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ट्रंप के 'बोर्ड ऑफ़ पीस' में कौन-कौन हैं और इस पर विवाद क्या है?
अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने दावोस में चल रहे वार्षिक वर्ल्ड इकोनॉमिक फ़ोरम सम्मेलन के दौरान अपने बोर्ड ऑफ़ पीस से पर्दा उठाया है.
जबकि, दुनियाभर के नेता इस बोर्ड की संभावित भूमिका को लेकर सावधानी बरतने की बात कह रहे हैं.
अमेरिकी राष्ट्रपति इस बोर्ड की अध्यक्षता करेंगे और यह पद उनके राष्ट्रपति के तौर पर कार्यकाल ख़त्म होने से जुड़ा नहीं होगा. ट्रंप ने इस आयोजन में कई विश्व नेताओं को आमंत्रित किया था.
ट्रंप ने कहा, "एक बार जब यह बोर्ड पूरी तरह गठित हो जाएगा, तो हम लगभग हर वो चीज़ कर सकते हैं, जो चाहते हैं. और हम संयुक्त राष्ट्र के साथ मिलकर काम करेंगे."
ट्रंप का बयान ऐसे समय आया है जब आलोचकों का कहना है कि ऐसा लगता है यह बोर्ड संयुक्त राष्ट्र की कुछ भूमिकाओं की जगह लेने के लिए बनाया गया है.
इस बोर्ड का विचार शुरुआत में ग़ज़ा के लिए ट्रंप की 20-सूत्रीय शांति योजना के तहत प्रस्तावित किया गया था. हालांकि, अब अमेरिका इसे संघर्ष के समाधान के लिए एक नए अंतरराष्ट्रीय संगठन के तौर पर पेश कर रहा है.
इस बोर्ड की स्थायी सदस्यता के लिए शुल्क के तौर पर एक अरब डॉलर की राशि तय की गई है.
जिन देशों ने कहा है कि वे सदस्य बनेंगे उनमें इसराइल, सऊदी अरब, मिस्र, तुर्की, अर्जेंटीना और इंडोनेशिया शामिल हैं. लेकिन अब तक अमेरिका को छोड़कर संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद का कोई भी स्थायी सदस्य इसमें शामिल नहीं हुआ है.
एग्ज़ीक्यूटिव बोर्ड के सदस्यों में ब्रिटेन के पूर्व प्रधानमंत्री टोनी ब्लेयर हैं, जिन्होंने 2003 में अमेरिका के नेतृत्व में इराक़ पर हुए हमले में ब्रिटिश सैनिक भेजे थे. उनके साथ ट्रंप के दामाद जैरेड कुशनर भी इस एग्ज़ीक्यूटिव बोर्ड में शामिल हैं लेकिन इसमें कोई फ़लस्तीनी प्रतिनिधि नहीं है.
'बोर्ड ऑफ़ पीस' में शामिल होने के लिए कौन तैयार?
- अल्बानिया- प्रधानमंत्री ईदी रमा
- अर्जेंटीना- राष्ट्रपति जेवियर मिलेई
- हंगरी- प्रधानमंत्री विक्टर ओर्बन
- इसराइल- प्रधानमंत्री बिन्यामिन नेतन्याहू
- कतर- प्रधानमंत्री शेख़ मोहम्मद अब्दुलरहमान
- कज़ाख़स्तान- राष्ट्रपति कासिम जोमार्त तोकायेव
- पराग्वे- राष्ट्रपति सैंटियागो पेना
- उज़्बेकिस्तान- राष्ट्रपति शौकत मिर्ज़ीयोयेव
वियतनाम की कम्युनिस्ट पार्टी के महासचिव टो लाम ने भी कथित तौर पर इस बोर्ड को स्वीकार कर लिया है, जबकि बेलारूस के राष्ट्रपति अलेक्ज़ेंडर लुकाशेंको ने कहा है कि वह "इसमें हिस्सा लेने के लिए तैयार हैं."
कनाडा के प्रधानमंत्री मार्क कार्नी का कहना था कि उन्होंने सैद्धांतिक तौर पर सहमति दे दी है, लेकिन बाद में अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने 'बोर्ड ऑफ़ पीस' में शामिल होने के लिए कनाडा को भेजे गए न्योते को वापस ले लिया.
राष्ट्रपति ट्रंप ने ट्रुथ सोशल पर लिखा, "प्रिय प्रधानमंत्री कार्नी, कृपया इस पत्र को इस बात की सूचना मानें कि 'बोर्ड ऑफ़ पीस' अपने आमंत्रण को वापस ले रहा है, जो कनाडा को इस बोर्ड में शामिल होने के संबंध में आपको दिया गया था."
पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज़ शरीफ़ ने भी बोर्ड ऑफ़ पीस में शामिल होने पर सहमति जताई है.
अब तक कौन से देश इसमें शामिल नहीं हुए हैं?
ब्रिटेन की विदेश मंत्री यवेट कूपर ने कहा है कि रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन की संभावित भागीदारी से जुड़ी चिंताओं की वजह से ब्रिटेन फिलहाल 'बोर्ड ऑफ़ पीस' में नहीं शामिल होगा.
कूपर ने बीबीसी से कहा कि बोर्ड में शामिल होने के लिए ब्रिटेन को आमंत्रित किया गया था, लेकिन दावोस में वर्ल्ड इकोनॉमिक फ़ोरम के दौरान आयोजित समारोह में "हस्ताक्षर करने वाले देशों में ब्रिटेन शामिल नहीं होगा."
स्लोवेनिया के प्रधानमंत्री रॉबर्ट गोलोब ने भी निमंत्रण ठुकरा दिया है. उनका कहना है कि यह पहल "व्यापक अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था में ख़तरनाक तरीके से दख़ल" देती है.
इसके अलावा समारोह में हिस्सा न लेने वाले अन्य देशों में फ़्रांस, जर्मनी, नॉर्वे, स्वीडन और डेनमार्क भी शामिल हैं.
बोर्ड में शामिल होने के लिए क्या ज़रूरी है?
बोर्ड के फ़ाउंडिंग चार्टर के लीक हुए हिस्से के मुताबिक, यह चार्टर तब प्रभावी होगा जब तीन देश औपचारिक रूप से इसे स्वीकार कर लेंगे. सदस्य देशों का कार्यकाल हर तीन साल पर रिन्यू होगा और एक अरब डॉलर देने वाले देशों की स्थायी सदस्यता मिलेगी.
एक अमेरिकी अधिकारी ने सीबीएस न्यूज़ को बताया कि बोर्ड में शामिल होने के लिए कोई अनिवार्य शर्त नहीं है. हालांकि, जो देश केवल तीन साल की सदस्यता के बजाय स्थायी सदस्यता चाहते हैं, उनसे एक अरब डॉलर शुल्क लिया जाएगा.
अधिकारियों के मुताबिक, इस राशि का इस्तेमाल ग़ज़ा के पुनर्निमाण में सहायता के लिए किया जाएगा.
समाचार एजेंसी रॉयटर्स ने ऐसे पत्र और मसौदा चार्टर की कॉपी देखी है, जिनके मुताबिक, यह ऐसा बोर्ड है जिसकी अध्यक्षता आजीवन डोनाल्ड ट्रंप करेंगे, भले ही वह अमेरिकी राष्ट्रपति न रहें. यह बोर्ड बाद में दूसरे संघर्षों से निपटने के लिए भी अपने दायरे का विस्तार करेगा.
क्या ट्रंप का बोर्ड यूएन को कमज़ोर कर सकता है?
रॉयटर्स ने जो पत्र देखा है उसमें ट्रंप कहते हैं कि यह बोर्ड "वैश्विक संघर्षों को सुलझाने के लिए एक साहसिक और नया नज़रिया अपनाएगा."
हालांकि इसे संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद को कमज़ोर करने की आशंका के तौर पर देखा जा रहा है, जो फिलहाल शांति स्थापित करने, शांति बनाए रखने और अंतरराष्ट्रीय पाबंदियों की ज़िम्मेदारी संभालती है.
इसराइली अख़बार हारेत्ज़ ने रिपोर्ट किया कि चार्टर की शुरुआत में 'अंतरराष्ट्रीय स्तर पर शांति बनाए रखने के लिए एक अधिक चुस्त और प्रभावी संस्था की आवश्यकता पर ज़ोर दिया गया है.' इसमें कहा गया है कि स्थायी शांति के लिए उन संस्थानों से आगे बढ़ने की हिम्मत चाहिए जो बहुत बार विफल रहे हैं.
हालांकि, व्हाइट हाउस ने 'बोर्ड ऑफ़ पीस' पर अपने बयान में कहा, "यह मील का पत्थर संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के 2803 प्रस्ताव के साथ पूरी तरह मेल खाता है."
लेकिन फ़्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों के एक करीबी सूत्र ने समाचार एजेंसी एएफ़पी को बताया कि चार्टर 'ग़ज़ा के फ़्रेमवर्क से आगे जाता है.' उन्होंने कहा, "यह बड़े सवाल खड़े करता है, ख़ासकर संयुक्त राष्ट्र के सिद्धांतों और संरचना के सम्मान को लेकर, जिन्हें किसी भी हाल में चुनौती नहीं दी सकती है."
इस बीच, क्विंसी इंस्टीट्यूट फॉर रिस्पॉन्सिबल स्टेटक्राफ़्ट के ख़ालिद एलजिंदी ने रॉयटर्स से कहा, "प्रशासन (ट्रंप) की ओर से ऐसे संकेत मिल रहे हैं कि वे 'बोर्ड ऑफ़ पीस' के दायरे को और व्यापक करना चाहते हैं और यहां तक कि मौजूदा यूएन सिस्टम को बदलने की बात भी कर रहे हैं. इसलिए साफ़ है कि ग़ज़ा इसकी शुरुआत हो सकता है, लेकिन ट्रंप प्रशासन के लिए यह बोर्ड का अंत नहीं है. "
ट्रंप प्रशासन पहले ही संयुक्त राष्ट्र को दिए जाने वाले अमेरिकी फ़ंड में कटौती कर चुका है. अमेरिकी वीटो की वजह से सुरक्षा परिषद ग़ज़ा युद्ध को ख़त्म करने के लिए कार्रवाई नहीं कर पाई है. सात जनवरी 2026 को ट्रंप ने एक ज्ञापन पर हस्ताक्षर किए, जिसके तहत अमेरिका संयुक्त राष्ट्र के 31 निकायों से बाहर हो गया. अमेरिका का कहना था कि ये निकाय 'अमेरिकी हितों के ख़िलाफ़ काम करते हैं.' इन निकायों में यूएन फ़्रेमवर्क कन्वेंशन ऑन क्लाइमेट चेंज और यूएन डेमोक्रेसी फंड भी शामिल हैं.
कार्यकारी बोर्ड में कोई भी फ़लस्तीनी शामिल नहीं है. ग़ज़ा कार्यकारी बोर्ड में एक इसराइली रियल एस्टेट अरबपति याकिर गाबे सदस्य के तौर पर शामिल किए हैं. हालांकि, वो इसराइल में जन्में लेकिन अब साइप्रस में रहते हैं. इसमें क़तर और तुर्की जैसे देशों के वरिष्ठ नेता भी शामिल हैं, जो ग़ज़ा में युद्ध के दौरान इसराइली रवैये की आलोचना कर चुके हैं.
बीबीसी न्यूज़ वर्ल्ड सर्विस के वीकेंड कार्यक्रम में राजनेता मुस्तफ़ा बरघूती ने कहा, "फ़लस्तीनियों को कहीं अधिक व्यापक प्रतिनिधित्व" की उम्मीद थी.
उन्होंने कहा, "यह बस एक अमेरिकी बोर्ड जैसा लगता है, जिसमें कुछ अंतरराष्ट्रीय तत्व भी जोड़े गए हैं."
बरघूती ने यह भी कहा कि मिस्र में शांति वार्ताओं के दौरान स्वीकृत फ़लस्तीनी प्रशासनिक समूह की भूमिका 'स्पष्ट नहीं' होना समस्या की बात है.
उन्होंने ग़ज़ा के पुनर्निर्माण को आसान बनाने के लिए रफ़ाह क्रॉसिंग खोलने को लेकर इसराइल की इच्छाशक्ति पर भी संदेह जताया.
वहीं, इस बीच इसराइल ने कहा है कि एग्ज़ीक्यूटिव बोर्ड बनाने पर हुई बातचीत से उसे बाहर रखा गया. प्रधानमंत्री बिन्यामिन नेतन्याहू के कार्यालय ने कहा है कि यह "इसराइल के साथ तालमेल में नहीं किया गया और ये उसकी नीति के विपरीत है."
इसराइल के विपक्षी नेता याएर लैपिड ने इस घोषणा को 'इसराइल के लिए कूटनीतिक विफलता' बताया. वहीं, धुर दक्षिणपंथी राष्ट्रीय सुरक्षा मंत्री इतेमार बेन-ग्वीर ने एक्स पर लिखा, "ग़ज़ा पट्टी को उसके पुनर्वास की निगरानी के लिए किसी एडमिनिस्ट्रेटिव कमिटी की ज़रूरत नहीं है. उसे हमास आतंकवादियों से मुक्त किए जाने की ज़रूरत है."
ट्रंप का 'बोर्ड ऑफ़ पीस' कैसे काम करेगा?
बोर्ड ऑफ़ पीस के साथ-साथ दो सब्सिडियरी (सहायक) सीनियर बोर्ड की भी घोषणा की गई है.
- फ़ाउंडिंग एग्ज़ीक्यूटिव बोर्ड, जिसका फ़ोकस निवेश और कूटनीति पर होगा
- ग़ज़ा एग्ज़ीक्यूटिव बोर्ड, ग़ज़ा के प्रशासन और पुनर्निर्माण के लिए बने टेक्नोक्रेट्स की समिति, जिसकी ज़िम्मेदारी ज़मीनी काम की निगरानी होगी.
व्हाइट हाउस ने कहा है कि इन बोर्ड में चुने गए सदस्य 'प्रभावी शासन और सर्वोत्तम सेवाएं सुनिश्चित करेंगे, जिससे ग़ज़ा के लोगों के लिए शांति, स्थिरता और समृद्धि को बढ़ावा मिलेगा.'
व्हाइट हाउस के मुताबिक, सात सदस्यों वाले संस्थापक कार्यकारी बोर्ड की अध्यक्षता ट्रंप करेंगे, जो ग़ज़ा के पुनर्निर्माण के अगले चरण का रास्ता तय करेगा. अन्य सदस्यों में शामिल हैं:
- अमेरिका के विदेश मंत्री मार्को रुबियो
- मध्य पूर्व के लिए विशेष दूत स्टीव विटकॉफ़
- ट्रंप के दामाद जैरेड कुशनर
इस बोर्ड में ब्रिटेन के पूर्व प्रधानमंत्री टोनी ब्लेयर भी शामिल हैं, जिनकी मौजूदगी विवादास्पद है क्योंकि साल 2003 में उन्होंने इराक़ युद्ध में ब्रिटेन को इन दावों के आधार पर शामिल किया था कि इराक के पास सामूहिक विनाश के हथियार हैं. हालांकि, बाद में ये दावे झूठे साबित हुए.
व्हाइट हाउस ने कहा है कि हर सदस्य के पास 'ग़ज़ा को स्थिर रखने के लिहाज़ से महत्वपूर्ण' एक अलग पोर्टफ़ोलियो होगा.
'बोर्ड ऑफ़ पीस' से ग़ज़ा में बदलेंगे हालात?
संयुक्त राष्ट्र के अनुमान के अनुसार, ग़ज़ा में लगभग 80 फ़ीसदी इमारतें बर्बाद या क्षतिग्रस्त हो चुकी हैं, जिससे करीब छह करोड़ टन मलबा पैदा हुआ है. बेघर हो चुके परिवार सर्द मौसम, सीमित आश्रय और खाने की कमी से जूझ रहे हैं.
सहायता संगठनों का कहना है कि हालात में कुछ सुधार हुआ है, लेकिन इसराइल अब भी उनके काम पर पाबंदियां लगाता है.
इसराइल का कहना है कि वह मानवीय सहायता दे रहा है और उसके प्रतिबंधों का उद्देश्य राहत की कोशिशों में हमास की घुसपैठ और राहत सामग्री का दुरुपयोग रोकना है. साथ ही वह ग़ज़ा में पहले से मौजूद सप्लाई को बाँटने में विफल रहने के लिए संयुक्त राष्ट्र को दोष देता है.
हालाँकि, शायद सबसे बड़ी चुनौती कमज़ोर पड़ते युद्धविराम को बनाए रखना है.
हमास ने कहा है कि वह फ़लस्तीन के एक देश की रूप में स्थापना वाले एक व्यापक समझौते के तहत ही हथियार डालेगा. वहीं, अब भी ग़ज़ा पट्टी के अधिकांश हिस्से में नियंत्रण रखने वाले इसराइल ने कहा है कि वह तभी पीछे हटेगा जब हमास हथियार डालेगा.
यह देखना अभी बाकी है कि ट्रंप का 'बोर्ड ऑफ़ पीस' कितनी जल्दी बदलाव ला पाएगा और सबसे अहम कि यह स्थायी शांति की दिशा में ठोस कदम उठा पाएगा या नहीं.
ट्रंप के 'बोर्ड ऑफ़ पीस' में किन्हें किया गया आमंत्रित?
रिपोर्टों के मुताबिक, 'बोर्ड ऑफ़ पीस' में शामिल होने के लिए कई विश्व नेताओं को पत्र भेजे गए हैं.
- ऑस्ट्रेलिया के प्रधानमंत्री एंथनी अल्बनीज़
- ब्राज़ील के राष्ट्रपति लू डा सिल्वा
- साइप्रस के राष्ट्रपति निकोस क्रिस्टोडुलिडिस
- मिस्र के राष्ट्रपति अब्देल फ़तह अल-सीसी
- यूरोपीयन कमीशन की अध्यक्ष उर्सुला वॉन देर लेयेन
- ग्रीस के प्रधानमंत्री किरियाकोस मिस्तोताकिस
- भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी
- जॉर्डन के प्रधानमंत्री जाफ़र हसन
- पोलैंड के राष्ट्रपति करोल नवारोकी
- रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन
- तुर्की के राष्ट्रपति रेचेप तैयप अर्दोआन
- ब्रिटेन के प्रधानमंत्री कीएर स्टार्मर
न्यूज़ीलैंड के प्रधानमंत्री क्रिस्टोफ़र लक्सन को भी बोर्ड में शामिल होने का निमंत्रण दिया गया है और उन्होंने कहा है कि वे इस पर गंभीरता से विचार करेंगे.
थाईलैंड के विदेश मंत्री ने भी कहा है कि वह इस प्रस्ताव के ब्योरे की समीक्षा कर रहे हैं.
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़ रूम की ओर से प्रकाशित.