नूंह का सन्नाटा तोड़ते बुलडोज़र और प्रशासन की कार्रवाई पर उठते सवाल- ग्राउंड रिपोर्ट

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- Author, दिलनवाज़ पाशा
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता, नूंह से
- 31 जुलाई को हरियाणा के नूंह में बजरंग दल ने धार्मिक यात्रा का आयोजन किया था.
- यात्रा में हज़ारों की संख्या में बजरंग दल के कार्यकर्ताओं और श्रद्धालुओं ने हिस्सा लिया.
- यात्रा जब नूंह में मंदिर से आगे बढ़ी तो पथराव शुरू हो गया और देखते ही देखते आगज़नी शुरू हो गई.
- भीड़ ने शहर की सड़कों और मंदिर के बाहर गोलियां भी चलाईं.
- बड़ी संख्या में लोग मंदिर में फंसे रहे, जिन्हें बाद में प्रशासन की मदद से बाहर निकाला गया.
- नूंह से शुरू हुई हिंसा के बाद बना तनाव, देर शाम हरियाणा के सोहना और गुरुग्राम तक पहुँच गया.
- हिंसा में अब तक छह लोगों की मौत हुई, जिसमें दो होमगार्ड भी शामिल हैं
- पुलिस के अनुसार नूंह में अब तक 56 एफ़आईआर दर्ज की गई है और 150 लोगों को गिरफ्तार किया गया है.
- जिला प्रशासन के अनुसार यहां 8 अगस्त तक इंटरनेट सेवाएं बंद कर दी गई हैं.
गुरुग्राम में चहल पहल है. आगे सोहना की तरफ़ बढ़ते हुए सड़क सुनसान होती जाती है. नूंह पहुंचे तो यहां सन्नाटा-सा पसरा है. जगह-जगह पर आरपीएफ़ और पुलिस के जवान तैनात दिखते हैं.
नूंह बस स्टैंड के सामने बुलडोज़र का शोर इस सन्नाटे को तोड़ रहा है. यहां और आसपास के इलाक़े में प्रशासन ने सड़क किनारे बनी सभी अस्थायी दुकानों को ज़मींदोज़ कर दिया है.
टिन और लोहे की रॉड से बने खोखों को मटियामेट करते वक़्त बुलडोज़र का ड्राइवर हिचकता है तो वहां मौजूद एक पुलिसकर्मी उससे कहता है, "ये सब पत्थरबाज़ों की दुकानों हैं, किसी पर रहम नहीं करना है, इस खोखे को पूरी तरह ख़त्म करो."

'क्यों दी गई सज़ा'
पास के ही एक गांव में रहने वाले चमनलाल आंखों में आंसू लिए ख़ामोशी से बाल काटने की अपनी दुकान को ख़त्म होते हुए देख रहे हैं.
बुलडोज़र के आगे बढ़ जाने के बाद चमनलाल पूरी तरह टूट चुकी अपनी दुकान में बचे हुए सामान को समेटने लगते हैं.
चमनलाल कहते हैं, "ब्याज़ पर क़र्ज़ लेकर ये दुकान ख़रीदी थी. दस लोगों का परिवार इसी से चल रहा था. हम सड़क पर आ गए हैं. इस दंगे में हमारी क्या भूमिका थी जो हमें ये सज़ा दी गई."
नूंह के अधिकारियों का कहना है कि सिर्फ अवैध निर्माण को तोड़ा जा रहा है.
नूंह के ज़िलाधिकारी धीरेंद्र खड़गटा कहते हैं, "पुलिस की रिपोर्ट के बाद ये कार्रवाई हो रही है. सिर्फ उन्हीं निर्माणों को तोड़ा जा रहा है जो अवैध हैं."
धीरेंद्र कहते हैं कि ये अभियान अभी ज़ारी रहेगा.
वहीं नूंह के डिस्ट्रिक्ट प्लानिंग अधिकारी विनेश सिंह कहते हैं, "उन जगहों को चिन्हित किया गया है जहां से पत्थरबाज़ी हुई है. जिन निर्माणों की संलिप्तता सामने आई है उन्हें तोड़ा जा रहा है."
विनेश सिंह के मुताबिक़ शनिवार को यहां 45 पक्की दुकानों, कई अस्थायी दुकानों और कुछ पक्के मकानों को तोड़ा गया है.

'कौन सुनेगा बात?'
नूंह बस अड्डे के सामने ही पानी और कोल्ड ड्रिंक बेचने वाले यूसुफ़ अली कहते हैं, "हम बर्बाद हो गए हैं, हमें नहीं पता कि आगे हम क्या करेंगे."
नूंह में मेडिकल कॉलेज मोड़ के पास बुलडोज़र ने एक तीन मंज़िला मकान और स्कूल को तोड़ दिया.
विनेश सिंह कहते हैं, "इस इमारत से पत्थरबाज़ी हुई थी. ऐसी सभी इमारतों को चिन्हित कर लिया गया है."
भारी पुलिस बल की मौजूदगी में इस इमारत में को तोड़ दिया गया. इसमें एक खाने का होटल भी चल रहा था.
इस इमारत के मालिक अभी बदहवासी की हालत में हैं. उनके छोटे भाई सरफ़राज़ बीबीसी से कहते हैं, "प्रशासन की तरफ़ से हमें कोई नोटिस नहीं मिला है. 2016 में एक बार नोटिस मिला था जिसके बाद हमने ज़िलाधिकारी से मुलाक़ात करने के बाद जुर्माना भर दिया था. तब से हमें कोई दिक़्क़त नहीं हुई थी."
सरफ़राज़ कहते हैं, "हमने ये इमारत किराए पर दी हुई है. यहां होटल चलाने वाले जावेद ने हमें बताया है कि वो पत्थरबाज़ों को इमारत पर चढ़ने से रोक रहा था. भीड़ की कोई शक्ल नहीं होती."
वो कहते हैं, "अगर हमारे परिवार से कोई हिंसा में शामिल होता तो हमें लगता कि प्रशासन ने सही किया है. लेकिन हमारा हिंसा से कोई मतलब नहीं था, फिर भी इकतरफ़ा कार्रवाई करते हुए हमारी इमारत को तोड़ दिया गया है."

लेकिन क्या प्रशासन की इस कार्रवाई के ख़िलाफ़ वो अदालत का दरवाज़ा खटखटाएंगे?
इस सवाल पर थोड़ा हिचकते हुए सरफ़राज़ कहते हैं, "पुलिस, प्रशासन, अदालत, राजनेता सभी सिर्फ़ इकतरफ़ा कार्रवाई कर रहे हैं, अगर हमें आगे कोई उम्मीद होती तो हम अदालत जाने का सोच सकते थे. लेकिन इन हालात में हम कहां जाएंगे और कौन हमारी बात सुनेगा?"
नल्हड़ मेडिकल कॉलेज के बाहर मौजूद मार्केट को अब ज़मींदोज़ कर दिया गया है.
यहां क़रीब 45 दुकानें थीं. शनिवार सुबह ही इन सभी को तोड़ दिया गया. अब यहां बचे हुए मलबे से लोग अपना सामान तलाश रहे हैं.

20 वर्षीय मुसैब यहां एक हाइपर मार्केट चलाते थे. उन्हें दुकान टूटने की ख़बर मीडिया रिपोर्टों से मिली.
जब तक वो यहां पहुंचे उनकी दुकान पूरी तरह जमींदोज़ हो चुकी थी.
मुसैब कहते हैं, "मेरे पिता ने अपनी जमापूंजी लगाकर ये दुकान मुझे खोलकर दी थी. महीने में बीस-तीस हज़ार रुपये कमा ही लेता था. लाखों का माल था, अब सब बर्बाद हो गया है."
मुसैब कहते हैं, "31 जुलाई को यात्रा के यहां आने से पहले हम दुकान बंद करके चले गए थे. यहां कोई हिंसा भी नहीं हुई थी. फिर भी प्रशासन ने ये मार्केट तोड़ दी है."
मुसैब कहते हैं कि उन्हें नहीं मालूम कि वो आगे क्या करेंगे. उनकी आंखों में आंसू और मन में गुस्सा है.
थोड़ा ठहरकर वो कहते हैं, "ये दुकान खोलने के लिए मैंने पढ़ाई छोड़ दी थी. अब सब बर्बाद हो गया है. मैं नहीं जानता कि आगे मैं क्या करूंगा."

'बिना जांच कार्रवाई'
हथिन के रहने वाले हरकेष शर्मा ने नूंह में अपने रेस्टोरेंट हैरी जैरी पिज़्ज़ा की ब्रांच खोली थी. उनके रेस्त्रां को दंगाइयों ने लूट लिया था.
अब प्रशासन ने मेडिकल कॉलेज के सामने मौजूद इस रेस्त्रां को तोड़ दिया है.
हरकेष शर्मा कहते हैं, "सरकार ने इस जगह को अवैध बताकर बुलडोज़र चला दिया है. बीती शाम ही मैं यहां देखकर गया था कि कहीं सरकार ने कुछ नोटिस तो नहीं लगाया है."
"अगर कोई नोटिस दिया गया होता तो मैं कम से कम अपना सामान तो यहां से हटा लेता. अगर ये जगह अवैध थी तो सरकार ने यहां बिजली का मीटर कैसे पास किया और रेंट एग्रीमेंट को कैसे मंज़ूर किया?"
हरकेष शर्मा को इस सांप्रदायिक हिंसा में दोहरी चोट पहुंची है.
बावजूद इसके वो बुलडोज़र के एक्शन का समर्थन करते हुए कहते हैं, "अगर सरकार दंगा करने वालों की पहचान करके सिर्फ़ उन्हें दंडित करती जिनकी संलिप्तता थी या जिन लोगों ने हमला किया तो समझ आता कि सरकार सही कर रही है. लेकिन यहां तो सरकार ने बिना जांच करे ही तोड़फोड़ कर दी है."

'अवैध रूप से बनी थीं दुकानें'
वकील ख़ान यहां पिछले दस साल से लैब चला रहे हैं. उन्हें भी मीडिया के ज़रिये ही दुकान टूटने की ख़बर मिली. दुकान के मलबे पर उदास खड़े वकील ख़ान कहते हैं, "अगर हमें मोहलत दी गई होती तो हम सामान निकाल लेते. हम किरायेदार हैं. हमारा क्या दोष था?"
वकील ख़ान कहते हैं, "मेरा तो फिर भी कम नुक़सान हुआ है. लेकिन यहां मौजूद छह मेडिकल स्टोर को भी तोड़ दिया गया है. उनमें लाखों की दवाइयां थीं. एक अल्ट्रासाउंड सेंटर को तोड़ा गया उसमें महंगी मशीन थी. एक एक्सरे सेंटर तोड़ा गया वहां भी महंगी मशीन थी. प्रशासन ने किसी को कोई मोहलत नहीं दी."
प्रशासन का कहना है कि मेडिकल कॉलेज के बाहर जिन दुकानों को तोड़ा गया है वो अवैध रूप से वन भूमि पर बनीं थीं.
ज़िलाधिकारी धीरेंद्र खड़गटा कहते हैं, "ये वन भूमि पर बना निर्माण था. इन्हें पहले ही नोटिस दिए जाते रहे हैं."

'कहां से पेट भरेंगे?'
वहीं यहां तोड़ी गई पंद्रह दुकानों के मालिक मोहम्मद सऊदी और उनके छोटे भाई नवाब शेख दावा करते हैं कि खानदानी ज़मीन पर बनीं उनकी दुकानों को दंगे के बहाने तोड़ दिया गया.
मोहम्मद सऊदी कहते हैं, "सुबह आठ बजे दुकानें तोड़ दी गईं. हमें कोई जानकारी नहीं दी गई. ये हमारी खानदानी ज़मीन पर बनी दुकानें हैं. प्रशासन ने मनमर्जी की और ये दुकानें तोड़ दी गईं."
सऊद कहते हैं, "हमारे पास संपत्ति के दस्तावेज़ हैं और हाई कोर्ट और सुप्रीम कोर्ट ने सरकार को यहां कोई कार्रवाई ना करने के लिए पहले ही स्टे दे दिया था. लेकिन अब प्रशासन ने मौक़े का फ़ायदा उठाते हुए दुकानें तोड़ दी हैं. हमें अपने दस्तावेज़ दिखाने का मौक़ा तक नहीं दिया गया."
सऊदी कहते हैं कि इस कार्रवाई के ख़िलाफ़ वो अदालत में याचिका दायर करेंगे. सऊदी के छोटे भाई नवाब शेख तोड़ दी गई अपनी दुकानों को देखकर चुपचाप खड़े रहे थे.
रूंधी हुई आवाज़ में नवाब शेख कहते हैं, "दंगे के वक़्त हमारे परिवार से यहां कोई मौजूद नहीं था. सरकार ने हमारा सत्यानाश कर दिया है. मैंने प्रशासन को रोकने की कोशिश की तो पुलिस मुझे यहां से उठा ले गई. हमारे बच्चों का पेट यहीं से भर रहा था अब हम कहां जाएँ?"
शेख कहते हैं, "सरकार हमारी गुहार नहीं सुन रही है. ज़ुल्म हम पर हो रहा है. सरकार को इंसाफ़ करना चाहिए, लेकिन यहां तो नाश कर रही है. इस सरकार ने हमें मिटा दिया है. हमारे घर में मातम पसरा हुआ है, हम कहां से पेट भरेंगे. इन दुकानों को फिर से बनाने के लिए हम कहां से अब पैसा लायेंगे?"

प्रशासन की कार्रवाई का समर्थन
यहां शहर के कई लोग टूटी हुई दुकानों को देखने आ रहे हैं. अशोक कुमार अपने कुछ दोस्तों के साथ यहां आए हैं.
बुलडोज़र की कार्रवाई का समर्थन करते हुए अशोक कुमार कहते हैं, "सरकार ने बिलकुल सही किया है. इन दंगाइयों को ऐसे ही सबक सिखाये जाने की ज़रूरत है."
अशोक कहते हैं, "हमें ये देखकर बहुत ख़ुशी हो रही है. हिंदुओं की किसी संपत्ति को नहीं तोड़ा गया है. जिन हिंदुओं का नुक़सान हुआ है वो किराए पर थे."
नूंह से नल्हड़ को जोड़ने वाली सड़क पर ही सांप्रदायिक हिंसा हुई थी और इसी सड़क पर अतिक्रमण के नाम प्रशासन कार्रवाई कर रहा है.
इस सड़क पर शत प्रतिशत पक्की संपत्तियां मुसलमानों की हैं, इन दुकानों में किराएदार के तौर पर हिंदू भी कारोबार कर रहे थे.
अशोक कुमार के साथ आए प्रमोद गोयल कहते हैं, "यहां ऐसा दंगा हुआ जो पहले कभी नहीं हुआ. ये सुनियोजित दंगा था. प्रशासन ने अवैध दुकानों को तोड़ा है, हमें बहुत ख़ुशी है कि प्रशासन ऐसी कार्रवाई कर रहा है."
रविवार को भी नूंह में बुलडोज़र की कार्रवाई जारी थी. ज़िलाधिकारी धीरेंद्र खड़गटा का कहना है कि अभी ये कार्रवाई जारी रहेगी.

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