भारत आने से पहले शेख़ हसीना के बांग्लादेश में आख़िरी कुछ घंटे कैसे बीते?

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- Author, अकबर हुसैन
- पदनाम, बीबीसी न्यूज़ बांग्ला, ढाका
बीते एक दशक से भी ज़्यादा समय से कई लोग शेख़ हसीना को ‘आयरन लेडी’ यानी लौह महिला कहते थे.
कई लोगों ने इस बात की कल्पना तक नहीं की थी कि क़रीब साढ़े पंद्रह साल तक काफ़ी मज़बूती से सत्ता में बनी रहने वालीं एक प्रधानमंत्री इस तरह देश छोड़कर निकल सकती हैं.
बांग्लादेश के इतिहास में इससे पहले सत्ता से हटने के बाद किसी व्यक्ति को देश से पलायन करने पर मजबूर नहीं होना पड़ा था.
सोमवार को आंदोलनकारी छात्रों के 'लॉन्ग मार्च टू ढाका' यानी ढाका अभियान के दौरान शेख़ हसीना और उनकी बहन शेख़ रेहाना देश छोड़कर पलायन करने पर मजबूर हो गईं. इससे पहले रविवार रात और सोमवार सुबह को कई नाटकीय घटनाक्रमों का सिलसिला जारी रहा.

हार मानने को तैयार नहीं थीं शेख़ हसीना

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रविवार को देशभर में अवामी लीग के नेताओं-कार्यकर्ताओं और प्रदर्शनकारियों के बीच हिंसक संघर्ष में क़रीब सौ लोगों की मौत हो गई थी. इनमें कई पुलिसवाले भी शामिल थे. प्रदर्शनकारियों के भारी विरोध की वजह से कई जगह अवामी लीग के नेताओं को पीछे हटना पड़ा था.
उस दिन शाम को ही अवामी लीग के कई वरिष्ठ नेताओं और सलाहकारों ने शेख़ हसीना को बताया कि परिस्थिति बेकाबू हो गई है. लेकिन शेख़ हसीना हार मानने के लिए तैयार नहीं हुईं.
उनको उम्मीद थी कि बलप्रयोग के ज़रिए परिस्थिति को नियंत्रण में रखा जा सकेगा. लेकिन सुरक्षा बलों के शीर्ष अधिकारियों ने उनको बताया कि इस मामले को अब और काबू में नहीं रखा जा सकता.
उसके बाद ही हसीना मानसिक तौर पर अपने पद से इस्तीफ़ा देने के लिए तैयार हुईं. शेख़ हसीना के पुत्र सजीब वाजिद ने बीबीसी को बताया कि उनकी मां रविवार से ही इस्तीफ़ा देने के बारे में सोच रही थीं.

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आख़िरी वक़्त तक क्या थी हसीना की योजना

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सेना के एक शीर्ष अधिकारी ने नाम नहीं छापने की शर्त पर बीबीसी बांग्ला को बताया कि ‘शेख़ हसीना ने अपने इस्तीफ़े पर कब हस्ताक्षर किए और कब हेलीकॉप्टर पर सवार हुई, इसकी जानकारी सिर्फ़ स्पेशल सिक्योरिटी फ़ोर्स, प्रेसिडेंट गार्ड रेजिमेंट और सेना मुख्यालय के शीर्ष अधिकारियों को ही थी. इस पूरे मामले को बेहद गोपनीय रखा गया था.’
सेना के सूत्रों ने बीबीसी को बताया है कि हसीना सोमवार सुबह 11 बजे ही गणभवन से बाहर निकल गई थीं. वो वहां से सेना के एक हेलीकॉप्टर के ज़रिए त्रिपुरा की राजधानी अगरतला पहुंचीं. उसके बाद एक विशेष विमान के ज़रिए हसीना और शेख़ रेहाना दिल्ली पहुंचीं.
शीर्ष अधिकारियों के साथ बातचीत में बीबीसी बांग्ला को पता चला है कि शेख़ हसीना दोनों विकल्प खुले रखना चाहती थीं. एक ओर जहां वो देश छोड़कर बाहर जाने के लिए तैयार थीं तो दूसरी और वो बल प्रयोग के ज़रिए अंतिम क्षणों तक सत्ता में टिके रहना चाहती थीं.
लेकिन सेना के शीर्ष अधिकारी नहीं चाहते थे कि हिंसा में मरने वालों और घायलों की तादाद और बढ़े.
रविवार को देश के विभिन्न हिस्सों में आम लोग और प्रदर्शनकारी सेना के निचले स्तर के अधिकारियों और जवानों के साथ मिल गए थे. उस परिस्थिति की समीक्षा करने के बाद सेना के शीर्ष अधिकारी समझ गए थे कि अब परिस्थिति सत्तारूढ़ पार्टी के नियंत्रण से बाहर जा चुकी है.
इंटरनेट क्यों किया गया था बंद

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सोमवार को सुबह गणभवन (शेख़ हसीना का निवास) जाने वाले तमाम रास्तों पर पुलिस और सेना के जवानों ने काफ़ी दूर से ही घेराबंदी कर रखी थी.
सेना के शीर्ष अधिकारियों से मिली जानकारी के मुताबिक़, ऐसा इसलिए किया गया था ताकि शेख़ हसीना सुरक्षित रूप से तेजगांव एयरपोर्ट तक पहुंच सकें.
दूसरी ओर, सुबह क़रीब नौ बजे डेढ़ घंटे के लिए पूरे देश में इंटरनेट बंद कर दिया गया. सेना के अधिकारियों ने बताया कि इंटरनेट पर पाबंदी इस वजह से लगाई गई थी कि शेख़ हसीना की गतिविधियों के बारे में सोशल मीडिया के ज़रिए कोई सूचना नहीं फैल सके.
शेख़ हसीना के हेलीकॉप्टर पर सवार होने के बाद इंटरनेट फिर बहाल कर दिया गया.
सेना और पुलिस प्रमुखों के साथ बैठक

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दैनिक प्रथम आलो अख़बार ने लिखा है कि सोमवार सुबह शेख़ हसीना ने गणभवन में सेना के तीनों अंगों के प्रमुखों के अलावा पुलिस प्रमुख के साथ एक बैठक की थी.
अख़बार ने अपनी एक रिपोर्ट में लिखा है, “शेख़ हसीना ने परिस्थिति पर नियंत्रण करने में सुरक्षा बलों की नाकामी पर नाराज़गी जताई थी. बैठक के दौरान हसीना ने आईजी (पुलिस) की ओर अंगुली उठाते हुए कहा कि पुलिस तो बढ़िया काम कर रही है. उस पर आईजी (पुलिस) ने बताया कि परिस्थिति इस स्तर पर पहुंच गई है कि पुलिस के लिए अब ज़्यादा समय तक इतना सख़्त रुख़ बनाए रखना संभव नहीं है.”
उस समय तक प्रदर्शनकारियों की भीड़ सड़कों पर जमा होने लगी थी. सेना के एक शीर्ष अधिकारी ने बीबीसी बांग्ला को बताया, "बैठक में शेख़ हसीना को बता दिया गया था कि भीड़ को ज़्यादा समय तक रोकना संभव नहीं होगा और लोग जलदी ही गणभवन की ओर रवाना होंगे. वैसी स्थिति में शेख़ हसीना का जीवन ख़तरे में पड़ सकता है."
उस अधिकारी के मुताबिक, शेख़ हसीना ने सोचा था कि अगर बलप्रयोग से 'लॉन्ग मार्च टू ढाका' को रोकने में कामयाबी मिल जाती है तो वो अपने पद से इस्तीफ़ा नहीं देंगी. लेकिन साथ ही इसमें नाकाम रहने की स्थिति में उन्होंने देश छोड़ने की भी तैयारी कर रखी थी.
भारत से पहले ही हो चुकी थी बात

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अधिकारियों ने बताया कि देश से पलायन करने के मुद्दे पर भारत के साथ पहले ही संपर्क किया गया था.
भारत की ओर से बताया गया था कि अगर शेख़ हसीना बांग्लादेश के हेलीकॉप्टर के ज़रिए भारत में अगरतला तक पहुंच सकें तो वहां से उनको विशेष विमान से दिल्ली ले जाया जाएगा.
हसीना को बांग्लादेश वायु सेना के एक विमान से दिल्ली से सटे हिंडन एयरपोर्ट तक ले जाया गया.
शेख़ हसीना के पुत्र सजीब वाजिद ने बीबीसी को बताया कि उनकी मां देश नहीं छोड़ना चाहती थीं. लेकिन परिवार के सदस्य उनकी सुरक्षा को लेकर चिंतित थे. इसलिए परिवार के तमाम सदस्य उन पर किसी सुरक्षित स्थान पर जाने के लिए दबाव बनाते रहे.
दैनिक प्रथम आलो ने लिखा है कि सोमवार सुबह पुलिस और सेना प्रमुखों ने शेख़ हसीना को इस्तीफ़ा देने के लिए तैयार करने की ख़ातिर उनकी बहन शेख़ रेहाना के साथ भी बातचीत की.
अख़बार ने अपनी रिपोर्ट में लिखा है, “शीर्ष अधिकारियों ने एक अलग कमरे में शेख़ रेहाना के साथ बातचीत की. उनको पूरी परिस्थिति की जानकारी देते हुए शेख़ हसीना को पद छोड़ने के लिए समझाने का अनुरोध किया गया.”
“उसके बाद रेहाना ने अपनी बड़ी बहन हसीना के साथ बातचीत की. लेकिन वो (हसीना) सत्ता में बने रहने पर अडिग थीं. उसी दौरान एक शीर्ष अधिकारी ने अमेरिका में हसीना के पुत्र सजीब वाजिद से भी फ़ोन पर बातचीत की. उसके बाद सजीब ने अपनी मां से बात की. उसके बाद ही आख़िरकार हसीना अपने पद से इस्तीफ़ा देने के लिए तैयार हुई.”
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