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सिलिकन वैली और आउटसोर्सिंग का असर | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
सिलिकन वैली...अमरीका के पश्चिमी तट पर कैलिफ़ोर्निया राज्य के शहर सैन फ़्रांसिस्को से लगभग 50मील दूर सैन होज़े नाम के एक दूसरे शहर को जाते वक़्त मिलती है ये सिलिकन वैली. ये जहाँ है उस जगह का नाम तो कुछ और है मगर दुनिया भर में लोग इसे सिलिकन वैली के ही नाम से जानते हैं. लगभग 50 साल पहले वित्तीय कमी को दूर करने के लिए यहाँ के स्टैनफ़ोर्ड विश्वविद्यालय ने कई हज़ार एकड़ की ज़मीन हाईटेक कंपनियों को काम करने के लिए दे दी. शुरू में यहाँ हाईटेक कंपनियाँ आईं मगर 70 के दशक से यहाँ सूचना प्रौद्योगिकी यानी आईटी क्षेत्र की कंपनियों ने अपना दबदबा बनाना शुरू कर दिया. आज यहाँ दुनिया के आधुनिकतम कंप्यूटरों का, सॉफ़्टवेयर का विकास होता है. छोटी-बड़ी कंपनियों को मिलाकर आईटी क्षेत्र की दुनिया की लगभग 4000 कंपनियों के दफ़्तर हैं यहाँ. भारतीयों का योगदान
और सिलिकन वैली में जो काम होता है उसमें भारतीयों की भागीदारी अच्छी-ख़ासी है. भारत के नामी-गिरामी संस्थानों से इंजीनियरिंग की पढ़ाई कर छात्र यहाँ आते हैं और अपनी मेहनत और योग्यता की बदौलत काफ़ी कुछ अर्जित करते हैं. आईआईटी कानपुर से पढ़ाई करने के बाद यहाँ बस चुके राजीव दत्ता बताते हैं कि भारतीयों का सिलिकन वैली में योगदान बड़ा महत्वपूर्ण रहा है. राजीव कहते हैं,"आज यहाँ बड़ी-बड़ी कंपनियों के शीर्ष पदों पर भारतीय मिल जाएँगे. उनका बड़ा सम्मान है यहाँ". आउटसोर्सिंग आउटसोर्सिंग - ये शब्द पिछले चार-पाँच सालों में यहाँ एक बड़े मुद्दे के रूप में उभरा है जिसे अमरीका में ऑफ़शोरिंग कहने का प्रचलन है. आउटसोर्सिंग, यानी कि कंपनियों का जो काम अमरीका में होता था उसे अब भारत में ही करवाने के प्रचलन ने ज़ोर पकड़ा. भारत में सस्ते में काम हो जाता था और इस कारण कंपनियों का ख़र्चा कम हुआ. मगर और एक चीज़ जो हुई वो ये कि लोगों की नौकरियाँ गईं और जा रही हैं. इलाहाबाद के प्रतिष्ठित मोतीलाल नेहरू रीजनल इंजीनियरिंग कॉलेज से शिक्षा प्राप्त संदीप गुप्ता बताते हैं,"पहले जिस कंपनी में 100 प्रोग्रामर थे अब वहाँ 25 रह गए हैं. अब इन 25 लोगों को को भी भय है कि नौकरी रहेगी कि नहीं और रहेगी तो उतना पैसा मिलेगा कि नहीं. बदलती स्थिति
मगर जानकार बताते हैं कि आउटसोर्सिंग मंदी से उबरने का एक तरीक़ा था जो ज़रूर लेकिन ये लंबे समय तक कारगर नहीं रहनेवाला क्योंकि भारत में भी अब लागत बढ़ती जा रही है. एनसिम नाम की कंपनी के सीईओ संदीप गुप्ता कहते हैं,"दो साल पहले आप भारत में किसी को रखते थे तो आपको उसे आज की अपेक्षा काफ़ी कम पैसे मिलते थे. तो अमरीका और भारत के कर्मचारियों की तनख़्वाहों में जो एक अंतर था वो कम होता जा रहा है". ऐसी स्थिति में पिछले कुछ अर्से में यहाँ स्थिति उलट-सी गई है. पहले इंजीनियर भारत से आया करते थे अब लोग यहाँ से भारत जा रहे हैं क्योंकि वहाँ अवसर अधिक हैं. राजीव दत्ता बताते हैं,"पिछले कुछ वर्षों में बहुत सारे लोग यहाँ से बंगलौर आदि जगहों पर चले गए क्योंकि उन्हें लगा कि वहाँ उनकी स्थिति बेहतर रहेगी. अब भारत से पहले जितने लोग यहाँ नहीं आ रहे". समय की माँग आउटसोर्सिंग को लेकर अमरीका के स्थानीय इंजीनियरों में भी चिंता है. वे कहते हैं कि ख़र्चा बचाने की बात बिल्कुल व्यावहारिक है मगर पानी जब सिर के ऊपर जाने लगेगा तो मुश्किल होगी. सैनफ़्रांसिस्को में वाइडॉरबिट नामक कंपनी में काम करनेवाले सॉफ़्टवेयर इंजीनियर जेसी बिन्स कहते हैं,"देखिए अभी असंतोष तो है स्थानीय लोगों में मगर बात उतनी गंभीर नहीं है लेकिन कल को अगर ये समस्या और बढ़ी तो यहाँ के लोगों में भी परेशानी उसी तरह से बढ़ सकती है." जानकारों की राय है कि पिछले छह महीने में अमरीकी बाज़ार में मंदी की हालत बेहतर हुई है और इससे सिलिकन वैली में भी अनिश्चितता कम हुई है. उनका मानना है कि भविष्य ऐसा ही रहनेवाला है, जिसमें कि कंपनियों को भारत में काम तो करवाना ही पड़ेगा मगर अमरीका में भी काम जारी रखना होगा. वे कहते हैं कि अगर कोई कंपनी अगर कामयाब रहना चाहती है तो उसे ऐसे ही मॉडल को अपनाना होगा. |
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