बांग्लादेश में हालात बिगड़ने के पीछे क्या कोई 'विदेशी एंगल' भी है?

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- Author, नितिन श्रीवास्तव
- पदनाम, संपादक, बीबीसी हिन्दी
पिछले कुछ वक्त से बांग्लादेश में शेख़ हसीना सरकार के लिए सबकुछ अच्छा नहीं चल रहा था.
घरेलू मोर्चे पर जहां उन्हें विपक्षी पार्टियों के दबाव और प्रदर्शनों का सामना करना पड़ा.
वहीं विदेश मोर्चे पर भी भारत और चीन के बीच संतुलन की सरकार की नीति सटीक नहीं बैठ रही थी.
पिछले महीने चीन के दौरे पर गईं शेख़ हसीना तय समय से पहले ही वापस आ गई थीं.
ऐसा माना गया कि शेख़ हसीना जो सोचकर चीन गई थीं, वो हासिल नहीं हुआ.
बांग्लादेश में भारत की पूर्व उच्चायुक्त वीना सीकरी बीबीसी हिन्दी से कहती हैं कि चीन में शेख़ हसीना को उचित सम्मान नहीं दिया गया, शी जिनपिंग के साथ वो जो बैठक चाहती थीं वो भी नहीं हो पाई.

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वीना कहती हैं, ''ये नहीं समझ आता कि चीन की सरकार ने आख़िर क्या सोचकर ऐसा किया. क्योंकि उस दिन तक चीन की सरकार, बांग्लादेश की सरकार के साथ दोस्ताना रिश्ते दिखा रही थी और ऐसे बयान भी दे रही थी.''
चीन से वापस आते ही शेख़ हसीना ने भारत के लिए एक बड़ा एलान कर दिया था. शेख़ हसीना का कहना था कि तीस्ता परियोजना में भारत और चीन दोनों की दिलचस्पी थी लेकिन वह चाहती हैं कि इस परियोजना को भारत पूरा करे.
इस बीच भारत और चीन से हसीना सरकार के संबंधों को लेकर बांग्लादेश में ही सवाल उठ रहे थे.
जिस पर हसीना ने कहा था, ''चीन से हमारे संबंध अच्छे हैं. इससे पहले मैं भारत दौरे पर गई थी, तब कहा गया कि मैंने देश भारत को बेच दिया है. मैं चीन गई तो कुछ हासिल नहीं हुआ. ये सब बयान आते रहते हैं. मुझे लगता है कि लोग मानसिक रूप से बीमार हैं.''


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सियासत में उथल-पुथल
शेख़ हसीना के भारत और चीन पर दिए बयान को अभी एक महीने भी पूरे नहीं हुआ था कि शेख़ हसीना सत्ता से बेदखल हो गईं हैं.
5 अगस्त का दिन बांग्लादेश के लिए इतिहास बदलने वाला साबित हुआ.
आरक्षण पर चल रहे हिंसक प्रदर्शनों के राष्ट्रव्यापी आंदोलन में तब्दील हो जाने के बाद बांग्लादेश की प्रधानमंत्री शेख़ हसीना ने देश छोड़ दिया.
वो एक सैन्य विमान से दिल्ली के पास गाजियाबाद के हिंडन एयरबेस पहुंचीं.
इसके बाद ऐसी ख़बरें आईं कि भारत के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोभाल ने शेख़ हसीना से मुलाक़ात की.
इसी बीच बांग्लादेश में सेना प्रमुख जनरल वकार ने अंतरिम सरकार के गठन का एलान कर दिया.

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''विदेशी एंगल''?
बांग्लादेश में मची इस उथल-पुथल को लेकर अब सवाल ये भी है कि क्या ये पूरा घटनाक्रम महज़ आरक्षण को लेकर प्रदर्शन पर टिका था या इसके पीछे कई और कारण शामिल थे.
सोशल मीडिया पर कई लोग इस बारे में दावा करते हुए सवाल उठा रहे हैं कि बांग्लादेश में जो हुआ, उसके पीछे विदेशी ताकतें हो सकती हैं?
बांग्लादेश में भारत की पूर्व उच्चायुक्त वीना सीकरी विदेशी ताकतों के शामिल होने की बात से इनकार नहीं करतीं.
वो कहती हैं कि ये देखना होगा कि आरक्षण में सुधार पर शुरू हुए आंदोलन का कैसे पूरा स्वरूप ही बदल गया है. ये बदलाव बहुत कुछ बताता है.
बांग्लादेश में भारत के पूर्व उच्चायुक्त हर्ष ऋंगला न्यूज़ एजेंसी एएनआई से कहते हैं, ''आप उन विदेशी ताकतों के शामिल होने की बात से इनकार नहीं कर सकते हैं, जो बांग्लादेश के हितों से और साफ़ तौर से हमारी सुरक्षा हितों के भी ख़िलाफ़ हैं.''
हालांकि, हर्ष ऋंगला इस पूरे घटनाक्रम के पीछे आर्थिक कारणों को भी ज़िम्मेदार मानते हैं.
उनका कहना है कि कोरोना महामारी के बाद जिस तरह से बांग्लादेश की अर्थव्यवस्था को बड़ा नुकसान पहुंचा, उसके बाद यूक्रेन संकट की वजह से ज़रूरी चीज़ों के दाम में और इज़ाफ़ा हो गया. इससे ईंधन, भोजन, खाद और वो सभी चीज़ें जो बांग्लादेश आयात करता है उसकी कीमतें बढ़ गईं.
ऋंगला का मानना है कि इन वजहों से भी ऐसी स्थिति पैदा हुई कि बांग्लादेश के लोग ख़ासकर युवा सड़कों पर उतर गए.

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शेख़ हसीना और प्रदर्शनकारी दोनों एक ही चीज़ चाहते थे: वीना सीकरी
वीना सीकरी हालिया प्रदर्शनों को सावधानीपूर्वक बनाई गई सुनियोजित रणनीति बताती हैं और ये भी कहती हैं कि आरक्षण के मुद्दे पर तो सरकार और छात्र एक ही विचार रखते थे.
वो बोलीं, ''ये आरक्षण सुधार आंदोलन 2018 में शुरू हुआ था. तब शेख़ हसीना सरकार ने प्रदर्शनकारियों की सभी मांगों को मान लिया था. लेकिन इसके ख़िलाफ़ जून के महीने में हाईकोर्ट में अपील हुई और आरक्षण को बरकरार रखा गया. लेकिन शेख़ हसीना सरकार सुप्रीम कोर्ट गई. वो छात्रों के साथ थी, उन्होंने कहा था कि वो आरक्षण ख़त्म करेंगे.''
बाद में बांग्लादेश के सुप्रीम कोर्ट ने आरक्षण व्यवस्था को क़रीब-करीब ख़त्म ही कर दिया.
वीना कहती हैं कि ऐसे में छात्र जो चाहते थे उन्हें मिल गया तो छात्र इस पूरे घटनाक्रम में पीछे रह गए.
वो बोलीं, ''मुझे लगता है कि आरक्षण सुधार प्रदर्शन ख़त्म हो चुका था. अब ऐसा लगता है कि जमात-ए-इस्लामी और बीएनपी के छात्र शाखा के प्रदर्शनकारी आ गए और बहुत ज़्यादा हिंसा हुई.''
बीबीसी संवाददाता अकबर होसैन के मुताबिक़,
जो भी सरकार बनेगी, उसके लिए क़ानून व्यवस्था बड़ी चुनौती होगी. कई जगहों पर लूटपाट की ख़बरें आ रही हैं. कानून व्यवस्था से जुड़ी चीज़ों को नियंत्रित करना चुनौती से भरा रहेगा.
कई राजनीतिक जानकारों का कहना है कि अगर अंतरिम सरकार हालात को सामान्य बनाने में नाकाम रहती है तो हालात और बिगड़ेंगे.
सब कुछ साफ होते हुए भी शेख़ हसीना हालात को भांपने में नाकाम रहीं. वो समझ ही नहीं पाईं कि हो क्या रहा है या समझने की कोशिश भी नहीं की कि देश के युवा चाहते क्या हैं.
बांग्लादेश के युवा राजनीतिक तौर पर काफी जागरूक हैं. आरक्षण का मसला था पर वो चाहते थे कि न्याय हो.
हाल में हुए चुनावों को लेकर पश्चिमी देश सवाल उठा रहे थे क्योंकि विपक्षी दलों का सफाया कर दिया गया था. मानवाधिकारों को लेकर भी सवाल उठे. मगर हसीना ने किसी की नहीं सुनी.
बेरोज़गारी बढ़ गई थी, अभिव्यक्ति की आज़ादी नहीं थी. इसके बाद युवाओं के गुस्से, डर और हताशा के मिलने से ऐसे हालात बने और वो सड़कों पर उतरे.

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बांग्लादेश का लोकतंत्र और सेना
फिलहाल, बांग्लादेश की सेना ने देश में अंतरिम सरकार का गठन करने की घोषणा कर दी है.
एक दौर था जब बांग्लादेश की सेना का वहां प्रभुत्व था. लेकिन अभी दशकों से वो सत्ता में नहीं रही है.
अब प्रदर्शन के बाद पैदा हुए ऐसे हालात में सेना सामने आई है और देश में स्थिरता की बात कर रही है.
आख़िर, सेना का इस तरह से सामने आना क्या इशारा करता है?
वीना सीकरी का कहना है कि उन्हें नहीं लगता कि बांग्लादेश की सेना वहां सत्ता पर काबिज होना चाहती है.
''आज वो इसलिए सामने आए क्योंकि सिर्फ़ वही है जो हालात को नियंत्रण में ला सकती है. श्रीलंका में भी बिलकुल ऐसा ही हुआ था. प्रदर्शनकारियों ने वहां पर भी राष्ट्रपति आवास पर नियंत्रण हासिल कर लिया था. आर्मी चीफ़ ने कहा है कि वो कोशिश कर रहे हैं कि वो स्थिरता लाई जाए, इसके बाद चुनाव कराए जाएंगे.''

भारत पर कैसे होगा असर
शेख़ हसीना इस वक्त भारत में हैं और इस पड़ोसी देश में आए इस सियासी भूकंप के झटके भारत में भी लग सकते हैं.
वीना सीकरी मानती हैं कि इसका असर भारत पर पड़ेगा और भारत स्थिरता चाहता है.
वो कहती हैं, “भारत हमेशा चाहता है कि बांग्लादेश समेत उसके पड़ोसी स्थिर हों और वहां पर लोकतंत्र बना रहे. यह चाहत भारत की अब भी है…भारत की कोशिश स्थिरता लाने की होगी.”
सियासत से इतर भारत के बांग्लादेश के साथ कारोबारी रिश्ते भी बेहद मजूबत हैं. दक्षिण एशिया में बांग्लादेश, भारत का सबसे बड़ा व्यापार साझेदार है.
भारत ने पिछले एक दशक में बांग्लादेश को सड़क, रेलवे, बंदरगाहों के निर्माण के लिए हज़ारों करोड़ रुपये दिए हैं.
ऐसे में बांग्लादेश के मची इस हलचल पर भारत पूरी नज़र बनाए हुए है.
पांच अगस्त को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने आधिकारिक आवास पर इस मामले पर उच्चस्तरीय बैठक भी बुलाई थी, जिसमें गृहमंत्री अमित शाह, रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह, विदेश मंत्री एस. जयशंकर शामिल हुए थे.
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