राहुल गांधी या ममता बनर्जी, पीएम मोदी को कौन दे पाएगा सीधी चुनौती?

राहुल गांधी और ममता बनर्जी की तस्वीर

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इमेज कैप्शन, राहुल गांधी अभी लोकसभा में विपक्ष के नेता हैं और ममता बनर्जी पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री हैं.
    • Author, अंशुल सिंह
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता

साल 2023 में जुलाई के महीने में जब 'इंडिया' गठबंधन की नींव रखी गई थी तब सबसे बड़ा सवाल था कि गठबंधन का चेहरा कौन है?

कांग्रेस गठबंधन में सबसे बड़ी पार्टी थी इसलिए राहुल गांधी का नाम आना स्वाभाविक था, लेकिन नीतीश कुमार और ममता बनर्जी भी अप्रत्यक्ष रूप से दावेदारी में पीछे नहीं थे.

नीतीश बाद में भारतीय जनता पार्टी वाले एनडीए गठबंधन में चले गए, लेकिन चेहरे का सवाल इंडिया गठबंधन के साथ बना रहा?

इस साल जून में जब लोकसभा चुनाव के नतीजे आए तो यह सवाल कुछ दिनों के लिए उठना बंद हो गया था.

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इसकी वजह थी इंडिया गठबंधन में कांग्रेस का सबसे पार्टी के रूप में उभरना. इंडिया गठबंधन ने 234 सीटें जीती थीं और कांग्रेस की इसमें 99 सीटों की हिस्सेदारी थी.

इसके बाद कुछ राज्यों में हुए विधानसभा चुनावों के बाद इंडिया गठबंधन के सहयोगी दल राहुल गांधी के नेतृत्व पर सवाल उठा रहे हैं. हालांकि आधिकारिक तौर पर गठबंधन के अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे ही हैं.

राहुल गांधी और ममता बनर्जी की तस्वीर

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इमेज कैप्शन, ममता बनर्जी इंडिया गठबंधन का हिस्सा हैं, लेकिन पश्चिम बंगाल में उनकी पार्टी ने अकेले चुनाव लड़ा था.

नेतृत्व पर 'इंडिया' गठबंधन अलग-थलग

बिहार में कांग्रेस और राष्ट्रीय जनता दल एक-दूसरे के सहयोगी हैं और दोनों के बीच अच्छा तालमेल दिखता भी है.

2004 के बाद राष्ट्रीय स्तर पर जब यूपीए गठबंधन की नींव पड़ी तो लालू यादव इसके अहम किरदार थे.

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बिहार में लालू यादव ने महागठबंधन बनाया तो कांग्रेस इसमें भी साझेदार थी. पिछले बीस साल से कांग्रेस के सहयोगी रहे लालू यादव का मंगलवार को दिया बयान राजनीतिक गलियारों में चौंकाने वाला था.

लालू यादव ने कहा, ''ममता को इंडिया गठबंधन का नेतृत्व दे देना चाहिए. हम लोग उनका समर्थन करेंगे."

जब पत्रकारों ने उनसे कहा कि कांग्रेस ने ममता को नेतृत्व देने की मांग पर आपत्ति जताई है तो उन्होंने कहा, ''कांग्रेस के विरोध से कुछ नहीं होने वाला है. ममता को नेतृत्व दिया जाना चाहिए.''

लालू यादव की इस बात का समर्थन उनके बेटे तेजस्वी यादव ने भी किया है.

लोकसभा चुनाव से पहले लालू ने राहुल की शादी को लेकर कहा था कि आप दूल्हा बनिए, हम बारात बनने के लिए तैयार हैं. राजनीति के जानकारों ने उस समय लालू के इस बयान को इंडिया गठबंधन के नेतृत्व से जोड़कर भी देखा था.

इंडिया गठबंधन में 37 सीटों के साथ समाजवादी पार्टी कांग्रेस के बाद दूसरा सबसे बड़ा दल है और अखिलेश यादव की ममता बनर्जी से राजनीतिक नज़दीकियां किसी से छिपी नहीं हैं.

हरियाणा और महाराष्ट्र के विधानसभा चुनावों के दौरान कांग्रेस और सपा के बीच तनातनी भी देखने को मिली थी.

रविवार को सपा सांसद रामगोपाल यादव से पूछा गया कि इंडिया गठबंधन का नेता कौन है? इस पर उन्होंने कहा कि इंडिया गठबंधन के नेता मल्लिकार्जुन खड़गे हैं.

शरद पवार इस मुद्दे पर पहले ही ममता का समर्थन कर चुके हैं.

शरद पवार ने कहा था, "हां बेशक. वह इस देश की एक प्रमुख नेता हैं और उनमें गठबंधन का नेतृत्व करने की क्षमता है."

कांग्रेस नेता अधीर रंजन का कहना है कि राहुल गांधी जब से अदानी पर हमलावर हुए हैं तभी से इंडिया गठबंधन का एक नया रुख़ देखने को मिल रहा है.

अधीर रंजन ने कहा, "टीएमसी एक राष्ट्रीय पार्टी थी और अब यह क्षेत्रीय पार्टी बन चुकी है. ये फूट डालना मतलब इंडिया गठबंधन को कमज़ोर करना है. इंडिया गठबंधन अगर कमज़ोर होता है तो सबसे ज़्यादा ख़ुशी बीजेपी और हमारे प्रधानमंत्री को होगी. अगर बीजेपी को ख़ुश करना सबका फर्ज है तो करने दीजिए."

रशीद किदवई का बयान

राहुल गांधी के नेतृत्व पर क्यों उठे सवाल?

इंडिया गठबंधन का मक़सद था कि लोकसभा चुनाव में बीजेपी को लगातार तीसरी बार सरकार में आने से रोककर सत्ता हासिल करना.

लेकिन जब नतीजे आए तो बीजेपी अकेले दम पर तो बहुमत हासिल नहीं कर पाई, लेकिन एनडीए ने स्पष्ट बहुमत हासिल किया.

लोकसभा के बाद विधानसभा चुनाव में भी कांग्रेस पिछड़ गई और राहुल के नेतृत्व पर सवाल उठने लगे.

हरियाणा में एग्जिट पोल्स से लेकर राजनीतिक विश्लेषक मान रहे थे कि कांग्रेस आसानी से जीत जाएगी. नतीजे आए तो कांग्रेस को करारी हार का सामना करना पड़ा. हरियाणा में इसे 90 सीटों में से सिर्फ 37 सीटें मिलीं.

जम्मू-कश्मीर में 90 सीटों में सिर्फ उसे छह सीटें मिली हैं और वो नेशनल कॉन्फ्रेंस की जूनियर पार्टनर बन कर रह गई. जम्मू क्षेत्र में कांग्रेस ने 29 सीटों पर चुनाव लड़ा और सिर्फ़ एक सीट जीती. राज्य में यह कांग्रेस का अब तक का सबसे बुरा प्रदर्शन था.

महाराष्ट्र में कांग्रेस सबसे ज़्यादा 103 सीटों पर लड़ी, लेकिन सिर्फ़ 16 सीटों पर सिमटकर रह गई. जबकि 2019 के चुनाव में कांग्रेस ने 44 सीटें जीती थीं.

झारखंड में जेएमएम ने पिछली बार से चार सीटें ज्यादा जीतकर कुल 34 सीटें हासिल कीं, लेकिन कांग्रेस 2019 की तरह 16 सीटें ही जीत पाई.

वरिष्ठ पत्रकार, राजनीतिक विश्लेषक और लेखक रशीद किदवई कहना है कि इंडिया गठबंधन के सहयोगी दल अभी किनारा कर रहे हैं.

रशीद किदवई कहते हैं, "क्षेत्रीय दलों के अपने-अपने राज्यों में कांग्रेस एक कमज़ोर कड़ी साबित हो रही है. जम्मू-कश्मीर का चुनाव इसका उदाहरण है. जहां-जहां बीजेपी से कांग्रेस की सीधी लड़ाई है वहां कांग्रेस बीजेपी को हराने में सक्षम नहीं होती है. महाराष्ट्र और हरियाणा ने इसे साबित किया है. अब चूंकि कांग्रेस कमज़ोर साबित हो रही है इसलिए क्षेत्रीय पार्टियां चाह रही हैं कि कांग्रेस उन्हें बराबर का भागीदार माने."

राज्यों में जब चुनाव हुए तो कांग्रेस और क्षेत्रीय पार्टियों का टकराव साफ़ देखने को मिलता था.

कांग्रेस की राज्य इकाइयां यह कहती रही हैं कि इंडिया गठबंधन राज्यों के चुनाव के लिए नहीं है. बंगाल में तो लोकसभा चुनाव के दौरान ही कांग्रेस और टीएमसी ने अलग-अलग चुनाव लड़ा था.

साल 2023 के आख़िर में मध्य प्रदेश में चुनाव हुए थे. तब अखिलेश यादव बार-बार कांग्रेस से गठबंधन की बात कह रहे थे. लेकिन कमलनाथ ज़िद पर अड़े रहे और गठबंधन नहीं हो पाया. कांग्रेस नेताओं कमलनाथ और टीएस सिंह देव ने तो यहां तक कह दिया था कि कौन अखिलेश?

हरियाणा चुनाव में भी कुछ ऐसा ही देखने को मिला. आम आदमी पार्टी चाहती थी कि गठबंधन हो जाए लेकिन भूपिंदर सिंह हुड्डा और प्रदेश नेता गठबंधन नहीं चाहते थे. आप ने यहां कोई प्रभाव नहीं छोड़ पाई लेकिन कुछ सीटों पर कांग्रेस का खेल ज़रूर बिगाड़ दिया था.

महाराष्ट्र में समाजवादी पार्टी ने खुलकर विरोध किया था और अपनी मांग के हिसाब से सीटें न मिलने के लिए कांग्रेस को ज़िम्मेदार ठहराया था. सपा महाराष्ट्र में पांच सीटें मांग रही थी लेकिन गठबंधन में उसे सिर्फ़ दो सीट मिलीं.

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ममता बनर्जी की तस्वीर

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इमेज कैप्शन, ममता लगातार तीन बार मुख्यमंत्री बन चुकी हैं और उनके सामने 2026 के विधानसभा चुनाव की चुनौती है

ममता का दावा कितना मज़बूत?

ममता बनर्जी इंडिया गठबंधन का हिस्सा ज़रूर हैं लेकिन बंगाल में उन्होंने 'एकला चलो' की नीति अपनाई हुई है.

कुछ दिन पहले एक इंटरव्यू में उन्होंने कहा था कि वो इंडिया गठबंधन का नेतृत्व करने के लिए तैयार हैं.

ममता ने कहा, "मैंने इंडिया गठबंधन बनाया था. अब इसे व्यवस्थित करना, नेतृत्व करने वालों पर निर्भर है. अगर वो इसे ठीक से नहीं चला सकते, तो क्या कर सकते हैं? मुझे मौक़ा मिले तो मैं इस गठबंधन को ज़रूर लीड करूंगी."

एक तरफ़ कांग्रेस बीजेपी के मुक़ाबले कई मोर्चों पर कमज़ोर साबित हुई है वहीं ममता के नेतृत्व में टीएमसी ने बीजेपी को लगातार चुनौती दी है.

2014 में जब मोदी ने पहली बार पूर्ण बहुमत की सरकार बनाई थी तब बीजेपी बंगाल में सिर्फ़ दो सीटें जीत पाई थी. इस चुनाव में ममता ने 34 सीटें जीती थीं.

2016 में ममता ने लगातार दूसरी बार चुनाव जीता और मुख्यमंत्री बनी रहीं. इसके बाद बीजेपी ने पश्चिम बंगाल पर अपना फ़ोकस बढ़ाया और 2019 के लोकसभा चुनाव में उन्हें इसका फ़ायदा भी मिला.

बीजेपी ने 18 सीट जीतीं और टीएमसी के खाते में 22 आईं. टीएमसी को 12 सीटों का नुक़सान हुआ लेकिन अब भी राज्य में सबसे बड़ी पार्टी टीएमसी ही थी.

दो साल साल 2021 में बीजेपी ने विधानसभा चुनाव में पूरा ज़ोर लगाया. चुनाव से पहले कई नेता तृणमूल कांग्रेस का दामन छोड़कर भाजपा में चले गए. इसमें सुवेंदु अधिकारी जैसे बड़े नेता भी शामिल थे. लेकिन ममता ने राज्य में वापसी करते हुए 200 से ज़्यादा सीटें जीतीं और तीसरी बार मुख्यमंत्री बनी थीं.

2024 का लोकसभा चुनाव उन्होंने अकेले लड़ा और सबसे ज़्यादा 29 सीटें जीतीं. इसके बाद टीएमसी सीटों के मामले में चौथी सबसे बड़ी पार्टी बनी थी.

ममता बनर्जी का बयान

वरिष्ठ पत्रकार शुभोजीत बागची कहते हैं, "ममता की शुरू से ही इच्छा रही है कि वो गठबंधन का चेहरा बनें. जब महाराष्ट्र में गठबंधन की हार हुई तो दूसरे बड़े नेता भी उनके समर्थन में दिख रहे हैं. अगर ममता 2026 में चौथी बार सीएम बनती हैं तो निश्चित रूप से उनकी दावेदारी मज़बूत होगी. विपक्ष में फिर इतना बड़ा नेता नहीं होगा जो लोकसभा सीटों के हिसाब से तीसरे सबसे बड़े राज्य में इतनी मज़बूती से सत्ता में बना रहे."

बीजेपी से सीधे मुक़ाबले में तो ममता आगे दिखती हैं लेकिन बीते कुछ महीने उनके लिए अच्छे नहीं रहे हैं. आरजी कर अस्पताल की घटना में ममता को सड़क से लेकर विधानसभा तक विरोध का सामना करना पड़ा था. मामले में उनके सांसद जवाहर सरकार ने इस्तीफ़ा दे दिया था.

कांग्रेस से अगर टीएमसी की तुलना करें तो कांग्रेस साफ़ तौर पर आगे दिखती है. टीएमसी की सिर्फ़ एक राज्य में सरकार है जबकि तीन राज्यों में कांग्रेस के अपने मुख्यमंत्री हैं. ममता ने गोवा और मेघालय जैसे छोटे-छोटे राज्यों में कोशिश की लेकिन सफलता हाथ नहीं लगी.

ऐसे में सवाल उठता है कि क्या कांग्रेस को दरकिनार करके इंडिया गठबंधन बन सकता है?

रशीद किदवई कहते हैं, "ममता बनर्जी बनाम राहुल गांधी जैसी बात का कोई तुक नहीं है. गठबंधन में जो ज़िम्मेदारियां दी जाती हैं वो मांगी या छीनी नहीं जाती हैं. इस मामले में राजनीतिक दल या व्यक्ति की जो हैसियत होती है, उसके हिसाब से उससे आग्रह किया जाता है."

"जब राजीव गांधी प्रधानमंत्री थे और विपक्ष बिखर रहा था तो एक नेशनल फ़्रंट बना था. उसमें आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री एनटी रामाराव को संयोजक बनाया गया था. रामाराव जी ने कभी दावेदारी नहीं की थी. इसी तरह से 90 के दशक में जब एनडीए विपक्ष में था तो उसमें जॉर्ज फर्नांडिस को भूमिका दी गई थी."

राहुल गांधी फिलहाल लोकसभा में विपक्ष के नेता हैं और कांग्रेस को लोकसभा में बीजेपी (36 फ़ीसद) के बाद सबसे ज़्यादा 21 फ़ीसद वोट मिले थे. जानकार इसे राहुल गांधी के पक्ष में एक मज़बूत समीकरण मानते हैं.

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