दिल्ली दंगों में मारे गए हेड-कॉन्सटेबल रतन लाल का परिवार अब किस हाल में है?

- Author, भूमिका राय
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
"मैं उनके लौटने का इंतज़ार करना चाहती हूं, जैसे पहले किया करती थी लेकिन अब इंतज़ार भी नहीं है. पता है कोई नहीं आने वाला. पहले जैसा कुछ भी नहीं रहा… ना मैं, ना मेरे तीनों बच्चे और ना हम लोगों की ज़िंदगी. हम चारों अपने-अपने हिस्से की याद समेटे हुए हैं, उसी को दोबारा जीने के लिए रोते हैं और उसी के सहारे जी भी रहे हैं."
साल 2020 फरवरी में, दिल्ली में भड़के हिंसक दंगों में 53 लोगों की जान गई थी.
दिल्ली पुलिस ने दिल्ली हाईकोर्ट में जो हलफ़नामा दायर किया उसके मुताबिक़, दंगों में जिन 53 लोगों की जान गई, उनमें 40 मुसलमान थे और 13 हिंदू.
इन्हीं दंगों में पूनम ने अपने पति और दिल्ली पुलिस में हेड-कॉन्सटेबल रहे रतन लाल को खो दिया था.
पूनम अब दिल्ली में नहीं रहती हैं. जिस घर को उन्होंने और पति रतनलाल ने एक-एक पाई जोड़कर बनाया था, अब वो घर बंद पड़ा है.
दिल्ली में बुराड़ी के अमृत विहार में बसा-बसाया घर छोड़ अब वो जयपुर आ गई हैं. यहां वो अपने भाई के घर रहती हैं. उन्होंने बच्चों का दाख़िला भी यहीं के एक स्कूल में करवा दिया है.
पूनम बताती हैं, "प्लान था कि जब वो रिटायर हो जाएंगे तो हम लोग जयपुर आ जाएंगे रहने के लिए लेकिन ऐसे आएंगे, ये तो सपने में भी नहीं सोचा था."
रतन लाल मूलरूप से राजस्थान के सीकर के रहने वाले थे लेकिन 1998 में दिल्ली पुलिस में नौकरी लगने के बाद से वो दिल्ली में ही बस गए थे.
पूनम कहती हैं, "वहाँ अकेले सब कुछ संभाल पाना बहुत मुश्किल हो रहा था. मेरे तीन छोटे बच्चे हैं और उन्हें अकेले संभाल पाना नहीं हो पा रहा था."
वो कहती है, "बुरा तो लगता है कि एक जगह, जहां ईंट-ईंट जोड़कर घर बनाया, जहां सब कुछ किया वो जगह छोड़नी पड़ी. बच्चों को अपना स्कूल छोड़ना पड़ा लेकिन मजबूरी सब कुछ करा लेती है."
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हालांकि पूनम बीच-बीच में दिल्ली जाती रहती हैं.
उन्होंने बताया, "ऐसा नहीं है कि मैंने एकदम से घर छोड़ दिया है. महीने-दो महीने में घर जाती रहती हूं. वहां जाकर खुशी होती है. सारी पुरानी यादें ताज़ा हो जाती हैं. घर में जाते ही उनकी फ़ोटो दिखती है, अच्छा लगता है लेकिन साथ ही टीस भी उठती है."
पूनम कहती हैं, "बुराड़ी वाले घर जाती हूं तो लगता है कि अपने घर आ गई हूं लेकिन उनका नहीं होना अखरता है. याद आता है कि कैसे वो सुबह जाते थे तो मैं गेट बंद करती थी. शाम को आते थे तो गेट खोलती थी. पर सबसे अधिक याद आता है उनका पुकारना. जिस नाम से वो मुझे पुकारते थे, उस नाम से कोई नहीं पुकारता…ना ही पुकार सकता है."
वो कहती हैं, "24 फरवरी के बाद से हमारी ज़िंदगी में कुछ भी पहले जैसा नहीं रहा. पहले हम लोग जब छुट्टियों में जयपुर आते थे और वापस दिल्ली जाते थे तो वो हमें बस अड्डे लेने आ जाया करते थे लेकिन अब पता होता है कि कोई नहीं आएगा हमें लेने. कभी नहीं."

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दिल्ली दंगों के दो साल हो गए हैं.
दंगों में 53 लोगों की मौत हुई थी, जिसमें 40 मुसलमान थे और 13 हिंदू थे.
रतन लाल की मौत चांदबाग़ इलाक़े में हिंसा के दौरान हुई थी.
उनके फेफड़े में 'राइफ़ल्ड फ़ायरआर्म' के घाव के थे.
रतन लाल की हत्या के मामले में 17 लोगों को गिरफ़्तार किया गया. लेकिन सीसीटीवी फुटेज में किसी के हाथ में रिवॉल्वर या फ़ायरआर्म्स नहीं थे.
बाद में दिल्ली हाई कोर्ट ने इस मामले में पांच अभियुक्तों को ज़मानत दे दी थी.
फ़ैसले को दिल्ली पुलिस ने सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी है.


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'दो साल में बदला कुछ नहीं, बस दुख बर्दाश्त करना आ गया'
पूनम जिस समय हमसे बात कर रही थीं उनकी बड़ी बेटी घर पर ही थीं और बाकी दो बच्चे स्कूल गए हुए थे. लेकिन पूरे इंटरव्यू के दौरान उनकी बड़ी बेटी एक कमरे में ही रहीं, बाहर नहीं आई.
दोनों बच्चे जब स्कूल से आए तो पूनम ने इंटरव्यू रोक दिया. जब दोनों बच्चे उस कमरे में चले गए जिसमें उनकी बड़ी बहन थी, तब जाकर पूनम ने दोबारा बात शुरू की.
पूनम कहती हैं, "ना तो मैं अपने बच्चों से इस बारे में बात करती हूं और ना चाहती हूं कि कोई मेरे बच्चों को ये सब कुछ याद दिलाए."
वो कहती हैं, "हम चारों की अपनी यादें हैं और हम उन्हीं के सहारे हैं लेकिन मैं नहीं चाहती हूं कि मेरे बच्चों से कोई इस बारे में पूछे या फिर किसी भी तरह से उन्हें कुछ भी याद दिलाए. मैं ख़ुद उनके सामने ऐसे बनकर रहती हूं जैसे कुछ हुआ ही नहीं हो."
हालांकि वो ये मानती हैं कि ये सब कर पाना बेहद मुश्किल है.
वो कहती हैं, "बच्चे अभी बहुत छोटे हैं तो हर छोटी-बड़ी बात पर महसूस करते हैं ही लेकिन जैसे ही वो कुछ बोलना शुरू करते हैं मैं हट जाती हूं. या कोई और बात छेड़ देती हूं. पर हर समय ऐसा नहीं हो पाता है."
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पूनम बताती हैं कि पैरेंट्स-टीचर मीटिंग होती है तो उनके लिए बच्चों को संभाल पाना ज़्यादा मुश्किल होता है.
वो कहती हैं, "बच्चे कहते कुछ नहीं हैं लेकिन उनका चेहरा उतर जाता है क्योंकि ज़्यादातर बच्चे अपने पापा-मम्मी दोनों के साथ आते हैं."
पूनम मानती हैं कि बच्चों के लिए मां और पिता दोनों ही ज़रूरी हैं. वो कहती हैं, "मैं कोशिश तो करती हूं लेकिन पूरी पापा बन नहीं पाती. पापा होते हैं तो बच्चों की फ़रमाइश का कोई तय वक़्त नहीं होता. वो जो चाहें, जब चाहें मांग लेते थे. पापा लाते भी थे, लेकिन मैं किसी भी समय घर से बाहर जाकर सामान नहीं ला सकती हूं. मैं रात में घर से बाहर नहीं निकल सकती."
हालांकि पूनम कहती हैं कि वो अपने बच्चों को एक सामान्य ज़िंदगी देने के लिए अपनी ओर से पूरी कोशिश कर रही हैं.

पति की मौत के बाद किया एमए
पूनम कहती हैं, "मैं नहीं चाहती कि मेरे बच्चे मुझे हर समय रोती रहने वाली मां के तौर पर देखकर बड़े हों. मैं चाहती हूं वो मुझे मज़बूत देखें. इसलिए मैं उनके सामने तो बिलकुल भी नहीं रोती. वैसे भी रोकर कुछ हासिल नहीं होना है."
पूनम के लिए बीते दो साल बहुत मुश्लिक भरे रहे हैं. पति की मौत, घर छूटना, नई जगह आना और बच्चों के भविष्य के लिए ख़ुद को संभालना. लेकिन इन सबके बावजूद उन्होंने तय किया कि वो आगे पढ़ेंगी ताकि अपने बच्चों को एक बेहतर भविष्य दे सकें.
पूनम ने इसी साल एमए की पढ़ाई पूरी की है.
वो बताती हैं, "जब मेरी शादी हुई थी तब तक मैंने सिर्फ़ बीए किया था. मैंने अपने पति से आगे पढ़ाने के लिए कहा तो उस समय उन्होंने मना कर दिया था. फिर बाद में ख़ुद ही उन्होंने बीएड करवाया. अब जब वो नहीं हैं तो मुझे और सक्षम बनना पड़ेगा, इसीलिए एमए किया."
पूनम बताती हैं कि पढ़ाई करने की एक वजह ये भी थी ताकि ध्यान बंटा रहे.
पढ़ाई करने का दूसरा मक़सद ये भी है कि पूनम अपने पैरों पर खड़ी होना चाहती हैं. वो चाहती हैं कि नौकरी करें ताकि अपने परिवार को बेहतर तरीक़े से संभाल सकें.
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आर्थिक सहायता मिली है लेकिन नौकरी मिल जाती तो बड़ी मदद होती
पूनम इस बात की तस्दीक करती हैं कि उन्हें सरकार की तरफ से आर्थिक सहायता मिली है. दिल्ली सरकार की ओर से भी उन्हें सहायता राशि उपलब्ध कराई गई है लेकिन वो चाहती हैं कि दिल्ली सरकार उनकी नौकरी के लिए भी सोचे.
वो बताती है, "जिस समय हम दिल्ली में थे तो मेरी नौकरी के लिए कहा गया था लेकिन अभी तक नौकरी का कुछ भी नहीं हो सका है. पुलिस में नौकरी का प्रस्ताव था लेकिन वो मैंने मेरे बेटे के लिए रखवा दी है. मैं बस इतना चाहती हूं कि सरकार मुझे मेरी शिक्षा के अनुरुप नौकरी दे दे ताकि मैं अपना और अपने बच्चों का भविष्य बेहतर कर सकूं. किसी पर आश्रित ना होना पड़े."
वो बताती हैं कि दिल्ली पुलिस के कुछ अधिकारी अक्सर उनका और उनके बच्चों का हालचाल लेते रहते हैं.
हाल ही में रतन लाल को गैलेंट्री-अवॉर्ड से भी नवाज़ा गया है.
हालांकि उनकी पत्नी यानी पूनम का कहना है कि उस समय कहा जा रहा था कि उन्हें शहीद का दर्जा दिया जाएगा लेकिन अभी तक उन्हें शहीद का दर्जा नहीं दिया गया है.
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क्या हुआ था उस दिन
तारीख़ 24 फ़रवरी 2020. दिन सोमवार.
दिल्ली पुलिस के हेड कॉन्स्टेबल रतन लाल के लिए यह एक आम दिन था. बरसों की आदत के मुताबिक़ उन्होंने सोमवार का व्रत रखा हुआ था. सुबह 11 बजे वह अपने दफ़्तर यानी गोकुलपुरी एसीपी ऑफ़िस के लिए रवाना हो गए.
दिल्ली में उस वक़्त तक दंगे भड़क चुके थे.
हेड कॉन्सटेबल रतन लाल ड्यूटी पर थे और इसी दौरान चांदबाग़ इलाक़े में 25 फ़ुटा रोड के पास एक बड़ी भीड़ जमा हो गई. पत्थरबाज़ी हुई और रतन लाल इसी दौरान घायल हो गए.
उन्हें घटनास्थल के ठीक सामने मौजूद नर्सिंग होम ले जाया गया लेकिन उन्हें बचाया नहीं जा सका.
उस दिन को याद करते हुए पूनम सिर्फ़ इतना ही कहती हैं, "मैं बस यही सोचकर कांप उठती हूं कि जिस आदमी पर तेल के छींटे पड़ जाते थे तो वो चीख उठता था, उसे गोली लगी होगी तो कितना दर्द हुआ होगा उसे.
हेड कॉन्सटेबल रतन लाल की पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट के मुताबिक़ उनके शरीर पर 21 घाव थे.
उनकी मौत अत्यधिक खून बहने से हुई और ये उनके फेफड़े में 'राइफ़ल्ड फ़ायरआर्म' के घाव के कारण हुआ था.
रतन लाल की हत्या के मामले में जिन 17 लोगों की गिरफ़्तारी पुलिस ने की, उन्हें सीसीटीवी वीडियो फ़ुटेज के आधार पर अभियुक्त बनाया गया था. पुलिस के मुताबिक इनके हाथ में, डंडे, रॉड और पत्थर थे.
लेकिन पुलिस की सीसीटीवी फुटेज के विवरण के मुताबिक़, इनमें से किसी के भी हाथ में राइफ़ल-रिवाल्वर जैसे फ़ायरआर्म्स नहीं थे. साथ ही पुलिस पूरी चार्जशीट में कहीं भी ये नहीं बताती कि इन 17 लोगों में से किसने और कैसे कॉन्स्टेबल रतन लाल की हत्या की है.

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कई अभियुक्तों को मिल चुकी है ज़मानत
सितंबर 2021 में दिल्ली हाई कोर्ट ने हेड कांस्टेबल रतन लाल की हत्या के मामले में पांच अभियुक्तों आरिफ, शाहबाद, फुरकान, सुवलीन और तबस्सुम को ज़मानत दे दी थी.
कोर्ट ने जमानत देते हुए कहा था कि लोकतंत्र में विरोध प्रदर्शन करना और अपनी असहमति व्यक्त करना एक मौलिक अधिकार है.
कोर्ट ने पुलिस को आड़े हाथों लेते हुए कहा कि ये अधिकार इस्तेमाल करने वालों की क़ैद को जायज़ ठहराने के लिए अधिकार के प्रयोग मात्र को हथियार की तरह इस्तेमाल नहीं करना चाहिए.
मामले की सुनवाई कर रहे जज जस्टिस सुब्रमण्यम प्रसाद ने कहा था, "भारतीय दंड संहिता की धारा 149 को, विशेषत: जब उसे धारा 302 के साथ पढ़ा जाए, सामान्य आरोपों और अस्पष्ट सबूतों के आधार पर लागू नहीं किया जा सकता. जब भीड़ से जुड़ा मामला हो तब अदालतों को जमानत देने या ख़ारिज करते समय इस नतीज़े पर पहुंचने में कोताही बरतनी चाहिए कि ग़ैर-कानूनी सभा के सभी सदस्य एक ग़ैर-क़ानूनी साझे उद्देश्य को हासिल करने का साझा इरादा रखते हैं."
इसके साथ ही कोर्ट ने कहा है कि यह उसका संवैधानिक कर्तव्य है कि राज्य की शक्ति की अधिकता की स्थिति में व्यक्तिगत स्वतंत्रता को मनमाने ढंग से न छीना जाए.
दिल्ली पुलिस ने हाई कोर्ट के इस फ़ैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी है.
इस मामले के संबंध में ताज़ा जानकारी के लिए बीबीसी ने जब दिल्ली क्राइम ब्रांच से संपर्क किया तो वहाँ से सिर्फ़ इतना ही कहा गया कि ये मामला कोर्ट में है, इसलिए अभी इस पर कोई टिप्पणी नहीं की जा सकती.
वहीं पूनम की ओर से इस मामले में कोई केस दर्ज नहीं कराया गया है.
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