असम के विधायक अमीनुल इस्लाम को सात महीने जेल में क्यों गुज़ारने पड़े?

अमीनुल इस्लाम

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इमेज कैप्शन, एक रैली में दिए गए बयान के लिए अमीनुल इस्लाम को गिरफ्तार किया गया था
    • Author, दिलीप कुमार शर्मा
    • पदनाम, गुवाहाटी से बीबीसी हिन्दी के लिए

गौहाटी हाई कोर्ट के एक आदेश के बाद एआईयूडीएफ़ यानी ऑल इंडिया यूनाइटेड डेमोक्रेटिक फ्रंट के विधायक अमीनुल इस्लाम शुक्रवार को जेल से बाहर आ गए.

दरअसल विधायक इस्लाम पिछले सात महीने से ज़्यादा समय से नौगांव की एक जेल में बंद थे.

गौहाटी हाई कोर्ट के जस्टिस कल्याण राय सुराणा और सुरेश मजूमदार की डिविज़न बेंच ने बीते गुरुवार को इस मामले की सुनवाई के बाद विधायक की हिरासत के आदेश रद्द कर दिए थे.

कोर्ट ने इसके साथ ही यह निर्देश दिया कि अगर किसी दूसरे मामले में उनकी ज़रूरत नहीं है तो उन्हें तुरंत रिहा कर दिया जाए.

असम के धींग विधानसभा क्षेत्र से लगातार तीन बार विधायक बने इस्लाम को राष्ट्रीय सुरक्षा क़ानून (एनएसए) के तहत इतने लंबे समय तक हिरासत में रखा गया.

उन्हें 24 अप्रैल को एक राजनीतिक रैली में दिए गए बयान के लिए गिरफ्तार किया गया था.

उन पर आरोप लगा कि 22 अप्रैल को पहलगाम में हुए हमले के लिए उन्होंने अपनी रैली में केंद्र की बीजेपी सरकार पर "साज़िश" रचने की बात कही थी.

इस रैली में उनके विवादित भाषण का वीडियो भी सोशल मीडिया पर काफ़ी चर्चा में रहा.

अमीनुल इस्लाम ने जेल से बाहर आने पर क्या कहा?

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जेल से बाहर निकले विधायक इस्लाम शनिवार को असम विधानसभा के शीतकालीन सत्र में भाग लेने पहुंचे थे.

उन्होंने पहलगाम हमले को लेकर बीजेपी सरकार पर "साज़िश" रचने वाले बयान के आरोप पर बीबीसी न्यूज़ हिन्दी से कहा, "मैंने केंद्र की सत्ता संभाल रही बीजेपी सरकार द्वारा साज़िश रचने की बात नहीं कही थी. लेकिन मैंने यह ज़रूर कहा था कि पहलगाम हमले के दौरान वहां हमारे सुरक्षा जवान क्यों नहीं थे."

"पहलगाम कश्मीर जैसे संवेदनशील राज्य का एक इंटरनेशनल पर्यटन स्थल है, फिर वहां सुरक्षा के इंतज़ाम क्यों नहीं थे. आतंकियों ने हमारे इतने सारे नागरिकों को कैसे मार दिया. मैंने इसके लिए देश के प्रधानमंत्री और गृह मंत्री को ज़िम्मेदार ठहराया था. साथ ही मैंने पहलगाम हमले की ठीक तरीक़े से जांच की मांग की थी."

अमीनुल इस्लाम ने कहा, "लेकिन यहां की सरकार ने मेरे बयान को पाकिस्तान का समर्थन करने वाला बताया और मुझ पर मामले दर्ज कर दिए. जबकि पहलगाम हमले को लेकर सोशल मीडिया से संसद तक हर कोई यही सवाल उठा रहा था. लेकिन उन्होंने मुझे जेल में डाल दिया."

हालांकि, अमीनुल इस्लाम को इस मामले में 14 मई को ही ज़मानत मिल गई थी. मगर उसी दिन उन्हें एनएसए के तहत हिरासत में ले लिया गया. बाद में 3 जुलाई को एनएसए के लिए बने एडवाइज़री बोर्ड ने उन्हें एक साल के लिए हिरासत में रखने की इजाज़त दे दी थी.

अमीनुल इस्लाम के विवादित बयान का वीडियो जब सामने आया तो बीजेपी और उसके सहयोगी दलों ने इस पर नाराज़गी ज़ाहिर की थी.

पुलिस ने "ग़लत जानकारी और नफ़रत फैलाकर लोगों में अशांति फैलाने" के आरोपों के तहत अमीनुल इस्लाम के ख़िलाफ़ बीएनएस की कई धाराओं के तहत मामला दर्ज किया था.

नौगांव के पुलिस अधीक्षक स्वप्निल डेका ने उस दौरान पुष्टि की थी कि पुलिस ने सामने आए वीडियो के आधार पर कार्रवाई की थी.

अमीनुल इस्लाम

हालांकि गिरफ्तारी और एनएसए के तहत हिरासत से जुड़े एक सवाल पर विधायक इस्लाम कहते हैं, "मुझ पर कार्रवाई के तहत जो भी आरोप लगाए गए थे, उसके लिए 15 दिन बाद 14 मई को कोर्ट ने मुझे ज़मानत दे दी थी. लेकिन उसी दिन मुझ पर एनएसए लगा दिया गया. यह मौजूदा बीजेपी सरकार की ज़्यादती नहीं है तो और क्या है? मुझे अब लगता है कि सरकार ने यह ज़्यादती इसलिए की क्योंकि मैं दाढ़ी रखने और टोपी पहनने वाला मुसलमान हूं. मैंने यह बात पुलिस अधीक्षक से भी पूछी थी."

विधायक इस्लाम यह भी आरोप लगाते हैं कि जिस तरह से एनएसए के तहत उनको एक साल के लिए हिरासत में भेजा गया था, उससे उनका राजनीतिक करियर ख़तरे में पड़ जाता.

वह कहते हैं, "मैं बीते सात महीनों से अपने क्षेत्र का कोई काम नहीं कर पाया हूं. लोगों से मिल नहीं पाया हूं. अगर मुझे एक साल जेल में रखा जाता तो विधानसभा चुनाव के बाद ही मैं बाहर आ पाता. लेकिन मुझे अदालत से न्याय मिला है."

"मैं अपने क्षेत्र में कई सारी विकास समितियों का अध्यक्ष हूं लेकिन 7 महीने से मेरे दस्तख़त के बिना कई ज़रूरी काम ठप पड़ गए. बीजेपी उन लोगों के ख़िलाफ़ बदले की कार्रवाई करती है जो उनसे सवाल पूछते है. मैंने आज भी विधानसभा में कई विधेयकों पर चर्चा के दौरान सरकार से सवाल पूछे हैं. आगे भी सवाल पूछता रहूंगा."

क्या कहता है क़ानून?

असम के मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा

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इमेज कैप्शन, एनएसए क़ानून राज्य सरकारों को किसी भी शख़्स को हिरासत में लेने की शक्तियां देता है

राष्ट्रीय सुरक्षा क़ानून को 1980 में लाया गया था. यह केंद्र और राज्य सरकारों को ऐसी शक्तियां देता है जिसके तहत राष्ट्र हित में किसी भी शख़्स को बिना सूचना हिरासत में लिया जा सकता है.

इस क़ानून में बिना ट्रायल के किसी शख़्स को एक साल तक हिरासत में रखा जा सकता है.

एनएसए के तहत विधायक इस्लाम की हिरासत और हाई कोर्ट के आदेश पर वरिष्ठ वकील एआर भुइयां ने बीबीसी न्यूज़ हिन्दी से कहा, "गौहाटी हाई कोर्ट ने विधायक अमीनुल इस्लाम की राष्ट्रीय सुरक्षा क़ानून के तहत हिरासत को यह कहते हुए रद्द कर दिया है कि राज्य की कार्रवाई प्रक्रिया के हिसाब से ग़ैर-क़ानूनी थी और संवैधानिक रूप से टिकने लायक नहीं थी."

उनका कहना है, "कोर्ट ने माना कि हिरासत में लेने वाले अधिकारी प्रिवेंटिव डिटेंशन को सही ठहराने के लिए कोई ठोस कारण नहीं दिखा पाए. न ही इसमें कोई नई धमकी जैसी बात लगी. यह आदेश मशीनी जैसा था और इसमें दिमाग़ का इस्तेमाल नहीं दिखाया गया, जो एनएसए की ज़रूरी शर्तों का उल्लंघन है."

अदालत के आदेश की व्याख्या करते हुए वकील भुइयां ने कहा, "यह फ़ैसला राज्य को एक ज़रूरी बात याद दिलाता है कि प्रिवेंटिव डिटेंशन का इस्तेमाल पॉलिटिकल या एडमिनिस्ट्रेटिव शॉर्टकट के तौर पर नहीं किया जा सकता और संवैधानिक सुरक्षा उपायों का पूरी तरह से सम्मान किया जाना चाहिए."

बीजेपी ने क्या कहा?

बीजेपी नेता विजय गुप्ता ने अमीनुल इस्लाम की ओर से धार्मिक भेदभाव के आरोपों का खंडन किया है

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बीजेपी ने एआईयूडीएफ़ विधायक इस्लाम को एनएसए के तहत हिरासत में रखने की कार्रवाई को सही बताया है.

असम बीजेपी के वरिष्ठ नेता विजय कुमार गुप्ता ने बीबीसी से कहा, "धींग के विधायक अमीनुल इस्लाम अकसर ऐसी हरकत करते हैं, जिसमें वो एक विशेष समुदाय को अपने बयानों से भड़काने का काम करते है. लेकिन हम सांप्रदायिक सद्भाव पर प्रहार करने वाले किसी भी व्यक्ति को बख्शेंगे नहीं. इसलिए उनके ख़िलाफ़ कानूनी कार्रवाई की गई."

उन्होंने ये भी कहा, "अगर भविष्य में वह फिर ऐसा कोई विवादित बयान देते हैं तो निश्चित तौर पर हमारी सरकार फिर से सख्त कार्रवाई करेगी. इस बार उन्हें हाई कोर्ट से राहत मिल गई है, लेकिन अगर वो अपनी इन हरकतों से बाज़ नहीं आएंगे तो उनके ख़िलाफ़ कठोर से कठोर कार्रवाई की जाएगी."

विधायक की ओर से उनके धर्म की वजह से कार्रवाई होने के आरोप पर बीजेपी नेता ने कहा, "बात किसी मुसलमान विधायक की नहीं है. कोई भी विधायक फिर चाहे वह किसी भी जाति-समुदाय का हो, जो हमारे सामाजिक परिवेश में ज़हर घोलने का काम करेगा, उसके ख़िलाफ़ कड़ी कार्रवाई की जाएगी."

बीबीसी के लिए कलेक्टिवन्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.