बांग्लादेश की सियासी हलचल पर क्या कह रहा है चीन का सरकारी मीडिया

बांग्लादेश की संसद की सफ़ाई करते छात्र

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इमेज कैप्शन, बांग्लादेश के हालात पर चीन ने सधी प्रतिक्रिया दी है

बांग्लादेश में 5 अगस्त को चीज़ें इतनी तेज़ी से बदलीं कि देश की सबसे लंबे समय तक प्रधानमंत्री रहीं शेख़ हसीना को पद से इस्तीफ़ा देने के बाद देश छोड़कर चली गईं.

आरक्षण के मुद्दे पर बांग्लादेश में छात्रों का आंदोलन कई हफ़्तों से चल रहा था. लेकिन सोमवार को ये इस कदर बेकाबू हुआ कि देश में सत्ता ही बदल गई.

बांग्लादेश में अंतरिम सरकार के गठन की हलचल तेज़ है लेकिन उसकी सियासी उठा-पटक ने पड़ोसी देशों की भी बेचैनी बढ़ा दी है.

शेख़ हसीना बांग्लादेश से सीधे भारत पहुंचीं, जिसकी जानकारी विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने मंगलवार को संसद में दी.

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वहीं बांग्लादेश के मुद्दे पर चीन की सरकार की तरफ़ से भी एकदम सधी प्रतिक्रिया देखने को मिली.

चीन ने कहा है कि वह बांग्लादेश के घटनाक्रम पर क़रीबी नज़र बनाए हुए हैं.

बांग्लादेश को लेकर चीन में क्या कहा जा रहा है?

चीन की सरकारी मीडिया शिन्हुआ ने लिखा है कि चीन के विदेश मंत्रालय ने मंगलवार को ये उम्मीद जताई है कि बांग्लादेश में जल्द शांति और स्थिरता बहाल होगी.

शेख़ हसीना के इस्तीफ़े पर पूछे गए सवाल के जवाब में चीन के विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता ने कहा, "बांग्लादेश के घटनाक्रम पर चीन क़रीबी नज़र बनाए हुए हैं. बांग्लादेश के पड़ोसी, दोस्त और रणनीतिक सहयोगी होने के नाते चीन ये उम्मीद करता है कि वहां जल्द ही शांति बहाल होगी."

चीन के सरकारी अख़बार ग्लोबल टाइम्स ने अपने एक आर्टिकल में लिखा है कि छात्रों का आंदोलन केवल राजनीतिक मंशा से प्रेरित नहीं था बल्कि इसके पीछे मज़बूत आर्थिक वजहें भी थीं.

शंघाई इंस्टिट्यूट्स फॉर इंटरनेशनल स्टडीज़ के सेंटर फॉर साउथ एशिया स्टडीज़ की डायरेक्टर लियु ज़ोंगई ने ग्लोबल टाइम्स से कहा, "बांग्लादेश दुनिया की सबसे बड़ी आबादी वाले देशों में से एक है. यहां क़रीब 17 करोड़ लोग रहते हैं, जिनमें से बड़ी संख्या में युवाओं को नौकरी की तलाश है."

वह कहती हैं, "महंगाई और आर्थिक समस्याओं ने शायद विरोध को ज़्यादा हवा दी. लेकिन सरकारी नौकरी में कोटा व्यवस्था ख़त्म करने के बावजूद स्थिति सामान्य होने की बजाय ये प्रदर्शन राजनीतिक आंदोलन में तब्दील हो गया."

भारत वाले एंगल पर चीन के अख़बार में क्या छपा है?

शेख हसीना जुलाई के महीने में चीन की यात्रा पर थीं.

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फ़ुदान यूनिवर्सिटी के सेंटर फॉर साउथ एशियन स्डडीज़ की डिप्टी डायरेक्टर लिन मिनवांग ने ग्लोबल टाइम्स अख़बार से कहा है कि बांग्लादेश में ठोस आर्थिक वजहों से प्रदर्शन शुरू हुए थे.

उनका कहना है कि इसके पीछे कोई राजनीतिक मक़सद नहीं था.

ग्लोबल टाइम्स ने लिखा है कि मंगलवार को भारत के विदेश मंत्री एस जयशंकर ने एक सर्वदलीय बैठक में कहा है कि भारत ने शेख़ हसीना को हर संभव मदद देने का वादा दिया है.

अख़बार लिखता है कि भारत की समाचार एजेंसी पीटीआई के मुताबिक़ एस जयशंकर ने शेख़ हसीना को भविष्य के लिए फ़ैसला लेना का वक़्त दिया है.

ग्लोबल टाइम्स ने शेख़ हसीना को लेकर भारत की कुछ मीडिया रिपोर्ट्स का भी ज़िक्र किया है.

बांग्लादेश में महीने भर से चल रहे विरोध प्रदर्शनों ने दुनिया का ध्यान खींचा है. सोमवार को व्हाइट हाउस और अमेरिकी विदेश विभाग ने बांग्लादेश में अलग-अलग पार्टियों से हिंसा से दूर रहने और जल्द से जल्द शांति बहाल करने का आग्रह किया था.

मीडिया रिपोर्टों के मुताबिक़ यूरोपीय संघ ने भी "व्यवस्थित और शांतिपूर्ण" तरीके़ से सत्ता हस्तांतरण की अपील की है.

चीन-बांग्लादेश के रिश्ते

शेख हसीना जुलाई के महीने में चीन की यात्रा पर थीं.

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इमेज कैप्शन, शेख़ हसीना और शी जिनपिंग (फ़ाइल फ़ोटो)

इस साल जनवरी में लगातार चौथी बार सरकार के प्रमुख के रूप में कार्यभार संभालने के बाद जुलाई में शेख़ हसीना चीन के दौरे पर गई थीं.

इससे पहले शेख़ हसीना द्विपक्षीय दौरे पर जून में भारत आई थीं.

भारत सरकार के साथ उन्होंने रेल यातायात समेत कई अलग-अलग मुद्दों पर क़रीब 10 समझौतों पर हस्ताक्षर किए.

चीन ने पिछले 15 सालों में बांग्लादेश में कई बड़ी परियोजनाओं के लिए क़र्ज़ देने के साथ ही उनमें अहम भूमिका भी निभाई है.

बहुचर्चित पद्मा ब्रिज के बुनियादी ढांचे के निर्माण और कर्णफुली सुरंग के निर्माण के बाद, चीन की ‘तीस्ता' परियोजना में भी दिलचस्पी रही है.

इसके अलावा पद्मा ब्रिज पर रेलवे लाइन, कर्णफुली नदी के नीचे से गुज़रने वाली टनल, ढाका में बस रैपिड ट्रांज़िट परियोजना सहित कई बड़े प्रोजेक्ट्स के लिए चीन ने क़र्ज़ देकर बांग्लादेश की आर्थिक मदद की है.

दरअसल चीन उन मुल्कों में है जिन्होंने बांग्लादेश को सबसे ज़्यादा क़र्ज़ दिया है.

बांग्लादेश के वित्त मंत्रालय के आर्थिक संबंध विभाग के आंकड़ों के मुताबिक़ बीते चार साल में अकेले चीन ने बांग्लादेश को क़रीब तीन अरब अमेरिकी डॉलर का क़र्ज़ दिया है.

अमेरिकन एंटरप्राइज़ इंस्टीट्यूट के अनुसार, चीन के साथ बांग्लादेश का सालाना द्विपक्षीय व्यापार लगभग 23 अरब अमेरिकी डॉलर तक पहुंच गया है.

बांग्लादेश के केंद्रीय बैंक के मुताबिक़ पिछले एक दशक में चीन से बांग्लादेश के आयात में क़रीब तीन गुना बढ़ोतरी हुई है.

बैंक के आंकड़ों के मुताबिक़, वित्त वर्ष 2012-13 में चीन से सालाना सामान का आयात क़रीब 650 करोड़ अमेरिकी डॉलर था, जो अब बढ़कर क़रीब 2,000 करोड़ अमेरिकी डॉलर हो गया है.

भू-राजनीतिक हित

भारत और बांग्लादेश के बीच रिश्ते काफ़ी पुराने हैं.

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इमेज कैप्शन, भारत और बांग्लादेश के बीच रिश्ते काफ़ी पुराने हैं

जानकारों की मानें तो आर्थिक और व्यापारिक हितों के अलावा भू-राजनीति के रणनीति के पहलू से भी बांग्लादेश चीन के लिए ख़ास महत्व रखता है.

उनका कहना है कि इसकी प्रमुख वजह बांग्लादेश की भौगोलिक स्थिति है.

इसकी एक बड़ी वजह अमेरिका है. अमेरिका की 'इंडो-पैसिफ़िक रणनीति' के चलते चीन बंगाल की खाड़ी पर अपना शिकंजा कसना चाहता है.

2021 में अमेरिका ने 'इंडो-पैसिफ़िक रणनीति' पेश की थी. दुनिया की आधी से अधिक आबादी इंडो-पैसिफ़िक क्षेत्र में रहती है, उत्पादों के बाज़ार के तौर पर ये इलाक़ा महत्वपूर्ण है.

वहीं समुद्र के रास्ते होने वाले व्यापार के लिहाज़ से भी ये क्षेत्र काफ़ी महत्वपूर्ण माना जाता है.

बेल्ट एंड रोड प्रोजेक्ट के ज़रिए चीन एशिया, यूरोप समेत दुनिया के 60 देशों से सड़क और रेल मार्ग से सीधे जुड़ना चाहता है.

कई जानकार मानते हैं कि बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव के ज़रिए दूसरे इलाक़ों में अपना प्रभुत्व बढ़ाने से चीन को रोकने के लिए ही अमेरिका ने एक रणनीति के रूप में 'इंडो-पैसिफ़िक स्ट्रेटेजी' की घोषणा की.

इस स्ट्रेटेजी के तहत अमेरिका ने जापान, ऑस्ट्रेलिया और भारत के साथ एक सुरक्षा गठबंधन भी बनाया है, जिसे क्वाड (क्वाडिलेटरल सिक्योरिटी डायलॉग) कहा जाता है.

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