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नए अमरीकी क़ानून से भारत को निराशा
भारत सरकार ने उस नए अमरीकी क़ानून को वैश्वीकरण की भावना के ख़िलाफ़ बताया है जिसमें सरकारी कामों का कोई भी भाग अमरीका से बाहर कराने पर रोक की व्यवस्था है. भारतीय उद्योग जगत ने भी नए अमरीकी क़दम पर निराशा जताई है. उल्लेखनीय है कि अमरीकी सीनेट ने शनिवार को उस विधेयक को पारित कर दिया जिसमें सरकारी ठेकों में आउटसोर्सिंग यानी सस्ते में दूसरे देशों में काम कराने पर प्रतिबंध की बात है. राष्ट्रपति के हस्ताक्षर के बाद यह क़ानून लागू हो जाएगा. भारत के सूचना प्रौद्योगिकी मंत्री अरुण शौरी ने कहा है कि नए अमरीकी क़ानून से अंतरराष्ट्रीय व्यापार वार्ताओं की जटिलता और बढ़ेगी.
शौरी ने कहा, "बिल का तो ज़्यादा असर नहीं होगा...लेकिन इसके जो संकेत हैं उसका बड़ा असर होगा." बीबीसी हिंदी सेवा से बातचीत में उन्होंने अमरीका के दोमुँहेंपन का ज़िक्र करते हुए कहा, "एक तरफ़ तो ये हमें मुक्त व्यापार पर भाषण देते हैं, अभी डब्ल्यूटीओ की बैठक में ही ये सेवा क्षेत्र में फिर से समझौते की बात कर रहे थे, और अब अपने घर में यों कर रहे हैं." शौरी ने कहा, "जिस उत्पाद पर भी हमारी पकड़ मज़बूत होती है ये ऐसा करना शुरू कर देते हैं." उद्योग जगत में मायूसी भारतीय उद्योग जगत ने खुल कर अपनी निराशा का इज़हार किया है. उद्योग संगठन सीआईआई के महानिदेशक तरुण दास ने नए अमरीकी क़ानून को उदारीकरण की भावना के ख़िलाफ़ बताया है. बीबीसी हिंदी सेवा से बातचीत में उन्होंने कहा, "अमरीका हमेशा से हमें उदारीकरण के लिए कहता रहा है. लेकिन सीनेट द्वारा पारित बिल इसके विपरीत है."
हालाँकि उन्होंने कहा कि भारतीय उद्योग जगत पर नए क़ानून का ज़्यादा असर नहीं पड़ेगा. दास ने कहा कि भारतीय कंपनियों के पास अमरीकी सरकार से जुड़े ज़्यादा काम नहीं हैं. उन्होंने कहा कि निजी क्षेत्र में ऐसे किसी क़ानून को लाए जाने की आशंका नहीं की जानी चाहिए. लेकिन दास ने कहा, "अमरीका सरकार ने जो संकेत दिए हैं वो ठीक नहीं है. यह एक नकारात्मक संकेत है." आउटसोर्सिंग का सबसे ज़्यादा लाभ उठाने वाली भारतीय सॉफ़्टवेयर कंपनियों के संगठन नैस्कॉम के प्रमुख किरण कार्णिक ने अमरीक़ी क़ानून को मुक्त व्यापार की अवधारणा के ख़िलाफ़ बताया है. |
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