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मीरवायज़ उमर फ़ारूक़ नज़रबंद या आज़ाद, मनोज सिन्हा के दावे की पड़ताल
- Author, कीर्ति दुबे
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
"आप जो आज देख रही हैं वही हक़ीकत है, आप बाहर से (कश्मीरी नहीं हैं) हैं तो आपने हिम्मत दिखाई और यहां तक आ गईं, यहां तो कोई पत्रकार आकर खड़ा भी नहीं हो सकता, मुझसे मिलना तो दूर की बात है."
शनिवार सुबह 11 बजकर 11 मिनट पर हुर्रियत कॉन्फ्रेंस के नेता मीरवायज़ उमर फ़ारूक़ ये बात अपने घर की एक छोटी सी खिड़की से चिल्लाकर कहते हैं. ये खिड़की इतनी भी बड़ी नहीं है कि इससे मीरवायज़ की शक्ल पूरी तरह नज़र आ सके.
जब मीरवायज़ खिड़की पर आकर अपनी बात कहते हैं और हम जब उसे रिकॉर्ड करना चाहते हैं तो यहां मौजूद पुलिस अधिकारी जबरन हमारा कैमरा बंद करवा देते हैं. मैं अपना फ़ोन निकालकर रिकॉर्ड करना चाहती हूं, मगर एक पुलिस अधिकारी मेरे हाथों से मेरा फ़ोन छीन लेते हैं.
जम्मू-कश्मीर के उप-राज्यपाल मनोज सिन्हा ने हाल ही में बीबीसी को दिए एक इंटरव्यू में कहा था कि मीरवायज़ उमर फ़ारूक़ न तो नज़रबंद हैं, न ही बंद हैं. इसके बाद हुर्रियत कॉन्फ़्रेंस ने बयान जारी करके उस दावे को ग़लत बताया था.
उप-राज्यपाल मनोज सिन्हा ने क्या कहा था?
शुक्रवार को बीबीसी ने उप-राज्यपाल मनोज सिन्हा का एक इंटरव्यू प्रसारित किया जिसमें उनसे ये सवाल पूछा गया कि आख़िर मीरवायज़ उमर फ़ारूक़ अब तक नज़रबंद क्यों हैं?
इसके जवाब में सिन्हा ने कहा, ''उन्हें बंद नहीं रखा गया है,अगर आप थोड़ा पीछे जाएंगे तो आपको मालूम हो कि उनके पिता जी की दुर्भाग्यपूर्ण तरीक़े से हत्या कर दी गई थी. उनके अगल-बगल हम पुलिस को रखते हैं ताकि वह सुरक्षित रहें, हमारी ओर से ना वो नज़रबंद हैं और ना ही बंद हैं."
"मैं बड़ी ज़िम्मेदारी के साथ ये बात कह रहा हूं कि वह कहीं भी आने-जाने के लिए पूरी तरह स्वतंत्र हैं. उन्हें कहीं नहीं रोका गया है. यहां कुछ वक्त पहले ऐसी दो हत्याएं हुईं जो पाकिस्तान ने कराई लेकिन आईएसआई ने कहा भारत सरकार ने कराई, ऐसा कुछ ना हो इसलिए हमने सुरक्षा लगाई है और ये सुरक्षा उनके घर के बाहर नहीं है बल्कि उस इलाके में है ताकि वह जब घर के बाहर कहीं जाएं तो उनके पास सुरक्षा रहे.''
इसके बाद हुर्रियत कॉन्फ़्रेंस ने बयान जारी करके कहा था, "अगर मीरवायज़ उमर फ़ारूक़ ग़ैर-क़ानूनी रूप से नज़रबंद नहीं हैं, तो उन्हें 26 अगस्त को शुक्रवार की तक़रीर की अनुमति दी जाए." हुर्रियत ने मनोज सिन्हा पर जान-बूझकर ग़लत जानकारी फैलाने का आरोप लगाया.
हक़ीक़त जानने बीबीसी की टीम शुक्रवार की रात साढ़े आठ बजे श्रीनगर के दरगाह इलाके में स्थित मीरवायज़ उमर फ़ारूक़ के घर पहुंची, यहां तैनात एक पुलिसकर्मी ने कहा कि मुलाकात दिन में हो सकती है.
'ये लड़की दिल्ली से आई है, उल्टे सवाल कर रही है'
शनिवार सुबह 10.30 बजे हम फिर मीरवाइज़ के घर के बाहर खड़े हैं. यहां उनके घर के ठीक सामने फ़ौज की एक बख़्तरबंद गाड़ी खड़ी है. सीआरपीएफ़ के 4-5 जवान तैनात हैं, जम्मू-कश्मीर पुलिस के 2-3 नुमाइंदे खड़े हैं. हमें गाड़ी से उतरता देख एक पुलिस वाला हमारी ओर बढ़ता है और पूछता है- "आपको किससे मिलना है?"
हम बताते हैं कि हम मीरवायज़ उमर फ़ारूक़ से मिलना चाहते हैं, ये कह कर जब हम भूरे रंग के मेन गेट की ओर बढ़ते हैं तो हमसे रुकने को कहा जाता हैं, मैं सवाल करती हूं कि मुझे यहां रोकने की वजह क्या है? इसके बाद वह पुलिसकर्मी अपने अधिकारी को फ़ोन लगाता है और कश्मीरी में कहता है- ''ये लड़की दिल्ली से आई है और मुझसे उल्टे सवाल कर रही है, आप आ जाएं.''
अगले 2 से 3 मिनट में नगीन थाना, जिसके अंतर्गत ये इलाका आता है उसके एसएचओ वहां आते हैं और कहते हैं, ''आप ही कीर्ति दुबे हैं आपसे मेरी कल रात बात हुई थी.'' इसके जवाब में मैंने कहा कि आज आने का समय आपने ही दिया था. इसके बाद हमसे कहा जाता है कि 'ऊपर से इज़ाजत लेनी पड़ेगी.'
हमने बीबीसी के इंटरव्यू का ज़िक्र करते हुए कहा कि लेफ़्टिनेंट गवर्नर मनोज सिन्हा ने कहा है कि मीरवायज़ किसी से भी मिल सकते हैं तो आख़िर किसकी इजाज़त चाहिए? इसके जवाब में एसएचओ हमसे कहते हैं कि पास में ही थाना है आप वहां चलें चाय पीएं, आप ख़ामखां इस धूप में खड़ी हैं. जब हम थाने जाने से इनकार कर देते हैं तो हमें 15 मिनट और इंतज़ार करने को कहा जाता है. इस दौरान मेरे ड्राइवर और कैमरा सहयोगी से कश्मीरी में एसएचओ कहते रहते हैं कि वे मुझे थाने लेकर जाएं.
लगभग 15 मिनट बाद उस इलाके के डिप्टी सुपरिटेंडेंट ऑफ़ पुलिस हमारे पास आते हैं. वह कहते हैं कि ''मीरवायज़ नज़रबंद नहीं हैं लेकिन आप अभी अंदर नहीं जा सकतीं, सवाल पूछने पर वो कहते हैं आप आईजी से इजाज़त ले लें तो हम आपको जाने देंगे.''
'आप जो देख रही हैं ये एलजी के दावे की सच्चाई है'
इस बीच घर के भीतर से एक शख़्स बाहर आता है और मैं उससे कहती हूं कि वो अंदर मीरवायज़ उमर फ़ारूक़ को इस बात की जानकारी दे दें कि हम गेट पर हैं. ये सब कुछ होते हुए 45 मिनट बीत चुके हैं.
इस बीच गेट के दूसरे कोने से आवाज़ आती है- "यू आर सीइंग द रिएलिटी" यानी "आप जो देख रही हैं वही हक़ीक़त है."
ये बात मीरवायज़ गेट के पास एक लाल रंग की दीवार में लगी छोटी सी ग्रिल वाली खिड़की से चिल्लाकर कह रहे हैं.
मीरवायज़ ने भूरे रंग की टोपी पहनी है जिसकी किनारी पर बादामी रंग के धागे से फूलों की कश्मीरी कढ़ाई है. तीन सालों बाद पहली बार मीरवायज़ मीडिया के कैमरे के सामने हैं लेकिन हम रिकॉर्ड नहीं कर सकते थे. मेरे पीछे मौजूद पुलिसकर्मी चिल्लाकर कहते हैं- ''अरे हम इन्हें अंदर ला ही रहे थे आप यहां क्यों आए?''
मैंने मीरवायज़ से पूछा- "आपको लेकर मनोज सिन्हा ने ये दावा किया है कि आप लोगों से मिलने के लिए आज़ाद हैं और नज़रबंद नहीं हैं."
मीरवायज़ कहते हैं, ''जो हालात आप देख रही हैं यही हक़ीक़त है. अगर मैं आज़ाद हूं तो मुझे आपसे मिलने क्यों नहीं दिया जा रहा. मैं किसी से नहीं मिल सकता, अपने परिवार को छोड़कर. आपने हिम्मत की और क्योंकि आप कश्मीरी नहीं हैं तो आप यहां खड़े होकर सवाल पूछ पा रही हैं. आप देखिए आपके ही कैमरा पर्सन जो कश्मीरी हैं उन्हें कैसे आगे बढ़ने से रोके रखा है. मैं चाहता हूं कि दुनिया देखे कि कैसे उप-राज्यपाल जिस बात को पूरी ज़िम्मेदारी के साथ कह रहे हैं. उसकी सच्चाई क्या है, वो झूठ है.''
वह कहते हैं, ''मैं तो चाहता हूं आप अंदर आएं, बात करें और चाय पिएँ लेकिन आप देख रही हैं मैं कुछ नहीं कर सकता.'' ये कह कर वो खिड़की से हट जाते हैं.
मीरवायज़ से मिलने की संभावना नहीं देखकर हम वहाँ से लौटे.
इसके बाद हमने उप-राज्यपाल मनोज सिन्हा के मीडिया एडवाइज़र यतीश यादव से संपर्क करके उन्हें हालात के बारे में बताना चाहा. उनसे बात नहीं हो सकने पर उन्हें मैसेज भेजा मगर ये स्टोरी लिखने तक कोई जवाब नहीं मिला था.
मीरवायज़ ने बीबीसी को किया फ़ोन कॉल
लगभग दोपहर डेढ़ बजे मीरवायज़ उमर फ़ारूक ने मुझे कॉल किया.
उन्होंने कहा, ''आपके सामने हक़ीक़त है जो दुनिया के सामने नहीं आने दी जाएगी. जो दावे मुझे लेकर आपके चैनल पर किए गए वो झूठ हैं. मुझे अपनी मस्जिद में जाकर नमाज़ पढ़ने की इजाज़त नहीं है.''
अगर मीरवायज़ पर इतनी पाबंदियां हैं, वो अपने ही घर में नज़रबंद हैं और बीबीसी को दिए गए इंटरव्यू में उप-राज्यपाल मनोज सिन्हा का उन्हें लेकर किया गया दावा ग़लत है तो आख़िर वो ख़ुद का एक बयान वीडियो के ज़रिए अपने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म से क्यों नहीं जारी कर रहे हैं? मेरे इस सवाल का सीधा जवाब मीरवाइज़ नहीं देते.
वो कहते हैं, "आपने देखा होगा हुर्रियत ने ट्विटर पर बयान जारी किया. हमने तो प्रतिक्रिया दी है. कश्मीर में सब डरे हुए हैं.''
हमने कई बार ये सवाल दोहराया. फिर उनसे पूछा कि क्या उन्हें डर है कि वीडियो के ज़रिए बयान जारी करने पर उनकी परेशानियां बढ़ सकती हैं? इस बार हमें जवाब मिला, ''मैं अपने साथियों से, हुर्रियत के लोगों से नहीं मिल सकता. यहां के कश्मीरी जर्नलिस्ट्स का डर मैं समझता हूं वो नहीं लिख सकते लेकिन आप शायद ये बता सकती हैं, जो आपने देखा.''
जिस तरह बीबीसी से मीरवायज़ को बात करने से रोका गया, उसे उन्होंने भी देखा तो क्या अब मीरवायज़ कोई बयान जारी करेंगे? इस सवाल पर वह कहते हैं- ''मैं देखता हूं, मैं अपनी ओर से क्या कर सकता हूं.''
कौन हैं मीरवायज़ उमर फ़ारूक़
मीरवायज़ उमर फ़ारूक़ अलगाववादी विचार रखने वाले 26 संगठनों के संघ ऑल पार्टी हुर्रियत कॉन्फ्रेंस के अध्यक्ष हैं. हुर्रियत कॉन्फ्रेंस में कुछ प्रतिबंधित संगठन भी शामिल हैं.
हुर्रियत कॉन्फ्रेंस को मीरवायज़ उमर फ़ारूक़ के दिमाग की ही उपज माना जाता है.
1992 में जब कश्मीर में चरमपंथ का प्रभाव बहुत अधिक था तब अलगाववादियों ने सशस्त्र संघर्ष को मदद देने के लिए एक राजनीतिक मंच बनाने का विचार किया ताकि कश्मीर मसले का हल निकल सके.
तब 31 जुलाई, 1993 को अलग-अलग विचार वाले कई अलगाववादी राजनीतिक, सामाजिक और धार्मिक दल इकट्ठा हुए जो मानते थे कि कश्मीर पर कब्ज़ा किया गया है. कई महीनों के विचार-विमर्श के बाद हुर्रियत कांफ्रेंस का गठन किया गया.
इसका संविधान कहता है कि ये राजनीतिक, सामाजिक और धार्मिक दलों का संघ है जो कश्मीर विवाद को सुलझाने के लिए शांतिपूर्ण संघर्ष की बात करता है.
वर्ष 1990 में जब मीरवायज़ 17 साल के थे तब उनके पिता मीरवायज़ मोहम्मद फ़ारूक़ की हत्या हो गई थी. पिता की मृत्यु के बाद उमर फ़ारूक़ को मीरवायज़ (प्रमुख मौलवी) की पदवी दी गई थी. वह घाटी के प्रमुख धार्मिक नेता हैं.
इसके दो साल बाद ही मीरवायज़ उमर फ़ारूक़ ने अलगाववादी संगठनों को एक ही मंच पर लाने का काम किया था. इसमें मीरवायज़ के नेतृत्व वाली आवामी एक्शन कमेटी भी शामिल हुई.
1990 की शुरुआत में हुर्रियत कॉन्फ्रेंस का घाटी में काफ़ी प्रभाव रहा. उस दौरान राष्ट्रपति शासन के कारण मुख्यधारा की राजनीतिक पार्टियां किनारे हो गई थीं. लेकिन, आगे चलकर सशस्त्र संघर्ष और भारत सरकार से शांतिपूर्ण बातचीत को लेकर हुर्रियत कॉन्फ्रेंस में मतभेद पैदा हो गए. इसके उदार और कट्टर दो धड़े बन गए.
उदार धड़े का नेतृत्व मीरवायज़ उमर फ़ारूक़, मसर्रत आलम भट्ट और अब्दुल ग़नी लोन कर रहे थे. कट्टर धड़े का नेतृत्व सैयद अली शाह गिलानी कर रहे थे. इसके प्रमुख सदस्य यासीन मलिक जम्मू-कश्मीर लिबरेशन फ्रंट के नेता बन गए.
जम्मू-कश्मीर से धारा 370 हटने के बाद हुर्रियत कॉन्फ्रेंस के दोनों धड़ों पर गैरक़ानूनी गतिविधियां (रोकथाम) अधिनियम (यूएपीए) के तहत प्रतिबंध लगाने की चर्चा भी हुई थी. इसके नेताओं पर जम्मू-कश्मीर में आतंकी फंडिंग करने का आरोप था. मीरवायज़ उमर फ़ारूक़ से आंतकी फंडिंग मामले में राष्ट्रीय जांच एजेंसी पूछताछ कर चुकी है. उनके घर पर छापेमारी भी हो चुकी है.
2019 में हुए नज़रबंद
पांच अगस्त 2019 को भारत सरकार ने धारा 370 हटाकर जम्मू-कश्मीर का विशेष दर्जा ख़त्म कर दिया था. इस फ़ैसले से पहले जम्मू-कश्मीर के कई अलगाववादी और मुख्यधारा के नेताओं को नज़रबंद किया गया था जिनमें मीरवायज़ भी शामिल थे.
उनके अलावा राज्य के पूर्व मुख्यमंत्री फ़ारूक़ अब्दुल्ला, उमर अब्दुल्ला, महबूबा मुफ़्ती और पीपल्स कॉन्फ्रेंस के नेता सज्जाद लोन भी शामिल थे.
क़रीब 19 महीनों बाद मार्च 2021 में मीरवायज़ उमर फ़ारूक़ को भी रिहा कर दिया गया था.
अंग्रेज़ी अख़बार टाइम्स ऑफ़ इंडिया के मुताबिक उन्होंने कहा था, ''मैं ये जानकर खुश हूं कि मैं एक आज़ाद शख़्स हूं. मैं ड्रग्स की लत के ख़िलाफ़ अभियान शुरू करूंगा.''
लेकिन, इसके कुछ समय बाद ही उन्होंने दावा किया था कि उन्हें फिर से नज़रबंद कर दिया गया है. हुर्रियत कॉन्फ्रेंस ने बयान दिया था कि प्रशासन ने अपना फ़ैसला वापस लेते हुए उन पर फिर से प्रतिबंध लगा दिए हैं. हालांकि, प्रशासन इस बात से इनकार करता है.
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