राम मंदिर की प्राण प्रतिष्ठा में जाने से कांग्रेस को फ़ायदा होगा या नुक़सान?

    • Author, मोहम्मद शाहिद
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता

इस महीने 22 जनवरी को अयोध्या के राम मंदिर की प्राण प्रतिष्ठा होने जा रही है. इस समारोह में शामिल होने के लिए तक़रीबन 7,000 मेहमानों को निमंत्रण दिया गया है जिनमें 3,000 वीवीआईपी शामिल हैं.

विश्व हिंदू परिषद ने बताया है कि राम मंदिर के उद्घाटन के लिए सभी प्रमुख राजनीतिक दलों के बड़े नेताओं को निमंत्रण दिया गया है.

कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे और पूर्व अध्यक्ष सोनिया गांधी से लेकर सीपीएम के महासचिव सीताराम येचुरी को इस समारोह का निमंत्रण दिया गया है.

सीताराम येचुरी ने कहा है कि वे इस समारोह में भाग नहीं लेंगे. वहीं कांग्रेस समेत इंडिया गठबंधन के दूसरे दलों ने अब तक ये साफ़ नहीं किया है कि वो इस समारोह में जाएंगे या नहीं.

क्या पसोपेश में है कांग्रेस?

कुछ दिनों पहले मीडिया में आई रिपोर्टों में ये दावा किया गया था कि सोनिया गांधी इस समारोह में हिस्सा लेंगी.

लेकिन बीते शुक्रवार को कांग्रेस पार्टी ने साफ़ किया कि उनके समारोह में शामिल होने को लेकर सही समय पर घोषणा की जाएगी.

कांग्रेस प्रवक्ता जयराम रमेश बयान दे चुके हैं कि सही समय पर फ़ैसला लिया जाएगा.

अंग्रेज़ी अख़बार द टेलीग्राफ़ ने बुधवार को एक रिपोर्ट प्रकाशित की है जिसमें बताया गया है कि कांग्रेस के इस समारोह में शामिल होने की प्रबल संभावनाएं हैं.

पार्टी के एक वरिष्ठ नेता अख़बार से कहते हैं कि उनकी (कांग्रेस) लड़ाई बीजेपी से वैचारिक और राजनीतिक है और पार्टी राम मंदिर के ख़िलाफ़ नहीं है.

इस अनाम नेता ने अख़बार से कहा, "हम आरएसएस-बीजेपी से ज़्यादा धार्मिक हैं और वो केवल धर्म का इस्तेमाल राजनीति के फ़ायदे के लिए करते हैं. हम बिलकुल सांप्रदायिक नहीं हैं और सभी धर्मों का सम्मान करते हैं. हमें राम मंदिर समारोह का बहिष्कार क्यों करना चाहिए?"

22 जनवरी को होने वाले प्राण प्रतिष्ठा कार्यक्रम में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी शामिल होंगे. वो दोपहर 12.15 बजे के क़रीब गर्भगृह में अनुष्ठान शुरू करेंगे.

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 5 अगस्त, 2020 को अयोध्या में राम मंदिर की आधारशिला रखी थी.

राम मंदिर आंदोलन में बीजेपी सबसे आगे रही है और विश्लेषक अयोध्या में बन रहे राम मंदिर का श्रेय बीजेपी और आरएसएस को ही देते हैं.

क्यों फ़ैसला नहीं ले पा रही कांग्रेस?

तो अब सवाल ये उठता है कि कांग्रेस राम मंदिर के प्राण प्रतिष्ठा समारोह में शामिल होने को लेकर अब तक कोई फ़ैसला क्यों नहीं ले पाई है?

इस सवाल पर वरिष्ठ पत्रकार नीरजा चौधरी भी हैरत जताती हैं और कहती हैं कि 90 के दशक में कांग्रेस ने अपने घोषणा-पत्र में क़ानूनी तरीक़े या बातचीत के ज़रिए राम मंदिर निर्माण के लिए हामी भरी थी, इस लिहाज़ से तो उसे इस समारोह में जाना चाहिए.

वो कहती हैं, "1992 में बाबरी मस्जिद को ढहाए जाने के बाद राम मंदिर का मुद्दा चुनावों में कभी भी निर्णायक नहीं रहा है लेकिन इस बार मंदिर के बनने का श्रेय पीएम मोदी को दिया जा रहा है. 22 जनवरी को होने वाली प्राण प्रतिष्ठा के बाद लोगों की नज़र में मंदिर भी उतना ही महत्वपूर्ण होगा जितना कि नरेंद्र मोदी की शख़्सियत. और इस साल होने वाले लोकसभा चुनाव में इसी मुद्दे को लेकर बीजेपी जनता के पास जाएगी."

"इस वजह से कांग्रेस को लगता है कि वो बीजेपी के कार्यक्रम में क्यों जाए क्योंकि इसका सीधा फ़ायदा उसी को होगा. लेकिन न जाने से कांग्रेस की छवि को बीजेपी हिंदू विरोधी के तौर पर पेश करेगी. इसी कारण से कांग्रेस दुविधा में बनी हुई है."

टेलीग्राफ़ ने अपनी रिपोर्ट में कांग्रेस के नेता के हवाले से लिखा है कि कांग्रेस नेतृत्व की दुविधा से जुड़ी ख़बरें बीजेपी को फ़ायदा पहुंचाने के लिए मीडिया के ज़रिए गढ़ी गई साज़िश है.

कांग्रेस के इस वरिष्ठ नेता ने टेलीग्राफ़ अख़बार से कहा, "हम मंदिर, मस्जिद, चर्च, गुरुद्वारा हर जगह जाते हैं और हमें राम मंदिर के उद्घाटन में क्यों नहीं जाना चाहिए? सुप्रीम कोर्ट के निर्देश पर बने नेशनल ट्रस्ट ने हमें निमंत्रण दिया है."

मुसलमानों का है दबाव?

कांग्रेस की केरल में सहयोगी पार्टी इंडियन यूनियन मुस्लिम लीग (आईयूएमएल) ने कांग्रेस के समारोह में जाने का विरोध किया है.

केरल में कांग्रेस के नेता और कांग्रेस कार्य समिति (सीडब्ल्यूसी) के सदस्य शशि थरूर ने इस समारोह को बीजेपी का सियासी मंच बताया है.

उन्होंने 28 दिसंबर को एक्स (पहले ट्विटर) पर ट्वीट किया था, "मेरा मानना है कि धार्मिक आस्था एक निजी मामला है और इसे सियासी चश्मे से नहीं देखना चाहिए या इसका राजनीतिक दुरुपयोग नहीं होना चाहिए. मैं उम्मीद करता हूँ कि जितने लोगों को राम मंदिर की प्राण प्रतिष्ठा में बुलाया गया है वो जाने या नहीं जाने का चुनाव अपनी पसंद के हिसाब से करने के लिए स्वतंत्र होंगे. मैं उम्मीद करता हूं कि जो नहीं जाएंगे उन्हें हिन्दू विरोधी नहीं कहा जाएगा और जो जाएंगे उन्हें बीजेपी के हाथों खेलने की बात नहीं की जाएगी."

वरिष्ठ पत्रकार और राजनीतिक विश्लेषक विनोद शर्मा कहते हैं कि राजनेताओं के इस समारोह में जाने को लेकर मुस्लिम समुदाय को कोई आपत्ति नहीं है.

विनोद शर्मा कहते हैं, "इस समुदाय (मुस्लिम) ने राम मंदिर विवाद पर आए सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले को स्वीकार किया है. ऐसा माहौल बनाया जा रहा है कि पार्टियों के वहां जाने से मुसलमान नाराज़ होंगे लेकिन इससे मुसलमानों को फ़र्क नहीं पड़ता. कांग्रेस पार्टी के वहां जाने से उसका मुस्लिम वोट नहीं छिटकेगा."

वहीं, नीरजा चौधरी कहती हैं कि कांग्रेस के लिए केरल बहुत महत्वपूर्ण है क्योंकि ये उसके कुछ उन चुनिंदा राज्यों में बचा है जहां वो मज़बूत है और वो अपने सहयोगी संगठन आईयूएमएल को नाराज़ भी नहीं करना चाहती है.

वो कहती हैं, "मंदिर के बनने से 90 फ़ीसदी हिंदू ख़ुश हैं और यह सच्चाई है. और एक राष्ट्रीय पार्टी (कांग्रेस) इसको कैसे नज़रअंदाज़ कर सकती है. राम का बीजेपी ने बहुत ख़ूबी से इस्तेमाल किया है और राम से कैसे निपटेंगे ये कांग्रेस के आगे चुनौती है."

"विश्वनाथ प्रताप सिंह और पीवी नरसिम्हा राव कह चुके हैं कि 'हम बीजेपी से तो लड़ लेते लेकिन राम से कैसे लड़ेंगे.' कांग्रेस के सामने अजीब स्थिति रही है कि उसके पास इसका काउंटर नैरेटिव नहीं है."

"कांग्रेस अगर इस समारोह में नहीं जाती है तो बीजेपी ये दिखाने की कोशिश करेगी कि उन्हें (कांग्रेस) हिंदू हित की फ़िक्र नहीं हैं. आईयूएमएल पहले ही चेतावनी दे चुकी है तो बीजेपी दिखाएगा कि ये 'मुस्लिम पार्टी' के डर से नहीं गए."

कांग्रेस को समारोह में जाने से होगा फ़ायदा?

साल 2019 में राम मंदिर पर आए सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले के बाद सीडब्ल्यूसी ने बयान जारी कर फ़ैसले का स्वागत किया था.

विनोद शर्मा कहते हैं कि पूर्व गृह सचिव माधव गोडबोले ने लिखा था कि ये (राम मंदिर का मुद्दा) 'रामायण का महाभारत' है जिसे बंद होना चाहिए. सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले ने इस मुद्दे को समाप्त कर दिया है.

कांग्रेस के समारोह में जाने से लाभ होगा या नुक़सान? इस सवाल पर विनोद शर्मा कहते हैं, "अगर ये (कांग्रेस) नहीं जाएंगे तो बीजेपी जगह-जगह कहेगी कि इन्होंने (कांग्रेस) भगवान राम की बेइज़्ज़ती कर दी और ये शुरू से भगवान राम के ख़िलाफ़ थे. पुराने गड़े मुर्दे उखाड़े जाएंगे लेकिन तथ्य ये है कि राजीव गांधी की सरकार के वक़्त में दरवाज़े खुले थे."

साल 1986 में एक डिस्ट्रिक्ट कोर्ट के फ़ैसले के बाद बाबरी मस्जिद का ताला खुलवा दिया गया था, जहां पर रामलला की मूर्ति रखी हुई थी.

राजनीतिक सौदेबाज़ी

ऐसा माना जाता है कि राजीव गांधी की सरकार ने (तब उत्तर प्रदेश में भी कांग्रेस की ही सरकार थी) बाबरी मस्जिद का ताला इसलिए खुलवाया था क्योंकि उसने मुस्लिम तलाक़शुदा महिला शाह बानो के मामले को संसद से क़ानून लाकर सुप्रीम कोर्ट के गुज़ारा भत्ता पर दिए गए फ़ैसले को उलट दिया था. इस पूरे मामले को कांग्रेस की राजनीतिक सौदेबाज़ी बताया जाता है.

विनोद शर्मा कहते हैं कि कांग्रेस की समावेशी विचारधारा रही है जिसमें हर तरह के लोग रहे हैं तो ऐसे समारोह में जाना उसकी विचारधारा के ख़िलाफ़ नहीं है.

"कांग्रेस को दोबारा वही स्वरूप हासिल करना पड़ेगा, उसमें अल्पसंख्यकों के हित की चिंता है लेकिन उसे ऐसा कोई मौक़ा नहीं खोना चाहिए जो उसे बहुसंख्यक विरोधी बना दे."

2019 के सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले के समय राहुल और प्रियंका गांधी ने ट्वीट करके कहा था कि हर नागरिक को कोर्ट के फ़ैसले का सम्मान करन चाहिए और सामाजिक सौहार्द्र बनाए रखना चाहिए.

हालांकि, एक तथ्य ये भी है कि बाबरी मस्जिद का ताला खुलवाए जाने से लेकर, राम की मूर्ति रखे जाने और बाबरी मस्जिद को तोड़े जाने के समय केंद्र में कांग्रेस की ही सरकार थी.

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