मोदी की 'हुंकार रैली' में हुए बम धमाकों के पीड़ितों का क्या है हाल?
चंदन कुमार जजवाड़े
बीबीसी संवाददाता, पटना से

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"ये मेरे ससुर नहीं हैं, हमने कहा था कि ये किसी और की मूर्ति है. बीजेपी के लोग कहने लगे कि ग़लत मूर्ति यहाँ आ गई है, बाद में बदल देंगे. लेकिन नौ साल से यही मूर्ति पड़ी है और नेता आकर इसी पर माला पहनाकर चले जाते हैं."
बिहार के बेगूसराय ज़िले के तारा बरियारपुर गाँव के बिंदेश्वरी चौधरी का निधन साल 2013 में पटना में नरेंद्र मोदी की रैली में हुए बम धमाकों में हो गया था.
बिंदेश्वरी चौधरी की बड़ी बहू रंजू देवी का कहना है, "सरकार (नरेंद्र मोदी) भी हमारे घर आए थे और कहा था कि आप लोग हमारे परिवार के हैं. किसी तरह की चिंता करने की ज़रूरत नहीं है. हम परिवार को नौकरी देंगे, परवरिश करेंगे. यहाँ शहीद बिंदेश्वरी चौधरी जी की मूर्ति लगवाएँगे."
घटना के कुछ महीनों बाद ही गाँव के एक मंदिर के पास बिंदेश्वरी चौधरी की एक मूर्ति स्थापित की गई थी. लेकिन उनके परिवार के लोगों का दावा है कि यह बिंदेश्वरी चौधरी की मूर्ति नहीं बल्कि किसी और की है.
मृतक बिंदेश्वरी चौधरी के बड़े बेटे अरूण चौधरी ने बताया कि मुआवज़े के तौर पर राज्य सरकार ने पाँच लाख और पार्टी ने पाँच लाख रुपए दिए थे, लेकिन तीन भाइयों में बँटकर पैसे ख़त्म हो गए.
मोदी की ‘हुंकार रैली’

27 अक्तूबर 2013 को रविवार का दिन था और पटना के गांधी मैदान में हज़ारों लोगों की भीड़ इकट्ठा थी.
इसी दिन गुजरात के तत्कालीन मुख्यमंत्री और बीजेपी की ओर से प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार नरेंद्र मोदी गांधी मैदान में 'हुंकार रैली' करने वाले थे.
मोदी के गांधी मैदान पहुँचने से पहले ही वहाँ कई बम धमाके हुए थे, जिसमें छह लोगों की मौत हो गई थी.
इनमें बीजेपी कार्यकर्ता और पार्टी समर्थक भी शामिल थे. इन धमाकों में क़रीब 50 लोग घायल भी हुए थे.
इस घटना की जाँच राष्ट्रीय जाँच एजेंसी एनआईए ने की थी और साल 2021 में धमाकों से जुड़े चार अभियुक्तों को एनआईए की एक अदालत ने फांसी की सज़ा भी सुनाई थी.

बहरहाल, 10 साल बाद प्रधानमंत्री के तौर पर नरेंद्र मोदी जल्द ही बिहार का दौरा कर सकते हैं.
साल 2013 की तरह आज भी बीजेपी और जेडीयू अलग हैं. हालाँकि इस बार नरेंद्र मोदी प्रधानमंत्री के तौर पर नौ साल पूरे कर चुके हैं.
उस समय नरेंद्र मोदी गांधी मैदान में मारे गए कई परिवारों से मिलने भी गए थे.
पीड़ित परिवारों का दावा है कि उन्हें नौकरी और परवरिश का भरोसा दिया था.
इसके अलावा मृतकों के स्मारक और उनके नाम से द्वार बनवाने का वादा भी किया था.
बीबीसी ने ऐसे ही कुछ परिवारों से मिलकर उनका हाल जानने की कोशिश की है.

नहीं मिली नौकरी
बेगूसराय की रंजू देवी के मुताबिक़ ससुर की मौत की ख़बर उन्हें दो दिन बाद अख़बार से मिली थी.
नौकरी के लिए वो और उनके पति पाँच साल तक बेगूसराय, पटना और दिल्ली तक के चक्कर लगाते रहे.
रंजू देवी दावा करती हैं, "साल 2014 में हमलोग रक्षाबंधन के समय दिल्ली भी गए थे. राधामोहन सिंह जी के यहाँ गए, वहाँ से भोला बाबू के पास भेज दिया गया. सबने यही कहा था कि नौकरी हो जाएगी. लेकिन नौकरी नहीं मिली. मेरे पति भी अब 50 की उम्र पार कर चुके हैं."
लेकिन यह आज तक नहीं बदली गई है.
हमने इसके बारे में जानने के लिए बेगूसराय के स्थानीय बीजेपी नेता नीरज शांडिल्य से संपर्क किया. नीरज शांडिल्य पहले ज़िला बीजेपी प्रवक्ता रह चुके हैं.
उनके मुताबिक़, "मूर्ति बदले जाने की कोई जानकारी हमारे संज्ञान में नहीं है, अगर ऐसा है तो घरवालों को आकर हमें बताना चाहिए. मूर्ति बनाने के लिए घरवालों से तस्वीर ली गई होगी और उसी के आधार पर मूर्ति बनी होगी."
नीरज दावा करते हैं कि बिंदेश्वरी चौधरी के तीन बेटे थे और कहा गया था कि जिस एक बेटे को नौकरी चाहिए वो सारे कागज़ के साथ आएँ, लेकिन साल 2015 तक कोई नहीं आया.
अरुण चौधरी के दो और भाई अजय और संजय हैं. परिवार का कहना है कि उनके पिताजी गाँव में लोगों का इलाज करते थे और दवाएँ देते थे, जिससे घर चलाने लायक कमाई हो जाती थी.
बिंदेश्वरी चौधरी की एक बहू उषा देवी बताती हैं कि अब सभी भाई मज़दूरी कर घर चलाते हैं.
मजदूरी करके हो रहा है गुजारा

गांधी मैदान के धमाकों में नालंदा के अहियापुर के रहने वाले 23 साल के राजेश कुमार की भी मौत हो गई थी.
उनके पिता अंजनी भूषण ने बताया कि बीजेपी और राज्य सरकार की तरफ से उन्हें पाँच-पाँच लाख रुपए मिले.
इनमें से कुछ पैसे लगाकर उन्होंने अपना घर बनवाया जबकि बाक़ी पैसों से तीन बच्चों को पढ़ा रहे हैं.
मृतक राजेश के भाई अखिलेश दावा करते हैं, "मोदी जी हमारे घर आए थे और कहा था कि भाई अखिलेश तुम अब घर के बड़े हो तुम्हें ही सबको संभालना है. हम तुम्हें नौकरी दिलाएँगे. हम दो बार दिल्ली गए मोदी जी से मिलने. लेकिन नौकरी नहीं मिली."
अखिलेश ने हमें जनता दल यूनाइटेड के लोकसभा सांसद कौशलेंद्र किशोर के लेटर हेड पर 2 जनवरी 2018 के आवेदन पत्र की एक कॉपी भी दिखाई, जो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को नौकरी के लिए लिखी गई थी.
इसके अलावा उन्होंने लोकसभा सचिवालय के एंट्री परमिट की भी एक कॉपी दिखाई.
इस परिवार ने भी अब नौकरी की आस छोड़ दी है और अंजनी भूषण ख़ुद खेतों में मज़दूरी करते हैं, जबकि अखिलेश अहमदाबाद में काम करते हैं.
अखिलेश का दावा है कि यह एक प्राइवेट और अलग नौकरी है, इसका मोदी जी के वादे से कोई नाता नहीं है.
जान बच गई, बाक़ी सब चला गया

इन धमाकों की चपेट में आए क़रीब साठ साल के चंद्रमणि की हालात शायद सबसे दुखद है.
दस साल पहले वो नालंदा में बीजेपी के सरमेरा प्रखंड के अध्यक्ष थे. गांधी मैदान के बम धमाके में वो बुरी तरह ज़ख़्मी हो गए.
उनके गले, फेफड़े और रीढ़ की हड्डी में लोहे के छर्रे घुस गए.
उनका कहना है कि पहले पटना के पीएमसीएच और फिर दिल्ली के एम्स अस्पताल में इलाज के बाद उनकी रीढ़ की हड्डी में फँसे लोहे के टुकड़े को तो निकाल दिया गया लेकिन अब भी शरीर में कई जगह छर्रे फँसे हुए हैं.
चंद्रमणि अब न तो चल पाते हैं और न ठीक से बैठ पाते हैं. हर काम के लिए उन्हें अब अपनी पत्नी अनीता देवी का सहारा चाहिए होता है.
चंद्रमणि रोते हुए कहते हैं, "जब से शरीर की यह हालत हुई है, बच्चे भी बात नहीं सुनते हैं. पाँच में से तीन बेटी की शादी किसी तरह कर पाया हूँ. पत्नी मेहनत मज़दूरी कर पैसे जुटाती है, तो घर चल पाता है."
गांधी मैदान में हुए बम धमाकों से दो साल पहले ही चंद्रमणि के एकमात्र बेटे और भांजों की मौत पानी भरे गड्ढ़े में गिरकर हो गई थी. जबकि साल 2017 में पैसे की तंगी में बिना इलाज के ही उनके पिताजी की मौत हार्ट अटैक से हो गई थी.
चंद्रमणि बताते हैं कि कभी-कभी पार्टी के स्थानीय लोग हालचाल जानने आ जाते हैं.
शुरू में पार्टी के कुछ लोगों ने उनकी आर्थिक मदद भी की. राज्य सरकार ने एक बार उन्हें 20 हज़ार का चेक दिया था और अब उन्हें और उनकी पत्नी को चार-चार सौ रुपए वृद्धावस्था पेंशन मिलती है.
बिहार में सत्ताधारी जेडीयू के प्रवक्ता नीरज कुमार आरोप लगाते हैं, "साल 2013 में जो मारे गए, वो बीजेपी के ही कार्यकर्ता थे. मोदी जी ने प्रधानमंत्री बनने के बाद भी अपना वचन पूरा नहीं किया. जो कार्यकर्ताओं का नहीं हुआ, वो देश का अपना होगा यह बात ही बेतुकी है."

‘कोई लखपति बन गया, मुझे कुछ नहीं मिला’
गांधी मैदान धमाके का ही एक पीड़ित परिवार पटना के गौरीचक इलाक़े के कमरजी गाँव का है. इस गाँव के राजनारायण सिंह भी बीजेपी के कार्यकर्ता थे.
क़रीब 70 साल की उम्र में गांधी मैदान में हुए बम धमाके में उनकी भी मौत हो गई थी.
राजनारायण सिंह की क़रीब 100 वर्ष माँ बिस्तर पर पड़ी रहती हैं. उनकी पत्नी शारदा देवी अपनी उम्र से कुछ ज़्यादा ही बूढ़ी दिखने लगी हैं.
उनके तीन बेटे हैं जो किसानी करते हैं.
राजनारायण सिंह के बेटे मनोज सिंह वो तस्वीरें दिखाते हैं, जब नरेंद्र मोदी 2 नवंबर 2013 को उनके घर आए थे.
नरेंद्र मोदी ने उनकी डायरी में 'भारत माता की जय' लिखकर हस्ताक्षर भी किया था.
बड़े बेटे राम विनोद सिंह दावा करते हैं, "उस समय अश्विनी चौबे, रविशंकर प्रसाद, सुशील मोदी समेत कई नेता आए थे. मोदी जी ने पिताजी का एक स्मारक, उनके नाम से गाँव में द्वार और नौकरी का वादा किया था पर कुछ नहीं किया. अब कोई पूछने भी नहीं आता है."
हालाँकि इस परिवार को भी राज्य सरकार और बीजेपी की तरफ़ से कुल 10 लाख़ रुपए मिले थे. परिवार के लोगों का कहना है कि सारे पैसे ख़र्च हो चुके हैं. बड़े परिवार के लिए यह रक़म छोटी पड़ गई.

हमें कोई पूछने तक नहीं आया

बीजेपी सांसद और बिहार बीजेपी के पूर्व अध्यक्ष संजय जायसवाल का कहना है कि पार्टी के भीतर चंदा इकट्ठा कर घायलों और मृतक परिवार की अच्छी आर्थिक मदद की गई थी.
संजय जायसवाल कहते हैं, “मुझे तो आज तक नहीं मालूम कि नौकरी की कोई बात हुई थी. मुझे इसकी कोई जानकारी नहीं है. इसलिए इस पर कोई कमेंट नहीं करूँगा. चुनाव आते ही ये मुद्दा कहाँ से आ गया. मेरे क्षेत्र के भी कई लोग घायल हुए थे. हमने सबकी मदद की थी. नौकरी की तो कोई बात नहीं हुई थी."
कमरजी गाँव में ही राजनारायण सिंह के घर के बगल में हमारी मुलाक़ात रामपुकार सिंह से हुई.
पेट पर ऑपरेशन के निशान और घर के अंधेरे कमरे को दिखाते हुए कहने लगे कि हमें कोई पूछने तक नहीं आया, क़र्ज़ लेकर प्राइवेट डॉक्टर से इलाज करवाया.
रामपुकार सिंह फूट फूटकर रोते हुए कहते हैं, "मोदी जी गाँव आए थे लेकिन मैं तो हॉस्पिटल में पड़ा था. मुझसे किसी ने कोई वादा नहीं किया था. बगल वाले की मौत हुई उनके घर को लखपति बना दिया. मैं जब घायल था तो बीजेपी के नेता आए और 30 हज़ार रुपया दिया. इतने में क्या होता है खेत बेचना पड़ा इलाज के लिए."
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