दिल्ली हाई कोर्ट ने लगाई फटकार, कहा- दंगों में पुलिस दोषियों को बचाने की कर रही है कोशिश

- Author, उमंग पोद्दार
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
दिल्ली हाई कोर्ट ने मंगलवार को 2020 दिल्ली दंगों में मारे गए 23 साल के फ़ैज़ान की हत्या का केस केंद्रीय जाँच ब्यूरो यानी सीबीआई को सौंप दिया.
इन दंगों में 53 लोगों की जान गई थी. दिल्ली पुलिस के आंकड़ों के मुताबिक़, मरने वालों में 40 मुसलमान और 13 हिंदू थे.
फ़ैज़ान इन 53 लोगों में से एक थे.
दंगों के दौरान एक वीडियो वायरल हुआ था, जिसमे कुछ पुलिसवाले पाँच लड़कों को पीटते नज़र आ रहे थे और उन्हें राष्ट्रगान गाने को कह रहे थे. फैज़ान उन पाँच लोगों में से एक थे.
इस घटना के बाद उन्हें दिल्ली के ज्योति नगर पुलिस स्टेशन में एक दिन हिरासत में रखा गया और वहाँ से छूटने के दो दिन बाद यानी 27 फ़रवरी 2020 को उनकी मौत हो गई थी.
हालाँकि, चार साल बाद भी इस केस में न तो उन पुलिस वालों की पहचान हुई है, न ही कोई चार्ज़शीट फ़ाइल हुई है.

घटना की निष्पक्ष जाँच की मांग करते हुए फै़ज़ान की माँ किस्मतुन ने 2020 में दिल्ली हाई कोर्ट में एक याचिका दायर की. उन्होंने इस घटना की निष्पक्ष जाँच के लिए एक स्पेशल इन्वेस्टिगेशन टीम (एसआईटी) की माँग की.
मंगलवार को उनकी याचिका स्वीकारते हुए दिल्ली हाई कोर्ट ने जांच सीबीआई को सौंपी और कहा कि जल्दी जांच शुरू करें.
उसके साथ कोर्ट ने दिल्ली पुलिस को भी फटकार लगाई.
कोर्ट ने कहा, “अब तक की जाँच लापरवाह और ढीली रही है और ऐसा लगता है कि पुलिस अभियुक्तों को बचा रही है.”
इससे पहले 2020 दंगों के कई मामलों में भी अलग-अलग अदालतों ने दिल्ली पुलिस की कार्यशैली की कड़ी आलोचना की थी.


पूरा मामला क्या है?
किस्मतुन ने अपनी याचिका में कहा कि 24 फ़रवरी 2020 को कुछ पुलिसवालों ने उनके बेटे को पीटा. फिर पुलिस उन्हें कुछ देर के लिए अस्पताल ले गई और वहाँ से पुलिस थाने.
जब वे पुलिस थाने पहुँचीं तो उन्हें फ़ैज़ान से मिलने नहीं दिया गया. एक रात बाद पुलिस ने उन्हें फ़ैज़ान को ले जाने दिया. पर वो कहती हैं कि तब उनके बेटे की हालत 'बहुत बुरी थी और उनके कपड़े खून से लथ-पथ थे'.
उन्होंने कोर्ट में दलील दी कि पुलिस ने उनके बेटे को “अवैध रूप से हिरासत में रखा” और ज़रूरी मेडिकल देखभाल नहीं की, जिसके कारण उनकी मौत हो गई.
उन्होंने ये आपत्ति भी जताई कि इतना समय बीतने के बाद भी पुलिस अभी तक वीडियो में नज़र आ रहे पुलिसवालों की पहचान नहीं कर पाई है.
हालाँकि, दिल्ली पुलिस ने इसका खंडन करते हुआ कहा कि वो इस मामले की तहक़ीक़ात तेज़ी से कर रही है. पुलिस का कहना है, उन्होंने दो पुलिस वालों की पहचान की है और उनके ख़िलाफ़ विभागीय कार्रवाई जारी है.
उन्होंने यह भी कहा उनके मुताबिक़, फ़ैज़ान अपनी मर्ज़ी से ही थाने में एक रात रुके थे. हालाँकि ये भी बताया गया कि उस रात ज्योति नगर थाने के सीसीटीवी कैमरा काम नहीं कर रहे थे.
पुलिस का कहना है कि उस दिन जो अफ़सर थाने में थे, उनका वो पॉलीग्राफ़ टेस्ट करवा चुकी है.

कोर्ट ने क्या कहा
जस्टिस अनूप भंभानी की बेंच ने दिल्ली पुलिस के रवैये की कड़ी निंदा की है.
उन्होंने कहा कि जो पुलिस वालों द्वारा पाँच लड़कों को पीटना “धार्मिक कट्टरता से प्रेरित था और इसलिए ये एक ‘हेट क्राइम’ माना जाएगा” जिस पर कार्रवाई और तेज़ी से होनी चाहिए.
कोर्ट ने कहा कि जांच “उम्मीद के मुताबिक़ तेज़ी” से आगे नहीं बढ़ रही है.
कोर्ट ने पुलिस के तर्कों पर भी सवाल उठाए. कोर्ट ने कहा कि फ़ैज़ान का ख़ुद से पुलिस थाने में रुकना, जब उसके परिवार वाले उसे ढूँढ रहे थे “सामान्य आदमी के व्यवहार के विपरीत” जाता है.
इसके अलावा कोर्ट ने ये भी पूछा कि पुलिस उनका इलाज करवाने के बजाए थाने क्यों ले गई.
कोर्ट ने इस बात पर भी चिंता जतायी थी कि अब तक इस पर कोई तहक़ीक़ात नहीं हुई कि जिस रात फ़ैज़ान थाने में थे, उस रात वहाँ क्या हुआ था.
कोर्ट ने कहा, “ऐसे अहम मौक़ों पर पुलिस थाने के सारे सीसीटीवी का ख़राब हो जाना भी भरोसा नहीं दिखाता.”
“अगर यह मान भी लिया जाए कि हिरासत में कोई हिंसा नहीं हुई थी तो भी यह सच है कि पुलिस ने फै़ज़ान को पुलिस स्टेशन में तब रखा जब उसे स्पष्ट रूप से गंभीर चिकित्सीय देखभाल की आवश्यकता थी. ऐसा करना ख़ुद में ही पुलिस के कर्तव्य की आपराधिक उपेक्षा थी.”
कोर्ट का कहना था कि मामले को ट्रांसफ़र करना इसलिए ज़रूरी है क्योंकि घटना के अभियुक्त उसी विभाग से हैं.

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दिल्ली पुलिस को फटकार
यह पहली बार नहीं है कि किसी अदालत ने दिल्ली पुलिस को 2020 में दंगों की जाँच के लिए फटकार लगाई है. इससे पहले भी कई ऐसे मामले हैं, जिनमें दिल्ली पुलिस को कोर्ट की तरफ़ से फटकार लगाई जा चुकी है.
सितंबर 2021 में दिल्ली की कड़कड़डूमा अदालत में जज विनोद यादव ने तीन लोगों को बरी करते हुए ये टिप्पणी की थी, “आज़ादी के बाद हुए दिल्ली के सबसे भीषण सांप्रदायिक दंगे को इतिहास देखेगा, तो इसमें जाँच एजेंसियों की नाकामी पर लोकतंत्र समर्थकों का ध्यान जाएगा कि किस तरह से जाँच एजेंसियाँ वैज्ञानिक तौर-तरीक़े का इस्तेमाल नहीं कर पाईं.”
अगस्त 2023 में तीन लोगों को दंगा फ़ैलाने के मामले में बरी करते हुए कड़क़डूमा कोर्ट में जज पुलस्त्य प्रमचाला ने कहा कि उन्हें शक है कि पुलिस ने “सबूतों के साथ छेड़छाड़ की है और केस की ठीक तरीक़े से जांच नहीं की है.”
अब तक फ़ैज़ान के केस में कोई गिरफ़्तारी नहीं हुई है. हालाँकि, दिल्ली पुलिस ने बीबीसी को बताया था कि फ़रवरी तक 758 एफ़आईआर में वो 2,619 लोगों को गिरफ़्तार कर चुकी है.
मंगलवार को फ़ैसले का स्वागत करते हुए क़िस्मतुन की वकील वृंदा ग्रोवर ने कहा, “दिल्ली पुलिस का इस केस में बर्ताव बाक़ी दंगों से मामलों से बिल्कुल अलग है. कई मामलों में पुलिस ने बहुत तेज़ी से गिरफ़्तारी की है कम सबूत होते हुए. यहाँ फ़ैज़ान पर हमले का वीडियो होने के बाद भी किसी की गिरफ़्तारी नहीं हुई है,”
उन्होंने कहा, “अब समय आ गया है कि एक प्रभावी जांच की जाए. मुझे उम्मीद है कि सीबीआई निष्पक्ष और पेशेवर तरीके से जांच करेगी और यह सुनिश्चित करेगी कि इस घृणित अपराध को अंजाम देने वाले पुलिस कर्मियों को क़ानूनी परिणाम भुगतना पड़े.”
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