You’re viewing a text-only version of this website that uses less data. View the main version of the website including all images and videos.
पालक पनीर की 'गंध' पर एतराज़, यूनिवर्सिटी को देना पड़ा 1.83 करोड़ का हर्जाना
- Author, शेरिलान मोलान
- पदनाम, बीबीसी न्यूज़, मुंबई
माइक्रोवेव में खाना गरम करने की एक छोटी सी बात से शुरू हुए विवाद पर अमेरिका की एक यूनिवर्सिटी को दो भारतीय छात्रों को 2 लाख डॉलर (करीब 1.83 करोड़ रुपये) देकर समझौता करना पड़ा.
आदित्य प्रकाश और उनकी मंगेतर उर्मी भट्टाचार्य ने बीबीसी से कहा कि उन्होंने यूनिवर्सिटी ऑफ़ कोलोराडो, बोल्डर, के ख़िलाफ़ नागरिक अधिकार का एक मुक़दमा दायर किया था. उनका आरोप है कि माइक्रोवेव से जुड़ी उस घटना के बाद उन्हें लगातार 'सूक्ष्म भेदभाव (माइक्रोएग्रेशन) और बदले की कार्रवाइयों' का सामना करना पड़ा.
मुक़दमे के अनुसार, उत्पीड़न की शुरुआत तब हुई जब यूनिवर्सिटी के एक स्टाफ़ सदस्य ने आदित्य प्रकाश के अपने लंच को माइक्रोवेव में गरम करने पर आपत्ति जताई. यह लंच था पालक पनीर, जो उत्तर भारत के सबसे लोकप्रिय व्यंजनों में से एक है और जिसे पिसे हुए पालक और पनीर से बनाया जाता है. स्टाफ़ सदस्य की आपत्ति की वजह थी सब्ज़ी की 'गंध'.
बीबीसी के सवालों के जवाब में यूनिवर्सिटी ने कहा कि प्राइवेसी क़ानूनों के चलते वह छात्रों के साथ हुए भेदभाव और उत्पीड़न से जुड़े 'ख़ास हालातों' पर कोई टिप्पणी नहीं कर सकती. हालांकि, उसका कहना है कि वह अमेरिकी क़ानूनों और यूनिवर्सिटी की नीतियों के तहत संरक्षित सभी छात्रों, फ़ैकल्टी और स्टाफ़ के लिए एक समावेशी माहौल बनाने के लिए प्रतिबद्ध है, चाहे उनका राष्ट्रीय मूल, धर्म, संस्कृति या कोई अन्य पहचान क्यों न हो.
बीबीसी हिन्दी के व्हॉट्सऐप चैनल से जुड़ने के लिए यहाँ क्लिक करें
यूनिवर्सिटी के बयान में कहा गया, "जब 2023 में ये आरोप सामने आए, तो हमने इन्हें गंभीरता से लिया और भेदभाव व उत्पीड़न से जुड़े मामलों को सुलझाने के लिए अपनी पहले से तय और मज़बूत प्रक्रियाओं का पालन किया, जैसा कि हम हर ऐसे मामले में करते हैं. सितंबर (2025) में हमने छात्रों के साथ एक समझौता किया."
आदित्य प्रकाश ने कहा कि उनके लिए इस मुक़दमे का मकसद पैसा नहीं था. उन्होंने कहा, "दरअसल हम यह स्पष्ट करना चाहते थे कि किसी भारतीय के साथ उसकी 'भारतीयता' की वजह से भेदभाव करने के परिणाम भुगतने पड़ते हैं."
'फ़ूड रेसिज़्म'
पिछले हफ़्ते पहली बार ख़बर बनने के बाद से यह मुक़दमा भारत में काफ़ी चर्चा में है. इसके साथ ही पश्चिमी देशों में जिसे कई लोग 'फ़ूड रेसिज़्म' कह रहे हैं, उस पर भी बहस छिड़ गई है. सोशल मीडिया पर कई भारतीयों ने विदेशों में अपने खाने-पीने की आदतों को लेकर मज़ाक उड़ाए जाने और भेदभाव झेलने के अनुभव साझा किए हैं.
कुछ लोगों ने यह भी कहा है कि खाने को लेकर भेदभाव सिर्फ़ पश्चिमी देशों तक सीमित नहीं है, भारत में भी यह एक आम समस्या है. यहां कई स्कूलों और कॉलेजों में मांसाहारी भोजन पर इस धारणा के तहत रोक लगा दी जाती है कि वह 'अशुद्ध' या 'गंदा' होता है. वंचित तबकों और उत्तर पूर्वी राज्यों से आने वाले लोगों को उनके खाने-पीने की आदतों की वजह से अक्सर पक्षपात झेलना पड़ता है, और कई बार उनके इस्तेमाल किए गए मसालों या सामग्रियों की 'गंध' को लेकर शिकायतें की जाती हैं.
और यह सिर्फ़ भारतीय या दक्षिण एशियाई समुदायों तक सीमित नहीं है. अफ़्रीका, लैटिन अमेरिका और एशिया के दूसरे हिस्सों से आने वाले लोगों ने भी अपने अपने खाने को लेकर शर्मिंदा किए जाने के अनुभव साझा किए हैं.
प्रकाश और भट्टाचार्य का कहना है कि उनकी परेशानियां सितंबर 2023 में शुरू हुईं. उस वक्त यूनिवर्सिटी के एंथ्रोपोलॉजी डिपार्टमेंट में पीएचडी कर रहे प्रकाश माइक्रोवेव में अपना पालक पनीर गरम कर रहे थे. आरोप है कि उसी दौरान एक ब्रिटिश स्टाफ़ सदस्य ने टिप्पणी की कि उनके खाने से 'तीखी' गंध आ रही है, और यह कहते हुए आपत्ति जताई कि उस माइक्रोवेव में तीखी गंध वाले खाने को गरम करने की अनुमति नहीं है.
प्रकाश का कहना है कि ऐसा कोई नियम कहीं लिखा हुआ नहीं था. जब उन्होंने बाद में यह जानने की कोशिश की कि किन खाने को 'तेज़ गंध वाला' माना जाता है, तो उन्हें बताया गया कि सैंडविच इस श्रेणी में नहीं आते, जबकि करी आती है.
प्रकाश का आरोप है कि इस बातचीत के बाद यूनिवर्सिटी की ओर से लगातार ऐसे कदम उठाए गए, जिनके चलते उन्हें और भट्टाचार्य, जो खुद भी वहां पीएचडी स्टूडेंट थीं, के रिसर्च फंड और पढ़ाने से जुड़ी ज़िम्मेदारियां छिन गईं. यहां तक कि जिन पीएचडी गाइड के साथ वे महीनों से काम कर रहे थे, वह भी उनके साथ नहीं रहे.
मई 2025 में प्रकाश और भट्टाचार्य ने यूनिवर्सिटी के ख़िलाफ़ मुक़दमा दायर किया. इसमें उन्होंने भेदभावपूर्ण व्यवहार और उनके ख़िलाफ़ 'लगातार बढ़ती बदले की कार्रवाइयों के एक पैटर्न' का आरोप लगाया.
सितंबर में यूनिवर्सिटी ने इस मुक़दमे का समझौते के ज़रिये निपटारा कर लिया. आम तौर पर इस तरह के समझौते दोनों पक्षों के लिए लंबे और महंगे अदालती संघर्ष से बचने के लिए किए जाते हैं.
समझौते की शर्तों के मुताबिक, यूनिवर्सिटी ने छात्रों को उनकी डिग्रियां देने पर सहमति जताई, लेकिन किसी भी तरह की क़ानूनी ज़िम्मेदारी स्वीकार करने से इनकार कर दिया. साथ ही, भविष्य में उन के वहां पढ़ने या काम करने पर भी प्रतिबंध लगा दिया गया.
बीबीसी को दिए गए अपने बयान में यूनिवर्सिटी ने कहा, "सीयू बोल्डर का एंथ्रोपोलॉजी विभाग छात्रों, फ़ैकल्टी और स्टाफ़ के बीच भरोसा दोबारा कायम करने के लिए काम कर रहा है. इसी कोशिश के तहत विभाग के नेतृत्व ने ग्रेजुएट छात्रों, फ़ैकल्टी और स्टाफ़ से मुलाकात की, उनकी बातें सुनीं और उन बदलावों पर चर्चा की जो सभी के लिए एक समावेशी और सहयोगी माहौल बनाने में मदद कर सकें."
यूनिवर्सिटी ने आगे कहा, "जिन लोगों को भेदभाव और उत्पीड़न रोकने से जुड़ी यूनिवर्सिटी की नीतियों का उल्लंघन करने का ज़िम्मेदार पाया जाता है, उन्हें जवाबदेह ठहराया जाता है."
कमला हैरिस भी नहीं बचीं इस भेदभाव से
प्रकाश का कहना है कि खाने को लेकर भेदभाव का यह उनका पहला अनुभव नहीं है.
उन्होंने बताया कि बचपन में जब वे इटली में रहते थे, तो स्कूल में लंच के दौरान टीचर अक्सर उन्हें अलग टेबल पर बैठने को कह देते थे, क्योंकि उनके सहपाठियों को उनके खाने की गंध 'नापसंद' थी.
वह कहते हैं, "मुझे अपने यूरोपीय सहपाठियों से अलग बैठाया जाना, या खाने की गंध के नाम पर साझा माइक्रोवेव इस्तेमाल करने से रोका जाना, ये सब वही तरीके हैं जिनसे गोरे लोग आपकी 'भारतीय पहचान' पर नियंत्रण करते हैं और आपके लिए मौजूद जगहों को संकरा करते जाते हैं."
उनका यह भी कहना है कि खाना भारतीयों और दूसरे जातीय समूहों को नीचा दिखाने का एक पुराना ज़रिया रहा है.
प्रकाश कहते हैं, "दरअसल 'करी' शब्द को हाशिये पर रहने वाले समुदायों की 'गंध' से जोड़ दिया गया है. ऐसे लोगों की, जो रसोईघरों और दूसरों के घरों में मेहनत करते हैं. इसी वजह से यह शब्द धीरे धीरे 'भारतीय' के लिए एक अपमानजनक शब्द की तरह इस्तेमाल होने लगा है."
भट्टाचार्य का कहना है कि खाने को लेकर अपमान का शिकार होने से अमेरिका की पूर्व उपराष्ट्रपति कमला हैरिस जैसी जानी-मानी शख़्सियतें भी नहीं बच पातीं.
वह 2024 में दक्षिणपंथी एक्टिविस्ट लॉरा लूमर के किए एक सोशल मीडिया पोस्ट का ज़िक्र करती हैं, जिसमें कहा गया था कि अगर हैरिस राष्ट्रपति बनती हैं, तो व्हाइट हाउस 'करी की तरह बदबू मारने लगेगा'. हालांकि लूमर ने इन आरोपों को नस्लवादी मानने से इनकार किया है.
शायद कभी अमेरिका वापस न जाएं
मुक़दमे में भट्टाचार्य ने यह भी आरोप लगाया कि उन्हें तब प्रतिशोध का सामना करना पड़ा, जब उन्होंने प्रकाश को अपनी एंथ्रोपोलॉजी क्लास में गेस्ट लेक्चरर के तौर पर कल्चरल रिलेटिविज़्म (सांस्कृतिक सापेक्षता) पर बोलने के लिए बुलाया. सांस्कृतिक सापेक्षता से अर्थ उस विचार से है कि कोई भी संस्कृति दूसरी से न तो बेहतर होती है और न ही बदतर, क्योंकि सभी समूहों की सांस्कृतिक परंपराएं अपनी संस्कृति के अंदर ही मौजूद रहती हैं.
प्रकाश के अनुसार, लेक्चर के दौरान उन्होंने खाने को लेकर अपने साथ हुए नस्लवादी व्यवहार के कई उदाहरण साझा किए थे , जिनमें पालक पनीर वाली घटना भी शामिल थी, हालांकि उन्होंने किसी का नाम नहीं लिया.
भट्टाचार्य का कहना है कि 2024 में जब उन्होंने एक्स (पहले ट्विटर) पर यूनिवर्सिटी में उनके और प्रकाश के साथ हो रहे 'व्यवस्थागत नस्लवाद' को लेकर एक पोस्ट डाली, तो उन्हें नस्लवादी गालियां दी गईं.
उस पोस्ट के नीचे जहां कई लोगों ने इस जोड़े का समर्थन किया, वहीं कुछ कमेंट ऐसे भी थे जिनमें लिखा था, 'भारत लौट जाओ', 'ग़ुलामी से मुक्त करना एक गलती थी' और 'मसला सिर्फ खाने का नहीं है, तुम में से बहुत से लोग नहाते भी नहीं और हमें यह पता है.'
प्रकाश और भट्टाचार्य का कहना है कि वे यूनिवर्सिटी से बस यह चाहते थे कि उनकी बात सुनी और समझी जाए; 'अलग-थलग' कर दिए जाने से उपजे उनके दर्द और तकलीफ़ को स्वीकार किया जाए; और किसी अर्थपूर्ण तरीके से उनकी भरपाई की जाए.
उनका कहना है कि यूनिवर्सिटी ने उनसे कभी वास्तविक माफ़ी नहीं मांगी. इस सवाल पर यूनिवर्सिटी ने बीबीसी को कोई जवाब नहीं दिया.
अब वे दोनों भारत लौट आए हैं और कहते हैं कि शायद वे कभी अमेरिका वापस न जाएं.
प्रकाश कहते हैं, "आप अपने काम में चाहे कितने ही अच्छे क्यों न हों, सिस्टम लगातार आपको यह एहसास दिलाता रहता है कि आपकी त्वचा के रंग या आपकी राष्ट्रीयता की वजह से आपको कभी भी वापस भेजा जा सकता है. यह अनिश्चितता बेहद गहरी होती है, और यूनिवर्सिटी में हमारा अनुभव इसकी एक साफ़ मिसाल है."
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.