भारत का वो इलाक़ा जहाँ हर दिन डूब जाते हैं तीन बच्चे, अब माँओं ने उठाया बचाने का बीड़ा

काकोली दास.

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इमेज कैप्शन, काकोली दास अपने बेटे ईशान की तस्वीर के साथ. छह साल के ईशान की मौत तीन महीने पहले पानी में डूब जाने के कारण हो गई थी.
    • Author, सौतिक बिस्वास
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता

मंगला प्रधान उस सुबह को कभी नहीं भूल पाएंगी, जिस दिन उन्होंने अपने एक साल के बेटे को खो दिया था. यह घटना 16 साल पहले सुंदरवन में घटी थी.

यह भारत के राज्य पश्चिम बंगाल में 100 द्वीपों का एक विशाल डेल्टा है.

तब मंगला प्रधान के बेटे अजीत ने केवल चलना शुरू ही किया था. वो जीवन से भरा हुआ था. वह चंचल, बेचैन और दुनिया के बारे में जानने को उत्सुक था.

उस सुबह, बाकी लोगों की तरह, उनका परिवार दैनिक जीवन के कामकाज में व्यस्त था. मंगला ने अजीत को नाश्ता कराया था. इसके बाद वो खाना बनाने के लिए रसोई में गई, तो अजीत को अपने साथ ले गई थी.

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पोखर

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इमेज कैप्शन, सुंदरवन में हर घर के सामने ऐसे पोखर बने हैं. इनका इस्तेमाल नहाने, कपड़े धोने में होता है.

उनके पति सब्ज़ी ख़रीदने बाहर गए थे. उनकी बीमार सास दूसरे कमरे में आराम कर रही थीं. इस बीच अजीत कहीं चला गया.

मंगला ने अजीत को आवाज़ लगाई लेकिन कोई जवाब नहीं आया. कुछ मिनट बाद मंगला को घबराहट होने लगी.

उन्होंने चिल्लाकर पूछना शुरू किया, "मेरा बेटा कहां है? क्या किसी ने मेरे बेटे को देखा?"

पड़ोसी उनकी मदद के लिए दौड़ पड़े. मगर, कुछ ही देर बाद मंगला के जीजा ने अजीत का छोटा सा शरीर घर के बाहर आंगन के पास पोखर में तैरता हुआ देखा.

अजीत भटककर पोखर में गिर गया था. उसकी एक पल की नादानी परिवार के लिए एक अकल्पनीय त्रासदी बन गई.

मंगला ने उठाया ये क़दम

मंगला प्रधान

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इमेज कैप्शन, मंगला प्रधान पालनाघर में बच्चों की देखभाल करती हैं.

आज, मंगला उस इलाक़े की उन 16 मांओं में शामिल हैं, जो एक ग़ैर-लाभकारी संस्था द्वारा स्थापित दो अस्थाई पालनाघरों में पैदल या साइकिल से जाती हैं.

ये संस्था वहां लगभग 40 बच्चों की देखभाल करती हैं. इन पालनाघरों में बच्चों को भोजन दिया जाता है और मुफ़्त शिक्षा दी जाती है. ये वो बच्चे होते हैं, जिन्हें उनके माता-पिता काम पर जाते समय वहीं छोड़ जाते हैं.

इन पालनाघरों को चलाने वाली संस्था का नाम चाइल्ड इन नीड इंस्टीट्यूट. संस्था के सुजॉय रॉय कहते हैं, "ये माताएं उन बच्चों की रक्षक हैं, जो उनके अपने नहीं हैं."

ऐसी देखभाल की तत्काल ज़रूरत

बच्चों की देखभाल करती हैं माताएं

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इमेज कैप्शन, एक दर्जन से ज़्यादा माताएं अस्थाई पालनाघर में 40 बच्चों की देखभाल करती हैं.
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ये वेटलैंड्स की ज़िंदगी है.

वेटलैंड्स एक ऐसी जगह होती है जहां की ज़मीन मौसमी या स्थायी रूप से पानी से ढकी रहती है. बंगाल में स्थित सुंदरवन भारत का एक बड़ा वेटलैंड है. इस क्षेत्र में अनगिनत बच्चे डूबते रहते हैं. यह इलाक़ा तालाब और नदियों से भरा पड़ा है. यहां हर घर के सामने एक तालाब है.

तालाबों का इस्तेमाल नहाने, कपड़े धोने और पीने के लिए किया जाता है. इस क्षेत्र में मेडिकल रिसर्च ऑर्गनाइजेशन द जॉर्ज इंस्टीट्यूट और सीआईएनआई ने साल 2020 में एक सर्वे किया था.

इसमें यह बात सामने आई थी कि सुंदरवन इलाक़े में हर दिन लगभग तीन बच्चे डूब जाते हैं. इनकी उम्र एक से नौ साल के बीच होती है.

डूबने की ये घटनाएं जुलाई में सुबह दस बजे से दोपहर दो बजे के दौरान चरम पर थीं. यह वो समय था, जब मानसून की शुरुआत होती थी. उस समय अधिकांश बच्चों की देखरेख करने वाला कोई नहीं होता था.

क्योंकि, बच्चों की देखभाल करने वाले लोग घरेलू कामकाज में जुटे होते हैं.

डूबने वाले बच्चों में लगभग 65 फ़ीसदी अपने घर के 50 मीटर के दायरे में इसका शिकार हो गए थे. इनमें से केवल 6 फ़ीसदी ऐसे थे, जिन्हें किसी प्रशिक्षित लाइसेंस प्राप्त डॉक्टर से इलाज मिल पाया था.

स्वास्थ्य सेवा खस्ताहाल

सुंदरवन के तालाब में बाड़ेबंदी

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इमेज कैप्शन, सुंदरवन के तालाब में बच्चों को तैरना सिखाया जा रहा है.

दरअसल, इस इलाक़े में अस्पताल न के बराबर हैं. यहाँ मौजूद कई जन स्वास्थ्य क्लिनिक निष्क्रिय हो चुके थे. इन हालात में ग्रामीणों ने बच्चों को बचाने के लिए प्राचीन अंधविश्वासों को गले लगाना शुरू कर दिया था.

इसमें वो प्रार्थना करते समय बच्चे के शरीर को एक व्यस्क के सिर पर घुमा देते थे. और पानी को छड़ी से पीटते थे, ताकि बुरी आत्माएं भाग जाए.

मंगला ने मुझसे कहा, "एक मां होने के नाते, मैं बच्चे को खोने का दर्द जानती हूं. मैं नहीं चाहती कि मैंने जो सहा, उस दर्द को कोई और मां भी झेले. मैं इन बच्चों को डूबने से बचाना चाहती हूं. वैसे भी हम बहुत सारे ख़तरों के बीच रहते हैं."

सुंदरवन में 40 लाख लोग रहते हैं. यहां का हर दिन संघर्ष भरा है. इस इलाके में बाघ ख़तरनाक ढंग इंसानी बस्तियों के क़रीब घूमते रहते हैं.

लोग जहरीले सांपों और बाघों के ख़तरे के बीच इस इलाक़े में मछली पकड़ते हैं, शहद और केकड़े इकट्ठा करते हैं.

जुलाई से अक्तूबर तक नदियां और तालाब भारी बारिश के कारण उफ़ान पर होते हैं. इस इलाक़े में तूफ़ान भी आते रहते हैं. इसमें कई गांव डूब जाते हैं.

जलवायु परिवर्तन इस अनिश्चितता को और बढ़ा रहा है. यहां लगभग 16 फ़ीसदी आबादी एक से नौ साल की उम्र वाली है.

सुजाता के साथ क्या हुआ?

सुजाता दास

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इमेज कैप्शन, सुजाता ने तय किया कि वो तालाब के पास बाड़ेबंदी करवाएंगी.

सुंदरवन में रहने वाली सुजाता की ज़िंदगी तीन महीने पहले पलट गई थी. उनकी 18 महीने की बेटी अंबिका एक तालाब में डूब गई थी.

उनका बेटा कोचिंग क्लास में था. परिवार के कुछ सदस्य बाज़ार गए थे. उनकी बड़ी चाची घर के कामों में व्यस्त थीं. उनके पति केरल में काम करते हैं लेकिन उस दिन वह घर पर थे.

सुजाता ने कहा, "हमने उसको तालाब में तैरता हुआ देखा. बारिश हो चुकी थी. पानी बढ़ चुका था. हम उसे पास के स्थानीय झोला छाप डॉक्टर के पास ले गए, जिसने उसको मृत घोषित कर दिया था."

"इस घटना ने हमें भविष्य में ऐसी त्रासदियों को रोकने के बारे में सोचने पर मजबूर कर दिया."

इसके बाद सुजाता ने गांव में मौजूद अन्य लोगों की तरह अपने तालाब के आसपास बांस और जाली की बाड़ लगाने की योजना बनाई, ताकि बच्चों को पानी के आसपास भटकने से रोका जा सके.

वो यह उम्मीद करती हैं कि जो बच्चे तैरना नहीं जानते हैं, उनको गांव के तालाब में यह सिखाया जाएगा. वो पड़ोसियों को सीपीआर (कार्डियोपल्मोनरी रिससिटेशन) सीखने के लिए प्रोत्साहित करना चाहती हैं, ताकि डूबने वाले बच्चों की जान बचाई जा सके.

सीपीआर एक आपातकालीन उपचार है जो तब किया जाता है जब किसी की सांस या दिल की धड़कन रुक जाती है. सीने

चुनौती क्या है?

तालाब के आसपास बाड़ेबंदी.

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इमेज कैप्शन, सुजाता का बेटा महामारी के दौरान डूबकर मर गया था. इसके बाद उन्होंने तालाब की बाड़ेबंदी करवाने का फ़ैसला लिया.

संजय रॉय कहते हैं, "बच्चे वोट नहीं देते हैं. इसलिए इन मुद्दों पर ध्यान देने के लिए राजनीतिक इच्छाशक्ति में कमी दिखाई देती है. यही वजह है कि हम स्थानीय स्तर पर लोगों को साथ लाने और इस मामले में शिक्षा का प्रसार करने पर ध्यान दे रहे हैं."

तालाब के ईर्द-गिर्द बनाई जाने वाली बाड़ और पालनाघर बनाने के लिए भारत की टॉप साइंस एजेंसी आईसीएमआर से मिलने वाली मदद भी अहम रही है.

पिछले दो सालों में, लगभग 2,000 ग्रामीणों ने सीपीआर का प्रशिक्षण लिया है. पिछले साल जुलाई में, एक ग्रामीण ने एक डूब गए बच्चे को अस्पताल ले जाने से पहले सीपीआर देकर मरने से बचा लिया था.

संजय रॉय कहते हैं, "मुख्य चुनौती पालनाघर बनाने और समुदाय के बीच जागरूकता बढ़ाने में है."

लेकिन स्थानीय मान्यताओं के कारण एक साधारण समाधान को लागू करना चुनौतीपूर्ण हो जाता है.

सुंदरवन में रहने वालों के बीच यह अंधविश्वास है कि अगर उन्होंने तालाब के आसपास बाड़ेबंदी करवाई तो पानी के देवता नाराज़ हो जाएंगे.

आंकड़े क्या कहते हैं?

अपने बच्चे को खोने वाली मां मंगला प्रधान का बयान

बांग्लादेश में भी एक से चार साल के बच्चों की मौत का बड़ा कारण डूबना है. वहां आंगनों में लकड़ी से बने हुए प्लेपेन लगाए गए हैं.

लेकिन बच्चे इन्हें पसंद नहीं करते. इसकी वजह से लोग इसका इस्तेमाल बकरियों और बत्तखों के लिए करते थे.

जॉर्ज इंस्टीट्यूट में एक इंज्यूरी एपिडेमियोलॉजिस्ट जगनूर कहते हैं, "इसने सुरक्षा को लेकर झूठी भावना पैदा कर दी. इस कारण बीते तीन सालों में डूबने की घटनाएं बढ़ी हैं."

गैर-लाभकारी संस्थाओं ने बांग्लादेश में 2500 पालनाघर स्थापित किए हैं. इनकी वजह से डूबने से होने वाली मौतों में 88 फ़ीसदी की कमी आई.

साल 2024 में, सरकार ने इनकी संख्या 8,000 तक बढ़ा दी. इससे हर साल 200,000 बच्चों को फ़ायदा हुआ. पानी के मामले में समृद्ध वियतनाम अब छह साल से दस साल तक के बच्चों पर ध्यान दे रहा है.

वियतनाम में भी बच्चों को पानी से डूबने की समस्या रही है. अब वहां बीते कुछ दशकों में हुई मौतों के डेटा का इस्तेमाल करके, बच्चों को बचाने क रणनीति बनाई जा रही है. उन्हें तैरना और पानी से सावधान रहना सिखाया जा रहा है.

वियतमनाम ने इस समस्या से लड़ने के लिए 6 से 10 साल के बीच के बच्चों पर ध्यान देना शुरू किया. उन्होंने पुराने आंकड़ों का अध्ययन किया और बच्चों को पानी से बचने के हुनर सिखाना शुरू किया.

इसके बाद पानी के रास्ते स्कूल जाने वाले छात्रों के डूबने की घटनाओं में कमी आई है.

डूब कर मरना एक बड़ा वैश्विक मुद्दा है. डब्ल्यूएचओ के मुताबिक, साल 2021 में 300,00 लोग डूब गए थे. यानी हर घंटे 30 से ज़्यादा मौत.

इनमें से लगभग आधे 29 साल से कम आयु के थे और एक चौथाई बच्चे थे, जिनकी उम्र पांच साल से कम थी.

डूबने से होने वाली मौतों के बारे में भारत का डेटा इतना सटीक नहीं है. सरकारी आंकड़ों में साल 2022 में लगभग 38,000 मौतें डूबने के कारण हुई हैं.

हालांकि, वास्तविक संख्या और ज़्यादा होने का अनुमान है.

क्या है सुंदरवन की सच्चाई?

काकोली दास अपनी बेटी ईशा के साथ

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इमेज कैप्शन, काकोली दास अपनी बेटी ईशा के साथ. उनके बेटे ईशान की मौत तालाब में डूबकर हुई थी.

सुंदरवन में कई सालों से बच्चों को आज़ादी से घूमने नहीं दिया जाता है. उन्हें रस्सी या कपड़े से बांध दिया जाता है, ताकि वो सुरक्षित रहें.

बच्चों को आवाज़ करने वाली पायल भी पहनाई जाती है, ताकि माता-पिता को यह पता लगता रहे कि उनका बच्चा कहां घूम रहा है.

काकोली दास का छह साल का बेटा पिछली गर्मियों में पड़ोसी को एक कागज़ का टुकड़ा देते समय तालाब में गिर गया था. ईशान सड़क और पानी के बीच पहचान करने में चूक गया था. नतीजतन, डूब गया था.

काकोली ने कहा, "मैं हर मां से विनती करती हूं कि अपने तालाब की बाड़ेबंदी करवा लीजिए. बच्चों को कैसे बचाया जाए, यह सीखिए. और बच्चों को तैरना सिखाइए. यह ज़िंदगी बचाने की बात है. हमारे पास इंतज़ार करने का विकल्प नहीं है."

अभी के लिए, पालनाघर एक उम्मीद बनकर सामने आए हैं. यह बच्चों को पानी के ख़तरे से सुरक्षित रखने का एक ज़रिया बन चुके हैं.

बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.

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