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शुक्रवार, 20 जून, 2008 को 14:13 GMT तक के समाचार
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बढ़ती महँगाई के लिए 'अदूरदर्शी' सरकार ज़िम्मेदार

पेट्रोल
पेट्रोलियम पदार्थों की क़मीते बढ़ाने के बदले करों में कटौती करनी चाहिए थी
महँगाई दर के दहाईं के आँकड़े को पार करने का तात्कालिक कारण पेट्रोलिय पदार्थों की क़ीमतों में हुई बढ़ोत्तरी है. हालाँकि क़ीमतें बढ़ने का पहले से अनुमान लगाया जा सकता था.

वित्त मंत्री ने जब इस बार का आर्थिक सर्वेक्षण पेश किया तो उसमें साफ लिखा हुआ है एक विकासशील अर्थव्यवस्था में दो तरह के ख़तरे होते हैं – महँगाई और मुद्रा विनिमय दर का प्रबंधन.

सर्वेक्षण में बताया गया कि भारत में ये ख़तरा शुरु हो गया है लेकिन सरकार ने कोई क़दम नहीं उठाया.

 केंद्र सरकार का ये कहना कि विपक्ष सकारात्मक सहयोग नहीं कर रही है, बिल्कुल बेवकूफी भरी बात है. उन्होंने हमें आज तक इस मुद्दे पर बात करने के लिए नहीं बुलाया.

जो क़दम उठाए गए उसका कोई लेना-देना महँगाई से नहीं था, इसलिए कोई असर नहीं पड़ा. साथ ही साथ आग में घी डालने का काम किया पेट्रोलियम पदार्थों की बढ़ी क़ीमतों ने.

जब महँगाई पहले से बढ़ रही हो, ऐसे समय में पेट्रोल-डीज़ल के दाम बढ़ाने से दूसरे सामानों के दाम भी बढ़ेंगे ये तय था.

सरकार के पास विकल्प थे

सरकार के पास विकल्प ये था कि पेट्रोलियम पदार्थों पर कर दरों में कटौती करते. ऐसा हुआ होता तो आज ये स्थिति नहीं आती.

उन्हें राज्य सरकारों से भी बात करनी चाहिए थी. लेकिन हुई राजनीति. वाहवाही लूटने का प्रयास किया गया. कांग्रेस शासित राज्यों ने पेट्रोलियम पदार्थों पर कर घटाए. ये बिल्कुल अर्थव्यवस्था का राजनीतिकरण था.

"सरकार ने आपूर्ति व्यवस्था को दुरुस्त करने प्रयास नहीं किए"

दूसरी बात, आपूर्ति पर ध्यान देना चाहिए था जो आज तक नहीं हुआ. सिर्फ़ मौद्रिक क्षेत्र पर ध्यान दिया गया. ब्याज़ दर बढ़ाए गए.

अब विडंबणा ये है कि महँगाई दर 11 फ़ीसदी से अधिक है लेकिन सरकारी सूद का दर आठ फ़ीसदी. यानी सरकार अपने कर्मचारियों को भी इसी दर पर ब्याज़ दे रही है. तो इसका क्या मतलब.

ये अदूरदर्शी सरकार अब सिर्फ बहाने बना रही है. पहले कहा गया कि एनडीए सरकार की ग़लत नीतियों से ऐसा हुआ है, फिर राज्यों को लक्ष्य बनाया गया और अब कह रहे हैं कि विश्व बाज़ार के कारण ऐसा हुआ है.

महँगाई का राजनीतिकरण

केंद्र सरकार का ये कहना कि विपक्ष सकारात्मक सहयोग नहीं कर रही है, बिल्कुल बेवकूफी भरी बात है. उन्होंने हमें आज तक इस मुद्दे पर बात करने के लिए नहीं बुलाया.

 अगर वे हमें बुलाते हैं तो हम बताएंगे कि कौन से क़दम उठाए जाएँ. लेकिन मैं विश्वास के साथ कहता हूँ कि सरकार ऐसा नहीं करेगी.

सरकार का कर्तव्य बनता है कि विपक्ष के साथ मशविरा करे. दूसरी बात जब हम सरकार में थे जो महँगाई नियंत्रण में थी. हमने जो उपाए किए वो इस सरकार के जेहन में हैं.

लेकिन 2004 में सत्ता में आने के बाद ही उन उपायों को दरकिनार किया गया.

अगर वे हमें बुलाते हैं तो हम बताएंगे कि कौन से क़दम उठाए जाएँ. लेकिन मैं विश्वास के साथ कहता हूँ कि सरकार ऐसा नहीं करेगी.

(बीबीसी संवाददाता आलोक कुमार से बातचीत पर आधारित)

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