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क्या संघ और बीजेपी के शक्ति संतुलन में बदलाव आ रहा है?
- Author, राघवेंद्र राव
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) और भारतीय जनता पार्टी के बीच गहरे सम्बन्ध कोई छुपी हुई बात नहीं हैं लेकिन ऐसे मौके कम ही आए हैं जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और आरएसएस के सरसंघचालक मोहन भागवत सार्वजनिक तौर पर एक साथ या एक ही मंच पर नज़र आए हों.
ऐसा एक मौका साल 2020 में तब आया था जब अयोध्या में राम मंदिर के भूमि पूजन पर दोनों साथ दिखे थे.
सोमवार को राम मंदिर के प्राण प्रतिष्ठा समारोह के दौरान फिर एक बार मोदी और भागवत एक साथ नज़र आए.
राम मंदिर के गर्भ गृह में भागवत मोदी के साथ पहले पूजा अर्चना करते दिखे और बाद में मंच से भाषण देते हुए भी.
बदलते रिश्ते?
भागवत प्राण प्रतिष्ठा में मौजूद ज़रूर थे लेकिन समारोह के नायक के तौर पर नहीं.
अपने भाषण में भागवत ने प्रधानमंत्री की तारीफ़ में कोई कमी नहीं रखी. उन्होंने कहा, "इस प्राण प्रतिष्ठा महोत्सव में पधारने से पहले प्रधानमंत्री जी ने कठोर व्रत रखा. जितना कठोर व्रत रखने को कहा था उससे कई गुना अधिक कठोर व्रताचरण उन्होंने किया. मेरा उनसे पुराना परिचय है और मैं जानता हूँ, वो तपस्वी हैं ही."
आरएसएस बीजेपी का अभिभावक संगठन है तो ये स्वाभाविक है कि उसका बीजेपी पर प्रभाव तो रहेगा ही, साथ ही, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी संघ के सक्रिय प्रचारक भी रहे हैं.
लेकिन पिछले कुछ सालों से जो लगातार चर्चा का विषय रहा है वो ये है कि क्या बीजेपी हमेशा आरएसएस के नियंत्रण में ही काम करती है? अगर नहीं तो आरएसएस का बीजेपी पर नियंत्रण किस हद तक है.
राम मंदिर के प्राण-प्रतिष्ठा समारोह में जहां धर्म और राजनीति के बीच की रेखाएं धुंधली होती दिखीं, वहीं भागवत की मौजूदगी ने भी एक सवाल पैदा किया: क्या बीजेपी और आरएसएस के रिश्तों में बदलाव आ रहा है?
'शक्ति संतुलन में बदलाव'
नीलांजन मुखोपाध्याय एक लेखक और राजनीतिक विश्लेषक हैं जिन्होंने बाबरी मस्जिद विध्वंस और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की प्रमुख हस्तियों पर किताबें लिखी हैं.
उनका कहना है कि मोहन भागवत को मंच पर बुलाया जाना और उनका भाषण देना महत्वपूर्ण है. वे कहते हैं कि अगस्त 2020 में भी मंदिर के भूमिपूजन के समय भागवत को यही जगह दी गई थी. वे कहते हैं, "आरएसएस और बीजेपी के बीच शक्ति के संतुलन में बदलाव आया है."
मुखोपाध्याय कहते हैं, "उस वक़्त (जब मोदी गुजरात के मुख्यमंत्री थे) आरएसएस के कुछ लोगों को ये उम्मीद थी कि मोदी मुख्यमंत्री हैं लेकिन वो हैं प्रचारक भी हैं इसलिए उन्हें संघ कार्यालय में आकर वरिष्ठ लोगों को रिपोर्ट करना चाहिए लेकिन मोदी संघ कार्यालय नहीं गए. लेकिन मुख्यमंत्री रहते हुए मोदी ने संघ के एजेंडे को आगे ही बढ़ाया."
मुखोपाध्याय कहते हैं, "मोदी का मानना है कि चुने हुए नेता को संघ कार्यालय में नहीं जाना है. जब वो प्रधानमंत्री बने तो मैंने एक लेख में लिखा था कि देखना होगा कि जिस तरह आरएसएस एक बड़े भाई की भूमिका में दिखता था क्या वो जारी रहेगा या वो बीजेपी का जुड़वा भाई बन जाएगा. कुछ वक़्त के बाद दोनों में समानता आ गई और आरएसएस का आधिपत्य ख़त्म हो गया."
'भागवत ने दिखाया कि बॉस वही हैं'
भागवत के गर्भ गृह में होने के क्या मायने हैं? क्या इसमें आरएसएस और बीजेपी के रिश्तों में आ रहे बदलाव की कोई झलक दिखती है?
वरिष्ठ पत्रकार रामदत्त त्रिपाठी कहते हैं, "बदलाव तो मैं नहीं देखता. मुझे लगता है कि कभी-कभी समय की मांग के हिसाब से स्क्रिप्ट, रोल और डायलॉग बदल जाते हैं, प्राण प्रतिष्ठा का जो सारा कार्यक्रम था वो मोदी जी का वैभव था, उनका जलवा दिखाने के लिए था क्योंकि आरएसएस जो है वो मोदी जी का इस्तेमाल अपने लॉन्ग-टर्म विज़न को पूरा करने के लिए कर रहा है. आरएसएस को मालूम है कि जो भी उनका विज़न है उसको पूरा करने के लिए एक बहुत बड़ी राजनीतिक ताक़त चाहिए."
त्रिपाठी कहते हैं कि आरएसएस बीजेपी का मातृ संगठन है लेकिन कभी-कभी लोगों को ये लगने लगा था कि आरएसएस बीजेपी की सांस्कृतिक शाखा है और आरएसएस प्रमुख एक छोटी शख़्सियत हैं.
वे कहते हैं, "लेकिन मोहन भागवत ने आज दिखा दिया कि बॉस तो वही हैं, लेकिन जो राजनीतिक प्रोजेक्ट है उसके लीडर मोदी ही हैं. अगर वो बॉस नहीं हैं तो गर्भ गृह में उनके होने की क्या ज़रुरत थी, मोदी जी की क्या मजबूरी थी?"
'भागवत अब मोदी को निर्देश नहीं दे सकते'
अटल बिहारी वाजपेयी जब प्रधानमंत्री थे तब उनके और तत्कालीन सरसंघचालक के एस सुदर्शन के बीच मधुर सम्बन्ध नहीं रहे. कई मुद्दों पर दोनों के बीच मतभेद होने की खबरें अक्सर आती रहती थीं.
जब बीजेपी ने 2014 का चुनाव जीत कर सरकार बनाई और नरेंद्र मोदी प्रधानमंत्री बने तो एक लम्बे अरसे तक ये चर्चा का विषय रहा कि किस तरह पार्टी और सरकार की डोर नागपुर (आरएसएस का मुख्यालय) के हाथ में है.
उस वक़्त ये बात भी छुपी नहीं थी कि मोदी सरकार के कई मंत्री आरएसएस के दिल्ली के झंडेवालान-स्थित कार्यालय में नियमित तौर पर 'हाज़िरी' देने जाते थे और अपने मंत्रालयों के कार्यों का लेखा-जोखा देते थे.
नीलांजन मुखोपाध्याय कहते हैं कि जहाँ तक उनकी जानकारी है उसके मुताबिक़ मोदी कभी मोहन भागवत से मिलने नहीं गए. वे कहते हैं, "अगर वो मिलें हैं तो संभवतः मोदी ने भागवत को अपने घर बुलाया होगा. कई मौकों पर भागवत ने सार्वजानिक तौर पर मोदी की तारीफ़ की है जो कि पहले कभी नहीं होता था. निश्चित रूप से संघ परिवार के भीतर सत्ता समीकरणों में फेरबदल हुआ है. सरसंघचालक अब वो सुप्रीमो नहीं रह गए हैं जो प्रधानमंत्री को निर्देश दे सकें."
मुखोपाध्याय कहते हैं कि प्रधानमंत्री मोदी ने कभी भी संघ के किसी भी सिद्धांत का उल्लंघन नहीं किया है.
वे कहते हैं, "बल्कि वो हमेशा की तरह उतने ही कट्टर प्रचारक हैं. तो संघ क्यों नाराज़ होगा? शासन के तरीक़े पर कुछ मतभेद हो सकते हैं. लेकिन प्रधानमंत्री ने भी संघ को बताया होगा कि सरकार चलाना उनका काम है और अगर संघ को सरकार की किसी नीति से दिक्क़त है तो वो उन्हें बताएं."
आगे की राह?
ज़रूरी सवाल ये है कि आने वाले समय में बीजेपी और आरएसएस के रिश्ते किस दिशा में बढ़ेंगे?
राजनीतिक विश्लेषक मानते हैं कि बीजेपी सरकार का केंद्र में होने का आरएसएस को बहुत फ़ायदा मिल रहा है. साथ ही, बीजेपी ये समझती है कि आरएसएस के ज़मीनी कार्यकर्ताओं के बिना उसके लिए चुनाव जीतना आसान नहीं होगा. तो दोनों को ही एक दूसरे की ज़रुरत है और इसीलिए दोनों के बीच कोई टकराव नहीं होगा.
नीलांजन मुखोपाध्याय कहते हैं, "वाजपयी दौर के उलट, चूंकि नरेंद्र मोदी के पास भरपूर संख्या है तो वो सरकार के कई विभागों और परिषदों को संघ परिवार के लोगों से भरने में सक्षम हैं.
मुखोपाध्याय के मुताबिक आने वाले समय में आरएसएस और बीजेपी के बीच पूरा तालमेल रहेगा. वे कहते हैं, "आरएसएस को फ़ायदा हो रहा है. 2004 में आरएसएस उतनी उत्साहित नहीं थी क्यूंकि वाजपई और सुदर्शन में रिश्ते ख़राब थे और वाजपयी आरएसएस और उसके लोगों के लिए कुछ नहीं कर पाए थे.अभी कोई समस्या नहीं है."
वे कहते हैं कि आरएसएस ने बैकसीट ले ली है. "आरएसएस इस बात को समझ गया है कि मोदी नतीजे ला रहे हैं और वो आरएसएस के एजेंडा और विचारधारा को पूरा कर रहे हैं. और वो समझ गए हैं कि मोदी को स्वायत्तता देनी होगी. अगर मोदी लाइन से भटके तो वे हल्का-सा इशारा करेंगे और देखेंगे की क्या करना है."
दूसरी तरफ रामदत्त त्रिपाठी कहते हैं कि प्राण प्रतिष्ठा समारोह के दौरान मोहन भागवत ने अपने भाषण में कहा ही कि जोश में होश बनाए रखना ज़रूरी है.
त्रिपाठी कहते हैं, "उनका मतलब ये था कि ये मेरी सेना है और मैं नियंत्रक हूँ और ये सबको कहा कि अनुशासन में रहना है, संयम से रहना है क्योंकि डर ये है कि जो ऊर्जा आज पैदा हुई है तो अगर अयोध्या जैसी घटनाएँ दूसरी जगहों पर होने लगीं तो उसे नियंत्रित करना मुश्किल हो जाएगा. भागवत कहना चाहते हैं कि योजना के मुताबिक कार्यक्रम बताए जाएँ कार्यकर्त्ता सिर्फ उतना ही करें. जो सांस्कृतिक पुनरुत्थान की बात कर रहे हैं तो वो अपने आप ही कहीं मस्जिद और मज़ार के नाम पर न भिड़ जाएँ."
त्रिपाठी के मुताबिक़ प्राण प्रतिष्ठा के बाद मोदी और भागवत ने अपने ऊपर बहुत बड़ी ज़िम्मेदारी ओढ़ ली है क्योंकि उन्होंने राम राज्य की बात की है.
वे कहते हैं, "काडर तो आरएसएस कंट्रोल करता है. इसमें किसी को ग़लतफ़हमी नहीं होनी चाहिए. आरएसएस की हर बात तो वाजपेयी जी भी नहीं मानते थे लेकिन स्क्रिप्ट आरएसएस से ही लिख कर आती थी. सबकी भूमिका पहले से तय होती थी."
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