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क्यों पैदा होता है अलगाववाद और क्यों उठती है अलग देश की मांग?
- Author, आदर्श राठौर
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
साल 2017 में स्पेन का कैटलोनिया प्रांत और इराकी कुर्दिस्तान स्वतंत्रता की मांग के कारण चर्चा में रहे. कैटलोनिया प्रांत के नेताओं ने तो खुद ही जनमतसंग्रह करवाकर स्पेन से आज़ाद होने की एकतरफा घोषणा कर दी मगर स्पेन ने उसे अलग होने नहीं दिया.
यह घटनाक्रम पूरी दुनिया के लिए अहम था क्योंकि कई देशों के अंदर अलग राष्ट्र की मांग उठती रही है. कहीं पर ऐसी मांग करने वालों को ताकत के दम पर दबाया जाता है तो कहीं स्वायत्ता और अधिकार देकर मनाया जाता है.
मगर अलग देश की मांग नई नहीं है. पिछले कई सालों से दुनिया के कई हिस्सों में लोग अपने लिए नए और स्वतंत्र देश की मांग कर रहे हैं.
कश्मीरी, बलोच, पख़्तून और इराक़ी कुर्द लंबे समय से अपने लिए अलग राष्ट्र की मांग कर रहे हैं. श्रीलंका में भी कई सालों तक तमिल देश के लिए हिंसक संघर्ष चला.
यूक्रेन के पूर्वी हिस्से में लोग अपने लिए अलग मुल्क चाहते हैं, चेचेन्या में भी अलग देश की मांग कायम है. यूरोप की बात करें तो कैटलोनिया ही आज़ादी नहीं चाहता, स्कॉटलैंड में भी बड़ा तबका ग्रेट ब्रिटेन से अलग होने की भावना रखता है.
विकसित देशों में आर्थिक कारण अहम
कौन से कारण हैं जिनके चलते लोग हर हाल में अपने लिए अलग राष्ट्र चाहते हैं? क्या वजह है अलगाववाद पनपने की? यूरोपीय राजनीति पर क़रीबी नज़र रखने वाले अंतरराष्ट्रीय मामलों के विशेषज्ञ प्रोफेसर हर्ष पंत बताते हैं कि विकसित और विकासशील देशों में अलगाववाद के उभार की वजहें अलग-अलग हैं.
वह कहते हैं, "अलगाववादी आंदोलनों को देखें तो एक समुदाय महसूस करता है कि उसकी पहचान को बचाया नहीं जा रहा. विकसित और विकासशील देशों में चलने वाले अलगाववादी आंदोलनों में फर्क है. विकसित देशों में आर्थिक मामलों को लेकर ज्यादा नाराज़गी होती है. जैसे कैटलोनिया में मुद्दा है कि जितना आर्थिक योगदान हम पूरे स्पेन को देते हैं, उतना हमें वापस नहीं मिलता."
प्रोफ़ेसर हर्ष पंत का कहना है कि विकासशील देशों में अलगाववादी आंदोलन के कारण पहचान से जुड़े हुए होते हैं जबकि विकसित देशों में पहचान के साथ-साथ आर्थिक भी होते हैं.
वह बताते हैं, "ब्रिटेन और स्पेन पिछले कुछ दशकों में विकसित देशों की कतार में हैं मगर अब यहां आर्थिक स्थिरता आ रही है, इसलिए ऐसे संकट उभर रहे हैं."
'उपनिवेशवाद तक जाती हैं अलगाववाद की जड़ें'
यूरोप से बाहर निकलें तो अलगाववादी विचारधारा के उभार के कारण भी बदल जाते हैं. यहां अलगाववाद का कारण पहचान से जुड़ा हुआ है. अंतरराष्ट्रीय मामलों के जानकार प्रोफ़ेसर पुष्पेश पंत बताते हैं कि बहुत से इलाकों में अलगाववाद की जड़ें उपनिवेशवाद के दौर तक जाती हैं.
वह कहते हैं, "इसकी जड़ें उपनिवेशवाद के दौर तक जाती हैं, जब यूरोप की महाशक्तियों ने कई जगहों पर कब्जा किया था. इन्होंने संपत्ति का बंटवारा किया तो उसमें कई ऐसे राजनीतिक मानचित्र बने, जिन्होंने एक परिवार, कबीले, भाषा बोलने वालों को अलग करके ऐसे हिस्सों में मिला दिया जो कुदरती तौर पर एक नहीं थे.''
"टेक्नॉलजी से पहले प्राकृतिक बाधाओं के कारण इलाके बंधे हुए थे और उन इलाकों की सांस्कृतिक विरासत एक सी थी. इन प्राकृतिक मानचित्रों को राजनीतिक मानचित्र में बदल दिया गया. मगर जब आजादी की लड़ाई लड़ी गई, तब लोगों को अपनी पहली वाली पहचान का अहसास हुआ. इस आज़ादी में इनके मन में आत्मनिर्णय की ललक बढ़ने लगी."
प्रोफ़ेसर पुष्पेश पंत बताते हैं, "जब आप पुराने साम्राज्यों की चर्चा करते हैं तो जिन राज्यों का उदय साम्राज्यवाद के विलय के बाद हुआ, उन्हें एक इकाई मान लेते हैं. भारत के संदर्भ में कहा जाता है कि विदेशी शासकों ने फूट डालो और शासन करो के आधार पर शासन किया. कहीं पर धर्म का भेदभाव था, कहीं पर भाषा का था. साम्राज्यवाद के दौर में हमारी सामाजिक संरचना की संस्थाएं नष्ट हो गईं. धर्मनिरपेक्षता के आधार पर धार्मिक नैतिक मूल्यों की एकता नष्ट हुई. आज जो हम देख रहे हैं, वह समुद्रमंथन है. अब एक ऐसी पीढ़ी बड़ी हो गई है जो भूमंडलीकरण के दौर पर राष्ट्र की सीमाओं को नहीं मानती. मगर एक तरफ तो वह भूमंडलीकरण की भी पक्षधर है, वहीं अपनी स्थानीय पहचान भी चाहती है. इसी कारण असंतोष, आक्रोष और असमंजस का माहौल हर तरफ देखना पड़ रहा है."
क्या हैं संयुक्त राष्ट्र के नियम?
विस्तारवाद, यानी कब्जा करने की नीति. ताकत के दम पर ज्यादा से ज्यादा बड़े इलाके पर कब्जा करके शासन चलाने का चलन नया नहीं है. यूनान के सिकंदर महान, मंगोलिया के चंगेज़ खऱान और मध्य एशिया के तैमूर लंग से लेकर बीसवीं सदी तक विस्तारवाद ने कई बार दुनिया का राजनीतिक नक्शा बदला.
लंदन स्कूल ऑफ इकनॉमिक्स में अंतरराष्ट्रीय क़ानून के विशेषज्ञ डॉक्टर जेम्स इर्विंग बताते हैं कि दो विश्वयुद्धों में जानमाल के भारी नुकसान के बाद दुनिया के देशों को लगा कि इस विस्तारवाद पर रोक लगने के लिए कुछ सिद्धांत बनने चाहिए.
दूसरे विश्व युद्ध के बाद ऐसा महसूस किया गया कि लोगों को आत्मनिर्णय का अधिकार होना चाहिए. यह सभी को न्याय देने के लिए जरूरी था. इसे शुरू में यूएन चार्टर में भी डाला गया था. उस वक्त लोगों को लगा होगा कि यह तो काफी अच्छा विचार है. मगर इसके मायने क्या होंगे, इसे लेकर ज्यादा सहमति नहीं बन पाई.
1945 में संयुक्त राष्ट्र संघ की स्थापना जिन सिद्धांतों पर हुई, उनमें आत्मनिर्णय का अधिकार भी शामिल था. मगर आज स्थिति क्या है?
अलगाववादी आंदोलन
दुनिया के विभिन्न हिस्सों में चल रहे अलगाववादी आंदोलनों को लेकर संयुक्त राष्ट्र के किसी नियम का पालन किया जाता है? पुष्पेश पंत कहते हैं कि आत्मणनिर्ण को लेकर कोई कानून हो ही नहीं सकता.
वह बताते हैं, "संयुक्त राष्ट्र का चार्टर है मगर इसमें दोहरे मापदंड अपनाए जाते रहे हैं. जहां-जहां ताकतवर महाशक्तियां वीटो इस्तेमाल कर सकती थीं., उन्होंने वीटो भी इस्तेमाल किया. उलझी गुत्थी थी दूसरे विश्वयुद्ध के बाद फिलिस्तीन और इजरायल के कृत्रिम निर्माण के बाद थी. सब जगह ऐसे आंदोलन चलते रहे हैं. संघर्षत आंदोलन जो चल रहे थे उन्हें रूस से मदद मिलती थी. आत्मनिर्णय का अधिकार क्या बांग्लादेश को पाकिस्तान ने दिया था?"
वो कहते हैं, "असली सवाल यह है कि आप कितनी छोटी इकाई को आत्मनिर्णय को अधिकार मिलना चाहिए? तिब्बतियों, रोहिंग्या, उइगर को क्यों नहीं मिलना चाहिए? तुर्की, ईरान और इराक के बीच कुर्द हैं. सब जगह हैं भाषाई, कबाइली, नस्ली या सरहद पर बसने वाले लोगों के लिए भी समस्या है."
अंतरराष्ट्रीय समुदाय के दोहरे मापदंड
भले ही बहुत से मामलों में संयुक्त राष्ट्र और दुनिया के देश दखल नहीं देते, मगर कुछ मामलों में इनका हस्तक्षेप रहता है. उदाहरण के लिए सर्बिया के कोसोवो इलाक़े ने अलग देश की मांग की थी.
सर्बिया ने इस आवाज़ को दबाने की कोशिश की तो संयुक्त राष्ट्र और नैटो की अगुवाई में सेनाएं, कोसोवो की मदद करने पहुंच गईं. अंतरराष्ट्रीय मामलों के जानकार प्रोफ़ेसर एसडी मुनि कहते हैं कि यह भी एक कारण है जिससे अलगाववाद की भावना को उकसावा मिलता है.
वह बताते हैं, "अंतरराष्ट्रीय राजनीति में नया सूत्र उभरकर आया है कि आप अपने देश के लोगों से भी बराबरी से व्यवहार नहीं करेंगे तो अंतरराष्ट्रीय समुदाय उसमें हस्तक्षेप कर सकता है. अगर आप अपने लोगों को निशाना बनाएंगे, तो संयुक्त राष्ट्र आ सकता है. इससे उन लोगों को उकसावा भी मिला है जिन्हें लगता है हमारे साथ ज्यादती हुई तो यूएन से समर्थन मिल सकता है."
पिछले कुछ दशकों से अलिखित नियम सा बन गया है कि आप बहुत कम ही मौकों पर दूसरे देश की संप्रभुता को चुनौती देते हैं. पिछले कुछ दशकों में बहुत कम देश उभरकर आए हैं जिन्होंने हिंसक आंदोलन से नया देश बनाया क्योंकि कोई देश इसे मान्यता नहीं देता क्योंकि इसमें उन देशों का हित है ताकि कल को उन्हें दिक्कत न हो. मगर कई देश हैं जो इसे नहीं मानते.
प्रोफेसर एसडी मुनि कहते हैं, "अंतरराष्ट्रीय समुदाय भी अपने हितों को देखते हुए फैसला करते हैं. यूएन चार्टर में क्या लिखा है, क्या नहीं, यह मायने नहीं रखता. आखिरकार ऐसे प्रश्न का जवाब यही होता है कि ऐसा होने पर मेरा हित क्या है. कहां पर क्या किया जाना है, ये फैसले लिए जाते हैं. नैतिक मूल्यों और मान्यताओं की आड़ लेकर अपना नफा-नुकसान देखा जाता है."
बावजूद इसके, इन एक दूसरे की संप्रभुता का सम्मान करने के इन अलिखित नियमों पर राजनीति हावी हो जाती है. कई बार ऐसा भी होता है कि संबंध अच्छे न होने पर देश एक-दूसरे के यहां अलगाववादी ताकतों के उभरने पर उन ताकतों के समर्थन की कोशिश करते हैं.
प्रोफ़ेसर हर्ष पंत कहते हैं, "उदाहरण के लिए यूक्रेन में रूस ने अलगाववादी ताकतों की मदद से क्रीमिया को अलग कर दिया, जैसे पाकिस्तान ने कश्मीर में अलगाववादी ताकतों को समर्थन दिया, उत्तर पूर्व में चीन का रोल रहा. शीत युद्ध के दौरान दोनों देश एक-दूसरे के पड़ोसी देशों में और सहयोगी देशों में अलगाववादी शक्तियों को बढ़ावा देते थे."
क्या कभी अलगाववाद खत्म होगा?
लेकिन भविष्य क्या है? क्या कभी ऐसा भी होगा कि अलगाववाद की भावना खत्म हो जाएगी? क्या कोई ऐसा रास्ता है कि सभी को संतुष्ट किया जा सके?
पुष्पेश पंत कहते हैं, "राष्ट्र की बात करें तो कोई न कोई जनतांत्रिक बहुमत होता है जो अपनी इच्छा थोपता है. भारत के संदर्भ में मेजॉरिटेरियन बाती होती है. मगर दुनिया में कौन सा देश ऐसा है जिसने अमरीका समेत जिसमें गोरे अमेरिकी प्रोस्टेटों ने अपनी छाप छोड़ने की कोशिश न की हो, या लिंगभेदी पुरुषवादी मानसिकता न रही हो."
वो कहते हैं, "मुझे लगता है कि अलगाववाद बना रहेगा संसार में हमेशा, क्योंकि हमारी नस्लें एक नहीं हैं, भाषाएं एक नहीं हैं, धर्म एक नहीं है, राष्ट्र-राज्य के हित एक नहीं हैं. राष्ट्र राज्य की इकाई अपने राष्ट्रहित को तर्कसंगत साबित करने के लिए बहुमत का सहारा लेती है और अल्पमत की आकांक्षाओं को उल्लंघन और दमन होता रहता है."
"यूरोप में 60-70 के दशक में कई अलगाववादी आंदोलन थे, मगर वे वक्त के साथ कुंद पड़ गए थे. मगर जिस तरह से पिछले अचानक कैटलोनिया का मुद्दा उभरा, उससे लगता है कि इस साल यूरोप में कई इलाकों के केंद्रीय सरकारों से झगड़े उभरकर सामने आ सकते हैं."
जानकार मानते हैं कि आर्थिक मंदी का यूरोप के कई देशों पर असर पड़ रहा है और इससे अलगाववादी ताकतों को नया अवसर मिल रहा है. इसी तरह दक्षिण पूर्व एशिया में रोहिंग्या संकट को लेकर भी पूरी दुनिया की नजरें म्यांमार पर होगी कि वह रखाइन प्रांत को लोकतांत्रिक ढंग से मुख्य धारा में ला पाएगा या नहीं.
श्रीलंका में तमिल समुदाय को मुख्य धारा में लाने की कोशिशों की रफ्तार कम हो गई है, नेपाल में मधेसी समुदाय की नाराज़गी दूर करने की चुनौती नई सरकार पर होगी और साथ ही भारत में कश्मीर के मुद्दे पर भी सबकी निगाहें रहेंगी, जिससे पाकिस्तान जुड़ा हुआ है.
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