हज के दौरान मरने वालों का अंतिम संस्कार कैसे होगा?

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- Author, संजना चौधरी
- पदनाम, बीबीसी न्यूज़ बांग्ला
इस साल सऊदी अरब में हज करने के लिए गए भारतीय नागरिकों में से अब तक 68 लोगों की मौत की खबरें आई है. एक सऊदी राजनयिक ने अपना नाम न ज़ाहिर करते हुए समाचार एजेंसी एएफ़पी को बताया है कि कुछ मौतें मौसम की वजह से भी हुई हैं.
सऊदी अरब के दो राजनयिकों ने समाचार एजेंसी एएफ़पी को बताया है कि अब तक हज के दौरान 600 से अधिक लोगों की मौत हो चुकी है.
बांग्लादेश के भी 21 लोगों की मौत हज के दौरान हुई है. इनमें से 18 पुरुष हैं और तीन महिलाएं. उन सबकी उम्र 48 से 90 साल के बीच है. बांग्लादेश की ओर से जारी हज संबंधित ताजा बुलेटिन में यह जानकारी दी गई है.
इस बुलेटिन के मुताबिक, मक्का में 18, मदीना में चार और मीना में एक हज यात्री की मौत हुई है. उनमें से 17 लोगों की मौत हज का रिवाज शुरू होने से पहले हुई जबकि चार लोग बाद में मारे गए.
वहीं, सऊदी अरब की सरकारी मीडिया ने बताया है कि मक्का में हज के लिए जाने वाले 570 से ज्यादा लोगों की मौत हुई है. उनमें बांग्लादेश के हज यात्री भी शामिल हैं. मृतकों में आधे से ज्यादा लोग मिस्र के नागरिक हैं.
सऊदी अधिकारियों ने बताया है कि असहनीय गर्मी और तेज लू और बीमारी के कारण ही हज यात्रियों की मौत हुई है. उनका कहना है कि वहां छांव में ही करीब 51.8 डिग्री सेल्सियस तापमान रिकॉर्ड किया गया है.
सऊदी अरब में हर साल हज के लिए जाने वाले कई लोगों को बेहद गर्मी, भीड़ से कुचल कर, बीमार होकर या सड़क हादसे समेत अलग-अलग वजहों से मौत हो जाती है.
ऐसे मामलों में आगे क्या करें?

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सवाल उठता है कि क्या उनके शव को स्वदेश ले आया जा सकता है? या फिर वहीं अंतिम संस्कार किया जाएगा? शव की शिनाख्त कैसे होगी? मृत्यु प्रमाणपत्र कहां से मिलेगा?
ऐसी मामले में सऊदी अरब के हज संबंधित क़ानून में साफ जिक्र किया गया है कि अगर हज के दौरान किसी व्यक्ति की मौत हो जाती है तो उसका शव उसके देश में नहीं भेजा जाता. उसे सऊदी अरब में ही दफना दिया जाता है.
हज यात्रा की तैयारी करते समय हर व्यक्ति हज से संबंधित एक आवेदन पत्र पर हस्ताक्षर करता है. उसमें लिखा होता है कि अगर सऊदी अरब की ज़मीन पर या आसमान में उसकी मौत हो जाती है तो उसके शव को वहां दफना दिया जाएगा. उनके परिवार या परिजनों की कोई आपत्ति स्वीकार नहीं की जाएगी.
सीधे शब्दों में कहें तो मृतकों के परिवार सऊदी सरकार से हज यात्रियों के शव को उनके वतन भेजने की कोई मांग या अनुरोध नहीं कर सकते. अगर उन्होंने ऐसा किया भी तो सऊदी सरकार इसे स्वीकार नहीं करेगी.
सऊदी अरब में हज के लिए जाने वाले हज यात्रियों को अपने रहने के ठिकाने, सड़क हादसे या अस्पताल में मौत होने की स्थिति में सबसे पहले सूचना सऊदी स्थित उस देश के हज मिशन को देनी होगी, जहां का वो शख़्स नागरिक है.
हज मिशन को इसकी जानकारी मोनाज्जेम या मोअल्लेम्स की ओर से दी जाती है. मोअल्लेम सऊदी अरब के गाइड को कहा जाता है. उसके अधीन कई एजेंसियां होती हैं.
कई बार अस्पताल प्रबंधन या आम लोग भी सीधे हज मिशन को ऐसे मामलों की सूचना दे देते हैं. यह इस बात पर निर्भर है कि हज यात्री की मौत कहां हुई है.
आमतौर पर हज यात्रियों के हाथ में लगे बैंड या गले में लटके पहचान पत्र पर उसका नाम, उम्र, एजेंसी, राष्ट्रीयता और पहचान नंबर समेत कई प्राथमिक सूचनाएं दर्ज रहती हैं.
इसके बाद हज मिशन मृतक की तस्वीर और प्राथमिक सूचनाओं का मिलान अपने पास मौजूद सूचनाओं और तस्वीर से करने के बाद उनकी पहचान की पुष्टि करता है. मृतक के साथ अगर कोई परिजन, परिचित है तो वह भी उसकी शिनाख्त कर सकता है.
इसके बाद हज मिशन उस देश में रहने वाले मृतक के परिवार और सऊदी अरब के हज मंत्रालय को इसकी जानकारी देता है. उसके साथ ही वेबसाइट पर भी इसकी जानकारी अपडेट की जाती है.
ऐसे मामलों में मृतक के परिजनों या परिवार के किसी सदस्य के सऊदी अरब पहुंच कर अपने परिजन के शव के अंतिम दर्शन का कोई मौका नहीं रहता. हालांकि अगर कोई परिजन उस समय मक्का में ही है तो उसे शव को देखने और जनाजे में शामिल होने का मौका मिलता है.
बांग्लादेश इस्लामिक फाउंडेशन के धार्मिक सिद्धांतकार डॉ. ओलिवर रहमान ख़ान ने बताया है कि मृतक के शव की शिनाख्त नहीं होने की स्थिति में उसकी पहचान की पुष्टि के लिए उसे 15 दिनों तक शवगृह में रखा जा सकता है.
भारत में हज यात्रा की ज़िम्मेदारी किसकी?

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शव की शिनाख्त होने के बाद नज़दीकी अस्पताल या मृतक हाजी के देश के हज दफ्तर के चिकित्सा केंद्र से सर्टिफाइड डॉक्टर के प्रमाणपत्र या मृत्यु प्रमाणपत्र लेना पड़ता है. मोअल्लेम कार्यालय भी क्लीयरेंस देता है.
भारत से हज करने जाने वाले हज यात्रियों की देखभाल और सुविधाओं की व्यवस्था की ज़िम्मेदारी भारतीय हज समिति और उसके तहत काम करने वाली राज्य स्तर की हज समितियां संभालती हैं.
जब किसी भारतीय हाजी की मौत होती है तो सऊदी सरकार मृत्यु प्रमाणपत्र भारत के हज मिशन को देती है. इसके बाद भारत में रहने वाले मृत व्यक्ति के परिजन हज दफ्तर से मृत्यु प्रमाणपत्र हासिल कर सकते हैं.
कई मामलों में वह प्रमाणपत्र संबंधित हज यात्री की एजेंसी को भी सौंप दिया जाता है.
शव की पहचान होने और मृत्यु प्रमाण पत्र जारी होने के बाद शव को नहलाने और अंतिम संस्कार की प्रक्रिया शुरू होती है.
किसी हज यात्री को कहां दफनाया जाएगा, यह उसकी मौत के स्थान पर निर्भर करता है. अगर किसी की मौत मक्का में होती है तो उसके शरीर को मक्का के रुसैफा में नहलाया और दफनाया जाता है.
इसी तरह मदीना या जेद्दा में मौत की स्थिति में अलग जगह पर इसकी व्यवस्था है. हज यात्रियों के शव को ले जाने के लिए सऊदी सरकार की ओर से फ्रीजर वैन की इंतजाम रहता है.
ऐसे मामलों में मृतक के परिजन या उसके देश की सरकार को कोई खर्च नहीं करना पड़ता. उनको कोई जिम्मेदारी भी नहीं लेनी होती.
अगर किसी हज यात्री की मक्का, मीना और मुज़दलिफ़ा में रहते हुए मृत्यु हो जाती है तो जनाज़ा मस्जिद अल-हरम या काबा शरीफ़ में किया जाता है. मदीना में मौत की स्थिति में मस्जिद-ए-नबवी में जनाजा होता है. इसके अलावा जेद्दा या कहीं और मौत होने पर स्थानीय मस्जिद में जनाजा निकलता है.
मक्का में जनाजे के लिए शव को पहले वाहन से ले जाकर काबा शरीफ़ के दक्षिण में स्थित बाब-ए- इस्माइल के पास रखा जाता है.
कैसे तय होता है शव को मक्का या मदीना में दफ़नाया जाए

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मस्जिद के इमाम हर वक्त की फ़र्ज़ नमाज़ के बाद जनाजे की नमाज़ की घोषणा करते हैं. उसी दौरान बता दिया जाता है कि वहां कितने लोगों के लिए नमाज़ पढ़ी जाएगी. उनमें पुरुषों, महिलाओं और बच्चों की संख्या का भी ज़िक्र रहता है.
मक्का में आमतौर पर इमाम शव को रखे जाने की जगह पर आकर जनाजे की नमाज़ पढ़ते हैं. कई बार काबा शरीफ के दक्षिण में मताफ़ के पास तुर्की हरम से भी जनाजे की नमाज़ पढ़ाई जाती है.
मक्का की मस्जिद हरम और मदीना की नबवी मस्जिद में लगभग हर बार फ़र्ज़ की अनिवार्य नमाज़ के बाद एक या उससे ज्यादा बार जनाजे की नमाज़ पढ़ी जाती है. इसे फ़र्ज़ कहा जाता है.
हज यात्री का जनाजा इन दोनों मस्जिदों से निकलता है. यह इस बात पर निर्भऱ है कि शख़्स की मौत कहां हुई है. अगर हज यात्री की मौत इन दोनों शहरों के बीच में कही होती है तो परिवार से पूछा जाता है कि शव को मक्का में दफनाया जाए या मदीना में. जनाजे के बाद उसे मक्का के शराया कब्रिस्तान में दफनाया जाता है. इससे पहले शव को काबा शरीफ के पास जन्नतुल मोअल्ला में दफनाया जाता था.
मदीना में मरने वालों को मस्जिद अल-नबवी के बगल में बक़ी-उल गरकद या जन्नतुल बक़ी में दफनाया जाता है.
जेद्दा या दूसरे किसी शहर में मरने वाले हज यात्रियों का स्नान, कफन और जनाजा जेद्दा में होता है. उनको जेद्दा के स्थानीय क़ब्रिस्तान में ही दफनाया जाता है.

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लेकिन अगर मृतक का परिवार चाहे तो उस व्यक्ति को मक्का या मदीना के क़ब्रिस्तान में भी दफनाया जा सकता है. हज यात्री की क़ब्र चाहे कहीं भी हो, उसके क़ब्र पर उसके नाम या परिचय की कोई पट्टी नहीं लगाई जाती. वहां क़ब्र बनाने या उसे ख़रीद कर रखने का कोई नियम नहीं है.
क़ब्रिस्तान के रजिस्टर में यह बात दर्ज रहती है कि किस हज यात्री का शव कितने नंबर की क़ब्र में है. ऐसा इसलिए किया जाता है ताकि मृतक के परिजन अगर क़ब्र पर जियारत करना चाहें तो उसे क़ब्र की शिनाख्त करने में आसानी हो.
किसी हज यात्री की मौत की स्थिति में शव को नहलाने, कफन पहनाने, जनाजा पढ़ाने औऱ दफन करने समेत तमाम कामों की ज़िम्मेदारी सऊदी सरकार की होती है. इसके लिए अलग-अलग विभाग है. ऐसे मामले में रेड क्रिसेंट भी काफी सक्रिय भूमिका निभाता है.
भारत का मुस्लिम समुदाय हज करते समय मरने को भाग्यशाली मानता है. वे इसे विशेष दर्जा मानते हैं.
इसी वजह से आज तक किसी हज यात्री के परिवार को शव को स्वदेश लाने की मांग करते नहीं पाया गया है.
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