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शिक्षा के बीच गहराता फ़ासला

स्कूली बच्चे
सरकारी स्कूलों में अब नेता और नीति निर्माताओं के बच्चे नहीं पढ़ते
राजस्थान में सरकारी दावों के विपरीत शिक्षा में शहरों के मुक़ाबले गाँव उपेक्षित हैं और शहरों में शिक्षा के बढ़ते निजीकरण ने सरकारी स्कूलों के सामने संकट खड़ा कर दिया है.

सरकार का कहना है कि सामंती परिवेश से निकले भारत के भौगोलिक दृष्टि से सबसे बड़े राज्य राजस्थान ने पिछले एक दशक में शिक्षा क्षेत्र में अच्छी प्रगति की है और साक्षरता, नामांकन और शिक्षा की गुणवता में उल्लेखनीय सुधार आया है.

घंटी की निनाद सुनकर हर क्षेत्र के लाखों बच्चे शहरों की मध्यमवर्गीय बस्तियों और गाँवों की उसर पगडंडियों से चलकर सरकारी स्कूलों की देहरी चढ़ते हैं.

सुविधाओं का अभाव

लेकिन एक सुनहरे भविष्य का ख़्वाब बुनते इन बच्चों को कहीं अध्यापकों की कमी का सामना करना पड़ता है तो कहीं स्कूलों के पास बुनियादी सुविधाओं का अभाव है.

पर राज्य के शिक्षा मंत्री घनश्याम तिवाड़ी को शैक्षिक प्रगति पर बहुत संतोष है.

तिवाड़ी कहते हैं कि राज्य के एक लाख स्कूलों में से 700 ही ऐसे हैं, जिनके पास भवन की कमी है. इन स्कूलों में प्रतिदिन डेढ़ करोड़ बच्चे तालीम लेने आते हैं.

 तीन साल पहले कॉलेज शिक्षा में एक लाख 27 हज़ार विद्यार्थी थे, आज यह संख्या तीन लाख 84 हज़ार है. लगभग हर प्रखंड पर एक आईटीआई है और हर ज़िले में एक पॉलीटेक्निक संस्थान
घनश्याम तिवाड़ी, शिक्षा मंत्री, राजस्थान

शिक्षा मंत्री का दावा है कि अगले तीन साल में कॉलेज शिक्षा में राजस्थान देश का अग्रणी राज्य हो जाएगा.

शिक्षा मंत्री कहते हैं, ‘‘तीन साल पहले कॉलेज शिक्षा में एक लाख 27 हज़ार विद्यार्थी थे, आज यह संख्या तीन लाख 84 हज़ार है. लगभग हर प्रखंड पर एक आईटीआई है और हर ज़िले में एक पॉलीटेक्निक संस्थान.’’

सरकारी ख़र्च

राजस्थान में गत एक दशक में शिक्षा क्षेत्र में सरकारी ख़र्च भी बढ़ा है और अभी शिक्षा का बजट पाँच हज़ार करोड़ रुपए से ज़्यादा का है.

सरकारी आँकड़े हालात की मोहक तस्वीर प्रस्तुत करते हैं. मगर बजट अध्ययन संस्थान के विजय गोयल कहते हैं यह महज छलावा है.

गोयल के मुताबिक,‘‘बीते एक दशक में शिक्षा का बजट 92 प्रतिशत तक बढ़ा है. लेकिन सच यह है कि इस बढ़ोत्तरी में मुख्य हिस्सा कर्मचारियों की वेतन वृद्धि का है. बुनियादी सुविधाओं के विकास में कोई वृद्धि नहीं हुई है. खेल, पुस्तकालय और प्रयोगशालाओं के विकास में व्यवस्था कंजूस है.’’

फाइल फोटो
शहरों में शिक्षा का निजीकरण हो रहा है और सक्षम छात्र सरकारी स्कूलों से किनारा कर रहे हैं

सरकारी दावों की धूप स्कूलों के आँगन में उतरते-उतरते पीली पड़ जाती है.

राजधानी जयपुर में मोटर गैराज स्थित सती सरकारी बालिका विद्यालय से विधानसभा, सचिवालय और मुख्यमंत्री दफ़्तर की दूरी महज एक किलोमीटर है, लेकिन यहाँ एक सीलन भरे कमरे में यह स्कूल चलता है.

हालत यह है कि शिक्षिका के बैठने के लिए भी कुर्सी नहीं है.

इस स्कूल में पढ़ने वाले बच्चों के अभिभावक या तो रिक्शा चलाते हैं या मज़दूर हैं.

यहाँ एक रिक्शा चालक बाप की बेटी शकीला मॉडल बनने का सपना देखती है, लेकिन इन सपनों को कौन सहारा देगा.

बदलता नज़रिया

समाज के संपन्न और सक्षम लोग सरकारी शिक्षण संस्थाओं से किनारा करने लगे हैं.

शिक्षा क्षेत्र में लंबे समय से काम कर रहे दिगंतर संस्था के रोहित धनखड़ कहते हैं,'' शिक्षा में सामाजिक परिदृश्य बदल रहा है. गाँवों के सरकारी स्कूलों में या तो अन्य पिछड़ा वर्ग की लड़कियाँ रह गई हैं या फिर दलित विद्यार्थी. पिछड़ा वर्ग के छात्र और ऊँची जात के विद्यार्थी अब प्राइवेट स्कूलों का रुख़ करने लगे हैं. यह शैक्षिक विभेद बच्चों की ज़िदंगी पर आगे तक प्रभाव डालता है.''

शिक्षा शास्त्री प्रकाश चतुर्वेदी को लगता है कि राजस्थान में स्कूली शिक्षा सांप्रदायिक है और उच्च शिक्षा उपेक्षित बच्चों को यही पढ़ाया जा रहा है कि जो कुछ अतीत में था वही श्रेष्ठ है. यह प्रतिगामी सोच की शिक्षा है.

 गाँवों के सरकारी स्कूलों में या तो अन्य पिछड़ा वर्ग की लड़कियाँ रह गई हैं या फिर दलित विद्यार्थी. पिछड़ा वर्ग के छात्र और ऊँची जात के विद्यार्थी अब प्राइवेट स्कूलों का रुख़ करने लगे हैं
रोहित धनखंड, दिगंतर संस्था

जयपुर जैसे शहरों में पुरानी स्कूलों की इमारतों पर बाज़ार की नज़र लगी हुई है.

कभी इन स्कूलों के इर्द-गिर्द मध्यम वर्ग के लोग रहते थे. अब हालत बदल गए हैं. विद्यार्थियों की संख्या घट गई है और स्कूलों का वजूद खतरे में पड़ गया है.

ग्रामीण क्षेत्रों में भी सरकारी स्कूलों की निजी स्कूलों की स्पर्धा से जूझना पड़ रहा है.

सरकारी स्कूलों में अब नेता और नीति निर्माताओं के बच्चे नहीं पढ़ते हैं.

सरकारी स्कूलों के पट खोलो तो एक ऐसे भारत के दर्शन होते हैं जो गाँव-ग़रीब का भारत है, जो शहर की मलिन बस्तियों के मजदूर का भारत है. लेकिन उसे अपने हिस्से की तालीम पर संतोष है.

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