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अनुच्छेद 370 पर फ़ैसले से उठ रहा है संघीय ढांचे को कमज़ोर करने का सवाल
- Author, उमंग पोद्दार
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़ की अध्यक्षता वाली पाँच जजों की बेंच ने सर्वसम्मति से फ़ैसला देते हुए जम्मू-कश्मीर के विशेष दर्जे को ख़त्म करने का फ़ैसला बरकरार रखा है.
सुप्रीम कोर्ट ने ये भी कहा कि अगले साल सितंबर तक जम्मू-कश्मीर में चुनाव कराने के लिए क़दम उठाने चाहिए.
शीर्ष अदालत ने कहा कि जम्मू-कश्मीर को पूर्ण राज्य का दर्जा जितनी जल्दी बहाल किया जा सकता है, कर देना चाहिए.
इस मामले में सुप्रीम कोर्ट के सामने सबसे महत्वपूर्ण सवाल था कि क्या केंद्र सरकार किसी राज्य में राष्ट्रपति शासन के दौरान उसे दो केंद्र शासित प्रदेशों में विभाजित कर सकता है.
भविष्य में इस सवाल के बहुत अहम परिणाम होने वाले हैं क्योंकि इसने केंद्र के हाथ में एक ऐसा हथियार दे दिया है कि वो पहले राष्ट्रपति शासन लागू करे और फिर पूरे राज्य या उसके एक हिस्से को केंद्र शासित प्रदेश में बदल दे.
कई क़ानूनी विशेषज्ञ और विपक्षी नेताओं का मानना है कि यह फ़ैसला राज्यों पर केंद्र के नियंत्रण को बढ़ा देता है और संघीय ढांचे को ढीला करता है.
संघीय ढांचे का मुद्दा भारत में बहुत विवादित रहा है. कई राज्यों ने केंद्र पर उनकी शक्तियों को छीनने के आरोप लगाए हैं.
कई राज्य सरकारों ने केंद्र द्वारा नियुक्त राज्यपालों पर विधेयकों को रोक कर बैठे रहने के आरोप लगाए हैं.
पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी का दावा है कि केंद्र ने कल्याणकारी योजनाओं के लिए सुनिश्चित फ़ंड और जीएसटी में 1.15 लाख करोड़ की हिस्सेदारी को रोक रखा है.
इसके अलावा, वन नेशन वन इलेक्शन के विचार ने इस डर को बढ़ा दिया है कि देश की राजनीति और ज़्यादा एक ही जगह केंद्रित हो जाएगी.
अदालत के सामने प्रमुख प्रश्न
संविधान के अनुच्छेद तीन में नए राज्यों के गठन की प्रक्रिया का उल्लेख है.
इसमें कहा गया है कि संसद दो या अधिक राज्यों को मिलाकर या राज्य विभाजित कर नए राज्य बना सकता है.
इसके लिए राष्ट्रपति की सिफ़ारिशों के आधार पर संसद में विधेयक पेश किया जा सकता है और इसके बाद इसे राज्य की विधानसभा में पेश करना अनिवार्य होता है.
साल 2019 में जब जम्मू और कश्मीर राष्ट्रपति शासन के तहत था, राज्य को दो केंद्र शासित प्रदेशों- जम्मू एवं कश्मीर और लद्दाख, में बांटने का एक विधेयक संसद में पास किया गया.
इसके तहत जम्मू एवं कश्मीर में विधानसभा और लद्दाख में बिना विधानसभा के केंद्र शासित प्रदेश बनाए गए.
इसलिए सुप्रीम कोर्ट के सामने सबसे अहम सवाल था कि केंद्र शासित प्रदेशों- जम्मू एवं कश्मीर और लद्दाख का गठन वैध था या नहीं.
कोर्ट ने क्या कहा?
जम्मू कश्मीर के केंद्र शासित प्रदेश के गठन के बारे में अदालत ने अपने विचार नहीं दिए.
कोर्ट ने कहा कि चूंकि सरकार ने ये आश्वासन दिया है कि जम्मू कश्मीर के राज्य का दर्जा बहाल किया जाएगा, इसलिए उन्हें यह तय करने की ज़रूरत नहीं है कि क्या किसी राज्य को दो केंद्र शासित प्रदेशों में तोड़ा जा सकता है.
हालांकि अदालत ने लद्दाख के गठन को जायज ठहराया.
कोर्ट ने कहा कि केंद्र के पास अनुच्छेद तीन के तहत ये अधिकार है कि वो किसी राज्य में से एक केंद्र शासित प्रदेश को बना दे, यहां तक कि राष्ट्रपति शासन के तहत भी.
सर्वोच्च अदालत ने ये भी कहा कि राष्ट्रपति शासन के दौरान संसद और राष्ट्रपति की कार्यवाही की कोई सीमा नहीं है.
विपक्ष का क्या कहना है?
विपक्षी नेताओं का कहना है कि यह फ़ैसला संघीय ढांचे को कमज़ोर करता है.
कांग्रेस ने कहा कि वो इस बात से निराश हुई है कि अदालत ने इस मुद्दे पर कोई फ़ैसला नहीं दिया कि क्या एक पूरे राज्य को केंद्र शासित प्रदेश में बदला जा सकता है.
वरिष्ठ वकील और कांग्रेस नेता अभिषेक मनु सिंघवी ने कहा कि संविधान के तहत सरकार के पास ये करने का कोई अधिकार नहीं है.
मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी (माकपा) के अनुसार, यह फ़ैसला केंद्र को राज्यों के ढांचे को एकतरफ़ा बदलने का अधिकार देता है.
सांसद असदुद्दीन ओवैसी ने कहा कि इस फ़ैसले का असर ये होगा कि ‘चेन्नई, कोलकाता, हैदराबाद या मुंबई को केंद्र शासित प्रदेश बनाने में केंद्र सरकार के सामने कोई रोक टोक नहीं होगी.’
क़ानूनविदों का क्या कहना है?
संवैधानिक क़ानूनों के विशेषज्ञ अनुज भुवानिया ने कहा, “एक राज्य को केंद्र शासित प्रदेश में विभाजित करने के मुद्दे पर फ़ैसला न देना, यह पूरी तरह मुकरना है.”
वो कहते हैं कि अदालत, राज्य को दो केंद्र शासित प्रदेशों में विभाजित किए जाने के मसले को इसलिए तय करने से मुकर नहीं सकती क्योंकि केंद्र ने राज्य के दर्जे को बहाल करने का आश्वासन दिया है.
अनुज भुवानिया ने कहा, “चूंकि अनुच्छेद 3 में इस तरह लिखा गया है कि केंद्र सरकार नए राज्य बनाने और राज्य की सीमाओं को बदलने की एकतरफ़ा कार्रवाई कर सकती है, इसलिए अदालत इसकी इस तरह व्याख्या कर सकती थी कि इसका दुरुपयोग न हो.”
उनके मुताबिक, “पहले भी हमने देखा है कि अदालत ने ऐसे बुनियादी सैद्धांतिक ढांचे दिए हैं जो इस बात को तय करते हैं कि संसद किन संशोधनों को कर सकती है. इसी तरह की व्याख्या इस मामले में भी की जा सकती थी.”
उन्होंने कहा, “लेकिन अदालत ने ऐसा करना नहीं चुना.”
अंग्रेज़ी अख़बार द हिंदू के मुताबिक, यह फ़ैसला केंद्र को राष्ट्रपति शासन लागू करने और राज्य में बड़ा बदलाव करने का अधिकार देता है, जैसे संवैधानिक संशोधनों को मंज़ूर करना या अहम मामलों को वापस लेना.
वरिष्ठ वकील और क़ानूनविद् फ़ली नरीमन ने एक साक्षात्कार में बताया कि इस फ़ैसले के नतीजतन, भारत एक देश के तौर पर और केंद्रीकृत होता जा रहा है.
एक और क़ानूनी विशेषज्ञ आलोक प्रसन्ना ने इंडियन एक्सप्रेस में लिखा, “सुप्रीम कोर्ट के इस फ़ैसले का सीधा असर यह होगा कि केंद्र जब चाहे तो कोई भी कारण बताकर वो किसी भी राज्य को केंद्र शासित प्रदेश में बदल सकता है.”
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