नहीं हो पाई. ख़य्याम कहते हैं कि नौशाद और ओपी नय्यर के साथ शमशाद बेगम का तालमेल बेहद अच्छा था, दोनों ने उनके साथ एक से एक लोकप्रिय गीत दिए.

नौशाद के संगीत निर्देशन में शमशाद बेगम ने मुग़ल-ए-आज़म का 'तेरी महफिल में किस्मत आज़मा कर हम भी देखेंगे..' और मदर इंडिया का 'होली आई रे कन्हाई..' जैसे शानदार गीत दिए.

'ले के पहला-पहला प्यार', 'कभी आर कभी पार', 'कहीं पे निगाहें कहीं पे निशाना', 'कजरा मोहब्ब्त वाला' गीत तो ऐसे हैं जो अमर हो गए है.

दशकों तक हिन्दी फिल्मों में अपनी आवाज का जादू बिखेरने के बाद शमशाद बेगम ने धीरे-धीरे पार्श्व गायन के क्षेत्र से अपने को दूर कर लिया. लेकिन उनके गीत आज भी न सिर्फ पुरानी बल्कि नई पीढ़ी के लोग भी गुनगुना रहे है.

शमशाद बेगम को संगीत में उल्लेखनीय योगदान के लिए 2009 में देश के तीसरे सबसे बड़े नागरिक सम्मान पद्म भूषण से नवाज़ा गया था.