| आउटसोर्सिंग पर अमरीका में बहस | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
अमरीका में नौकरियों को विदेशों में भेजने या 'आउटसोर्सिंग' करने के कारण लोगों में रोष बढ़ता जा रहा है. अमरीकी अर्थव्यवस्था अब भी मंदी के दौर से गुज़र रही है और बेरोज़गारी के कारण लोगों को लगता है कि उनकी नौकरियाँ सस्ते में काम करने वाले लोगों के पास विदेशों मे जा रही हैं. कंप्यूटर प्रोग्रामर, फ़ाइनेंशियल एनेलिस्ट और यहाँ तक कि कुछ वक़ीलों की कंपनियों ने भी अपना काम विदेशों में भेजना शुरु कर दिया है. अमरीका में इस साल नवंबर में राष्ट्रपति पद के लिए चुनाव होने हैं और इसलिए 'आउटसोर्सिंग' यहाँ एक चुनावी मुद्दा भी बन गया है. क़ानून डेमोक्रेटिक पार्टी के उम्मीदवार जॉन कैरी 'आउटसोर्सिंग' के ख़िलाफ़ सख़्त क़ानून लाने की बात भी कह चुके हैं. अमरीकी सीनेट ने तो क़ानून पारित कर सरकारी कामकाज को 'आउटसोर्स' करने पर प्रतिबंध लगा दिया है. और इस सारे सिलसिले में भारत का नाम सबसे ऊपर लिया जा रहा है. इसी माहौल में ये बहस भी शुरु हो गई है कि आख़िर ये नौबत ही क्यों आई कि नौकरियों को विदेशों में भेजा जाए. ये भी पूछा जा रहा है कि इस पूरे क्रम को रोका क्यों नहीं जा रहा है और इससे किसको फ़ायदा हो रहा है. बहस
सारे सवाल और इनके जवाब ढूँढने के लिए भारतीय मूल के कुछ अमरीकियों ने न्यूयॉर्क में एक गोष्ठी का आयोजन किया. इसमें व्यापारी, छात्र, नौकरी करने वाले और आम लोगों ने भाग लिया. लोग काफ़ी उत्तेजित नज़र आ रहे थे और इस मुद्दे पर बंटे हुए भी दिखे. कुछ को अपनी मातृभूमि से प्यार के कारण 'आउटसोर्सिंग' को गले लगाते भी देखा गया तो कुछ नौकरियाँ छूटने से गुस्साए हुए थे. पिछले पाँच साल से न्यूयॉर्क में नौकरी कर रहे इंजीनियर कृष्णा को अचानक नौकरी से निकाल दिया गया. वे इसके लिए आउटसोर्सिंग को ही ज़िम्मेदार मानते हैं. वे कहते हैं,"आज आप नौकरियाँ भारत भेज रहे हैं. कल भारत के लोग ज़्यादा पैसे माँगेंगे तो आप वहाँ से आउटसोर्स कर फ़िलीपींस, मलेशिया और रोमानिया में काम ले जाएँगे. तो इस तरह तो लोग नौकरियाँ ही नहीं करेंगे". कृष्णा इस बात को भी सही नहीं बताते कि भारत में नौकरियाँ देने से वहाँ लोग खुश हैं. वे कहते हैं,"वहाँ नौकरियाँ मिल रही हैं अमरीकी कंपनियों की शर्तों पर. आपने कुछ माँग की तो वे नौकरियाँ दूसरों को दे देंगे". आउटसोर्सिंग के पक्षधर आउटसोर्सिंग के पक्षधर लोग इसे एक स्वाभाविक प्रक्रिया के रूप में देखते हैं. दुनिया भर में नौकरियाँ और दूसरे मुद्दों पर सर्वेक्षण करनेवाली एक कंपनी के मालिक आलोक अग्रवाल कहते हैं,"ये जो हवा बनती जा रही है कि भारतीयों की नौकरियाँ जानेवाली हैं वह सही नहीं है. हमारे हिसाब से केवल तीन हज़ार नौकरियाँ गई हैं अब तक और इतने बड़े देश में जहाँ 14 करोड़ लोग बेरोज़गार हुए हैं वहाँ ये गिनती कोई मायने नहीं रखती". लेकिन आउटसोर्सिंग के विरोधी कहते हैं कि इससे सिर्फ़ मालिकों को ही फ़ायदा हो रहा है और कर्मचारियों को बेवजह नौकरियों से हाथ धोना पड़ रहा है. भारतीय मूल की अमरीकी इंजीनियर सोना शाह अमरीका में रहनेवाले भारतीयों के आउटसोर्सिंग के प्रति रवैये को सही नहीं मानतीं. वे कहती हैं,"भारतीय लोग यहाँ आते हैं, फ़ायदा उठाते हैं और यहाँ से सब ले तो लेते हैं मगर वापस देने के लिए तैयार नहीं होते". लेकिन कुछ लोग समझते हैं कि आउटसोर्सिंग इतनी बड़ी समस्या नहीं है. न्यूयॉर्क स्थित कोलंबिया विश्वविद्यालय में एमबीए की पढ़ाई कर रहे श्रीधर केनो कहते हैं,"जो काम भारत जा रहा है वो बहुत कम है. अब वे वक़ीलों को, नर्सों को तो नहीं भेज पाएँगे भारत. अगर आप देखें तो 40 तरह की नौकरियों में से केवल दो तरह की नौकरियाँ भारत जा रही हैं". बहरहाल इस मुद्दे पर आम अमरीकी लोगों में रोष और ग़ुस्सा बढ़ रहा है और देश में सियासी माहौल होने और इसका राजनीतिकरण आग में घी का काम कर रहा है. |
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