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चिदंबरम पर है चौतरफ़ा दबाव | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
पिछली जुलाई में वित्त मंत्री पी. चिदंबरम ने जब बजट पेश किया तब वित्तीय वर्ष के चार महीने बीत चुके थे. उन्हें 1997 जैसा ड्रीम बजट लाने का मौका नहीं मिला. फरवरी, 2004 के जनादेश में मिले संदेश की अनदेखी करना सत्ताधारी यूपीए सरकार के प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह और वित्तमंत्री पी चिदंबरम के लिए मुश्किल है. नई आर्थिक नीतियों के जनक प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह और इन नीतियों के प्रबल समर्थक वित्त मंत्री चिदंबरम के लिए दोबारा से उन नीतियों के बारे में सोचना उनकी इच्छा नहीं, बल्कि राजनीतिक मजबूरी है. इसके साफ संकेत उनके जुलाई के बजट भाषण में मिलते हैं. इस भाषण के दूसरे ही पैरे में प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि जनता ने परिवर्तन के लिए वोट दिया है. इस परिवर्तन के ज़रिए मतदाताओं ने अपनी मंशा जाहिर कर दी है कि राष्ट्रीय प्राथमिकताओं, उनकी प्रक्रियाओं और निगरानी के फोकस में वे बदलाव चाहते हैं. चौतरफ़ा दबाव 28 फरवरी को आने वाले बजट से यह ज़ाहिर होगा कि वित्त मंत्री जनता के जनादेश और राष्ट्रीय साझा न्यूनतम कार्यक्रम (एनसीएमपी) के आर्थिक और सामाजिक वादों के प्रति कितने गंभीर हैं. उनके लिए इस चुनौती पर खरे उतरना और मुश्किल इसलिए होगा कि राजस्व संग्रह और राजकोषीय घाटा उनके बजट आकलन के अनुरूप होने नहीं जा रहा है. उपलब्ध आंकड़ों के हिसाब से राजस्व संग्रह में 17 हज़ार करोड़ की कमी होने के आसार साफ हैं. इसमें सात हज़ार करोड़ रुपए का टोटा केवल केंद्रीय उत्पाद शुल्क में होने वाला है. इसकी मुख्य वजह सत्ता में आते ही बढ़ी मुद्रास्फीति दर रही, जिसके चलते वित्त मंत्री को पेट्रोउत्पादों में दो बार शुल्क में राहत देनी पड़ी. खाद्य और अन्य सब्सिडियों को कम करके यह कमी पूरी करने का जोखिम उठाना अब वित्त मंत्री के सामर्थ्य के बाहर दिखाई देता है. हर समय वित्त मंत्री के सपनों पर मौज़ूदा गठबंधन के अहम घटक वामपंथ का लाल रंग छाया रहता है. सात लक्ष्य पिछली जुलाई के अपने बजट भाषण में वित्त मंत्री ने यूपीए गठबंधन में शामिल दलों के राष्ट्रीय साझा न्यूनतम कार्यक्रम के सात मुख्य आर्थिक लक्ष्य गिनाए.
पहला, 7-8 फीसदी की विकास दर को सुनिश्चित अवधि के लिए प्राप्त करना. दूसरा, सबको मूल शिक्षा और स्वास्थ्य उपलब्ध कराना. तीसरा, कृषि, सेवा क्षेत्र में निवेश को प्रोत्साहित कर उपयोगी रोज़गार अवसर सृजित करना. चौथा, हर परिवार को न्यूनतम वेतन को आधार मानकर साल में सौ दिन का रोज़गार अवसर सुनिश्चित कराना. पाँचवाँ, कृषि और मूलभूत ढाँचे पर फोकस करना. छठा, राजकोषीय सुदृढ़ता और सुधारों को तेज़ करना. सातवाँ, अधिक, पर्याप्त राजकोषीय हस्तांतरण को निश्चित करना. कहना न होगा कि इन आर्थिक लक्ष्यों के आलोक में कई गंभीर चुनौतियों की तलवार उनके सिर पर लटकी है. उनकी सफलता और विफलता इस यक्षप्रश्न पर टिकी है कि राजकोषीय लक्ष्यों को वह कैसे और कितना हासिल कर पाएँगे? 2003 में पारित राजकोषीय उत्तरदायित्व और प्रबंधन अधिनियम में साफ उल्लेखित है कि 2008-09 तक सरकार राजस्व घाटे को समाप्त करने के लिए प्रतिबद्ध है, इसके साथ ही राजकोषीय घाटे को इस अवधि में 0.3 फीसदी दर से कम करना है. चालू वित्त वर्ष में राजकोषीय घाटा का लक्ष्य सकल घरेलू उत्पाद का 4.4 और 3.6 फीसदी रहे हैं. अब तक जो आर्थिक संकेत मिले हैं, उनसे बजट में निर्धारित यह लक्ष्य हासिल करना लगभग असंभव दिखाई दे रहा है. राजस्व संग्रह में 17-18 हज़ार करोड़ रुपए कम रह जाने के आसार साफ हैं. ज़ाहिर है कि जब इस साल ही निर्धारित लक्ष्य पिछड़ रहे हैं, तो आगामी बजट में राजकोषीय उत्तरदायित्वों और प्रबंधन अधिनियम में निर्धारित लक्ष्यों को पाने के लिए भारी मशक्कत वित्तमंत्री को करनी पड़ेगी. इसके साथ ही अगले बजट में गठबंधन के घटक वामदलों के भारी दबाव में उन्हें सामाजिक सुरक्षाओं के लिए आबंटन बढ़ाना है. वामदलों का दबाव अनेक क्षेत्रों में विदेशी निवेश की सीमा बढ़ाने के लिए उन्हें वाम दलों से जूझना है. विदेशी निवेश सीमा बढ़ाने से मिलने वाली निवेश से तात्कालिक रूप से कर राजस्व बढ़ाने में उन्हें सहायता मिल सकती है. ज़ाहिर है कि सीमित विकल्पों के बीच उन्हें राजकोषीय घाटा कम करना है और राजस्व घाटे के लक्ष्य को हासिल करना है. रोज़गार के अवसर बढ़ाने हैं. कुछ बजट व्यय में भी बढ़ोत्तरी तय है. 12वें वित्त आयोग ने सकल बजटीय समर्थन की राशि को एक करोड़ 72 लाख करोड़ रुपए करने की मंशा जाहिर की है. जो अभी एक करोड़ 45 लाख करोड़ रुपए है. याद रहे कि वाम दलों ने भी राज्यों के हिस्से को 40 हज़ार करोड़ रुपए से बढ़ाने की माँग की है. आर्थिक दबावों से जाहिर है कि बहुत देने को वित्त मंत्री के पास कुछ नहीं है, जैसा उन्होंने 1997 के बजट में किया था. यह बजट देश के आर्थिक इतिहास में ड्रीम बजट के नाम से मशहूर है. करों की चुनौती बजट में दोहराए गए वायदों में एक बड़ा मसला है संवर्धित कर प्रणाली का है. इसे एक अप्रैल 2005 से लागू करने की घोषणा भी की जा चुकी है. पर इसे सफलतापूर्वक चलाने और बढ़ाने के लिए अभी अनेक उपाय किए जाने बाक़ी हैं.
सैद्धांतिक तौर पर अंत में उत्पाद शुल्क और संवर्धित कर प्रणाली को सामान और सेवा कर (जीएसटी) से बदला जाना है. इसके लिए सेनवेट को 18 फ़ीसदी के स्तर से 12 फ़ीसदी पर लाया जाना ज़रूरी है और सेवा कर को 10 से 12 फ़ीसदी तक ले जाना पड़ेगा. यह दोनों काम निकट भविष्य में असंभव नज़र आ रहे हैं. व्यापारियों में ख़ास कर छोटे और खुदरा व्यापारियों में सेवा कर और संवर्धित मूल्य प्रणाली को लेकर देशव्यापी भारी असंतोष है. 21 फ़रवरी को हुई व्यापारियों की देशव्यापी हड़ताल इस असंतोष का नतीजा है. कर नीति में मनमाफ़िक परिवर्तन करना वित्त मंत्री के लिए दुष्कर है. आयकर में कर मुक्त सीमा को बढ़ाने के लिए चौतरफा दबाव है. वित्त मंत्री इस संदर्भ में एक हाथ ले, दूसरे हाथ से देने की बाजीगरी दिखा सकते हैं. यानी आय कर में कुछ राहत दें, पर आय कर मुक्त भत्तों पर करों का फंदा कस सकते हैं. वैसे भी 90 फ़ीसदी भारतीयों का बजट से मतलब सिर्फ आय कर, उत्पाद कर व सब्सिडी राशि से ज़्यादा कुछ नहीं है. बजट को इस भंवर से बाहर निकालने की ही असली चुनौती वित्त मंत्री पी. चिदंबरम के सामने है और रहेगी. (लेखक 'अमर उजाला कारोबार' के संपादक रहे हैं और अब अमर उजाला के कार्यकारी संपादक हैं.) |
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