ट्रंप और मोदी की मुलाक़ात से पहले भारत ने क्या-क्या किया

ट्रंप मोदी मुलाक़ात

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इमेज कैप्शन, 27 जनवरी को फ़ोन पर हुई बातचीत के दौरान डोनाल्ड ट्रंप ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को व्हाइट हाउस आमंत्रित किया था.

इसराइल के प्रधानमंत्री बिन्यामिन नेतन्याहू, जापान के प्रधानमंत्री शिगेरु इशिबा और जॉर्डन के किंग अब्दुल्लाह के बाद भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी चौथे विदेशी नेता हैं जो ट्रंप के दोबारा राष्ट्रपति बनने के बाद व्हाइट हाउस में उनसे मिलने पहुँच रहे हैं.

डोनाल्ड ट्रंप दोबारा राष्ट्रपति बनने के बाद कई देशों पर टैरिफ की घोषणा कर चुके हैं लेकिन भारत अब भी बचा हुआ है. हालांकि ट्रंप ने अमेरिका पहुँचने वाले स्टील और एल्युमिनियम पर टैरिफ़ लगाया है और भारत में इन धातुओं का निर्यात अमेरिका को करता है.

ट्रंप कई मोर्चों पर भारत को असहज कर चुके हैं लेकिन मोदी सरकार ने बहुत सतर्कता से प्रतिक्रिया दी है.

अतीत में ट्रंप भारत को 'टैरिफ किंग' कह चुके हैं और इस महीने की शुरुआत में ही अमेरिका से 104 भारतीयों को लेकर अमेरिका का मिलिटरी एयरक्राफ़्ट अमृतसर पहुँचा था. इन भारतीयों के हाथों हथकड़ी और पैरों में बेड़ियां लगी थीं.

ट्रंप की भारत से शिकायत केवल अवैध प्रवासियों को लेकर ही नहीं बल्कि आर्थिक मोर्चे पर भी गंभीर मतभेद हैं.

ट्रंप नहीं चाहते हैं कि भारत का अमेरिका के साथ ट्रेड सरप्लस हो. जब कोई देश आयात की तुलना में ज़्यादा कीमत की वस्तुएं और सेवाएं निर्यात करता है तो ऐसी स्थिति को ट्रेड सरप्लस कहते हैं. साथ ही ट्रंप यह भी चाहते हैं कि भारत अमेरिकी उत्पादों पर आयात शुल्क कम करे.

ट्रंप भारत को लेकर इस तरह से तब पेश आ रहे हैं, जब भारत की अर्थव्यवस्था पिछले दो सालों में सबसे धीमी गति से बढ़ रही है. अमेरिका के साथ ट्रेड सरप्लस भारत के लिए ज़रूरी है. इसके अलावा भारत को अमेरिकी निवेश की भी ज़रूरत है.

भारत की सतर्कता

अमितेंदु पलित

ट्रंप ने भारत को भले ही अपने चुनावी कैंपेन के दौरान टैरिफ की धमकी दी थी लेकिन राष्ट्रपति बनने के बाद कनाडा, मेक्सिको और चीन की तरह टैरिफ लगाने की घोषणा नहीं की है.

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नरेंद्र मोदी ने अमेरिका जाने से पहले ही कई ऐसे क़दम उठा लिए थे, जो इस दौरे की ज़मीन तैयार करने जैसे लग रहे हैं.

मसलन भारत ने अमेरिकी बाइक हार्ले डेविससन से टैरिफ कम करने की घोषणा की है. ऐसी भी ख़बरें हैं कि भारत अमेरिकी व्हिस्की और अन्य उत्पादों पर भी आयात शुल्क कम कर सकता है.

ग्लोबल ट्रेड रिसर्च इनिशिएटिव के संस्थापक अजय श्रीवास्तव ने ब्लूमबर्ग से कहा है, ''प्रीमियम मोटरसाइकिल और व्हिस्की को अगर छोड़ दें तो भारत क़रीब 75 प्रतिशत अमेरिकी उत्पादों पर महज पाँच प्रतिशत टैरिफ लगाता है. पीएम मोदी को चाहिए कि वह ट्रंप को समझाएं कि भारत टैरिफ किंग नहीं है. भारत और अमेरिका के संबंधों को व्यापार के आईने से अलग भी देखने की ज़रूरत है. मिसाल के तौर पर भारत एमजॉन से लेकर ओपन एआई तक तमाम अमेरिकी टेक कंपनियों को अपना बाज़ार मुहैया कराता है जबकि चीन में अमेरिका को यह सुविधा नहीं है.''

इसके साथ ही हाल के वर्षों में भारत ने रूसी हथियारों पर निर्भरता कम की है और अमेरिका के साथ रक्षा साझेदारी बढ़ाई है. यह साझेदारी मोदी के दौरे के बाद और बढ़ सकती है. भारत ने अमेरिका में रह रहे अपने अवैध प्रवासियों को लेकर भी ट्रंप प्रशासन की बात मानी है.

हाल ही में भारत ने परमाणु जवाबदेही क़ानून में संशोधन करते हुए 100 गीगावाट परमाणु ऊर्जा उत्पादन का फ़ैसला किया था. कहा जा रहा है कि इससे भी अमेरिकी कंपनियों को ही फ़ायदा होगा. भारत ने मोदी की ट्रंप से मुलाक़ात के पहले माहौल सकारात्मक बनाने की कोशिश शुरू कर दी थी.

भारत कितनी मांगें मान सकता है?

तन्वी मदान का बयान

अमेरिका ने बिना दस्तावेज़ों वाले भारतीय कामगारों को जिस तरह से भेजा, उसे विपक्षी पार्टियों ने भारत का अपमान बताया. लेकिन मोदी सरकार ने इस आलोचना का जवाब भी बहुत धैर्य के साथ दिया.

थिंक टैंक द ब्रूकिंग्स इंस्टिट्यूशन की सीनियर फेलो तन्वी मदान ने एक्स पर लिखा है, ''अमेरिका ने जिस तरह से भारतीयों को भेजा, उस पर कई तरह की बातें हो रही हैं लेकिन मोदी सरकार ने इसकी आलोचना नहीं की. ज़ाहिर है कि मोदी सरकार ट्रंप को पहले कार्यकाल से अलग रूप में देख रही है. भारत सामान्य रूप से किसी देश की सार्वजनिक आलोचना नहीं करता है. भारत की ये रणनीति रही है कि सार्वजनिक आलोचना से समस्या का समाधान मिलने के बजाय और जटिल हो जाएगा. भारत की सोच है कि ट्रंप से उलझना समझदारी नहीं है. भारत सार्वजनिक रूप से यही कहेगा कि वह मामले को अमेरिका के सामने उठाएगा.''

नरेंद्र मोदी के लिए सबसे बड़ी चुनौती है कि वह ट्रंप को कैसे भारत के हितों पर चोट करने से रोकें.

इसीलिए ट्रंप के रवैये को लेकर भारत बेफ़िक्र नहीं है. पिछले साल भारत के साथ अमेरिका का व्यापार घाटा 45 अरब डॉलर का था. लेकिन ऐसा भी नहीं है कि अमेरिका को सबसे ज़्यादा व्यापार घाटा भारत के साथ हो रहा है. इस मामले में भारत अमेरिका के लिए 11वें नंबर पर आता है. लेकिन ट्रंप कुछ भी एकतरफ़ा होने देने के मूड में नहीं हैं.

ट्रंप की टैरिफ की धमकी को लेकर भारत के पूर्व विदेश सचिव कंवल सिब्बल ने लिखा था, ''ट्रंप भारत पर टैरिफ़ लगाते हैं तो यह अमेरिका की आर्थिक दादागिरी होगी. अमेरिका की अर्थव्यवस्था भारत से बहुत बड़ी है. अमेरिका की अर्थव्यवस्था 29 ट्रिलियन डॉलर की है, जबकि भारत की महज़ चार ट्रिलियन डॉलर की."

'अमेरिका भारत की तुलना ठीक नहीं'

कंवल सिब्बल का बयान

सिब्बल ने लिखा है, "अमेरिका में प्रति व्यक्ति आय 66 हज़ार डॉलर है जबकि भारत में केवल 2400 डॉलर. अमेरिका दुनिया की आर्थिक व्यवस्था को कंट्रोल करता है. अंतरराष्ट्रीय व्यापार डॉलर में होता है और इससे अमेरिका का दबदबा और बढ़ जाता है.''

सिब्बल ने लिखा है, ''अमेरिकी नीतियों से दुनिया भर की अर्थव्यवस्था प्रभावित होती हैं. अमेरिका भारत से अपनी तुलना नहीं कर सकता है. मुक़ाबला बराबरी में होता है. अमेरिका का व्यापार घाटा मुख्य रूप से चीन के साथ ज़्यादा है. चीन से अमेरिका का व्यापार घाटा 30 फ़ीसदी है, ईयू से 16 फ़ीसदी है और कनाडा से 15 फ़ीसदी. भारत से अमेरिका का व्यापार घाटा महज़ 3.2 प्रतिशत है.''

27 जनवरी को राष्ट्रपति ट्रंप और पीएम मोदी की फोन पर बातचीत हुई थी. इसी बातचीत में ट्रंप ने पीएम मोदी को व्हाइट हाउस आमंत्रित किया था. बातचीत में ट्रंप ने कहा था कि भारत अमेरिका से और रक्षा उपकरण ख़रीदे. साथ ही द्विपक्षीय व्यापार संतुलित करने के लिए कहा था.

हाल ही में दिल्ली में एक कार्यक्रम में भारत के विदेश मंत्री एस जयशंकर ने ट्रंप को अमेरिकी राष्ट्रवादी कहा था. मोदी की नीतियों में भी राष्ट्रवाद के उस पहलू पर ज़ोर है कि विदेशी निर्भरता कम हो.

ट्रंप चाहते हैं कि भारत अमेरिका से ज़्यादा से ज़्यादा रक्षा उपकरण ख़रीदे. दूसरी तरफ़ मोदी चाहते हैं कि भारत रक्षा उपकरण ख़ुद बनाए. ऐसे में दोनों की नीतियां भी आपस में टकराती हैं.

ट्रंप के पहले कार्यकाल में नेशनल सिक्यॉरिटी काउंसिल में साउथ एंड सेंट्रल एशिया की सीनियर डायरेक्टर लीज़ा कर्टिस ने हिन्दुस्तान टाइम्स को दिए इंटरव्यू में कहा है, ''मुझे लगता है कि मोदी की मेक इन इंडिया और ट्रंप की अमेरिका फ़र्स्ट की नीति में कहीं न कहीं सीधा टकराव है. ख़ास कर जब बात रक्षा व्यापार की आती है. हालांकि पहले कार्यकाल में ट्रंप ने भारत को हथियारों से लैस ड्रोन तकनीक मुहैया कराने का बाधाएं दूर की थीं. लेकिन ड्रोन डील पूरी होने सात साल लग गए थे. ज़ाहिर है कि ट्रंप इस बार देरी नहीं चाहेंगे.

"भारत के लिए अमेरिका से रक्षा सौदा किसी चुनौती से कम नहीं है. ट्रंप चाहते हैं कि भारत अमेरिकी हथियार ख़रीदे. भारत में उत्पादन पर भी बात हो सकती है लेकिन ट्रंप ये भी उम्मीद करेंगे कि भारत अमेरिका में बने रक्षा उपकरणों को भी ख़रीदता रहे.''

लेकिन कई विश्लेषक मानते हैं कि ट्रंप को ख़ुश करना इतना आसान नहीं होता है और न ही इसका कोई अंत होता है.

इकनॉमिक टाइम्स से नेशनल यूनिवर्सिटी ऑफ सिंगापुर में इंटरनेशनल ट्रेड एंड इन्वेस्टमेंट के विशेषज्ञ और अर्थशास्त्री अमितेंदु पलित ने कहा, ''ट्रंप को ख़ुश करने में भारत के लिए यह जोखिम होगा कि इसकी कोई सीमा नहीं है. ट्रंप आगे और भी चीज़ों को लेकर दबाव बना सकते हैं. ट्रंप की आदत है कि एक बार आपने उनकी बात मान ली तो ज़रूरी नहीं कि यह आख़िरी बात है. भारत के लिए यही सबसे बड़ी चुनौती होगी.''

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